Monday, 30 January 2017

नाड्योपचारतन्त्रम्(The Origin of Accupressure)

गतांश से आगे...
                                        
                            द्वादश अध्याय
                            चिकित्सा-काल
            किसी कार्य के लिए समय के महत्त्व को नकारा नहीं जा सकता। यूं तो सामान्यतया नाड्योपचार(एक्युप्रेशर) समय और स्थान सापेक्ष नहीं है—पहाड़ की चोटी हो या घाटी, समुद्रतट हो या मरुस्थल,मैदान हो या सड़क,घर हो या दफ्तर, कहीं भी किसी भी समय सुविधा और आवश्यकतानुसार उपचार लिया जा सकता है; किन्तु ध्यान देने की बात है कि कहीं भी का आशय है—हर हाल में उपचार का नियम-पालन,न कि लापरवाही। वैसे सर्वोत्तम स्थान तो अपना घर (या पेशेवर उपचारक का स्थान) ही हो सकता है,जो स्वच्छ, शान्त,वायु और प्रकाश-युक्त हो। यही बात समय के सम्बन्ध में भी है। यह सही है कि जरुरत के मुताबिक उपचार कभी भी,कहीं भी लिया-किया जा सकता है,किन्तु कभी भी का संकेत आपात स्थिति से है,न कि सामान्य स्थिति में। आधी रात में यदि भयंकर उदर-शूल प्रारम्भ हो जाय, तो प्रातःकाल आने की प्रतीक्षा मूर्खता ही कही जायेगी।  परन्तु सामान्य स्थिति में समय सुनिश्चित होना भी आवश्यक है।
       सुनिश्चित समय के सम्बन्ध में  चीनी विशेषज्ञों का ‘घटिका संकेत’(Organ Clock) चित्रांक 20 भी विचारणीय है, जिसमें यह दर्शाया गया है कि किस अवधि में चेतना-प्रवाह किस ओर(किस अंग में)हुआ करता है। जैसा कि सैद्धान्तिक पृष्ठभूमि अध्याय में कहा गया है—प्राणशक्ति का अधिकतम वहन प्रत्येक शक्ति-प्रवाह-पथ(meridian) में खास समय में ही हुआ करता है,और उसके ठीक बारह घंटे बाद,उस प्रवाह-पथ की स्थिति ठीक विपरीत यानी न्यून प्रवाह वाली हो जाती है। उदाहरणतया प्रातः 3-5 बजे के बीच फेफड़े के मेरीडियन अधिक प्राणवाही होते हैं। सिद्धान्त कहता है कि प्राण-प्रवाह का उच्चत्तम काल ही सम्बन्धित प्रवाह-पथ के अंग-उपांगों की विभिन्न व्याधियों का प्रकोप(अति प्रभाव)काल होगा। अतः चिकित्सा-काल का नियम कहता है कि उक्त प्रकोप-काल में यदि उपचार किया जाय तो अपेक्षाकृत अधिक लाभ होगा; किन्तु सिद्धान्ततः यह बिलकुल सही होते हुए भी व्यावहारिक दृष्टि से सही नहीं प्रतीत होता,इस कारण समुचित पालनीय नहीं कहा जा सकता । फलतः सुविधाजनक काल-निर्धारण उचित प्रतीत हो रहा है।
           आपात तो आपात है ही,शेष यानी सामान्य स्थिति में नाड्योपचार के प्रयोग का कालान्तर(दो बैठकों के बीच का अन्तराल) छः-छः घंटे का होना ही चाहिए,यानि प्रातः, दोपहर, सायं,रात्रि में उपचार लिया जाय। अब अलग-अलग इन चारों कालों पर विचार करना चाहिए—
