Tuesday, 29 April 2014

पुण्यार्कवनस्पतितन्त्रम् 23

(१७) वचआयुर्वेद में मेधा-वर्धक औषधियों में वच की प्रसिद्धि है।मुख्यतः यह दो प्रकार का होता है- मीठा और कड़वा।कड़वे स्वाद वाले वच को घोड़वच भी कहते हैं।यह किंचिंत जहरीला भी होता है- यानी अधिक मात्रा में सेवन प्राण-घातक हो सकता है।सद्यः प्रज्ञा हरा तुण्डी,सद्यः प्रज्ञा करी वचाः –आर्ष-वचन इस बात को ईंगित करता है कि वच आशुगुणकारी है- खासकर प्रज्ञा के मामले में।स्नायुतन्त्र पर बड़ा अच्छा प्रभाव है वच का।संगीत प्रेमियों के लिए वच,मुलहठी,कुलंजन आदि सद्यः आशीष हैं- यदि इच्छित कोकिल नाद स्वरम्, पिव माघ चतुर्दश कृष्ण दिनम्।अद्रक,भद्रक,पीतरसं,वच,वाकुचि,ब्राह्मी,सद्य घृतम्।।
    इस चेतना-साधक वनस्पति को ग्रहण करने के लिए अन्य वनस्पतियों की तरह नक्षत्रों का आधार न लेकर सूर्यादिग्रहण का आधार लेना है;यानी दोनों में से किसी भी ग्रहणकाल में- जो अपेक्षाकृत लम्बा हो। शेष बातें- स्थापन-पूजन विधान पूर्व निर्दिष्ट ही रहेंगे।हाँ,स्थापनोपरान्त वागीश्वरी मंत्र का कम से कम ग्यारह माला जप प्रतिदिन के हिसाब से २१ दिनों तक करना चाहिए,साथ ही दशांश विधि से होमादि कर्म  भी सम्पन्न करने के पश्चात् यह प्रयोग-योग्य हो जाता है।वच का बांदा अथवा वच की गांठ(कुछ भी) इसी भांति साधित करके प्रयोग करना चाहिए।
   वच का चूर्ण वनाकर आधा चम्मच चूर्ण मधु या गोघृत के साथ प्रातः-सायं लागातार इक्कीश दिनों तक सेवन करने से हर प्रकार की स्वरमंडलीय व्याधियाँ- हकलाहट,स्वरभंग,उच्चारण-दोष,जिह्वा-कष्ट आदि ठीक होकर स्वर मधुर बन जाता है। साथ ही अद्भुत रुप से वाक्-सिद्धि भी होती है।नित्य का औषध-सेवन यदि सूर्योदय से पूर्व किया जाय तो लाभ और भी अधिक हो सकता है।
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Monday, 28 April 2014

पुण्यार्कवनस्पतितन्त्रम् 22

(१६)  निम्ब का बाँदा- आम की तरह ही नीम का बाँदा भी सहज प्राप्त है।आयुर्वेद में नीम को बहुत उपयोगी माना गया है।तन्त्र शास्त्र में इसका उपयोग षट्कर्मों (में तीनअधम) के लिए किया जाता है।इसके ग्रहण के लिए दो नक्षत्र कहे गए हैं- उद्देश्य-भेद से।सिर्फ प्रक्षेपण के लिए ज्येष्ठा और स्थापन के लिए आर्द्रा नक्षत्र का चयन करना चाहिए।अधम तान्त्रिक तो दोनों ही रखते हैं।चूंकि इसका प्रयोग अधम कार्य के लिए ही है,अतः प्रयोग से बचना चाहिए,और सबसे बड़ी बात ये है कि एकपक्षीय(निजस्वार्थ वस) आप ऐसा करते हैं तो बर्ष भर के अन्दर ही आपको इसका दुष्परिणाम भुगतना पड़ेंगा।अतः प्रयोग से पूर्व सौ बार सोच लें कि आप जिसे सताने के लिए यह प्रयोग करने जा रहे हैं,क्या वह सच में दोषी है?यदि सच में दोषी है तो इस तन्त्र से उसे सजा अवश्य मिलेगी,और यदि निर्दोष है,तो सजा सौगुना होकर प्रयोग कर्ता को भोगनी पड़ेगी।वैसे यह प्रयोग है विलकुल अमोघ।
          पूर्व निर्दिष्ट विधान से नीम के बाँदा को प्राप्त करे,और आगे की सारी प्रक्रियायें- स्थापन-पूजनादि पुस्तक के प्रारम्भ में वतलायी गयी विधि से सम्पन्न करें।फर्क इतना ही है कि बाकी सारे प्रयोग घर में किए जाने का निर्देश है,जब कि इस क्रिया की पूरी साधना घर में नहीं करनी है- अनुकूल किसी अन्य सुरक्षित स्थान में करनी है।क्रिया पूरी हो जाने पर भी तैयार साधित निम्बबाँदा को घर में लाकर रखना भी नहीं है,अन्यथा विपरीत परिणाम होंगे।स्थापन पूजन के बाद चामुण्डा मंत्र का कम से कम छतीस हजार,और अधिक से अधिक सवा लाख जप करना चाहिये- दशांश प्रक्रिया सहित।
         ऊपर दो ग्रहण-नक्षत्रों की चर्चा है।ज्येष्ठा ग्रहित बांदा को चूर्ण करके विरोधी के शरीर पर (विशेष कर सिर पर)छिड़क देने की बात है,तो आर्द्रा ग्रहित बांदा को शत्रु के घर में(सम्पूर्ण बांदा) किसी तरह स्थापन का विधान है- यानी उसके घर में गाड़ दे- खास कर उसके शयन-कक्ष में साधित बांदा की उपस्थिति अनिवार्य शर्त है,क्यों कि घर के किसी अन्य भाग में रहने पर परिवार के अन्य लोगों पर ही प्रभाव पड़कर रह जायेगा,खास व्यक्ति अछूता ही रहेगा।ध्यातव्य है कि प्रयोग समय के संकल्प का भी ध्यान रखना है- आप उसके साथ करना क्या चाहते हैं?सजा कौन सी दे रहे हैं?
      अन्य प्रयोग- नीम के बीजों से निकाला गया तेल विभिन्न औषधियों में प्रयुक्त होता है।किसी रविपुष्य योग में नीम के तेल को नौ हजार चामुण्डामंत्र से अभिमंत्रित करके किसी पात्र में रख दे।फिर उस पात्र में विरोधी की तस्वीर(नाम पता सहित लिखकर)डुबो कर कहीं किसी भी नीम के पेड़ पर टांग दें- काले कपड़े में बांध कर।आपका अभीष्ट पूरा होगा थोड़े ही दिनों में- जो संकल्प साधे रहेंगे- प्रयोग में।
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Sunday, 27 April 2014

पुण्यार्कवनस्पतितन्त्रम् 21

                      (१५) 

 कर्पास,रोहित,शाखोट,अशोक,और विल्व- 

     बाँदा प्रकरण के ये अद्भुत रत्न हैं।इनके ग्रहण-काल-भेद हैं- क्रमशः भरणी,अनुराधा,मृगशिरा,उत्तराषाढ़ और अश्विनी नक्षत्र,शेष प्रक्रिया और प्रयोग विलकुल समान हैं। किन्तु संत निर्देशानुसार इसके पूर्ण मंत्र रहस्य को स्पष्ट नहीं कर पा रहा हूँ।वैसे भी आज के विकृति-वहुल परिवेश में इस तरह की शक्तियों की चर्चा सर्वथा अनुचित ही है,क्यों कि निश्चित है कि जान लेने के बाद इनका दुरुपयोग ही होगा.सदुपयोग होने का सवाल ही नहीं है।आँखिर कोई अदृश्य होकर क्या करेगा? मुझे पूरा भरोसा है संत के वचन पर,और तन्त्र के सिद्धान्त पर भी।हाँ,इसके एक अन्य प्रयोग की चर्चा यहाँ करना अप्रासंगिक नहीं होगा- इन बाँदाओं को विधिवत संस्कार करके, शुद्ध गोरोचन के साथ मिश्रण करे,और अंजन की तरह आँखों में लगाकर भूमिविदारण मंत्र का प्रयोग करने से भूगर्भ-तन्त्र का ज्ञान होता है।यहाँ यह ध्यान रखना आवश्यक है कि भूमिविदारण मंत्र की साधना(सवा लाख जप)पहले सुविधा नुसार कर लेनी चाहिए,तभी समय पर प्रयोग करने पर कारगर होगा।
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पुण्यार्कवनस्पतितन्त्रम्-20

14- विदारीकन्द- विदारीकन्द एक जंगली लता है,जिसके कन्द(गांठदार मूल) का प्रयोग शक्तिवर्धक औषधी के   रुप में किया जाता है।इसकी पत्तियाँ पान की तरह होती हैं,और कंद- वाराही कंद की तरह(किन्तु रोंयेंदार नहीं)होते हैं।स्वाद में थोड़ा कड़वा होता है।यूँ तो किसी लता में बाँदा का होना असम्भव सा है,फिर भी जंगलों में भटककर अन्वेषण करने से इस लता का एक खास रुप मिल सकता है- जिसके लरियों में कहीं-कहीं उभरी हुयी गांठे (एक प्रकार की विकृति) मिल जायेगी- यही विदारीबाँदा है।इसे पूर्व वर्णित विधि से पूर्वाफाल्गुन नक्षत्र में घर लाकर स्थापन-पूजन करके पूजा-स्थल या तिजोरी में स्थायी रुप से स्थान देदें।धन-वृद्धि के लिए बड़ा ही सरल प्रयोग है यह।
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पुण्यार्कवनस्पतितन्त्रम्-19

