Saturday, 26 April 2014

पुण्यार्कवनस्पतितन्त्रम्-17

(11)             अनार का बाँदा- (क) अनार एक सुस्वादु फल है।इसका संस्कृत नाम दाडिम है।यह खट्टे और मीठे दो प्रकार का होता है।मेरा अभीष्ट- स्वाद नहीं, बाँदा है।दोनों में किसी भी पौधे का हो,परिणाम समान है।तन्त्र-शास्त्रों में अनार का बहुत महत्त्व है। यन्त्र लिखने के लिए अनार के डंठल से बनायी लेखनी का उपयोग करने का विधान है। जादू-टोना-टोटका आदि में अनार के विशिष्ट प्रयोग मिलते हैं।अनार का बाँदा घर में रहने से इनसब कुप्रभावों से बँचा जा सकता है।ज्येष्ठा नक्षत्र में अनार का बाँदा पूर्व निर्दिष्ट विधि से घर लाकर स्थापन-पूजन करने के बाद नौ हजार देवी नवार्ण से अभिमन्त्रित करके गृह के मुख्य द्वार के ऊपरी चौखट में जड़ देना चाहिए। इस प्रयोग से हर प्रकार की बाहरी बाधाओं का निवारण होता है।वास्तु-रक्षा के अतिरिक्त शरीर-रक्षा में भी इसका उपयोग किया जा सकता है- तांबे के ताबीज में भर कर, पुरुष दांयी भुजा में,एवं स्त्री बांयीं भुजा में धारण करें।सुविधानुसार गले में भी धारण किया जा सकता है।ताबीज का धागा सदा लाल ही रहेगा- इस बात का ध्यान रखें।
(ख) नक्षत्र भेद से अनार के बांदे का दूसरा प्रयोग भी है।शेष पूजा-विधान पहले की तरह ही है।धन-धान्य,वैभव की कामना से अनार के बाँदा को पूर्वाफाल्गुनी नक्षत्र में घर लाकर स्थापन-पूजन करना चाहिए।पूजन के बाद महालक्ष्मी मंत्र का सोलह माला जप दशांश होमादि अंग सहित अवश्य करे।फिर तिजोरी आदि में उसे स्थायी स्थापर कर दे।समय-समय पर उसके वस्त्र बदलते रहना चाहिए।
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