Tuesday, 22 April 2014

पुण्यार्कवनस्पतितन्त्रम् 5

           तृतीय परिच्छेद – वनस्पति-तन्त्र-प्रयोग
                               
श्वेतार्क(मन्दार)
        मन्दार एक बहुपरिचित पौधा है।संस्कृत में इसे अर्क भी कहते हैं।अर्क सूर्य की संविधा है।यह शिव का अतिप्रिय पुष्प है।इसकी कई प्रजातियाँ हैं।मुख्य रूप से नीले और सफेद फूलों के भेद से पहचाना जाता है।एक और खास बात ये है कि बनावट के विचार से छोटे और बड़े आकार में मिलने वाले दो पौधे हैं,जो वस्तुतः दो विलकुल भिन्न जाति के है। एक को अकवन के नाम से जाना जाता है।इसका विकास क्रम मदार से किंचित भिन्न है।प्रायः लोग दोनों को एक ही समझ लेते हैं,जब कि जाति एक और प्रजाति भेद है।गुण-धर्म में भी भेद स्वाभाविक है।अकवन(अर्क)जड़ से ही बहुशाखा वाला होता है,जव कि मदार में शाखायें अपेक्षाकृत कम होती हैं।अकवन साल दो-साल में प्रायः सूख जाता है,किन्तु मदार बहुबर्षायु पौधा है।अकवन में सिर्फ शाखायें ही शाखायें होती हैं,जब कि मदार तना युक्त होता है।पुराना पड़ने पर काफी मोटा और १०-१५ फीट ऊँचा हो जाता है। गोस्वामी जी ने वर्षाऋतु-वर्णन क्रम में कहा है-
     अर्क,जवास पात विनु भयऊ।जिमि सुराज खल उद्यम गयऊ।।
तात्पर्य यह कि वरसात में सभी पेंड़-पौधे लहलहाने लगते हैं,जब कि अर्क और जवास प्रायः सूख जाते हैं।इनकी पत्तियाँ झड़ जाती हैं।आमतौर पर रेलवे लाईनों के किनारे,या जहाँ-तहाँ किसी पुराने मकानों के ढूह पर पाया जाता है।इसके पत्ते वरगद के पत्ते जैसे आकार के होते हैं।रंग में थोड़ा फर्क होता है।बैंगनी फूलों वाला मदार तो बहुतायत से पाया जाता है,किन्तु सफेद फूल की प्रजाति जरा दुर्लभ है।
      यहाँ मेरा विवेच्य वनस्पति श्वेतार्क(मदार) ही है।क्षुप जातिय अकवन या नीले फूलों वाला मदार नहीं।
मदार पुष्प शिव को अतिशय प्रिय है- इसके पीछे एक कारण यह भी है कि इस पौधे में पार्वती नन्दन गणेश का वास है।गीता (विभूतियोग)में श्रीकृष्ण ने स्वयं को अश्वत्थ(पीपल) कहा है। तदभांति मन्दार गणेश की साक्षात् विभूति है।लोककल्याण के लिए विघ्नेश्वर विनायक मन्दार के रूप में अवतरित हुए हैं- ऐसा तन्त्र-ग्रन्थों में वर्णित है। अति चमत्कारिक बात यह है कि मन्दार मूल को आप निर्विघ्नता पूर्वक(विना कटे-टूटे) यदि जमीन से ऊखाड़ कर गौर करें तो पायेंगे कि साक्षात् मंगल मूर्ति की तरह नजर आएगा।
     यहाँ हम मन्दार के विभिन्न प्रयोगों की चर्चा करेंगे,जिनमें ज्यादातर श्वेतार्क मूल का ही प्रयोग है।इसके लिए पौधे का बहुत पुराना(मोटा)होना जरुरी नहीं है।हाँ,ये बात अलग है कि पौधा जितना ही पुराना होगा- उसका मूल उतना ही सुदृढ़-सुव्यवस्थित-सुन्दर आकृति वाला होगा।