(13)              सम्भालू-(निर्गुण्डी)- सम्भालु चावल की एक प्रजाति है- राजभोग,देहरादून,वासमती आदि की तरह
किन्तु यहाँ मेरा वर्ण्यविषय निर्गुण्डी है।इसका एक संस्कृत नाम शेफालिका भी है।शेफालिका के पौधे मध्यम आकार- दस-पन्द्रह फीट के करीब होते हैं,जिनकी पत्तियाँ अरहर की पत्तियों जैसी होती हैं,किन्तु रहर की पती हरे रंग की होती है,जबकि शेफालिका की पत्तियों पर लगता है कि प्रकृति ने धूल भरे चूने का छिड़काव कर दिया हो।इसके हल्के नीले फूल बड़े ही सुहावने लगते हैं।बिहार में इसे सिन्दूवार के नाम से जाना जाता है।इसके और भी कई क्षेत्रीय नाम हैं- मेउडी,भूत केशी,सिन्धुर,अर्थ सिद्धक,इन्द्राणी आदि।इन्द्राणी नाम से भ्रमित नहीं होना चाहिए, क्योंकि इन्द्रायण या इन्द्रवारुण नाम का एक अन्य वनस्पति(लता) भी है।निर्गुण्डी बिहार-झारखंड के जंगलों में प्रचुर मात्रा में पाया जाता है।किन्तु इसका बाँदा अति दुर्लभ है।आयर्वेद में निर्गुण्डी के पंचांग(फल,फूल,मूल,त्वक,पत्र) का उपयोग होता है।यह उत्तम कोटि का वेदनाहर है।तन्त्र में इसके मूल और बाँदा ही उपयोगी हैं।
(क) बाँदा- सौभाग्य से कहीं इसका बाँदा दीख पड़ें तो हस्ता नक्षत्र में पूर्व वर्णित विधि से घर लाकर स्थापन-पूजन करके तिजोरी में स्थान देदें।आर्थिक समृद्धि के लिए यह अति उपयोगी है।अर्थोपार्जन के नये-नये क्षेत्र दीखने लगते हैं,और थोड़े प्रयास में पर्याप्त सफलता भी लब्ध हो जाती है।
 (ख)मूल- निर्गुण्डी-मूल के कई प्रयोग हैं।इसके ग्रहण के लिए रविपुष्य/गुरुपुष्य योग का विचार करके  पूर्व निर्दिष्ट विधि से घर लाना चाहिए।मूल का स्थापन-पूजन भी पूर्ववत अनिवार्य शर्त है।पूजन के बाद सुरक्षित रख देना चाहिए,ताकि आवश्यकतानुसार उपयोग किया जा सके।यहाँ बतलाये जा रहे सभी प्रयोग आयुर्वेदीय मत से ग्राह्य हैं।इनका उपयोग वैसे भी किया जा सकता है;किन्तु तान्त्रिक विधि से ग्रहित-साधित वनस्पतियों का अपना ही चमत्कार है।
o   1.स्वर-शोधन- पूर्व साधित निर्गुण्डी-मूल को सुखाकर चूर्ण वनालें।आधे चम्मच चूर्ण को सुसुम पानी के साथ प्रातः-सायं कुछ दिनों तक लेते रहने से कंठ-स्वर सुरीला होगा।गले की अन्य समस्याओं में भी इसे प्रयोग किया जा सकता है।
§  2.कृशता-निवारण- पूर्व साधित निर्गुण्डी-मूल को सुखाकर चूर्ण वनालें।आधे चम्मच चूर्ण को सुसुम दूध के साथ नित्य प्रातः-सायं कम से कम एकतीस दिनों तक लेने से पाचन-क्रिया ठीक होती है,और बल-वीर्य-ओज की वृद्धि होती है।इस चूर्ण को आयुर्वेदिक अन्य पुष्टिकर योगों के साथ मिला कर भी लिया जा सकता है।
o   3.रक्त शोधन- विभिन्न प्रकार के चर्मरोगों(दाद,खाज,खुजली,एक्जीमा आदि सत्ताइश प्रकार के क्षुद्र कुष्ट)में  पूर्व साधित निर्गुण्डी-मूल को सुखाकर चूर्ण वनालें।आधे चम्मच चूर्ण को मधु के साथ नित्य प्रातः-सायं छः महीने तक लागातार सेवन करने से समस्त रक्त दोषों का निवारण होता है।


o   4.शान्तिदायी- पूर्व कथित विधि से निर्गुण्डी मूल का स्थापन-पूजन करके घर में किसी पवित्र स्थान पर रख दें।नित्य प्रति और कुछ नहीं तो कम से कम श्रद्धापूर्वक प्रणाम ही कर लिया करें।इस क्रिया से अनेक  लाभ होंगे- घर में शान्ति-सुख-समृद्धि आयेगी।टोने-टोटके से घर की रक्षा होगी।
o   5. व्यापार-वृद्धि- विधिवत ग्रहण किए गये निर्गुण्डी मूल (वा पंचाग) को पीले वस्त्र में,पीले सरसो के साथ बांधकर दुकान के चौखट में लटका देने से रुके हुए ग्राहक का आगमन होने लगता है।व्यापार में अप्रत्याशित रुप से विकास होने लगता है।
o   6.सुरक्षा- निर्गुण्डी-मूल को ताबीज में भर कर धारण करने से भूत-प्रेत,जादू-टोने आदि से सुरक्षा होती है।पहले से प्रभाव-ग्रस्त रोगी भी थोड़े ही दिनों में ठीक हो जाता है।
o   7.गर्भरक्षा- जिस स्त्री को प्रायः गर्भपात हो जाता हो,उसे पूर्व साधित निर्गुण्डी-मूल को पुनः गर्भरक्षा मंत्र से अभिमंत्रित करके चांदी या तांवे के ताबीज में भर कर, लाल धागे में परोकर रवि या मंगलवार को धारण करा देना चाहिए।
8.निर्गुण्डी-कल्प- तन्त्रात्मक आयुर्वेद में निर्गुण्डी कायाकल्प का विधान है। पूर्व साधित निर्गुण्डी-मूल को सुखाकर चूर्ण वनालें।आधे चम्मच चूर्ण को बकरी के मूत्र के साथ प्रातः-सायं एक बर्ष तक सेवन करने से अद्भुत चमत्कार हो सकता है- यह क्रिया सिर्फ औषध सेवन नहीं,अपितु एक साधना की तरह है।पूरे समय शुद्ध-सात्विक जीवन निर्वाह करते हुए शिव पंचाक्षर एवं देवी नवार्ण जप का अनुष्ठान भी चलता रहेगा।सामान्य गृहस्थ जीवन में मर्यादा पूर्वक रहते हुए भी एक बर्ष की यह साधना- कल्पक्रिया की जा सकती है।कोई पूर्ण ब्रह्मचर्य पूर्वक करे तो सोने में सुगन्ध जैसी बात होगी।इस कायाकल्प के चमत्कारों का वर्णन कितना हूँ किया जाय थोड़ा है।आज के समय में आश्चर्यजनक ही कहा जा सकता है- शरीर इतना शुद्ध हो जाता है कि शस्त्र-स्तम्भन,जल-स्तम्भन,अग्नि-स्तम्भन आदि सारी क्रियायें- खेचरी विद्या की तरह सम्भव होजाती हैं।
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पुण्यार्कवनस्पतितन्त्रम्-18

(12)              कपित्थ (कैंत,कैंथ) का बाँदा- यह गणेशजी का प्रिय फल है- कपित्थ जम्बू फल चारु भक्षणम्....एक अद्भुत गुण है इस फल में- हाथी को साबूत फल खिला दें। अगले दिन उसके मल में सीधे समूचा फल मिल जायेगा,किन्तु फोड़कर देखने पर आप हैरान रह जायेंगे- उसके अन्दर का गूदा गायब रहेगा।खट्टे-मीठे स्वाद वाला कैथ देखने में ठीक वेल जैसा होता है,सिर्फ दोनों के रंग में भेद है।कपित्थ भूरे रंग का होता है।कपित्थ का बाँदा किसी अत्याधुनिक बूलेटप्रूफ जैकेट से जरा भी कम नहीं,वशर्ते कि सही समय सही ढंग से इसे प्राप्त कर विधिवत तैयार किया जाय। कृत्तिका नक्षत्र में कपित्थ-बाँदा को यथाविधि घर लाकर पूर्व निर्दिष्ट विधान से स्थापन-पूजन करके पूजा-स्थान में ही सुरक्षित रख दें।जैसा कि अन्यान्य बाँदा प्रयोगों में कहा गया है- शिव-शक्ति मन्त्रों का यथोचित जप-होमादि विधिवत सम्पन्न करना चाहिए।इसके बाद कम से कम एक सौ आठ आवृत्ति देवी कवच का पाठ करना भी इस प्रयोग में आवश्यक है।ध्यातव्य है कि जप-पाठ आदि सभी कार्यों में देव-प्रतिमा की तरह चौकी वगैरह पर ऊँचा स्थान देकर इसे स्थापित कर, अपने  सामने ही रखना चाहिए।प्रयोग के समय पुनः एक आवृत्ति कवच और एक-एक माला पूर्व प्रयुक्त दोनों मन्त्रों का प्रयोग अवश्य कर लें।इसे ताबीज के रुप में एक साथ दोनों भुजा और गले में धारण करना चाहिए।
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Saturday, 26 April 2014

पुण्यार्कवनस्पतितन्त्रम्-17

(11)             अनार का बाँदा- (क) अनार एक सुस्वादु फल है।इसका संस्कृत नाम दाडिम है।यह खट्टे और मीठे दो प्रकार का होता है।मेरा अभीष्ट- स्वाद नहीं, बाँदा है।दोनों में किसी भी पौधे का हो,परिणाम समान है।तन्त्र-शास्त्रों में अनार का बहुत महत्त्व है। यन्त्र लिखने के लिए अनार के डंठल से बनायी लेखनी का उपयोग करने का विधान है। जादू-टोना-टोटका आदि में अनार के विशिष्ट प्रयोग मिलते हैं।अनार का बाँदा घर में रहने से इनसब कुप्रभावों से बँचा जा सकता है।ज्येष्ठा नक्षत्र में अनार का बाँदा पूर्व निर्दिष्ट विधि से घर लाकर स्थापन-पूजन करने के बाद नौ हजार देवी नवार्ण से अभिमन्त्रित करके गृह के मुख्य द्वार के ऊपरी चौखट में जड़ देना चाहिए। इस प्रयोग से हर प्रकार की बाहरी बाधाओं का निवारण होता है।वास्तु-रक्षा के अतिरिक्त शरीर-रक्षा में भी इसका उपयोग किया जा सकता है- तांबे के ताबीज में भर कर, पुरुष दांयी भुजा में,एवं स्त्री बांयीं भुजा में धारण करें।सुविधानुसार गले में भी धारण किया जा सकता है।ताबीज का धागा सदा लाल ही रहेगा- इस बात का ध्यान रखें।
(ख) नक्षत्र भेद से अनार के बांदे का दूसरा प्रयोग भी है।शेष पूजा-विधान पहले की तरह ही है।धन-धान्य,वैभव की कामना से अनार के बाँदा को पूर्वाफाल्गुनी नक्षत्र में घर लाकर स्थापन-पूजन करना चाहिए।पूजन के बाद महालक्ष्मी मंत्र का सोलह माला जप दशांश होमादि अंग सहित अवश्य करे।फिर तिजोरी आदि में उसे स्थायी स्थापर कर दे।समय-समय पर उसके वस्त्र बदलते रहना चाहिए।
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पुण्यार्कवनस्पतितन्त्रम्-16