       प्रातःकाल शौचादि से निवृत्त होने पर,खाली पेट उपचार लेना चाहिए। खाली पेट का मतलब- भोजन,नास्ता आदि ठोस आहार से है। यानी जल,दूध,फलों के रस या अन्य स्वास्थकर पेय पदार्थ वर्जित नहीं हैं। सर्वोत्तम होगा कि मात्र दो गिलास(अधिक नहीं) मौसम के अनुसार शीतल या उष्ण जल-पान करके,उपचार लिया जाय। उपचार समाप्ति के आधे घंटे बाद (सम्भव न हो तो कम से कम 15मि. अवश्य) देर करके ही ठोस आहार (नास्तादि) लिया जाना चाहिए।
            दोपहर के उपचार में भी कुछ ऐसी ही बातों का ध्यान रखना चाहिए। भोजन और उपचार के बीच जितना अन्तराल हो सके वरता जाय। इसमें भी उपचार के बाद भोजन 15 मि.बाद ही लेना चाहिए। जब कि भोजन के बाद उपचार कम से कम 45 मि.के अन्तराल पर लिया जाना चाहिए।
           सायंकालिक उपचार का सम्बन्ध सूर्यास्त से है। दिवा-रात्रि सन्धि-बेला सायंकालिक उपचार का सर्वोत्तम काल है। इस काल की महत्ता पर योगशास्त्रों ने व्यापक प्रकाश डाला है। अतः इसका पालन कर,अपेक्षाकृत अधिक लाभान्वित हुआ जा सकता है।
            रात्रिकालिक उपचार के लिए भी दोपहर की तरह ही भोजन और उपचार के अन्तराल का विचार किया जाना चाहिए। उपचार के तुरत बाद शयन किया जा सकता है।
   उपर्युक्त उपचार का कोई भी काल हो(प्रातः,सायं,दोपहर,रात्रि)इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि जोरों की भूख लगी हो तो उपचार न करे। ऐसी स्थिति में सुविधानुसार जल या अन्य पेय लिए जाने चाहिए। उक्त काल-नियमों के अतिरिक्त उपचार के लिए अन्य बातों का ध्यान भी रोगी और उपचार कर्ता को अवश्य रखना चाहिए—
1.बिलकुल भरे पेट में उपचार कदापि न लें।
2.बिलकुल खाली पेट भी उपचार कदापि न लें।
3.स्नान के तुरन्त बाद उपचार लिया जा सकता है,किन्तु उपचार के तुरन्त बाद स्नान कदापि न किया जाय। योगासनों के सम्बन्ध में भी ठीक यही नियम लागू होता है।
4.उपचार के तुरत बाद कठिन शारीरिक श्रम किया जा सकता है,किन्तु कठिन शारीरिक श्रम के बाद तुरत उपचार नहीं लेना चाहिए।
नाड्योपचार के काल सम्बन्ध मात्रा से भी है,अर्थात् नित्य (एक अहोरात्र- 24घंटें में) कुल कितनी बार उपचार लिया जाय। इस सम्बन्ध में विशेषज्ञों में जरा मतान्तर है। होमियो पैथी की उच्च शक्ति वाली औषधि-सेवन की तरह कुछ विशेषज्ञों की राय है कि शिरादाब उपचार सप्ताह में 1-2 बार लेना ही पर्याप्त है,अधिक की कोई आवश्यकता ही नहीं है। तो दूसरी ओर कुछ विशेषज्ञ ठीक विपरीत—न्यून शक्ति वाली होमियो औषध की तरह अपना तर्क देते हैं—यानी  प्रति दिन 6-8 बार उपचार लेना चाहिए। किन्तु विशेषज्ञों के ये दोनों मत अपने-अपने अति की सीमा पर हैं। फलतः भ्रामक और अनुचित प्रतीत होते हैं—सात दिन में एक बार,और एक दिन में सात बार—का क्या औचित्य ! अति आहार,अल्प आहार, अनियमित आहार,जिस भांति तीनों अनुचित हैं,उसी भांति उक्त दोनों अतिमूलक सिद्धान्तों का मध्यम मार्ग ही सर्वोचित प्रतीत होता है। क्यों कि सप्ताह में एक बार उपचार लेने का कोई अर्थ ही नहीं। नाड्योपचार कोई यौगिक शंखप्रक्षान