       i.                श्वेतार्क गणपति और स्वर्ण-निर्माण
एक सर्वाधिक रोचक और चमत्कारी प्रयोग है- स्वर्ण-निर्माण का।इसमें वृक्ष को नष्ट करने की बात नहीं है।प्रत्युत वृक्ष जितना ही पुराना और मोटा होगा क्रिया में आसानी होगी। दूसरी और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इस क्रिया की व्यावहारिक कठिनाई है-यह एक दीर्घकालिक अनुष्ठान है।साधक के निज साधना बल के अनुसार पांच,सात,दश,या बारह वर्ष लग सकते हैं।सीधे कहें कि इस साधना में तैयारी से लेकर पूर्णता तक  पहुंचने में जीवन ही खप जाने जैसी बात है।बहुत धैर्य की आवश्यकता है।साथ ही यह बहुत गुप्त और रहस्यमयी साधना है।आपकी थोड़ी असावधानी(क्रिया-त्रुटि और गोपनीयता भंग) आपके दीर्घकालिक श्रम पर पानी फेर सकता है। मैं स्वयं इसका भुक्तभोगी हूँ।मेरे गुरुजनों ने भी इसे साधा है।
इस क्रिया के लिए प्रथम अनिवार्यता है कि कहीं से इसका बीज या गाछ उपल्बध करें,और अपनी गृह-वाटिका में स्थापित करें- इस बात का ध्यान रखते हुए कि इसके पास
बैठ कर लम्बी साधना करनी है।अतः भविष्य-विचार पूर्वक पौधा लगाने का स्थान चयन करें।पांच-सात वर्षों में क्रिया-योग्य पौधा तैयार हो जायेगा।वस्तुतः इस प्रयोग में मोटे तने की आवश्यकता है।तना जितना मोटा होगा,साधक के लिए उतना ही उपयोगी और लाभप्रद होगा।
      उचित होगा कि योजनावद्ध रुप से पौधे की स्थापना कर देखभाल करते रहें,और इस बीच अपने कायिक शुद्धि के साथ अन्यान्य साधना करते रहें,या सामान्य जीवन- क्रिया-कलापों में गुजारें।पुत्र जन्म से लेकर कमाऊ बनने तक की प्रतीक्षा हर कोई करता है- और बड़े शौक और लगन से करता है।फिर इस चमत्कारी क्रिया के लिए प्रतीक्षा में क्या हर्ज ? वैसे सच पूछा जाय तो इस लम्बी साधना का परिणाम सांसारिक भोग साधना बहुल ही है। अतः इसके प्रति साधक को विशेष आकर्षित नहीं होना चाहिए।अन्य अल्पकालिक साधना-प्रयोगों से ही संतोष करना चाहिए।
      अस्तु।पौधा कार्य-योग्य हो जाने पर रविपुष्य/गुरूपुष्य योग में प्राण-प्रतिष्ठा-विधि से प्रतिष्ठित कर यथा सम्भव पंचोपचार/षोडशोपचार पूजन करें।भगवान गणपति के बारह प्रसिद्ध मंत्रो में स्वेच्छा से किसी मंत्र का चुनाव कर लें।उस चयनित मंत्र से ही पूजन करना है। पूजा के बाद एकाग्रचित होकर क्षमा याचना करें,और अपना अभिष्ट उन्हें स्पष्ट करें।