(१0)              कुश का बाँदा- कुश दो-तीन फीट ऊंचा क्षुप जातीय घास है,जिसके विना शुभाशुभ कर्मकांड अधूरा माना जाता है।इसका संस्कृत नाम दर्भ है। नवग्रहों में केतु की यह समिधा है।यूँ तो इसमें बाँदा होना आश्चर्य जनक प्रतीत होता है,किन्तु सच्चाई ये है कि कभी-कभी इसके पतले तनों के बीच कुछ गांठें बन जाती हैं,जो देखने में रुद्राक्ष के छोटे दाने सदृश होती हैं- तन्त्र-शास्त्रों में इसे ही कुश का बाँदा कहा गया है।यह दुर्लभ बाँदा कदाचित प्राप्त हो जाय तो भरणी नक्षत्र में पूर्व निर्दिष्ट विधि से घर लाकर स्थापन-पूजन करके पवित्र स्थान में रख दें।इसकी क्षमता की निरंतरता के लिए नित्य श्री महालक्ष्मी मंत्र का कम से कम सोलह बार जप अवश्य कर लिया करें।इसका मुख्य गुण है- दरिद्रता का नाश करना।इसके सम्बन्ध में एक और बात ध्यान में रखने योग्य है कि बाँदा अपने पूरे रुप में हो- कटा-फटा जरा भी नहीं,अन्यथा कारगर नहीं होगा।
कुश के अन्य प्रयोग- विशेष अवसरों पर कुश की पत्तियों के तीन टुकड़ों की बनी अंगूठी बांयें हाथ की अनामिका अंगुली में एवं दो पत्तियों की दांयें हाथ की अनामिका में पहन कर कर्मकांड-क्रियाओं का विधान है।सामान्य तौर पर लोग जरुरत के समय ही इसे बना लेते हैं,और काम के बाद विसर्जित कर देते हैं; खास कर श्राद्धादि कार्य के बाद का कुशा तो विसर्जित कर ही देना चाहिए।
 कुशा ग्रहण मुहूर्त-  किसी कार्य के लिए कुशा ग्रहण का एक खास मुहूर्त है- अन्य दिनों में उखाड़ा गया कुशा मात्र उसी दिन के लिए योग्य होता है।किसी मास की आमावश्या को उखाड़ा गया कुश महीने भर तक कार्ययोग्य होता है।पूर्णिमा को उखाड़ा गया कुश पन्द्रह दिनों तक कार्ययोग्य होता है;किन्तु भाद्रमास के आमावश्या को उखाड़ा गया कुशा पूरे बर्ष भर के लिए कार्ययोग्य माना गया है।इस विशेष आमावश्या को कुशोत्पाटिनी आमावश्या कहा गया है।प्रातः स्नान के बाद कुश लाने के निमित्त अक्षत, फूल,जलादि के साथ खोदने के लिए कोई औजार लेकर पौधे के समीप जाकर, पूजन-प्रार्थना करके-   ऊँ हुँ फट् स्वाहा मंत्रोच्चारण करते हुए श्रद्धापूर्वक कुश उखाड़ना चाहिए।
       इस प्रकार घर लाए गए कुश से आसन का निर्माण करें।आसनी तैयार हो जाने के बाद उस पर पूर्वाभिमुख बैठकर श्रीविष्णु के पंचाक्षर मंत्र का एक माला जप कर लें।जप करते समय भाव ये रहे कि आसन की सिद्धि हेतु जप कर रहा हूँ।पौराणिक प्रसंग है कि श्री विष्णु जब पृथ्वी के उद्धार के लिए महावराह का रुप धारण किए तब शरीर झाड़ने के क्रम में उनके महाकाय से झड़ा हुआ रोम ही पृथ्वी पर गिर कर पवित्र कुशा के रुप में अवतरित हुआ।कुशा की पवित्रता का एक और पौराणिक प्रसंग है-        
    अपनी माता विनीता को विमाता कद्रु की कैद से छुड़ाने के लिए वैनतेय गरुड़जी ने अमृत हरण किया, और शर्त के अनुसार सर्पों के समक्ष कुश पर ही अमृत-कलश को रख कर चले गए।अमृत-कलश के  स्पर्श के कारण कुश की पवित्रता और बढ़ गयी।अस्तु।
       कुश का आसन- यहाँ मेरा अभीष्ट है कुशासन- इस साधित-पवित्र कुशासन पर बैठकर जो भी क्रिया करेंगे,वह सामान्य की अपेक्षा अधिक फलद होगी।ध्यान रहे- अपना साधित यह आसन किसी अन्य को उपयोग न करने दें।वैसे पहले भी कह आए हैं- आसन,माला,वस्त्रादि किसी प्रयोज्य वस्तु का अन्य के लिए व्यवहार निषिद्ध है।अपना प्रयोज्य वस्तु किसी को कदापि न दें, और दूसरे का प्रयोज्य वस्तु कदापि न लें।साधकों को इन बातों का सख्ती से पालन करना चाहिए।
       पवित्री(कुश की अंगूठी)- उक्त भाद्रमास की कुशा को ऐंट-बांटकर (क्रमशः तीन और दो पत्तियों के संयोग से) दो अंगूठियाँ बना लें।इनमें तीन पत्तियों वाली अंगूठी को बांयीं मुट्ठी में,और दो पत्तियों वाली अंगूठी को दांयी मुट्ठी में बन्द कर सात मिनट तक श्री विष्णु पंचाक्षर मंत्र का जप कर लें।आगे किसी अनुष्ठान में इसे अनामिका अंगुली में धारण कर, क्रिया करेंगे तो वह सामान्य की अपेक्षा अधिक फलद होगी।
      कुश मूल की माला- विहित काल में ग्रहण किए गए कुश-मूल की माला(चौवन या एक सौआठ मूल) बनाकर किसी रविपुष्य/गुरुपुष्य योग में श्री बिष्णुपंचाक्षर मंत्र का सोलह माला जप कर कर लें।जप से पूर्व माला को षोडशोपचार पूजित अवश्य कर लेना चाहिए।अब इस साधित कुश-मालिका पर नित्य सोलह माला महालक्ष्मी मंत्र का जप पूरे कार्तिक मास में करने से अक्षय लक्ष्मी की प्राप्ति होती है।अन्य समय में भी लक्ष्मी मंत्र का जपानुष्ठान इस मालिका पर अत्यधिक फलद होता है।
         कुशासन,कुश माला,कुश की पवित्री का उपयोग किसी भी अनुष्ठान में एकत्र रुप से करना चाहिए।इस सम्बन्ध में कुछ बातें और स्पष्ट कर दूँ- सधवा स्त्री को कुश का प्रयोग कदापि नहीं करना चाहिए। आसन के लिए सफेद कम्बल का आसन,और रुद्राक्ष की माला प्रायः सर्वग्राह्य है।पवित्री की जगह सोने की अंगूठी धारण करना चाहिए।सोना सम्भव न हो तो चांदी-तांबा से भी काम चल सकता है।दूसरी बात यह कि आजकल बाजार में कुश के नाम पर मिलने वाला आसन कुश है ही नहीं,प्रत्युत वैसा ही दीखने वाला "कास " है।वैसे कुश कोई दुर्लभ पौधा नहीं है।बात है सिर्फ पहचान की। 
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पुण्यार्कवनस्पतितन्त्रम्-15

(9)              आम का बाँदा- आम का बाँदा अति सुलभ है।प्रायः आम के पेड़ों में यह मिल ही जाता है।इसके प्रयोग भी अपेक्षाकृत सहज हैं।किसी नक्षत्र विशेष का बन्धन भी नहीं है।सिर्फ रविपुष्य योग का विचार करके पूर्व निर्दिष्ट विधि से घर लाकर, स्थापन-पूजन कर किसी पवित्र स्थान में सुरक्षित रख दें।यह बाँदा विजयदायी है।

पुरुषों को दांयी भुजा में एवं स्त्रियों को बांयी भुजा में ताबीज में भर कर धारण करना चाहिए।किसी कार्य की सफलता हेतु इसका प्रयोग किया जा सकता है।
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Wednesday, 23 April 2014

पुण्यार्कवनस्पतितन्त्रम्-14

(8)             थूहर(सीज) का बाँदा- थूहर एक जहरीला सा पौधा है।इसके सर्वांग में दूध ही दूध भरा होता है।इसका दूध आंखों के लिए बड़ा ही घातक है।वैसे इसके दूध को सुखा कर, गोलियाँ वनाकर उदरशूल में वैद्य लोग प्रयोग करते हैं।यानी कि प्राणहर नहीं है।इसकी लगभग डेढ़ सौ प्रजातियाँ हैं।सबके गुणधर्म भिन्न हैं।गृहवाटिका में इसके विभिन्न प्रजातियों को खूबसूरती के लिए लगाते हैं।इसका प्रचलित नाम कैक्टस है।मेरा अभीष्ट ये सभी प्रजातियाँ नहीं,बल्कि इसकी एक खास प्रजाति है, जो एक-डेढ़ ईंच गोलाई वाला तना मूलक होता है।पुराना होने पर मध्यम वृक्ष के
आकार का हो जाता है।तब इसके तने की मोटाई भी काफी अधिक हो जाती है।इसकी हरी कोमल पत्तियों को घी में भूंज कर रस निचोड़, खांसी-जुकाम में भी प्रयोग करते हैं।इसका गुण कफ-निस्सारक है।पहले, देहातों में प्रसूतिका गृह के द्वार पर इसे अवश्य स्थापित किया जाता था।मान्यता यह थी कि इसके द्वार-रक्षण से भूत-प्रेतों का प्रभाव सूतिकागृह में नहीं होता।सूर्य जब  हस्ता नक्षत्र में आते हैं(बरसात के दिनों में) तब इसकी गांठों को सरकंडे के साथ मिलाकर किसान अपने धान के खेतों की रक्षा के लिए मेड़ पर स्थापित करते हैं।आज शहरी सभ्यता में भी प्रायः घरों में इसका छोटा पौधा गमलों में कैद नजर आजाता है।इससे वास्तु दोषों का भी निवारण होता है।विहित समय में थूहर का बाँदा पूर्व निर्दिष्ट विधि से घर लाकर,स्थापित-पूजित कर रख लेना चाहिए। प्रत्युत्पन्न मतित्त्व के लिए यह बड़ा ही अद्भुत है।वाक् पटुता,वाक् चातुरी, प्रभाव, सम्मोहन,मेघाशक्ति वर्धन, दूर्दर्शिता,चिन्तन शक्ति आदि में इसका यथोचित प्रयोग करना चाहिए।ध्यान रहे- ये सारे अद्भुत गुण तत् वनस्पति की विधिवत मंत्र संयोग और सिद्धि से ही सम्भव है।विना सम्यक् सिद्धि के कोई चमत्कार लक्षित नहीं होगा।
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पुण्यार्कवनस्पतितन्त्रम्- 13

(7)            हरश्रिंगार(हरसिंगार) का बाँदायह भी जाना पहचाना पौधा है। इसके पौधे मध्यम कद-काठी के होते हैं,और कटे किनारों वाले छोटे-छोटे पत्ते।खूबसूरत सफेद(नारंगी डंठल युक्त) फूल- सुबह-सुबह बृक्ष के चारों ओर गोल घेरे में पसरे- भीनी-भीनी सुगन्ध विखेरते मिलेंगे।यदि आसपास कहीं हरसिंगार का एक भी पौधा है,तो सारा वातावरण रजनीगंधा सा सुवासित हो जाता है।हरसिंगार में बाँदा होना अति दुर्लभ है।संयोग से कहीं प्राप्त हो जाय तो इसे हस्ता नक्षत्र में पूर्व निर्दिष्ट विधि से घर लाकर,पूर्व वर्णित विधि से स्थापन-पूजन कर लें और बक्से, तिजोरी,आलमीरे में यथोचित स्थान पर रख छोड़ें।छोटे टुकड़े को ताबीज में भर कर भुजा अथवा गले में धारण भी कर सकते हैं।जरुरतमन्द को आशीर्वाद स्वरुप दे भी सकते हैं।अक्षय लक्ष्मी के आमन्त्रण के लिए यह बड़ा ही अद्भुत् है।
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पुण्यार्कवनस्पतितन्त्रम्- 12

