Wednesday, 9 January 2019

पत्तियाँ छांटने की कवायद


                                पत्तियाँ छांटने की कवायद

          जड़ सींचने की शिक्षा हमारे बुज़ुर्ग लोग दिया करते थे । जड़ ही सुरक्षित न रहा यदि, फिर पत्तियों और तनों का क्या होगा ? जड़ गया कि सब नेस्तोनाबूद ।

बात में दम भी है ।

किसी ऐसे ही जड़ को जड़ से समाप्त करने की प्रतिज्ञा ली थी आचार्य चाणक्य ने । ये कहने की जरुरत नहीं कि वे मगध-विभूति थे । और आज भी समीचीन हैं । भविष्य में भी रहेंगे ।

किन्तु बड़े खेद की बात है कि कौटिल्य के उसी मगध या जरा विस्तार से कहें तो ऐतिहासिक पाटलीपुत्र या और विस्तार दें तो हमारे बिहार में जड़ पर प्रहार किये वगैर, पत्तियों की छंटायी की कवायद चल रही है । हालाकि बिलकुल पहली बार ऐसा किसी राज्य में हुआ है- सो बात नहीं है । ऐसे प्रयास, सुप्रयास, दुस्प्रयास कई बार चलते रहे हैं—अलग-अलग कार्यों के लिए, अलग-अलग प्रदेशों में । ये नजदीक होने के चलते थोड़ा बड़ा दीख रहा है- वो जैसे मैग्नीफाइंग-ग्लास से दीखता है न, ठीक वैसा ही ।

 जग-जाहिर है कि छोटे-बड़े आकार देने का काम मीडिया के जिम्मे होता है । इसका मुंह मीठा रहेगा तो करेला भी कलाकन्द सा स्वाद देगा, अन्यथा कलाकन्द भी खाने की कोई चीज है ! बहुत ही गैस बनाता है पेट में पहुँच कर ।

    खैर, बात मैं शुरु किया था पत्तियों की कटाई-छंटाई से । क्यों कि नयी वाली चाणक्य नीति यही है- पत्तियाँ छांटते रहो, जड़ को तो छूना भी मत , क्यों कि सबका जड़ वहीं है- तुम्हारा भी हमारा भी । नेता का भी, अनेता का भी । विजेता का भी, अविजेता का भी । पक्ष का भी , प्रतिपक्ष का भी । एक ही ईश्वर के अनेक रुपों की तरह, एक ही कारण का सारा कुछ विस्तार भर है ।

  दरअसल हमारे सरकार बहादुर के पास वो ‘’सायन्स-रिव्यू’’ वाली मैगज़ीन अभी हाल में पहुँची है शायद । छपी तो बहुत पहले थी, वैज्ञानिकों ने अगाह तो शुरु में ही कर दिया था- मेरिट-डिमेरिट का, परन्तु वो क्या है न कि जानकारी या कहें सूचना जरा देर से मिली कि प्लास्टिक-पोलीथीन आदि पर्यावरण के लिए बहुत ही हानिकारक हैं । इसी तरह शराब भी व्यक्ति और समाज के स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है । और यही कारण है कि नौकरशाहों को जरुरी फाइलें छोड़ कर महुए के पेड़ गिनने और पड़ोसी राज्यों से आने वाली ट्रेनों में ड्यूटी लगा दी गयी है । इतना ही नहीं अकसर खा-पीकर मस्त रहने वाले नगरनिगम-कर्मी भी चैतन्य हो गये हैं । सड़क-गली-नुक्कड़ों पर बड़े-बड़े वोर्ड लगाये गए हैं पर्यावरण-पुराण-सूत्र लिखकर, तथा जनता को जागरुक करने के लिए नाटकों के रंगारंग कार्यक्रम भी चलाये जा रहे । आखिर जागरुक जनता को करना है, तो इसमें पैसा भी जनता का ही लगना चाहिए न ! इसीलिए  टैक्स के पैसे को पानी की तरह बहाकर,  एन्फ्रास्ट्रकचर के विकास के बजाय वौद्धिक-विकास यानी पर्यावरण की समझ पर प्रकाश डाला जा रहा है । बाजार जाते समय घर से झोला लेकर निकलने की नसीहत दी जा रही है । इसका प्रत्यक्ष लाभ तो हमें ये दीखता है कि झोले का व्यवसाय खूब विकसित होगा और आने वाले चुनाव के पहले काफी बेरोजगारों को रोजगार मिल जायेगा । पुराने अखबार की कीमत भी बढ़ेगी, क्यों कि वर्षों से ठोंगा बनाने का पिछड़ा हुआ सा व्यवसाय, फिर एकबार सिर उठाकर बाइज्जत जिन्दगी जी सकेगा ।