पूजन सामग्री में अन्य सामानों के अतिरिक्त- शुद्ध पारद एक पाव,लाल कपड़ा चौथाई मीटर,कच्चा गोदुग्ध एक पाव,वरगद का एक सुन्दर पत्ता,सौ ग्राम शुद्ध मोम(मधु मक्खी वाला- ये आपको जड़ी-बूटी की दुकान में मिल जायेगा),वृक्ष में छेद करने के औजार- मोटा बरमा,तेज चाकू,रुखानी आदि साथ रखना आवश्यक है।मोटे तने में सर्वप्रथम मोटा बरमा से छेद करें- छेद इतना ही हो कि तने में आर-पार न हो जाय(मोटाई का तीन हिस्सा ही छेदा जाय)।बरमा से निकल रहे कुन्नी (बुरादा) को प्रेम पूर्वक किसी पात्र में एकत्र कर लें,क्योंकि आगे इसका उपयोग करना है। अब किए गये छिद्र को किसी दूसरे औजार से थोड़ा और बड़ा करें।छेद विलकुल सुडौल हो- इसका ध्यान रखें।अब किए गये छिद्र में सावधानी पूर्वक,साथ लाये गये पारद को भर दें।ध्यान रहे- पारद अति चंचल द्रव्य है।इसे हाथों से पकड़ना कठिन है।अतः वरगद के पत्ते को कुप्पीनुमा बनाकर,छिद्र में पारद भरने का काम करें।छिद्र थोड़ा(एक ईंच) खाली रहे,तभी पारद डालना बन्द कर दें।यदि पारद बचा रह जाय तो कोई हर्ज नहीं।अब, छेद करते समय निकले बुरादे में मधुमक्खी वाला मोम मिलाकर उस शेष छेद में सावधानी पूर्वक भर दें।उपर से लाल कपड़े को चार-पांच बार लपेट कर पट्टीनुमा बन्धन कर दें।हाँ,पौधे के थल में छःईंच गोल घेरा बना दें,जिसमें आसानी से नित्य जल डाला जा सके।अब,पुनः आसन लगाकर पूर्व साधित- गणपति मन्त्र का ग्यारह माला जप करें।जप के लिए रुद्राक्ष माला सर्वोत्तम है।जप पूरा हो जाने पर किए गये जप-पूजन क्रियादि को ऊँ श्री गणपत्यर्पण मस्तु- कह कर पुष्पाञ्जली दे दे।तत्पश्चात गोदुग्ध का अर्घ्य अर्पिच करे। इस प्रकार प्रथम दिन की क्रिया सम्पूर्ण हुयी।
अब,नित्य पंचोपचार पूजन,ग्यारह माला पूर्व साधित गणपति मन्त्र-जप,दुग्धार्घ्य, पुष्पाञ्ली,और समर्पण की क्रिया करते रहना है- लम्बे समय तक।
ध्यान रहे- यह एक दीर्घकालिक अनुष्ठान है।आपके भाग्यानुसार और कर्म की सघननतानुसार फल में समय लगेगा।एक बर्ष से बारह बर्ष- कुछ भी लग सकता है।प्रयोग शतानुभूत है,इसमें जरा भी संशय नहीं। आप नियमित रुप से अपनी क्रिया जारी रखें। क्रिया दीर्घकालिक है।सांसारिक जीवन में कई तरह के व्यवधान आयेंगें।परिवार-गोत्रादि में जनना शौच,मरणाशौच भी होंगे ही।रोग-बीमारी भी सतायेगी ही।ऐसी परिस्थिति में अनुष्ठान क्रिया किंचित बाधित होगी।जननाशौच में नौ दिन,एवं मरणाशौच में बारह दिनों तक क्रिया बन्द रहेगी।रोग-बीमारी की विशेष स्थिति में भी बाधित हो सकता है,जो सर्वथा क्षम्य है। वस इतना ही ध्यान रहे कि आलस्य,लापरवाही और नैराश्य का शिकार न हों।  
प्रयोग सिद्धि का संकेत- क्रिया करते-करते आप देखेंगे कि मन्दार-वृक्ष की पत्तियाँ जो स्वाभाविक रूप से थोड़ा भूरापन लिए हरे रंग की थी,अव धीरे-धीरे अपना रंग बदलने