(6)              उदुम्बर(गूलर) का बाँदा- यूँ तो ऊपर गिनाये गये पञ्चपल्लवों में आम को छोड़ शेष चारों- (पीपल,वट,पाकर,गूलर)को उदुम्बर कहा जाता है;किन्तु उदुम्बर शब्द रुढ़ हो गया है- गूलर के लिए ही। इसके फल की सब्जी या पकौड़ियाँ भी बनायी जाती है।उदर रोगों के लिए गूलर अमोघ औषधि है।विभिन्न रोगों- खास कर धातुक्षीणता में यह बहुत गुणकारी है।नवग्रहों में यह शुक्र की संविधा है।
      उदुम्बर का बाँदा रोहिणी नक्षत्र में पूर्व कथित विधि से घर लाकर स्थापन-पूजन करने के बाद तिजोरी,गल्ला,आलमारी में लाल या पीले वस्त्र में लपेट कर रख दें।यह धन-धान्य की बृद्धि के लिए अद्भुत है।इसे आप रसोई-घर में भी रख सकते हैं।
उदुम्बर के अन्य प्रयोगः-(क) धनागम- रविपुष्य योग में(गुरुपुष्य में हरगिज नहीं) गूलर का जड़ पूर्व विधि से निमंत्रण देकर घर लावें,और विधिवत स्थापन-पूजन करके,कम से कम ग्यारह माला देवी नवार्ण मंत्र का जप,दशांश होमादि सम्पन्न करने के बाद लाल कपड़े में लपेट कर पूजा-स्थल या कहीं और सुरक्षित रख दें।नित्य पंचोपचार पूजन भी करते रहें।ध्यातव्य है कि प्रथम दिन चढाये गए गन्ध-पुष्पादि को यथावत छोड़ दें,हटायें नहीं।अन्य दिनों वाला पूजन-सामग्री अगले दिन हटाते जाएं।जड़ को  हो सके तो चाँदी में जड़वा कर भी स्थापित कर सकते हैं,तांबा या अन्य धातु नहीं।इस प्रयोग से अप्रत्याशित रुप से धनागम होते रहता है।यह प्रयोग अपेक्षाकृत आसान और शतानुभूत है।
     (ख)सन्तान-सुख-  जिन घरों में सन्तान सुख का अभाव हो-(सन्तान न होता हो,हो-होकर मर जाता      हो, जीवित होकर भी अयोग्य और उपद्रवी- परिवार के लिए दुःखदायी हो,रोगी हो) किसी कारण से भी,वैसी स्थिति में उदुम्बर-मूल का प्रयोग चमत्कारी लाभ देता है।सारी बातें प्रयोग संख्या- ‘क’ के समान ही  रहेगी। अन्तर मात्र इतना ही कि पूजन के बाद अपना अभिप्राय निवेदन करना न भूलें।नित्य प्रार्थना करें कि हे उदुम्बर देव मुझे सन्तान-सुख प्रदान करें- मेरे सन्तान को सद् बुद्धि दें... इत्यादि।प्रयोग के थोड़े दिनों बाद से ही आप विल्क्षण परिवर्तन या लाभ अनुभव करेंगे।
(ग) प्रेम,प्रतिष्ठा और सम्मोहन- प्रायः देखा जाता है कि हर प्रकार से ठीक-ठाक रहने पर भी, किसी-किसी को घर-परिवार-समाज में समुचित  प्रेम-सम्मान नहीं मिलता।ऐसी परिस्थिति में उदुम्बर मूल का प्रयोग चमत्कारी लाभ दिखलाता है।(ध्यान रहे- आकांक्षी का कोई दोष न हो,वह अपने आप में ठीक हो,दोष अन्य का ही हो)।रविपुष्ययोग में उदुम्बर-मूल पूर्ववर्णित विधि से घर लाकर स्थापन पूजन करके आकांक्षी को प्रेम-पूर्वक प्रदान करे,और आशीष दें।ध्यातव्य है यह लोककल्याण की भावना से ही किया जाय।किसी अन्य कारण और उद्देश्य से हरगिज नहीं।जड़ की मात्रा विशेष हो, ताकि कम से कम तैंतीस दिनों तक घिसकर चन्दन की तरह माथे में लगाया जा सके।स्त्रियाँ भी विन्दी की तरह उपयोग कर लाभ पा सकती हैं।खासकर स्त्रियों को ही ऐसे मानसिक कष्ट विशेष रुप से झेलने पड़ते हैं।श्रद्धा-विश्वास पूर्वक प्रयोग करने से अवश्य लाभ मिलेगा।
(घ) सामान्य सुख-शान्ति- उक्त विधि से उदुम्बर मूल का ग्रहण-स्थापन और नित्य पूजन घर में सुख और शान्ति प्रदान करता है।यह प्रयोग निरापद और सुविधाजनक है।कोई भी व्यक्ति इसका प्रयोग स्वयं के लिए कर सकता है।
(ङ) दत्तात्रेय-साधना—भगवान दत्तात्रेय को ब्रह्मा-बिष्णु-महेश का संयुक्त स्वरुप माना जाता है।इनकी पूजा- अर्चना-उपासना भगवान आशुतोष की तरह शीघ्र फलदायी कही गयी है।दत्तात्रेय तन्त्र में विभिन्न प्रयोगों की चर्चा है।प्रसंगवश यहाँ उदुम्बर-प्रयोग की चर्चा कर रहा हूँ।रविपुष्य योग में प्रारम्भ कर, किसी एकान्त और पवित्र स्थान में गूलर के पेड़ के नीचे बैठकर दत्तात्रेय पंचाक्षर(ऊँ दां युक्त) मंत्र का सोलह माला जप इक्कीश दिनों तक करने से चमत्कारिक लाभ होता है।जप से पूर्व नित्य यथासम्भव पंचोपचार/षोडशोपचार पूजन करना चाहिए;और अनुष्ठान समाप्ति की विधि अन्य विधियों जैसी ही होगी- यानी दशांश हवन,तर्पण,मार्जनादि,तथा दो बटुक एवं भिक्षुक भोजन सदक्षिणा अनिवार्य शर्त है।नित्य पूजा में अन्य सामग्री के साथ-साथ मलयागिरि स्वेत चन्दन,स्वेत पुष्प एवं केवड़ा का इत्र आवश्यक है।साधक को उत्तर या पूर्वमुख बैठना चाहिए।

                 यही प्रयोग पूर्व विधि से उदुम्बर-मूल को घर में लाकर भी किया जा सकता है। 

Tuesday, 22 April 2014

पुण्यार्कवनस्पतितन्त्रम्- 11

(5)  अश्वत्थ(पीपल) का बाँदा- (क) आम,पीपल,वट,पाकर,और गूलर ये पवित्र पंचपल्लव श्रेणी में आते हैं;जिनमें पाकड़,पीपल,और वट क्रमशः सृष्टि के मूल ब्रह्मा-बिष्णु-महेश कहे जाते हैं।इन तीनों पौधों को एकत्र(एक ही थल में)लगाने का बड़ा ही शास्त्रीय महत्त्व है- इसे त्रिसंकट कहते हैं।त्रिसंकट-वृक्ष स्थापन,पूजन,दर्शन को बड़ा ही धार्मिक कार्य माना गया है।ये वृक्ष आसानी से प्रायः सभी जगह पाये जाते हैं। इनकी विशेषता यह है कि इनका बीज सामान्य वातावरण में उत्पन्न नहीं होते, यानी आप बीज लगाना चाहें तो अंकुरित नहीं होंगे;किन्तु इनके मीठे सुस्वादु फलों को पक्षी भक्षण करते हैं।उनके उदर की उष्मा से बीजों को अंकुरित होने की क्षमता प्राप्त होती है।इस प्रकार पक्षियों के बीटों(मल) से प्राप्त बीज सहज ही उग आते हैं।
      वास्तु शास्त्र में पीपल वृक्ष का स्थान भवन के पश्चिम दिशा में होना लाभकारी कहा गया है,यानी वट के ठीक विपरीत।वहाँ अवस्थित होकर भवन-रक्षा का कार्य करता है पीपल का पौधा।
   आयुर्वेद एवं तन्त्र ग्रन्थों में इनके सैकड़ों प्रयोग भरे पड़े हैं।यहाँ हमारा प्रसंग पीपल वृक्ष का बाँदा-विवेचन है।यदि सौभाग्य से पीपल का बाँदा प्राप्त हो जाय तो पूर्व निर्दिष्ट विधियों से उसे अश्विनी नक्षत्र में ग्रहण करें और विधिवत स्थापन- पूजनोंपरान्त किसी इच्छुक स्त्री को लोककल्याणार्थ प्रदान करें।उसे गाय के कच्चे दूध के साथ पीस कर,गाय के ही कच्चे दूध के साथ पिला दें- रविपुष्य/गुरुपुष्य योग में तो निश्चित ही वन्ध्या को भी सुन्दर-स्वस्थ संतान की प्राप्ति होगी। ध्यातव्य है कि यह अन्यान्य स्त्री दोषों का भी अमोघ निवारण है।हाँ,यदि पुरुष में भी दोष हो तो उसका निवारण पहले कर लेना चाहिए।तभी स्त्री पर उसकी सफलता प्राप्त होगी।यहाँ एक बात का और भी ध्यान रखना है कि शिव एवं शक्ति मंत्रों के साथ-साथ संतानगोपालमंत्र का भी पुरश्चरण(या कम से कम चौआलिस हजार जप)विधिवत दशांश हवन, तर्पण,मार्जन,एवं पांच वटुक भोजन दक्षिणा सहित होना अति आवश्यक है।
(ख)पीपल के अन्य प्रयोग- १. श्रीकृष्ण ने गीता के विभूतियोग में स्वयं को पीपल कहा है।हम ऊपर कह आये हैं कि पीपल साक्षात् बिष्णु का स्वरुप है।एक पौराणिक प्रसंग के अनुसार शनिवार को शनिदेव का वास पीपल में होता है।यही कारण है कि शनि की प्रसन्नता हेतु शनिवार को पीपल में गूड़ मिश्रित जल प्रदान करने का विधान है।यह कार्य पश्चिमाभिमुख करना चाहिये।सायं काल पीपल-तल में दीप-दान से भी शनि प्रसन्न होते हैं।
    २. देव वर्ग से इतर- प्रेत,वैताल,भैरव,यक्षिणी आदि का भी प्रिय वृक्ष पीपल है।ये क्षुद्र योनियाँ पीपल पर प्रायः वास करती हैं।पीपल के जड़ में नित्य जलार्पण से ये प्रेत योनियाँ प्रसन्न होती हैं।हिन्दु रीति के अनुसार दशगात्र तक पीपल के जड़ में यथाविधि जल डालने का विधान है।किसी व्यक्ति को किसी तरह की अन्तरिक्ष वाधा हो तो नित्य, पीपल की पंचोपचार सेवा से अवश्य लाभ होगा।किसी अनाड़ी ओझा-गुनी-तान्त्रिक के पास भटकने से अच्छा है कि श्रद्धा-विश्वास पूर्वक पीपल की पूजा करे। किसी जटिल रोग-बीमारी की स्थिति में (जहाँ डॉक्टरी निदान और उपचार कारगर न हो रहा हो)पीपल के पत्ते पर सायंकाल में दही और साबूत उड़द रख कर पीपल के जड़ के समीप रख दें,और थोड़ा जल देकर प्रार्थना करे- हे प्रभो! आप मेरा संकट दूर करें।सप्ताह भर के इस प्रयोग से अद्भुत लाभ होगा।मैंने हजारों प्रयोग कराकर देखा है,शायद ही कभी निराश होना पड़ा हो।
    ३. धर्मशास्त्रों में पीपल का गुणगान भरा पड़ा है।वैज्ञानिक दृष्टि से भी पीपल बहुत महत्त्वपूर्ण है।किसी शुभ मुहूर्त(पंचांग में वृक्षारोपण मुहूर्त देखकर) में पीपल का वृक्ष लगाकर उसकी सेवा करें।जैसे-जैसे वृक्ष बड़ा होगा आपकी यश-कीर्ति,मान-सम्मान,धन-सम्पदा,आरोग्य की वृद्धि होती जायेगी।
    ४. दरिद्रता निवारण के लिए किसी अनुकूल पीपल वृक्ष-तल में शिवलिंग(आठ अंगुल से अधिक नहीं)स्थापित कर,पंचोपचार पूजनोपरान्त नित्य ग्यारह माला शिव पंचाक्षर मंत्र का जप करें। थोड़े ही दिनों में चमत्कारिक लाभ होगा।
    ५. हनुमद्दर्शन—सामान्य नियम है कि किसी वृक्ष के नीचे शयन नहीं करना चाहिए, विशेष कर रात्रि में तो बिलकुल ही नहीं;विशेष परिस्थिति में पीपल इसका अपवाद है।किसी पवित्र वातावरण में लगे पीपल वृक्ष के समीप(नीचे) बैठकर अठारह /इक्कीश दिनों तक हनुमान की पूजा,जप,