की क्रिया नहीं है,जो साप्ताहिक या पाक्षिक किया जाय। यह तो किसी व्याधि का उपचार है,जो व्याधि की स्थिति और उग्रता के अनुसार उपचार की अपेक्षा रखता है। ठीक दूसरी ओर प्रतिदिन सात-आठ बार का उपचार  भी बेतुका है- ठीक वैसा ही,जैसे तन्दुरुस्ति के लिए घी,दूध,विटामिन के टब में डुबकी लगाना। क्यों कि इससे लाभ के वजाय हानि की ही अधिक आशंका है। क्यों कि विहित विधि से उपचार करके एक ओर प्राण-प्रवाह को सक्रिय और सबल बनाया जाता है,तो दूसरी ओर अनियमित तौर पर अति दबाव(अनावश्यक,बार-बार )से उपचारित केन्द्र को दुर्बल और निष्क्रिय होने को उत्प्रेरित किया जाना है। अति उपचार के सम्बन्ध में एक और बात ध्यान देने योग्य है,जैसा कि सिद्धान्त अध्याय में बतलाया जा चुका है—नाड्योपचार प्रतिबिम्ब केन्द्रों पर दबाव देने से रक्तवाहिनियों(blood vessels) एवं स्नायुसंस्थान (Nervous system) के अवांछित पदार्थ धक्के खाकर बाहर निकलते हैं, और दाब उपचार के इस क्रम में गुर्दों (kidney)को आवश्यकता से अधिक कार्य करना पड़ जाता है जहरीले तत्त्वों  (toxin)का बोझ उठाकर। परिणामतः बारम्बार के दबाव से गुर्दों को अनावश्यक छेड़छाड़ होने से नुकसान होने का खतरा रहता है,साथ ही एक ही स्थान पर बारबार दबाव पड़ने से तत्स्थानीय उत्तकों (tissues)को भी नुकसान पहुंचने की आशंका रहती है। उपचार का अन्तराल कम रहने से प्राकृतिक(स्वाभाविक)रुप से उन्हें सुधरने का अवसर नहीं मिल पाता, जिसके परिणामस्वरुप भीतर ही भीतर जख़्म बनने का भी खतरा पैदा हो जाता है । अतः सर्व सम्मति से मध्म मार्ग का अनुकरण करते हुए कहा जा सकता है कि आपात स्थिति को छोड़कर सामान्य स्थितियों में प्रति चौबीस घंटों में उपचार-बैठक चार बार से अधिक कदापि न हो। दो-तीन बार हो तो अतिउत्तम। इस प्रकार प्रत्येक बैठक का अन्तराल क्रमशः 6-8-12 घंटे का उत्तरोत्तर उत्तम माना जाता है।
समय सम्बन्धी एक और बात ध्यान देने योग्य है,जिसे काल-नियम का अपवाद कह
सकते हैं—हृदय,फेफड़े और गुर्दों की जीर्ण व्याधियों का उपचार प्रारम्भ करते समय प्रारम्भिक दो-चार दिनों तक चौबीस घंटों में मात्र एक बार ही उपचार करना उचित है,वो भी रोग और रोगी का विचार करते हुए,काफी सावधानी पूर्वक। इस नियम को अत्यावश्यक समझकर पालन करना चाहिए। अन्यथा उपचार कर्म की असावधानी और अज्ञानता का दोष नाड्योपचार पद्धति पर लगेगा, और दूसरी ओर रोगी को लाभ के वजाय हानि की ही अधिक आशंका रहेगी।
            नाड्योपचार क्रम में काल-निर्धारण का उपर्युक्त सभी सिद्धान्त(नियम)सिर्फ अहोरात्र (प्रति चौबीस घंटों में) उपचार-बैठक का काल-निर्धारण करता है। इस प्रकार यह तो स्पष्ट हो गया कि नित्य प्रति किस स्थिति में कितनी बार उपचार लेना चाहिए। किन्तु प्रतिबार(प्रति बैठक)कितने समय तक उपचार करना है,यह भी विचारणीय है,क्यों कि ‘ किस समय ’ के साथ-साथ ‘ कितने समय ’ का विचार रखना भी उतना ही महत्त्वपूर्ण है।