लगी हैं।पत्तियाँ पहले बीमार पत्तियों की तरह पीली लगेंगी।फिर उनके झड़ जाने पर,नयी पत्तियाँ नये कलेवर में होंगी- पीतल या सोने जैसी अद्भुत चमक वाली।वस,इसी की प्रतीक्षा थी आपको।आपका कार्य सिद्ध हो गया।अब,पुनः रविपुष्य/गुरुपुष्य योग का विचार करके अनुष्ठान समाप्ति का संकल्प करें।पूर्व क्रम से पूजन,जपादि नित्य क्रिया सम्पन्न करके,वृक्ष को सादर दण्डवत करें।लपेटी हुयी लाल पट्टी को खोल दें।किसी औजार से छिद्र में भरे गये बुरादे को आहिस्ते से अलग करें,और उसके अन्दर पूर्वकाल में भरे गये पारद को बाहर निकालें।आप देख कर चमत्कृत हो जायेंगे- यह पारद नहीं,शतप्रतिशत शुद्ध सुवर्ण है। श्रद्धा पूर्वक उसे माथे से लगायें,और सामने रखे गये किसी पात्र में(स्टील नहीं) रख कर विधिवत षोडषोपचार पूजन करें।उसमें से (कम से कम सवा तोला) किसी गरीव को दान कर दें।और शेष को आदर सहित अपने खजाने में रख दें। एक काम और करना अति आवश्क है- कम से कम पांच ब्राह्मण और पांच भिक्षु को भोजन करायें,और श्रद्धानुसार उन्हें दक्षिणा दें।
     नोटः- (१) इस क्रिया का वैज्ञानिक आधार- इस प्रयोग में पारद को तान्त्रिक विधि से स्वर्ण में परिवर्तित कर रहे हैं।लौह आदि अन्यान्य धातुओं को भी तान्त्रिक विधि से परिवर्तित किया जा सकता है।किन्तु पारद का परिवर्तन अपेक्षाकृत आसान है।वैज्ञानिक विवेचन करें तो कहा जा सकता है कि पदार्थों के परिवर्तन के लिए उसके इलेक्ट्रोन-प्रोटोन ही जिम्मेवार होते हैं।पदार्थ और ऊर्जा का ही खेल है यह बहुआयामी ब्रह्मांड।प्राकृतिक रूप से यह परिवर्तन(Transmutation) नित्य-निरंतर जारी है। सामान्य जन के लिए यह महद् आश्चर्य की बात हो सकती है,किन्तु एक वैज्ञानिक जानता है कि वृक्ष(लकड़ी) ही भूगर्भ में दब कर कोयला बनता है, और फिर कोयला ही हीरे में बदलता है।कोयले और हीरे में वैज्ञानिक दृष्टि से बहुत साम्य है- दोनों कार्बन ही हैं। पारद और सोना भी एक दूसरे के बहुत करीब हैं।इनके इलेक्ट्रोन-प्रोटोन काफी करीब हैं।सोने के परमाणु में ७९ इलेक्ट्रोन, ७९ प्रोटोन,और ११८ न्यूट्रोन होते है,जब कि पारद के परमाणु में ८० इलेक्ट्रोन, ८० प्रोटोन,और १२१ न्यूट्रोन होते हैं। यानी किसी विधि से पारद का परमाण्वांक घटा दिया जाय ,तो वह सोना हो जाय।यही कारण है कि परिवर्तन आसान है।वैज्ञानिक-प्रयोगशाला में इन क्रियाओं को जाँचा-परखा गया है।इस तरह के रासायनिक और भौतिक परिवर्तन में जरा भी संशय नहीं है।