मजे की बात ये है कि आलू वाले को जुर्माना देना पड़ेगा पोलीथीन में आलू देने पर, किन्तु मल्टीनेशन कम्पनियों को उसी दस रुपये वाले आलू का चीप्स बनाकर 400 रुपये में बेचने पर ज़ुर्माने के बजाय बख़्सिश  देने का इन्तज़ाम है , क्यों कि बड़ी कम्पनियों के रैपर से पर्यावरण को कोई नुकसान होने का खतरा नहीं है- ऐसा शायद मंगलग्रह के एलीयन वैज्ञानिक ने दावा किया है । ठीक उसी तरह थानाप्रभारी को पूजा-दक्षिणा देकर दारु बेचने वा पीने से या वीवीआईपी लोगों द्वारा शराब का इस्तेमाल करने  से देश या समाज को कोई नुकसान नहीं होता – ठीक वैसे ही जैसे पंडितजी के पेट में जाकर अंडा भी शाकाहारी हो जाता है, उसी तरह औकाद वाले लोगों के हलक से उतर कर दारु भी गंगाजल हो जाता है ।

असल बात ये है कि आम आदमी को हमेशा अपने हद-वो-ज़द में रहना चाहिए , क्योंकि औकाद के लिए कद जरुरी है । 

किन्तु ये गम्भीर सी बातें मुझ नासमझ को समझ नहीं आ रही है कि पत्तियां छांटें या कि जड़ काटें ? क्या पोलीथीन बनानेवाली कम्पनियों को लाइसेंस देते समय सिरफिरी सरकारों को ये सोचना नहीं चाहिए था या फिर, बाजारों और गोदामों में छापेमारी करने के बजाय, सीधे कम्पनियों का प्रोडक्शन ही क्यों नहीं बन्द करवा दिया जाता ? जड़ कट जाने पर पत्तियां क्या खुद-व-खुद झड़-सूख नहीं जायेंगी ?

मंच पर भाषण देकर नहीं, मीडिया में फोटो छपवाकर नहीं, बल्कि बेडरुम में इत्मिनान से गाल या दिल पर हाथ धरकर सोचने की जरुरत है कि क्या शराब एक दिन के लिए भी बन्द हुआ है और क्या पोलीथीन भी बन्द हो जायेगा इस कवायद से ?  

मुझे तो ऐसा ही लगता है- सरकारी खजाने में शराब से मिलने वाले टैक्स का आना भले बन्द हो गया हो, पुलिस-प्रशासन के आय का एक नया ज़रिया खुल गया है, पीने-पिलाने वालों का क्रम उसी तरह जारी है और जारी भी रहेगा ।

ये कह कर मैं शराब या पोलीथीन का समर्थन नहीं कर रहा हूँ, बल्कि निर्णयात्मक सोच पर प्रश्न-चिह्न लगा रहा हूँ । कोई भी योजना बनाने से पहले उसके प्रत्येक पहलुओं पर गम्भीरता से विचार क्यों नहीं कर लिया जाता ? उतावले में बचकाने निर्णय लेकर, क्यों जनता पर थोप दिये जाते हैं?

क्या इन सवालों पर विधायिका के मदमस्त लोग विचार करेंगे कभी ?

और नहीं , तो फिर उन्हें चेत जाना चाहिए- जनता भी अपनी औकाद दिखाने को व्याकुल है ।

जय हिन्द ।

Tuesday, 1 January 2019

चौकी-चौका-चौक


                                चौकी-चौका-चौक

            वो क्या है न कि गोबर ठोंकने के लिए पहले भूसी मिलाकर गोल-गोल लोइयाँ बनाते हैं, फिर उसे किसी एक जगह पर आहिस्ते से थपकाते हैं और तब जोर से थाप मारते हैं सही जगह पर, ताकि गोइठा सही आकार लेले और तब तक चिपका रहे, जबतक उखाड़ा(हटाया) न जाये ।

            कुछ कहने से पहले, कुछ और कहना जरुरी सा लग रहा है । कुछ और का मैटर नहीं है मेरे पास, इसलिए जानी-पहचानी-पुरानी एक कहानी कहकर ही अपनी बात रखने की न्यू बना रहा हूँ ।