स्तवन,एवं रात्रि शयन आदि करने से प्रत्यक्ष, या कम से कम स्वप्न में तो निश्चित ही दर्शन हो सकता है।इसके लिए किसी शुभ नक्षत्र-योगादि का विचार करके कठोर ब्रह्मचर्य पालन करते हुए सप्तशती के दूसरे(लक्ष्मी)बीज,आदि प्रणव,अन्त नमः तथा हनुमते रामदूताय- मन्त्र का ग्यारह माला नित्य के हिसाव से जप करने से अभीष्ट सिद्धि अवश्य होती है।अनुष्ठान समाप्ति पर षोडशोपचार पूजन सहित रोट(सिर्फ दूध में सने हुए गुड़ मिश्रित आटे की मोटी रोटी के आकार का शुद्ध धी में तला हुआ पकवान) का नैवेद्य अर्पण करे,तथा कुल जप का दशांश हवन-तर्पणादि के बाद, दो बटुक और भिक्षुक का दक्षिणा सहित भोजन भी अनिवार्य है।
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पुण्यार्कवनस्पतितन्त्रम्- 10

(4)             बरगद का बाँदा- (क) बरगद(बर,वट) एक सुपरिचित विशालकाय पौधा है।भगवान भोलेनाथ का यह प्रतीक भी है।शिव की तरह यह जटाजूट धारी भी है।वास्तु प्रकरण में इस पौधे का भवन के पूरब दिशा में होना अति शुभद माना गया है,किन्तु पश्चिम दिशा में उतना ही हानिकारक भी कहा गया है।इसका बाँदा यदि सौभाग्य से कहीं दीख जाय तो पूर्व वर्णित विधि से आर्द्रा नक्षत्र में, घर लाकर स्थापन-पूजन करके रख लें।श्रम,संघर्ष,युद्ध आदि में सदा विजयदायी है-  शिववृक्ष का बाँदा। शारीरिक सुरक्षा और शक्ति-वर्द्धन में इसका जोड़ नहीं।सच पूछें तो यह अद्भुत प्रयोग वाला वनस्पति है।आयुर्वेद में इसके कई औषधीय प्रयोग मिलते हैं।उक्त बाँदा को स्थापन-पूजन के पश्चात् चन्दन की तरह घिसकर गाय के दूध के साथ पीने से तेज और बल की बृद्धि होती है।बुढ़ापे को दूर भगाने की अद्भुत क्षमता है इसमें।
       (ख)  वट के अन्य प्रयोग- १. धन-वृद्धि के लिए- यूँ तो वट का बीज ठीक वट-वृक्ष के नीचे नहीं उगता,किन्तु सौभाग्य से कहीं ऐसा पौधा नजर आजाय तो किसी सोमवार या रविपुष्य योग के दिन उसे सम्मान पूर्वक घर ले आयें।किसी अनुकूल जगह पर घर के आसपास लगा दें।पूरबमुखी घर हो तो उसी दिशा में लगायें,और स्थापना विधि से स्थापन-पूजन कर दें।आगे,नित्य उसके समीप खड़े होकर कम से कम एक माला शिव पंचाक्षर मंत्र का जप कर लिया करें।यह पौधा जैसे-जैसे बड़ा होगा,घर में समृद्धि आते जायेगी।
     २.वरगद एक अजीब पौधा है- थोड़ा पुराना होने पर हम देखते हैं कि उसके तने से कुछ जड़ें निकल कर नीचे जमीन की ओर आने लगती हैं।कभी-कभी तो ये जमीन में आकर नये वृक्ष का सृजन भी कर देती हैं।इन अवरोही जड़ों को वरोह या वरजटा कहते हैं।किसी रविपुष्य योग में अथवा सोमवार को आदर पूर्वक इसे काट कर घर ले आयें।विधिवत इसका पूजन करें।फिर इसे छोटे-छोटे टुकड़ों में काट कर सुरक्षित रख दें। नित्य इस से दातून करें।वरोह की कूची(व्रश) बड़ी अच्छी होती है।इसके प्रयोग से दांतों की सभी बीमारियाँ दूर होती हैं। वरोह को सुखा कर चूर्ण बनाकर मंजन की तरह भी प्रयोग करने से दंत रोगों में लाभ होता है।ध्यातव्य है कि सभी वनस्पतियों का औषधीय गुण है,किन्तु उनमें तान्त्रिक गुण भी यथाविधि प्रयुक्त कर दिया जाय तो अद्भुत लाभ होता है।आये दिन शिकायत होती है कि अमुक आयुर्वेदिक औषधि कारगर नहीं है।इसके पीछे औषध-निर्माण प्रक्रिया ही मुख्य रुप से जिम्मेवार है।पहले ऋषि-मुनि इन सारी विधियों का प्रयोग करते थे-(वनस्पति ग्रहण से निर्माण तक),किन्तु आज आधुनिक कम्पनियाँ किसी तरह लाकर,कूंट-चूर,पैक कर बाजार में ठेल देती हैं।जड़ी-बूटियों का वैज्ञानिक शोधन भले कर लेते हों ये निर्माता,किन्तु तान्त्रिक गुण कहाँ भर पाते हैं।यही कारण है कि औषधियाँ निर्बीज होती जा रही हैं।वनस्पति के औषधीय गुणों के साथ तान्त्रिक गुणों का संयोग भी किया जाय तो सोने में सुगन्ध आजाय।
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पुण्यार्कवनस्पतितन्त्रम्- 9

(3)              शिरीष बाँदा- कवियों का प्रिय शिरीष एक सुपरिचित पौधा है।इसके विशाल पौधे में बड़े सुन्दर-कोमल फूल लगते हैं।आठ-दस ईंच लम्बी डेढ़ ईंच करीब चौड़ी, पतली सी फली में कुछ बीज होते हैं।इनका औषधीय प्रयोग भी होता है।लकड़ियाँ शीशम को भी मात करने वाली होती हैं,किन्तु वास्तु शास्त्र में इसका उपयोग सर्वथा वर्जित है।शिरीष काष्ठ को सद्यः वंश-नाशक कहा गया है।मैं इसका प्रत्यक्ष दर्शी हूँ।एक सज्जन नया मकान वनवाये,जिसमें अपनी वाटिका में सुलभ प्राप्त शिरीष की लकड़ियों का किवाड़ लगवाये।कई अनुभवी-जानकारों ने- यहाँ तक की बढ़ई ने भी मना किया,किन्तु जाहिल-जिद्दी लोग तो किसी की सुनते नहीं,या कहें भावी होनहार उनकी बुद्धि को ग्रस लेता है।भवन बनने के साल-भीतर ही एक मात्र कुल दीपक का निधन हो गया।आगे लाख प्रयत्न के बावजूद सन्तति-लाभ न कर सके।

    यहाँ मेरा अभीष्ट शिरीष का बाँदा है।इसे कहीं संयोग से प्राप्त कर लें तो, पूर्वा भाद्रपद नक्षत्र में पहले अन्य प्रयोगों में बतलायी गयी विधि से घर में लाकर स्थापन-पूजन कर रख लें।इसका फल सर्व समृद्धि है।हर प्रकार की चिन्ता-कष्ट का निवारण करने वाला है यह।विशेष अवसर पर इसका थोड़ा अंश चन्दन की तरह घिसकर सिर के ऊपर मध्य भाग में तथा ललाट में तिलक की भांति लगाना चाहिए।

पुण्यार्कवनस्पतितन्त्रम्- 8

 वहुआर का बाँदा- 
      
     वहुआर एक सुपरिचित पौधा है.इसका एक नाम लिसौढ़ा भी है। इसका वृक्ष बहुत बड़ा नहीं होता।अमरूद वगैरह की तरह ही होता है।गोल-गोल छोटे बेर की तरह इसके फल होते हैं।फल लस्सेदार(लार की तरह) खाने में लगते हैं।यही कारण है कि सुस्वादु फलों की श्रेणी में इसे नहीं रखा जा सकता।हाँ, इसकी लकड़ी बड़ी हल्की और चिकनी होती है।देहातों में जुआठ(हल-जुआठ) के लिए इसका उपयोग होता है।

       बहुआर का बाँदा सौभाग्य से कहीं दीख जाये तो पूर्व वर्णित विधि से मघा नक्षत्र में घर लाकर पूर्व विधि से ही स्थापन-पूजन करके लाल वा पीले वस्त्र में लपेट कर तिजोरी,कोष,भण्डार,आलमारी,वक्से में यथोचित स्थान देदें।नित्यप्रति पंचोपचार पूजन करके,कम से कम एक-एक माला शिव पंचाक्षर एवं देवी-नवार्ण मंत्रों का जप वहीं बैठकर कर लिया करें। यह बहुआर-बाँदा धन-समृद्धि के लिए अद्भुत् प्रसिद्ध है। जिस घर में इस अभिमंत्रित बहुआर बाँदा की नित्य पूजा होती है,वहाँ साक्षात् लक्ष्मी का वास होता है।अन्नादि भण्डार सदा भरे रहते हैं।
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पुण्यार्कवनस्पतितन्त्रम्- 7

                           ३.विभिन्न बाँदाओं के प्रयोग
 बाँदा प्रकरण में यहाँ कुछ खास बाँदाओं का वर्णन किया जा रहा है।कुछ ऐसे भी पौधे हैं,जिनके मूल-त्वक-काष्ठ आदि का भी तान्त्रिक उपयोग है।अतः उनकी चर्चा भी इसी प्रकरण में खण्ड विभाजन करके कर देना उचित लग रहा है।यथा- कुश,निर्गुण्डी.पीपल,वट,उदुम्बर इत्यादि।
(१)              वदरी-बाँदा- वदरी संस्कृत का शब्द है-इसका प्रचलित शब्द है- बेर।यह एक सुस्वादु फल है।इसमें बाँदा सौभाग्य से ही मिल सकता है।यदि कहीं दीख जाये, तो स्वाती नक्षत्र में विधिवत निमंत्रण देकर घर लाना चाहिए।विधि वही है जैसा कि पूर्व अध्याय में कहा गया है।एक दिन पहले संध्या समय अक्षत,फूल,जल, सुपारी,पैसा आदि लेकर वृक्ष के समीप जाकर.पूर्व या उत्तर मुख खड़े होकर

