Tuesday, 22 April 2014

पुण्यार्कवनस्पतितन्त्रम्- 10

(4)             बरगद का बाँदा- (क) बरगद(बर,वट) एक सुपरिचित विशालकाय पौधा है।भगवान भोलेनाथ का यह प्रतीक भी है।शिव की तरह यह जटाजूट धारी भी है।वास्तु प्रकरण में इस पौधे का भवन के पूरब दिशा में होना अति शुभद माना गया है,किन्तु पश्चिम दिशा में उतना ही हानिकारक भी कहा गया है।इसका बाँदा यदि सौभाग्य से कहीं दीख जाय तो पूर्व वर्णित विधि से आर्द्रा नक्षत्र में, घर लाकर स्थापन-पूजन करके रख लें।श्रम,संघर्ष,युद्ध आदि में सदा विजयदायी है-  शिववृक्ष का बाँदा। शारीरिक सुरक्षा और शक्ति-वर्द्धन में इसका जोड़ नहीं।सच पूछें तो यह अद्भुत प्रयोग वाला वनस्पति है।आयुर्वेद में इसके कई औषधीय प्रयोग मिलते हैं।उक्त बाँदा को स्थापन-पूजन के पश्चात् चन्दन की तरह घिसकर गाय के दूध के साथ पीने से तेज और बल की बृद्धि होती है।बुढ़ापे को दूर भगाने की अद्भुत क्षमता है इसमें।
       (ख)  वट के अन्य प्रयोग- १. धन-वृद्धि के लिए- यूँ तो वट का बीज ठीक वट-वृक्ष के नीचे नहीं उगता,किन्तु सौभाग्य से कहीं ऐसा पौधा नजर आजाय तो किसी सोमवार या रविपुष्य योग के दिन उसे सम्मान पूर्वक घर ले आयें।किसी अनुकूल जगह पर घर के आसपास लगा दें।पूरबमुखी घर हो तो उसी दिशा में लगायें,और स्थापना विधि से स्थापन-पूजन कर दें।आगे,नित्य उसके समीप खड़े होकर कम से कम एक माला शिव पंचाक्षर मंत्र का जप कर लिया करें।यह पौधा जैसे-जैसे बड़ा होगा,घर में समृद्धि आते जायेगी।
     २.वरगद एक अजीब पौधा है- थोड़ा पुराना होने पर हम देखते हैं कि उसके तने से कुछ जड़ें निकल कर नीचे जमीन की ओर आने लगती हैं।कभी-कभी तो ये जमीन में आकर नये वृक्ष का सृजन भी कर देती हैं।इन अवरोही जड़ों को वरोह या वरजटा कहते हैं।किसी रविपुष्य योग में अथवा सोमवार को आदर पूर्वक इसे काट कर घर ले आयें।विधिवत इसका पूजन करें।फिर इसे छोटे-छोटे टुकड़ों में काट कर सुरक्षित रख दें। नित्य इस से दातून करें।वरोह की कूची(व्रश) बड़ी अच्छी होती है।इसके प्रयोग से दांतों की सभी बीमारियाँ दूर होती हैं। वरोह को सुखा कर चूर्ण बनाकर मंजन की तरह भी प्रयोग करने से दंत रोगों में लाभ होता है।ध्यातव्य है कि सभी वनस्पतियों का औषधीय गुण है,किन्तु उनमें तान्त्रिक गुण भी यथाविधि प्रयुक्त कर दिया जाय तो अद्भुत लाभ होता है।आये दिन शिकायत होती है कि अमुक आयुर्वेदिक औषधि कारगर नहीं है।इसके पीछे औषध-निर्माण प्रक्रिया ही मुख्य रुप से जिम्मेवार है।पहले ऋषि-मुनि इन सारी विधियों का प्रयोग करते थे-(वनस्पति ग्रहण से निर्माण तक),किन्तु आज आधुनिक कम्पनियाँ किसी तरह लाकर,कूंट-चूर,पैक कर बाजार में ठेल देती हैं।जड़ी-बूटियों का वैज्ञानिक शोधन भले कर लेते हों ये निर्माता,किन्तु तान्त्रिक गुण कहाँ भर पाते हैं।यही कारण है कि औषधियाँ निर्बीज होती जा रही हैं।वनस्पति के औषधीय गुणों के साथ तान्त्रिक गुणों का संयोग भी किया जाय तो सोने में सुगन्ध आजाय।
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