नेता और पंडित में बहुत मामले में समानता है । एक भाषण पिलाने को बेताब रहता है और दूसरा प्रवचन पिलाने को । भले ही भाषण किसी और ने लिखकर दिया हो, भले ही प्रवचन अभी हाल में ही कहीं सुना-पढ़ा हो, पर जल्दी से जल्दी किसी और को सुनाकर अपनी ज्ञान-गगरी को खाली कर लेना जरुरी ही नहीं अपरिहार्य समझता है ।

अनुभवी जनों का मानना है कि यदि ये ऐसा न करें तो पेट में गुड़गुड़ाहट सी होने लगती है, या हो सकता है विक्रमादित्य के वेताल वाली शर्त याद आ जाये- जानते हुए भी नहीं बोलोगे तो सिर फट जायेगा ।

नेता सदा चौक खोजता है और पंडित चौकी । या कहें तो दोनों चौक-चौकी की जुगाड़ में रहते हैं । चौकी यानी आम से थोड़ी ऊँची वाली जगह, जहां कोई खास उचक कर आसीन हो सके और अपने भीतर के गर्द-गुब्बारों को बाहर निकाल सके । भले ही उससे किसी का भला हो या बुरा । अब कहने वाला, भला कब सोचता है कि सुनने वाले पर क्या असर होगा उसकी बातों का । दरअसल असर-बेअसर तो सुनने वाले का क्षेत्र है न – वो सुने, ना सुने । सुन कर वहीं छोड़ जाये, अथवा घसीट कर घर ले जाये । हालाकि ज्यादातर होता ये  है कि हम सुन भी लेते हैं, समेट भी लेते हैं, परन्तु घसीट कर घर तक ले जाने की ज़हमत नहीं पालते । रास्ते में मौका पाते ही किसी और के गले मढ़ देने का प्रयास करते हैं । खैर ।

बात हो रही थी पुरानी कहानी की । एक बार एक पंडितजी भक्तों की भारी भीड़ में ऊँची सी चौकी पर बैठकर प्रवचन कर रहे थे । यजमानों को उपदेश देते हुए बोले कि बैंगन बहुत ही हानिकारक है- आयुर्वेद की दृष्टि से भी और धर्मशास्त्र की दृष्टि से भी , अब तो नासा वाले भी इसका विरोध करने लगे हैं ।

संयोग से या कहें दुर्योग से उसी स्रोता-मंडली में पंडिताइन भी बैठी थी । उस वेचारी ने तो अपने मैके में सिर्फ इतना ही सुन रखा था कि एकादशी से एक दिन पहले और एक दिन बाद बैंगन नहीं खाना चाहिए । और हां, आयुर्वेद तो यहां तक बैंगन का बखान करता है कि यदि गरिष्ट भोजन कर लिए हों तो बैंगन का चोखा प्रचुर मात्रा में खा लें...सारा का सारा घासलेटी मलबा साफ हो जायेगा । किन्तु आज पंडितजी की नयी बात पंडिताइन की जानकारियों पर प्रश्न-चिह्न लगा दिया ।

भागी-भागी घर लौटी । थोड़ी देर बाद भूखे-प्यासे पंडितजी भी पधारे अकाल के कुकुर की तरह हांफते हुए ।

पितृसत्तात्मक सामाजिक व्यवस्था में स्त्री की क्या विसात !

कांपते हांथों से भोजन की थाल सामने रख गयी । कुड़कुड़ाते पेट को आश्वासन देते पंडित जी पीढ़े पर बैठते ही आग बबूला हो गए— अरे ! ये क्या सिर्फ रोटी और अचार...सब्जी क्यों नहीं बनायी ?

भींगे कुकुर की तरह कांपती पंडिताइन ने कहा- सब्जी तो बैंगन की बनायी थी । आपका प्रवचन सुन अभी-अभी बाहर फेंक आयी ।

पंडितजी पहले तो भड़कने के मूड में आये, किन्तु प्यारी पंडिताइन के भोलेपन और पतिपरायणता का ध्यान आते ही बिलकुल नरम पड़ गए, मानों पंडिताइन नहीं कोई सलोनी सी जजमानिन ही हो सामने । मुस्कुराते हुए बोले— अरे भाग्यवती ! तुम्हें इतनी भी अकल नहीं मिली थी मैके से कि चौकी और चौका की बात जुदा-जुदा होती है। अब वहां जजमानों की जमात में बैंगन की बुराई न करुं तो गोभी-परवल भला कौन खिलायेगा ? वही सस्ता वाला बैंगन परोस देगा पूड़ी-बुन्दिया के साथ...।