प्रार्थना करे- "हे दिव्य वनस्पति देव ! मैं अपने अभीष्ट सिद्धि हेतु कल प्रातः आकर आपको अपने घर ले चलूँगा।आप कृपया मेरे साथ अपने दिव्य विभूतियों सहित चलकर मेरा मनोरथ सिद्ध करें। " – कहकर अक्षत,फूल आदि वहीं वृक्ष मूल में छोड़ दें।अगले दिन प्रातः स्नान-पूजनादि से निवृत्त होकर कुछ औजार लेकर पास जायें।वृक्ष को प्रणाम कर, ऊपर चढ़कर, साथ लाये गए औजार से बाँदा को काट लें।अब साथ लाये गए लाल या पीले कपड़े में लपेटकर श्रद्धापूर्वक माथे से लगायें।घर आकर देव-प्रतिमा-स्थापन की संक्षिप्त विधि से स्थापन करके पंचोपचार/षोडशोपचार पूजन करें।इसके बाद ग्यारह माला शिव पंचाक्षर एवं ग्यारह माला देवी-नवार्ण मंत्रों का जप,हवन,तर्पण,मार्जन सम्पन्न करके कम से कम एक ब्राह्मण और एक दरिद्रनारायण को भोजन दक्षिणा सहित प्रदान करें।इस प्रकार आपका कार्य पूरा हो गया।अब, जब भी आवश्यकता हो,उस पूजित काष्ठ में से थोड़ा अंश काट कर लाल या पीले कपड़े या तांबे के ताबीज में भरकर प्रयोग कर सकते हैं।कल्याण भावना से (व्यापार नहीं)किसी को दे भी सकते हैं।इस बदरी-बाँदा का एक मात्र कार्य है- मनोनुकूलता प्रदान करना।यानि किसी से कुछ सहयोग लेना हो,कोई कार्य करवाना हो तो विधिवत धारण करके उस व्यक्ति के पास जाकर अपने इष्ट मंत्रों का मानसिक जप करते हुए प्रस्ताव रखना चाहिए।

पुण्यार्कवनस्पतितन्त्रम्-6

         ()बाँदा एक परजीवी वनस्पति
       
वस्तुतः बाँदा एक परजीवी वनस्पति है,जो भूमि पर न उग कर,विभिन्न वृक्षों पर अपना स्थान बनाता है।जिस वृक्ष पर उगता है उसके ही रस-तत्वों से अपना पोषण करता है।ध्यातव्य है कि यह रासना और अमर- लता से भिन्न है।वे दोनों सहज-स्वतन्त्र रुप से उद्भुत हैं,जब कि बाँदा एक विकृति की तरह है।यही कारण है कि कुछ विद्वान इसे परजीवी स्वतन्त्र वनस्पति न कहकर वृक्ष की बीमारी ही मानते हैं।किन्तु मैं इसे स्वतन्त्र परजीवी इसलिए कह रहा हूँ, क्योंकि स्वतन्त्रता के सारे लक्षण इसमें विद्यमान हैं- इसकी काष्ट-संरचना अपनी है- खुरदरी गांठदार,पत्तियों का आकार लम्बा-गोलाई युक्त, हरे रंग के सुन्दर गुलाबी पुष्पगुच्छ-लौंग जैसा,फल निमौली जैसे गुच्छों में ही  पाये जाते हैं।यूं तो यह प्रायः किसी भी वृक्ष पर हो सकता है,किन्तु आम,महुआ, जामुन आदि पर सहजता से देखा जा सकता है।आम के वृक्ष में तो सबसे ज्यादा।इसका प्रभाव क्षयकारी है।जिस वृक्ष पर उग जाता है,या कहें जिस वृक्ष को ग्रस लेता है,उसका विकास अवरूद्ध हो जाता है।यही कारण है कि बागों में किसी बृक्ष पर देखते के साथ ही उसका संरक्षक तत्काल ही काट कर नष्ट कर देता है,ताकि इसका कुप्रभाव अधिक फैलने न पाये।
     तन्त्र शास्त्र में बाँदा बहुत ही उपयोगी बतलाया गया है।विभिन्न वृक्षों पर पाये जाने वाले बाँदा का अलग-अलग तान्त्रिक उपयोग है।उन अलग-अलग वृक्षों से ग्रहण का अलग-अलग मुहूर्त भी है।समुचित मुहूर्त में ही निर्दिष्ट विधि से उसे ग्रहण करना चाहिए,तभी समुचित लाभ प्राप्त हो सकता है।अन्यथा नहीं।वनस्पति तन्त्र-सिद्धि के लिए पहले अध्याय में बतलाये गए सभी निर्देशों का सम्यक् पालन करना भी अति आवश्यक है।तभी अभीष्ट की प्राप्ति हो सकेगी।
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पुण्यार्कवनस्पतितन्त्रम् 5