            काल-निर्धारण के इस द्वितीय खंड के भी दो उपखंड हैं—1.बैठक का कुल समय कितना होना चाहिए , और  2.एक विन्दु पर कितना समय देना चाहिए ।
            सामान्यतया किसी भी व्याधि में कम से कम एक-दो-तीन प्रतिबिम्ब-केन्द्रों पर उपचार करना होता है। कभी-कभी उपचार के लिए विहित विन्दुओं की संख्या आठ-दस भी हो जाती है,साथ ही शरीर के कई प्रतिबिम्ब समूहों पर इतनी ही(या कुछ कम) संख्या में विन्दुओं का चुनाव करना पड़ता है,और इस प्रकार कुल संख्या काफी अधिक और उबाऊ हो जाती है। उदाहरणार्थ—सर्दी,खांसी,बुखार,पेट दर्द,मरोड़,दस्त आदि कई-कई लक्षण एक साथ प्रकट होते हैं,ऐसी स्थिति में विन्दु परीक्षण करने पर एक साथ करीब 14-20 विन्दु उपचार-संकेत दे रहे होते हैं- किसी एक वोर्ड पर। और इस प्रकार पूरे शरीर का परीक्षण करने पर कुल संख्या सौंकड़ों में हो जाती है। ऐसी स्थिति में सवाल उठता है कि क्या सभी विन्दुओं पर उपचार किया जाय? क्यों कि सिद्धान्त कहता है—जहां दुःखे वहां दबावो। किन्तु बात ऐसी नहीं है। अति विन्दु संकेत की स्थिति में चिकित्सक का कर्तव्य होता है कि विन्दुओं की छंटाई वरीयता क्रम से की जाय, या फिर व्याधि के मूल कारण का अनुसंधान किया जाय। और इस निर्णय पर पहुंचने के लिए नाड्योपचार सिद्धान्त का ज्ञान रखने के साथ-साथ शरीर-शास्त्र,और रोग-निदान-सिद्धान्त का भी भरपूर ज्ञान रखना आवश्यक है। यानी स्पष्ट कहें तो पूरे तौर पर चिकित्सा-विज्ञान के सभी उपशास्त्रों का अनुभव और ज्ञान होना चाहिए। किन्तु कभी-कभी पर्याप्त दक्षता के बावजूद विन्दुओं की संख्या कम कर पाना बड़ा ही कठिन कार्य हो जाता है। वैसी स्थिति में उपचार-उपकरणों का उपयोग करके ,समय को समेटा जाना चाहिए।
            सामान्यतः प्रति उपचार बैठक का समय आधा घंटा पर्याप्त है। वच्चों और वृद्धों के लिए इससे भी कम समय रखना चाहिए। किन्तु किसी-किसी जटिल व्याधि में इससे दूना समय भी देना पड़ सकता है,परन्तु इसे सार्वभौम नियम नहीं कहा जा सकता।
            अब रही बात प्रति उपचार केन्द्र पर दिये जाने वाले समय की बात,तो यह समय व्यक्ति,व्याधि और विन्दु सापेक्ष है। अतः इन तीनों बातों पर विचार करना आवश्यक है।
            1)व्यक्ति-सापेक्ष—प्रति प्रतिबिम्ब-केन्द्र पर,प्रति बैठक बालकों के लिए 30सेकेन्ड समय पर्याप्त है। कोमलांगी स्त्रियों के लिए भी यही समय उचित है। पुरुषों के लिए अपेक्षाकृत अधिक समय(45 से 60 सें.)होना चाहिए।
            2)व्याधि-सापेक्ष—एक ही व्यक्ति में अलग-अलग व्याधियों में एक समय में उपचार किए जाने वाले समय में अन्तर होगा। उदाहरणार्थ- पुरुषों के लिए 1मि. का उपचार-काल यथेष्ट माना गया है एक विन्दु पर,किन्तु हृदय,फेफड़े और गुर्दे की व्याधियों में पूर्वोत्तर क्रम से उपचारावधि अधिक रखी जानी चाहिए। यानी गुर्दे हेतु सर्वाधिक(1मि.),फेफड़े हेतु 30सें,एवं हृदय हेतु मात्र 15से.यथेष्ट है।