        तन्त्र-मन्त्र भी कुछ ऐसा ही कर रहा है,जो कार्य प्रकृति अपनी नियत गति से निरंतर करती आरही है।तन्त्र-मन्त्र कैसे कार्य करता है- इन सिद्धान्तों का विवेचन आप हमारी पुस्तिका- पुण्यार्कतन्त्रप्रदीपिका में देख सकते हैं।यहाँ सिर्फ इतना ही कह दें कि ऑक्सीजन और हाईड्रोजन के अणु आपस में मिल कर जल का निर्माण करते हैं,उसी भांति पारद मन्दार-दूध से लम्बे समय तक संयोग करते-करते स्वर्ण में बदल जाता है। प्रयोगशाला का विशिष्ट परिवेश और उपकरण जैसे कार्य संयोग करते हैं, वैसे ही यहाँ मन्त्र क्रिया और निरंतर मंत्रपूरित गोदुग्ध का सिंचन पारद में रासायनिक परिवर्तन ला देता है। ध्यातव्य है कि वैज्ञानिक सिद्ध है कि गाय के दूध में स्वर्णशक्ति भी मौजूद है।गाय के मेरुदण्ड से कुछ विशिष्ट रसायन निरंतर श्रवित होते रहते हैं,जो सोने के गुण वाले हैं।ओज-वृद्धि के लिए आयुर्वेद स्वर्ण-भस्म खाने का सलाह देता है।सामान्य जन जो इस मंहगी दवा का सेवन नहीं कर सकते,वे नियमित रुप से गोदुग्ध सेवन करके लाभ पा सकते हैं। किन्तु यहाँ भी एक बड़ा शर्त है- देशी नस्ल की गाय,क्यों कि उसके मेरुदण्ड में ही यह गुण है;आजकल की जर्सी  (Crossbreed)गायों में नहीं।अस्तु।
      (२) तन्त्र-ग्रन्थों में स्वर्ण निर्माण की कई विधियाँ दी गयी हैं।योग साधना से भी ये सब चमत्कारिक सिद्धियाँ सहज ही प्राप्त हो सकती हैं।किन्तु साधक को सदा इनसे परहेज करना चाहिए।सामान्य जीवन यापन हेतु कुछ हल्के-फुल्के प्रयोग भले ही कर ले।
 (३) यह प्रयोग पूर्णतया गणपति का है।गणेश साक्षात् कृष्ण ही हैं।कृष्ण यानी विष्णु। मूलतः यह वैष्णवी क्रिया है।इसकी मर्यादा का ध्यान रखते हुए,मांसाहारी लोग इस साधना-प्रयोग को कदापि न करें।उन्हें इसकी सिद्धि कदापि नहीं मिल सकती।उनका श्रम और समय व्यर्थ जायेगा।कुछ अन्य बाधायें झेलनी पड़ेंगी सो अलग।           
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     ii.                  श्वेतार्क(मन्दार)मूल का विभिन्न प्रयोगः-
     सर्वप्रथम मन्दार के पौधे का पता लगा लें।अब रविपुष्य/गुरुपुष्य योग में उसके मूल को घर लाने की योजना बनायें।जिस दिन विहित योग मिल रहा हो,उसके पूर्व संध्या को पूजन सामग्री- जल,अक्षत,मौली,रोली,सिन्दूर,चन्दन,सुपारी,पुष्प,कपूर,धूप,दीप,कुछ नैवेद्य लेकर पौधे के समीप जाकर पूर्व/उत्तर मुख खड़े होकर विधिवत पूजन करें।(यहाँ बैठ कर पूजा करना आवश्यक नहीं है)।ध्यातव्य है कि श्वेतार्क में साक्षात् गणपति का वास है।अतः पूजन गणपति-मंत्र से ही होगा- चयन किए गये किसी गणपति मंत्र से- जिसकी आप पहले भी साधना कर चुके हैं। पूजन के पश्चात् अक्षत-पुष्प-सुपारी लेकर(जल नहीं)प्रार्थना करेः- "हे गणपति! हे श्वेतार्क देव! मैं अपने कार्य की सिद्धि के लिए कल प्रातः आपको अपने साथ अपने घर ले चलूँगा।