           तृतीय परिच्छेद – वनस्पति-तन्त्र-प्रयोग
                               
श्वेतार्क(मन्दार)
        मन्दार एक बहुपरिचित पौधा है।संस्कृत में इसे अर्क भी कहते हैं।अर्क सूर्य की संविधा है।यह शिव का अतिप्रिय पुष्प है।इसकी कई प्रजातियाँ हैं।मुख्य रूप से नीले और सफेद फूलों के भेद से पहचाना जाता है।एक और खास बात ये है कि बनावट के विचार से छोटे और बड़े आकार में मिलने वाले दो पौधे हैं,जो वस्तुतः दो विलकुल भिन्न जाति के है। एक को अकवन के नाम से जाना जाता है।इसका विकास क्रम मदार से किंचित भिन्न है।प्रायः लोग दोनों को एक ही समझ लेते हैं,जब कि जाति एक और प्रजाति भेद है।गुण-धर्म में भी भेद स्वाभाविक है।अकवन(अर्क)जड़ से ही बहुशाखा वाला होता है,जव कि मदार में शाखायें अपेक्षाकृत कम होती हैं।अकवन साल दो-साल में प्रायः सूख जाता है,किन्तु मदार बहुबर्षायु पौधा है।अकवन में सिर्फ शाखायें ही शाखायें होती हैं,जब कि मदार तना युक्त होता है।पुराना पड़ने पर काफी मोटा और १०-१५ फीट ऊँचा हो जाता है। गोस्वामी जी ने वर्षाऋतु-वर्णन क्रम में कहा है-
     अर्क,जवास पात विनु भयऊ।जिमि सुराज खल उद्यम गयऊ।।
तात्पर्य यह कि वरसात में सभी पेंड़-पौधे लहलहाने लगते हैं,जब कि अर्क और जवास प्रायः सूख जाते हैं।इनकी पत्तियाँ झड़ जाती हैं।आमतौर पर रेलवे लाईनों के किनारे,या जहाँ-तहाँ किसी पुराने मकानों के ढूह पर पाया जाता है।इसके पत्ते वरगद के पत्ते जैसे आकार के होते हैं।रंग में थोड़ा फर्क होता है।बैंगनी फूलों वाला मदार तो बहुतायत से पाया जाता है,किन्तु सफेद फूल की प्रजाति जरा दुर्लभ है।
      यहाँ मेरा विवेच्य वनस्पति श्वेतार्क(मदार) ही है।क्षुप जातिय अकवन या नीले फूलों वाला मदार नहीं।
मदार पुष्प शिव को अतिशय प्रिय है- इसके पीछे एक कारण यह भी है कि इस पौधे में पार्वती नन्दन गणेश का वास है।गीता (विभूतियोग)में श्रीकृष्ण ने स्वयं को अश्वत्थ(पीपल) कहा है। तदभांति मन्दार गणेश की साक्षात् विभूति है।लोककल्याण के लिए विघ्नेश्वर विनायक मन्दार के रूप में अवतरित हुए हैं- ऐसा तन्त्र-ग्रन्थों में वर्णित है। अति चमत्कारिक बात यह है कि मन्दार मूल को आप निर्विघ्नता पूर्वक(विना कटे-टूटे) यदि जमीन से ऊखाड़ कर गौर करें तो पायेंगे कि साक्षात् मंगल मूर्ति की तरह नजर आएगा।
     यहाँ हम मन्दार के विभिन्न प्रयोगों की चर्चा करेंगे,जिनमें ज्यादातर श्वेतार्क मूल का ही प्रयोग है।इसके लिए पौधे का बहुत पुराना(मोटा)होना जरुरी नहीं है।हाँ,ये बात अलग है कि पौधा जितना ही पुराना होगा- उसका मूल उतना ही सुदृढ़-सुव्यवस्थित-सुन्दर आकृति वाला होगा।
       i.                श्वेतार्क गणपति और स्वर्ण-निर्माण
एक सर्वाधिक रोचक और चमत्कारी प्रयोग है- स्वर्ण-निर्माण का।इसमें वृक्ष को नष्ट करने की बात नहीं है।प्रत्युत वृक्ष जितना ही पुराना और मोटा होगा क्रिया में आसानी होगी। दूसरी और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इस क्रिया की व्यावहारिक कठिनाई है-यह एक दीर्घकालिक अनुष्ठान है।साधक के निज साधना बल के अनुसार पांच,सात,दश,या बारह वर्ष लग सकते हैं।सीधे कहें कि इस साधना में तैयारी से लेकर पूर्णता तक  पहुंचने में जीवन ही खप जाने जैसी बात है।बहुत धैर्य की आवश्यकता है।साथ ही यह बहुत गुप्त और रहस्यमयी साधना है।आपकी थोड़ी असावधानी(क्रिया-त्रुटि और गोपनीयता भंग) आपके दीर्घकालिक श्रम पर पानी फेर सकता है। मैं स्वयं इसका भुक्तभोगी हूँ।मेरे गुरुजनों ने भी इसे साधा है।
इस क्रिया के लिए प्रथम अनिवार्यता है कि कहीं से इसका बीज या गाछ उपल्बध करें,और अपनी गृह-वाटिका में स्थापित करें- इस बात का ध्यान रखते हुए कि इसके पास
बैठ कर लम्बी साधना करनी है।अतः भविष्य-विचार पूर्वक पौधा लगाने का स्थान चयन करें।पांच-सात वर्षों में क्रिया-योग्य पौधा तैयार हो जायेगा।वस्तुतः इस प्रयोग में मोटे तने की आवश्यकता है।तना जितना मोटा होगा,साधक के लिए उतना ही उपयोगी और लाभप्रद होगा।
      उचित होगा कि योजनावद्ध रुप से पौधे की स्थापना कर देखभाल करते रहें,और इस बीच अपने कायिक शुद्धि के साथ अन्यान्य साधना करते रहें,या सामान्य जीवन- क्रिया-कलापों में गुजारें।पुत्र जन्म से लेकर कमाऊ बनने तक की प्रतीक्षा हर कोई करता है- और बड़े शौक और लगन से करता है।फिर इस चमत्कारी क्रिया के लिए प्रतीक्षा में क्या हर्ज ? वैसे सच पूछा जाय तो इस लम्बी साधना का परिणाम सांसारिक भोग साधना बहुल ही है। अतः इसके प्रति साधक को विशेष आकर्षित नहीं होना चाहिए।अन्य अल्पकालिक साधना-प्रयोगों से ही संतोष करना चाहिए।
      अस्तु।पौधा कार्य-योग्य हो जाने पर रविपुष्य/गुरूपुष्य योग में प्राण-प्रतिष्ठा-विधि से प्रतिष्ठित कर यथा सम्भव पंचोपचार/षोडशोपचार पूजन करें।भगवान गणपति के बारह प्रसिद्ध मंत्रो में स्वेच्छा से किसी मंत्र का चुनाव कर लें।उस चयनित मंत्र से ही पूजन करना है। पूजा के बाद एकाग्रचित होकर क्षमा याचना करें,और अपना अभिष्ट उन्हें स्पष्ट करें।
पूजन सामग्री में अन्य सामानों के अतिरिक्त- शुद्ध पारद एक पाव,लाल कपड़ा चौथाई मीटर,कच्चा गोदुग्ध एक पाव,वरगद का एक सुन्दर पत्ता,सौ ग्राम शुद्ध मोम(मधु मक्खी वाला- ये आपको जड़ी-बूटी की दुकान में मिल जायेगा),वृक्ष में छेद करने के औजार- मोटा बरमा,तेज चाकू,रुखानी आदि साथ रखना आवश्यक है।मोटे तने में सर्वप्रथम मोटा बरमा से छेद करें- छेद इतना ही हो कि तने में आर-पार न हो जाय(मोटाई का तीन हिस्सा ही छेदा जाय)।बरमा से निकल रहे कुन्नी (बुरादा) को प्रेम पूर्वक किसी पात्र में एकत्र कर लें,क्योंकि आगे इसका उपयोग करना है। अब किए गये छिद्र को किसी दूसरे औजार से थोड़ा और बड़ा करें।छेद विलकुल सुडौल हो- इसका ध्यान रखें।अब किए गये छिद्र में सावधानी पूर्वक,साथ लाये गये पारद को भर दें।ध्यान रहे- पारद अति चंचल द्रव्य है।इसे हाथों से पकड़ना कठिन है।अतः वरगद के पत्ते को कुप्पीनुमा बनाकर,छिद्र में पारद भरने का काम करें।छिद्र थोड़ा(एक ईंच) खाली रहे,तभी पारद डालना बन्द कर दें।यदि पारद बचा रह जाय तो कोई हर्ज नहीं।अब, छेद करते समय निकले बुरादे में मधुमक्खी वाला मोम मिलाकर उस शेष छेद में सावधानी पूर्वक भर दें।उपर से लाल कपड़े को चार-पांच बार लपेट कर पट्टीनुमा बन्धन कर दें।हाँ,पौधे के थल में छःईंच गोल घेरा बना दें,जिसमें आसानी से नित्य जल डाला जा सके।अब,पुनः आसन लगाकर पूर्व साधित- गणपति मन्त्र का ग्यारह माला जप करें।जप के लिए रुद्राक्ष माला सर्वोत्तम है।जप पूरा हो जाने पर किए गये जप-पूजन क्रियादि को ऊँ श्री गणपत्यर्पण मस्तु- कह कर पुष्पाञ्जली दे दे।तत्पश्चात गोदुग्ध का अर्घ्य अर्पिच करे। इस प्रकार प्रथम दिन की क्रिया सम्पूर्ण हुयी।
अब,नित्य पंचोपचार पूजन,ग्यारह माला पूर्व साधित गणपति मन्त्र-जप,दुग्धार्घ्य, पुष्पाञ्ली,और समर्पण की क्रिया करते रहना है- लम्बे समय तक।
ध्यान रहे- यह एक दीर्घकालिक अनुष्ठान है।आपके भाग्यानुसार और कर्म की सघननतानुसार फल में समय लगेगा।एक बर्ष से बारह बर्ष- कुछ भी लग सकता है।प्रयोग शतानुभूत है,इसमें जरा भी संशय नहीं। आप नियमित रुप से अपनी क्रिया जारी रखें। क्रिया दीर्घकालिक है।सांसारिक जीवन में कई तरह के व्यवधान आयेंगें।परिवार-गोत्रादि में जनना शौच,मरणाशौच भी होंगे ही।रोग-बीमारी भी सतायेगी ही।ऐसी परिस्थिति में अनुष्ठान क्रिया किंचित बाधित होगी।जननाशौच में नौ दिन,एवं मरणाशौच में बारह दिनों तक क्रिया बन्द रहेगी।रोग-बीमारी की विशेष स्थिति में भी बाधित हो सकता है,जो सर्वथा क्षम्य है। वस इतना ही ध्यान रहे कि आलस्य,लापरवाही और नैराश्य का शिकार न हों।  
प्रयोग सिद्धि का संकेत- क्रिया करते-करते आप देखेंगे कि मन्दार-वृक्ष की पत्तियाँ जो स्वाभाविक रूप से थोड़ा भूरापन लिए हरे रंग की थी,अव धीरे-धीरे अपना रंग बदलने
लगी हैं।पत्तियाँ पहले बीमार पत्तियों की तरह पीली लगेंगी।फिर उनके झड़ जाने पर,नयी पत्तियाँ नये कलेवर में होंगी- पीतल या सोने जैसी अद्भुत चमक वाली।वस,इसी की प्रतीक्षा थी आपको।आपका कार्य सिद्ध हो गया।अब,पुनः रविपुष्य/गुरुपुष्य योग का विचार करके अनुष्ठान समाप्ति का संकल्प करें।पूर्व क्रम से पूजन,जपादि नित्य क्रिया सम्पन्न करके,वृक्ष को सादर दण्डवत करें।लपेटी हुयी लाल पट्टी को खोल दें।किसी औजार से छिद्र में भरे गये बुरादे को आहिस्ते से अलग करें,और उसके अन्दर पूर्वकाल में भरे गये पारद को बाहर निकालें।आप देख कर चमत्कृत हो जायेंगे- यह पारद नहीं,शतप्रतिशत शुद्ध सुवर्ण है। श्रद्धा पूर्वक उसे माथे से लगायें,और सामने रखे गये किसी पात्र में(स्टील नहीं) रख कर विधिवत षोडषोपचार पूजन करें।उसमें से (कम से कम सवा तोला) किसी गरीव को दान कर दें।और शेष को आदर सहित अपने खजाने में रख दें। एक काम और करना अति आवश्क है- कम से कम पांच ब्राह्मण और पांच भिक्षु को भोजन करायें,और श्रद्धानुसार उन्हें दक्षिणा दें।
     नोटः- (१) इस क्रिया का वैज्ञानिक आधार- इस प्रयोग में पारद को तान्त्रिक विधि से स्वर्ण में परिवर्तित कर रहे हैं।लौह आदि अन्यान्य धातुओं को भी तान्त्रिक विधि से परिवर्तित किया जा सकता है।किन्तु पारद का परिवर्तन अपेक्षाकृत आसान है।वैज्ञानिक विवेचन करें तो कहा जा सकता है कि पदार्थों के परिवर्तन के लिए उसके इलेक्ट्रोन-प्रोटोन ही जिम्मेवार होते हैं।पदार्थ और ऊर्जा का ही खेल है यह बहुआयामी ब्रह्मांड।प्राकृतिक रूप से यह परिवर्तन(Transmutation) नित्य-निरंतर जारी है। सामान्य जन के लिए यह महद् आश्चर्य की बात हो सकती है,किन्तु एक वैज्ञानिक जानता है कि वृक्ष(लकड़ी) ही भूगर्भ में दब कर कोयला बनता है, और फिर कोयला ही हीरे में बदलता है।कोयले और हीरे में वैज्ञानिक दृष्टि से बहुत साम्य है- दोनों कार्बन ही हैं। पारद और सोना भी एक दूसरे के बहुत करीब हैं।इनके इलेक्ट्रोन-प्रोटोन काफी करीब हैं।सोने के परमाणु में ७९ इलेक्ट्रोन, ७९ प्रोटोन,और ११८ न्यूट्रोन होते है,जब कि पारद के परमाणु में ८० इलेक्ट्रोन, ८० प्रोटोन,और १२१ न्यूट्रोन होते हैं। यानी किसी विधि से पारद का परमाण्वांक घटा दिया जाय ,तो वह सोना हो जाय।यही कारण है कि परिवर्तन आसान है।वैज्ञानिक-प्रयोगशाला में इन क्रियाओं को जाँचा-परखा गया है।इस तरह के रासायनिक और भौतिक परिवर्तन में जरा भी संशय नहीं है।