 ये पुरानी कहानी बहुत कुछ सोचने-कहने का अवसर दे जाती है ।

चौकी और चौका में हम इतना फर्क क्यों कर लेते हैं ? कथनी और करनी में इतना विरोधाभास क्यों हो जाता है? कथनी का लेशमात्र भी करनी में नज़र नहीं आता । मंच पर घोषणायें बड़ी-बड़ी होती हैं और जमीन पर कुछखास उतर नहीं पाता । वचने किं दरिद्रता... वाली लोकोक्ति चरितार्थ होकर रह जाती है ।

किसी पार्टी का घोषणा-पत्र हो या किसी बाबा का प्रवचन, परिणाम और उपलब्धि सब शिफ़र । मेरी बातों पर यकीन न हो तो दस पार्टियों का चुनावी घोषणा-पत्र उठा लें, सबके मुखपृष्ठ फाड़ दें और फिर आपस में मिला दें, और फिर से पेजवाइज सजा दें । आप पायेंगे कि क्रमांकों और अनुच्छेदों में अन्तर भले हो, ‘थीममें अन्तर बिलुकल नहीं मिलेगा । सभी पार्टियां एक  जैसी चोचलेबाजी करती मिलेंगी- गरीबी की बात, किसान की बात, मजदूर की बात, दलित-शोषित की बात, मन्दिर-मस्जिद  की बात, बेरोजगार की बात, भ्रष्टाचार की बात, लूट की बात, घोटाले की बात, काले-गोरे धन की बात, मन की बात, तन की बात...।

ठीक इसी तरह दस-बीस बाबाओं के प्रवचन कलेक्ट कर कल्चर करलें। आप पायेंगे कि सबमें एक ही उपदेश है- निन्दा मत करो, चुगली मत करो, झूठ मत बोलो, चोरी मत करो, जीव हिंसा मत करो, सबमें ईश्वर का अंश है...।

नेता भाषण देकर चले जाते हैं, बाबा प्रवचन देकर । देश और समाज वहीं का वहीं ठिठका रह जाता है। अपने पुराने ढर्रे पर चलता रह जाता है । क्यों कि उसे भी पता है कि ये दोनों अपना-अपना रोजगार कर रहे हैं । न तो नेता को देश से मतलब है और न बाबा को समाज से । किन्तु मजे की बात ये है कि जान-समझ कर भी हम फिर इकट्ठे हो जाते हैं- किसी बाबा या कि नेता की बकबक सुनने को ।

नेता की बातों में सिर्फ एक पर ईमानदारी से पहल हो जाये- भ्रष्टाचार पोलियो उन्मूलन की तरह जड़-मूल से समाप्त हो जाये, तो देश की दिशा और दशा दोनों बदल जाये ।

बाबाओं की बात में सिर्फ एक पर पहल हो जाये- सर्वत्र एक ही ईश्वरीय सत्ता है, फिर संसार की सारी समस्यायें ही समाप्त हो जायें । कौन किसकी निन्दा करेगा, कौन किससे और किसकी चुगली करेगा, कौन हिंसा करेगा !

आजकल विभिन्न जातीय सम्मेलनों की बाढ़ आयी है । सभी जातियां एकजुट होने को उतारु हैं । सब अपने-अपने खेमे में घुस जाने को आतुर दीखते हैं । क्यों कि मानव वाली बड़ी सी कनात माकूल नहीं लगती ।

किन्तु दीखते भर हैं । होते नहीं ।

जरा गौर फरमायें तो पायेंगे कि वहां भी कुर्सी और तिजोरी की ही कवायद है सिर्फ । पूरी जमात सचिव-अध्यक्ष-कोषाध्यक्ष  की कुर्सी पर ही आसीन होना चाहता है । कार्यकर्ता तो कोई रहना ही नहीं चाहता । और परिणाम—टुकड़े-टुकड़े-टुकड़े । पूरी कायनात फाड़-फूड़, नोच-चोंथ कर रुमाल भर भी बच नहीं पाता सलामत ।

दरअसल ये सारा खेल अहंकार का है । समर्पण का इसमें रत्ती भर भी खुशबू नहीं है । अहं में सत्ता की भूख है सिर्फ , समर्पण में सेवा का भाव । यहां रखना कुछ है ही नहीं । पाना कुछ है ही नहीं । सिर्फ देना और देना है । करना और करना है ।

इस अहंका ही विसर्जन करना होगा । अहं गया कि ईश्वर उतरा । चौकी-चौका का भेद मिटा कि सबकुछ चौक में बदल जायेगा । अस्तु।