आप कृपापूर्वक मेरे साथ चल कर मेरे अभीष्ट की सिद्धि करें।" प्रार्थना में शब्दों का हेर-फेर हो सकता है,भावों का नहीं।वस्तुतः आप गणपति देव को अभीष्ट सिद्धि हेतु आमन्त्रित करने गये हैं।प्रार्थना करके प्रेम पूर्वक हाथ में लिए हुए अक्षत-पुष्प-सुपारी को वहीं वृक्ष-तल में छोड़कर वापस घर आ जायें।रात्रि में एकान्त शयन करें।स्वप्न संकेत- शुभाशुभ मिल सकते हैं,नहीं भी।कोई बात नहीं।
       अगली सुबह(मुंह अन्धेरे ही) नित्य कृत्य से निवृत्त होकर एक मीटर लाल या पीले नवीन वस्त्र और खोदने-काटने के औजार के साथ पुनः वहाँ जाकर वृक्ष को सादर प्रणाम करें,और गणपति के ध्यान सहित पूर्व चयनित मन्त्र का उच्चारण करते हुए पूर्व या उत्तर मुख करके सावधानी पूर्वक जड़ की खुदाई करें।खुदाई काफी गहराई तक करनी चाहिए। प्रयास करें कि पूरा का पूरा जड़ (मुशला सहित) निकल सके। पूरा कार्य मौन जप के साथ सम्पन्न करना है।यूँ तो यह कार्य विलकुल अकेले का है,किन्तु विशेष परिस्थिति में किसी सदव्यक्ति का सहयोग लिया जा सकता है,जो शुचिता और गोपनीयता में आपका साथ दे सके।क्यों कि तान्त्रिक प्रयोग ढिंढोरा पीटकर करने की चीज नहीं है।दूसरी बात यह कि प्रयास हो कि जड़ टूटने न पावे। जितना अच्छा जड़ होगा उतना ही उपयोगी होगा।इस प्रकार ग्रहण किए गये टूटे-कटे जड़ का भी उपयोग है,और सम्पूर्ण विग्रह का भी।अतः सबको सहेज लें- साथ ले गये नवीन वस्त्र में।ध्यान रहे- वहाँ से वापस आते समय भी किसी से बातचित न करें।दिन चढ़ चुका रहेगा।रास्ते में लोग मिलेंगे ही।पर आप मौन रहें।
     घर आकर जड़ की विधिवत सफाई करें।पुनः,गंगाजल से सिंचित करने के बाद लाल वस्त्र का आसन देकर छोटी चौकी वगैरह पर स्थायी तौर पर स्थापित कर विधिवत पंचो/षोडशोपचार पूजन करने के बाद ग्यारह माला गणपति मन्त्र का जप करें।तत्पश्चात् दशांश हवन,तत्दशांश तर्पण,तत्दशांश मार्जन करने के बाद एक ब्राह्मण और एक दरिद्रनारायण भोजन एवं यथाशक्ति दक्षिणा प्रदान करें।इस प्रकार आपके घर में साक्षात् गणपति का आविर्भाव हो गया।आगे नित्य यथोपचार पूजन एवं कम से कम एक माला मंत्र जप अवश्य करते रहना चाहिए।
     जड़ उखाड़ते समय कुछ टुकड़े(थोड़े मोटे से) यदि हों तो उनका भी विभिन्न तरह से उपयोग हो सकता है।किसी शिल्पी से उन टकड़ों को उत्कीर्ण कराकर गणपति की छोटी सी प्रतिमा(तीन-चार ईंच की) बनवा कर उसे भी उक्त विधि से स्थापित कर वही लाभ प्राप्त कर सकते हैं।