        तन्त्र-मन्त्र भी कुछ ऐसा ही कर रहा है,जो कार्य प्रकृति अपनी नियत गति से निरंतर करती आरही है।तन्त्र-मन्त्र कैसे कार्य करता है- इन सिद्धान्तों का विवेचन आप हमारी पुस्तिका- पुण्यार्कतन्त्रप्रदीपिका में देख सकते हैं।यहाँ सिर्फ इतना ही कह दें कि ऑक्सीजन और हाईड्रोजन के अणु आपस में मिल कर जल का निर्माण करते हैं,उसी भांति पारद मन्दार-दूध से लम्बे समय तक संयोग करते-करते स्वर्ण में बदल जाता है। प्रयोगशाला का विशिष्ट परिवेश और उपकरण जैसे कार्य संयोग करते हैं, वैसे ही यहाँ मन्त्र क्रिया और निरंतर मंत्रपूरित गोदुग्ध का सिंचन पारद में रासायनिक परिवर्तन ला देता है। ध्यातव्य है कि वैज्ञानिक सिद्ध है कि गाय के दूध में स्वर्णशक्ति भी मौजूद है।गाय के मेरुदण्ड से कुछ विशिष्ट रसायन निरंतर श्रवित होते रहते हैं,जो सोने के गुण वाले हैं।ओज-वृद्धि के लिए आयुर्वेद स्वर्ण-भस्म खाने का सलाह देता है।सामान्य जन जो इस मंहगी दवा का सेवन नहीं कर सकते,वे नियमित रुप से गोदुग्ध सेवन करके लाभ पा सकते हैं। किन्तु यहाँ भी एक बड़ा शर्त है- देशी नस्ल की गाय,क्यों कि उसके मेरुदण्ड में ही यह गुण है;आजकल की जर्सी  (Crossbreed)गायों में नहीं।अस्तु।
      (२) तन्त्र-ग्रन्थों में स्वर्ण निर्माण की कई विधियाँ दी गयी हैं।योग साधना से भी ये सब चमत्कारिक सिद्धियाँ सहज ही प्राप्त हो सकती हैं।किन्तु साधक को सदा इनसे परहेज करना चाहिए।सामान्य जीवन यापन हेतु कुछ हल्के-फुल्के प्रयोग भले ही कर ले।
 (३) यह प्रयोग पूर्णतया गणपति का है।गणेश साक्षात् कृष्ण ही हैं।कृष्ण यानी विष्णु। मूलतः यह वैष्णवी क्रिया है।इसकी मर्यादा का ध्यान रखते हुए,मांसाहारी लोग इस साधना-प्रयोग को कदापि न करें।उन्हें इसकी सिद्धि कदापि नहीं मिल सकती।उनका श्रम और समय व्यर्थ जायेगा।कुछ अन्य बाधायें झेलनी पड़ेंगी सो अलग।           
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     ii.                  श्वेतार्क(मन्दार)मूल का विभिन्न प्रयोगः-
     सर्वप्रथम मन्दार के पौधे का पता लगा लें।अब रविपुष्य/गुरुपुष्य योग में उसके मूल को घर लाने की योजना बनायें।जिस दिन विहित योग मिल रहा हो,उसके पूर्व संध्या को पूजन सामग्री- जल,अक्षत,मौली,रोली,सिन्दूर,चन्दन,सुपारी,पुष्प,कपूर,धूप,दीप,कुछ नैवेद्य लेकर पौधे के समीप जाकर पूर्व/उत्तर मुख खड़े होकर विधिवत पूजन करें।(यहाँ बैठ कर पूजा करना आवश्यक नहीं है)।ध्यातव्य है कि श्वेतार्क में साक्षात् गणपति का वास है।अतः पूजन गणपति-मंत्र से ही होगा- चयन किए गये किसी गणपति मंत्र से- जिसकी आप पहले भी साधना कर चुके हैं। पूजन के पश्चात् अक्षत-पुष्प-सुपारी लेकर(जल नहीं)प्रार्थना करेः- "हे गणपति! हे श्वेतार्क देव! मैं अपने कार्य की सिद्धि के लिए कल प्रातः आपको अपने साथ अपने घर ले चलूँगा।आप कृपापूर्वक मेरे साथ चल कर मेरे अभीष्ट की सिद्धि करें।" प्रार्थना में शब्दों का हेर-फेर हो सकता है,भावों का नहीं।वस्तुतः आप गणपति देव को अभीष्ट सिद्धि हेतु आमन्त्रित करने गये हैं।प्रार्थना करके प्रेम पूर्वक हाथ में लिए हुए अक्षत-पुष्प-सुपारी को वहीं वृक्ष-तल में छोड़कर वापस घर आ जायें।रात्रि में एकान्त शयन करें।स्वप्न संकेत- शुभाशुभ मिल सकते हैं,नहीं भी।कोई बात नहीं।
       अगली सुबह(मुंह अन्धेरे ही) नित्य कृत्य से निवृत्त होकर एक मीटर लाल या पीले नवीन वस्त्र और खोदने-काटने के औजार के साथ पुनः वहाँ जाकर वृक्ष को सादर प्रणाम करें,और गणपति के ध्यान सहित पूर्व चयनित मन्त्र का उच्चारण करते हुए पूर्व या उत्तर मुख करके सावधानी पूर्वक जड़ की खुदाई करें।खुदाई काफी गहराई तक करनी चाहिए। प्रयास करें कि पूरा का पूरा जड़ (मुशला सहित) निकल सके। पूरा कार्य मौन जप के साथ सम्पन्न करना है।यूँ तो यह कार्य विलकुल अकेले का है,किन्तु विशेष परिस्थिति में किसी सदव्यक्ति का सहयोग लिया जा सकता है,जो शुचिता और गोपनीयता में आपका साथ दे सके।क्यों कि तान्त्रिक प्रयोग ढिंढोरा पीटकर करने की चीज नहीं है।दूसरी बात यह कि प्रयास हो कि जड़ टूटने न पावे। जितना अच्छा जड़ होगा उतना ही उपयोगी होगा।इस प्रकार ग्रहण किए गये टूटे-कटे जड़ का भी उपयोग है,और सम्पूर्ण विग्रह का भी।अतः सबको सहेज लें- साथ ले गये नवीन वस्त्र में।ध्यान रहे- वहाँ से वापस आते समय भी किसी से बातचित न करें।दिन चढ़ चुका रहेगा।रास्ते में लोग मिलेंगे ही।पर आप मौन रहें।
     घर आकर जड़ की विधिवत सफाई करें।पुनः,गंगाजल से सिंचित करने के बाद लाल वस्त्र का आसन देकर छोटी चौकी वगैरह पर स्थायी तौर पर स्थापित कर विधिवत पंचो/षोडशोपचार पूजन करने के बाद ग्यारह माला गणपति मन्त्र का जप करें।तत्पश्चात् दशांश हवन,तत्दशांश तर्पण,तत्दशांश मार्जन करने के बाद एक ब्राह्मण और एक दरिद्रनारायण भोजन एवं यथाशक्ति दक्षिणा प्रदान करें।इस प्रकार आपके घर में साक्षात् गणपति का आविर्भाव हो गया।आगे नित्य यथोपचार पूजन एवं कम से कम एक माला मंत्र जप अवश्य करते रहना चाहिए।
     जड़ उखाड़ते समय कुछ टुकड़े(थोड़े मोटे से) यदि हों तो उनका भी विभिन्न तरह से उपयोग हो सकता है।किसी शिल्पी से उन टकड़ों को उत्कीर्ण कराकर गणपति की छोटी सी प्रतिमा(तीन-चार ईंच की) बनवा कर उसे भी उक्त विधि से स्थापित कर वही लाभ प्राप्त कर सकते हैं।
     श्वेतार्क गणपति स्थापन का फलः-  जो व्यक्ति इस प्रकार गणपति की नित्य साधना करता है उसके सभी मनोरथ पूरे होते हैं।ज्ञान,विद्या,धन-सम्पत्ति,सुरक्षा,विघ्नशान्ति सब कुछ स्वयमेव होता रहता है।उसके घर-परिवार पर किसी प्रकार के जादू-टोटके का प्रभाव नहीं पड़ता।भवन के वास्तु दोषों का भी अद्भुत रुप से निवारण हो जाता है।
श्वेतार्क मूल के अन्यान्य प्रयोग( पूर्व विधि से प्राप्त)--
ª     स्वास्थ्य लाभः- जड़ को सुखाकर चूर्ण कर लें।आधा चम्मच चूर्ण नित्य प्रातः-सायं गोदुग्ध के साथ लेने से बल-वीर्य,ओज-तेज की वृद्धि होती है।औषध सेवन का प्रारम्भ रविपुष्य योग में ही करना चाहिए।
ª     . सुरक्षा- तांबे के ताबीज में भर कर पुरुष दायीं बांह या गले में,तथा स्त्री बायीं बांह या गले में धारण करें।इससे हर प्रकार के टोने-टोटके का निवारण होकर पूर्ण सुरक्षा प्राप्त होगी।यह कार्य भी रविपुष्य योग में ही करें।
ª     सौभाग्य वृद्धि- क्रमांक दो की विधि से ही धारण करने पर यह लाभ भी प्राप्त   होता है,किन्तु इसमें एक कार्य और करना पड़ता है- उसी तरह के ताबीज में कमल के पत्ते को डाल कर स्त्रियों को अपने कमर में बांधना चाहिए।खास कर उन्हें जिनकी कुण्डली में सप्तम भाव(सौभाग्य स्थान) दुर्बल हो।
ª     ४.  वशीकरण-सम्मोहन –(क) श्वेतार्क मूल को रविपुष्य योग में घी और गोरोचन के साथ घिस कर माथे पर तिलक लगाने से इस कार्य की सिद्धि होती है।(ध्यान रखें- प्रयोग का दुरुपयोग न करें,अन्यथा आपकी इस सम्बन्धी अन्य प्रयोग भी निस्फल हो जायेंगे।प्राणसंकट या ऐसी ही विशेष परिस्थिति में सिर्फ प्रयोग करें।
(ख) बकरी के दूध में घिसकर भी उक्त लाभ प्राप्त होता है।
(ग)विवाहार्थ(व्यभिचार नहीं) किसी स्त्री को सम्मोहित करने के लिए अपने वीर्य के साथ घिस कर,तिलक लगा उसके चेहरे पर दृष्टि डालते हुए थोड़ी बातचित करने मात्र से प्रबल सम्मोहन होता है।(ध्यान रहे- तिलक लगाकर प्रथम दृष्टि उसी पर जाए,भूल से भी किसी दूसरे पर नहीं)।एक महोदय ने यह प्रयोग करने का प्रयास किया था।संयोग वश ज्यूँ ही अपने कमरे से तिलक धारण कर गन्तव्य की ओर बढ़े,अचानक एक अन्य स्त्री सामने आगयी,और लाख चेष्टा के वावजूद उसने सम्भाषण भी किया।परिणामतः लम्बे समय तक वह उनका पीछा नहीं छोड़ी।बड़ी कठिनाई से पिंड छुड़ाना पड़ा।अतः बहुत सावधानी से यह तामसी प्रयोग करें।सिद्धान्त है कि सत्व जब हठात् तम में रुपान्तरित होता है तो उसकी ऊर्जा बड़ी प्रखर होती है।श्वेतार्क पूर्णतः सात्विक प्रयोग है।अतः तामसिक प्रयोग से परहेज करना चाहिए।
ª     ५.  स्तम्भन- यहाँ इस शब्द का व्यापक अर्थों में प्रयोग है।यानी किसी प्रकार का स्तम्भन करने में समर्थ है यह मूल।
(क) श्वेतार्क मूल को लाल या पीले कपड़ें में बाँध कर कमर में धारण कर सम्भोग करने से रति क्रिया काफी लम्बी हो जती है।इसे कमल पत्र में लपेट कर बांधा जाय तो और शक्तिशाली हो जाता है।
(ख)श्वेतार्क का दूध और मधु मिलाकर लेप बनायें।इस लेप में श्वेतार्क के फल से प्राप्त रुई की बत्ती बनाकर धी का दीपक जला कर समीप रखें।सम्भोग काल में उसपर दृष्टि डाले रहने से वीर्य-स्तम्भन होता है।कोई यह तर्क दे सकते हैं कि ध्यान दीपक पर रहने के कारण भोग-काल की वृद्धि मनोवैज्ञानिक रुप से हो गयी।जी नहीं,हालाकि ऐसा भी होता है।किन्तु इस दीपक का अपना विलक्षण प्रयोग है।
ª     (६) राज-कृपादि – साधक को राजकृपा- राजकीय पदाधिकारी की अनुकूलता,सम्मान आदि की आकांक्षा हो तो अपने निवास स्थान से पूर्व दिशा की ओर स्थित श्वेतार्क-मूल ग्रहण कर ताबीज की तरह धारण करना चाहिए।
ª     (७) रोगनाश,शत्रुपराजय,मानसिक कष्ट,शोक-सन्ताप आदि के निवारण के लिए अपने निवास स्थान से दक्षिण दिशा की ओर स्थित श्वेतार्क-मूल ग्रहण कर ताबीज बनाकर धारण करना चाहिए।
ª     (८)विरोधियों को नीचा दिखाने(दबाने),उनकी क्रिया-स्तम्भन हेतु अपने निवास स्थान से पश्चिम दिशा में स्थित श्वेतार्क-मूल का प्रयोग करना चाहिए।
ª     (९) गृह-वास्तु रक्षा के उद्देश्य से विहित मुहूर्त में श्वेतार्क का पौधा कहीं से लाकर ऐसी जगह पर स्थापित करे कि प्रवेश-द्वार के सीध में हो।गृह में प्रवेश करते समय और बाहर निकलते समय श्रद्धा पूर्वक दर्शन करे।वैसे श्वेतार्क का पौधा भवन के किसी भी भाग में होगा तो लाभदायक ही है,क्यों कि साक्षात् गणेश तुल्य है।किन्तु प्रवेश-द्वार के सामने,पूरब दिशा में,ईशान कोण में,उत्तर दिशा में होना विशेष शुभ माना गया है।
ª     (१०) विष-निवारण- मन्दार-मूल को जल में घिसकर दंशित स्थान पर लेप करने से बर्रे,विच्छु आदि विषों का शमन होना है।
ª     (११) आकर्षण- मदार(श्वेत)मूल, गोरोचन,कूठ,हरिद्रा आदि को साथ-साथ चन्दन की तरह घिस कर  लगाने से लोगों को अपनी ओर आकर्षित(सम्मोहित)करने की क्षमता आ जाती है।
ª     (१२) अग्नि(ताप) रोधक- श्वोतार्क मूल को बच के साथ पीसकर लेप बना शरीर में लेप करने से अग्नि का प्रभाव शरीर पर नहीं पड़ता।इस प्रयोग की सिद्धि की परीक्षा सिर्फ अंगुली पर लगा कर पहले कर लेनी चाहिए।
श्वेतार्क तन्त्र में इस चमत्कारी वनस्पति- सिद्ध श्वेतार्क के सैकड़ों प्रयोग मिलते हैं।अपनी साधना-
वुद्धि से यथोचित प्रयोग कर लाभान्वित हुआ जा सकता है। श्रद्धा-विश्वास पूर्वक इनका लोककल्याण हेतु प्रयोग किया जाना चाहिए।


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