     श्वेतार्क गणपति स्थापन का फलः-  जो व्यक्ति इस प्रकार गणपति की नित्य साधना करता है उसके सभी मनोरथ पूरे होते हैं।ज्ञान,विद्या,धन-सम्पत्ति,सुरक्षा,विघ्नशान्ति सब कुछ स्वयमेव होता रहता है।उसके घर-परिवार पर किसी प्रकार के जादू-टोटके का प्रभाव नहीं पड़ता।भवन के वास्तु दोषों का भी अद्भुत रुप से निवारण हो जाता है।
श्वेतार्क मूल के अन्यान्य प्रयोग( पूर्व विधि से प्राप्त)--
ª     स्वास्थ्य लाभः- जड़ को सुखाकर चूर्ण कर लें।आधा चम्मच चूर्ण नित्य प्रातः-सायं गोदुग्ध के साथ लेने से बल-वीर्य,ओज-तेज की वृद्धि होती है।औषध सेवन का प्रारम्भ रविपुष्य योग में ही करना चाहिए।
ª     . सुरक्षा- तांबे के ताबीज में भर कर पुरुष दायीं बांह या गले में,तथा स्त्री बायीं बांह या गले में धारण करें।इससे हर प्रकार के टोने-टोटके का निवारण होकर पूर्ण सुरक्षा प्राप्त होगी।यह कार्य भी रविपुष्य योग में ही करें।
ª     सौभाग्य वृद्धि- क्रमांक दो की विधि से ही धारण करने पर यह लाभ भी प्राप्त   होता है,किन्तु इसमें एक कार्य और करना पड़ता है- उसी तरह के ताबीज में कमल के पत्ते को डाल कर स्त्रियों को अपने कमर में बांधना चाहिए।खास कर उन्हें जिनकी कुण्डली में सप्तम भाव(सौभाग्य स्थान) दुर्बल हो।
ª     ४.  वशीकरण-सम्मोहन –(क) श्वेतार्क मूल को रविपुष्य योग में घी और गोरोचन के साथ घिस कर माथे पर तिलक लगाने से इस कार्य की सिद्धि होती है।(ध्यान रखें- प्रयोग का दुरुपयोग न करें,अन्यथा आपकी इस सम्बन्धी अन्य प्रयोग भी निस्फल हो जायेंगे।प्राणसंकट या ऐसी ही विशेष परिस्थिति में सिर्फ प्रयोग करें।
(ख) बकरी के दूध में घिसकर भी उक्त लाभ प्राप्त होता है।
(ग)विवाहार्थ(व्यभिचार नहीं) किसी स्त्री को सम्मोहित करने के लिए अपने वीर्य के साथ घिस कर,तिलक लगा उसके चेहरे पर दृष्टि डालते हुए थोड़ी बातचित करने मात्र से प्रबल सम्मोहन होता है।(ध्यान रहे- तिलक लगाकर प्रथम दृष्टि उसी पर जाए,भूल से भी किसी दूसरे पर नहीं)।एक महोदय ने यह प्रयोग करने का प्रयास किया था।संयोग वश ज्यूँ ही अपने कमरे से तिलक धारण कर गन्तव्य की ओर बढ़े,अचानक एक अन्य स्त्री सामने आगयी,और लाख चेष्टा के वावजूद उसने सम्भाषण भी किया।परिणामतः लम्बे समय तक वह उनका पीछा नहीं छोड़ी।बड़ी कठिनाई से पिंड छुड़ाना पड़ा।अतः बहुत सावधानी से यह तामसी प्रयोग करें।सिद्धान्त है कि सत्व जब हठात् तम में रुपान्तरित होता है तो उसकी ऊर्जा बड़ी प्रखर होती है।श्वेतार्क पूर्णतः सात्विक प्रयोग है।अतः तामसिक प्रयोग से परहेज करना चाहिए।
ª     ५.  स्तम्भन- यहाँ इस शब्द का व्यापक अर्थों में प्रयोग है।यानी किसी प्रकार का स्तम्भन करने में समर्थ है यह मूल।
(क) श्वेतार्क मूल को लाल या पीले कपड़ें में बाँध कर कमर में धारण कर सम्भोग करने से रति क्रिया काफी लम्बी हो जती है।इसे कमल पत्र में लपेट कर बांधा जाय तो और शक्तिशाली हो जाता है।
(ख)श्वेतार्क का दूध और मधु मिलाकर लेप बनायें।इस लेप में श्वेतार्क के फल से प्राप्त रुई की बत्ती बनाकर धी का दीपक जला कर समीप रखें।सम्भोग काल में उसपर दृष्टि डाले रहने से वीर्य-स्तम्भन होता है।कोई यह तर्क दे सकते हैं कि ध्यान दीपक पर रहने के कारण भोग-काल की वृद्धि मनोवैज्ञानिक रुप से हो गयी।जी नहीं,हालाकि ऐसा भी होता है।किन्तु इस दीपक का अपना विलक्षण प्रयोग है।
ª     (६) राज-कृपादि – साधक को राजकृपा- राजकीय पदाधिकारी की अनुकूलता,सम्मान आदि की आकांक्षा हो तो अपने निवास स्थान से पूर्व दिशा की ओर स्थित श्वेतार्क-मूल ग्रहण कर ताबीज की तरह धारण करना चाहिए।
ª     (७) रोगनाश,शत्रुपराजय,मानसिक कष्ट,शोक-सन्ताप आदि के निवारण के लिए अपने निवास स्थान से दक्षिण दिशा की ओर स्थित श्वेतार्क-मूल ग्रहण कर ताबीज बनाकर धारण करना चाहिए।
ª     (८)विरोधियों को नीचा दिखाने(दबाने),उनकी क्रिया-स्तम्भन हेतु अपने निवास स्थान से पश्चिम दिशा में स्थित श्वेतार्क-मूल का प्रयोग करना चाहिए।
ª     (९) गृह-वास्तु रक्षा के उद्देश्य से विहित मुहूर्त में श्वेतार्क का पौधा कहीं से लाकर ऐसी जगह पर स्थापित करे कि प्रवेश-द्वार के सीध में हो।गृह में प्रवेश करते समय और बाहर निकलते समय श्रद्धा पूर्वक दर्शन करे।वैसे श्वेतार्क का पौधा भवन के किसी भी भाग में होगा तो लाभदायक ही है,क्यों कि साक्षात् गणेश तुल्य है।किन्तु प्रवेश-द्वार के सामने,पूरब दिशा में,ईशान कोण में,उत्तर दिशा में होना विशेष शुभ माना गया है।
ª     (१०) विष-निवारण- मन्दार-मूल को जल में घिसकर दंशित स्थान पर लेप करने से बर्रे,विच्छु आदि विषों का शमन होना है।
ª     (११) आकर्षण- मदार(श्वेत)मूल, गोरोचन,कूठ,हरिद्रा आदि को साथ-साथ चन्दन की तरह घिस कर  लगाने से लोगों को अपनी ओर आकर्षित(सम्मोहित)करने की क्षमता आ जाती है।
ª     (१२) अग्नि(ताप) रोधक- श्वोतार्क मूल को बच के साथ पीसकर लेप बना शरीर में लेप करने से अग्नि का प्रभाव शरीर पर नहीं पड़ता।इस प्रयोग की सिद्धि की परीक्षा सिर्फ अंगुली पर लगा कर पहले कर लेनी चाहिए।
श्वेतार्क तन्त्र में इस चमत्कारी वनस्पति- सिद्ध श्वेतार्क के सैकड़ों प्रयोग मिलते हैं।अपनी साधना-
वुद्धि से यथोचित प्रयोग कर लाभान्वित हुआ जा सकता है। श्रद्धा-विश्वास पूर्वक इनका लोककल्याण हेतु प्रयोग किया जाना चाहिए।


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