            3)विन्दु-सापेक्ष—समय की मात्रा विन्दु-सापेक्ष दो तरह से है—एक का सम्बन्ध अवयव से है,और दूसरे का सम्बन्ध प्रतिबिम्ब-समूह(वोर्ड) से है। दोनों ही स्थितियों में समय की सामान्य मात्रा से अपेक्षाकृत अन्तर रखा जाना जरुरी है। उदाहरणतया- हृदय के विन्दु पर सामान्य से काफी कम समय देना चाहिए—कम से कम आधी मात्रा को ही यहां सामान्य माना जायेगा। और संयोग से रोगी यदि हृदय का ही हो तब तो मात्रा और भी कम(चौथाई) हो जायेगी।  इसी भांति और भी सुकोमल और आशुप्रभावी अवयवों के सम्बन्ध में चिकित्सक को अपने विवेक से काम लेना चाहिए। विन्दु-सापेक्षता का सम्बन्ध विभिन्न विन्दु-समूहों से भी है। जैसे- तलवे के केन्द्रों पर सर्वाधिक दबाव दिया जा सकता है। इसकी तुलना में हथेली पर कम समय दिया जायेगा। पीठ,पेट आदि अन्य अंग-विन्दु-समूहों पर और भी कम समय देना होगा। सर्वाधिक न्यून समय चेहरे और कान के केन्द्रों पर दिया जाना चाहिए। इन विभिन्न प्रतिबिम्ब-केन्द्र-समूहों पर समय के न्यूनाधिकता का मुख्य कारण प्रतिबिम्ब-समूहों की सक्रियता का अन्तर ही है,अन्य कुछ नहीं।
            प्रतिबिम्ब-काल-निर्धारण की उक्त मात्रा को परिमित कैसे किया जाय,यह भी विचारणीय है। जिसमें सबसे आसान तरीका हुआ- घड़ी का प्रयोग,किन्तु यह पैमाना सरल होते हुए,जरा कठिन भी है,और झमेले वाला भी। अतः सर्वोचित है- गणना द्वारा मात्रा का निर्घारण। सामान्यतया 100 तक की गिनती किसी एक केन्द्र को उपचारित करने हेतु होना चाहिए। इस सर्वमान्य गणना की मात्रा के अनुसार व्यक्ति,विन्दु और व्याधि का विचार करते हुए संख्या तय करनी चाहिए। किन्तु हां,गिनती की लयबद्धता का ध्यान भी रखा जाना चाहिए। अन्यथा वास्तविक समय में काफी अन्तर आ जायेगा,जो कदापि उचित नहीं है। अतः गिनी जाने वाली संख्याओं का अन्तराल सम्यक् और एकवद्धता-पूर्ण हो- इस बात का सदा ध्यान रखा जाय।
            नाड्योपचार पद्धति के प्रयोग हेतु सभी निर्दिष्ट काल-नियमों का यथासम्भव पालन अति आवश्यक है,तभी उचित लाभ प्राप्त हो सकेगा,और पद्धति के दुष्परिणामों से बचा जा सकेगा। क्यों कि अपने अनुभव में मैंने पाया है कि पद्धति की ज्यादातर वदनामी प्रयोगकर्ता(चिकित्सक)की लापरवाही  के कारण होती है,न कि पद्धति स्वयं में दोषपूर्ण है। अस्तु।
                                       
 

           
           

           क्रमशः... 

Sunday, 29 January 2017

नाड्योपचारतन्त्रम्(The Origin of Accupressure)

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ग्यारहवें अध्याय का तीसरा भाग-


गतांश से आगे...
ग्यारहवें अध्याय का तीसरा भाग

परिष्कार विधि— नाभिचक्र का सम्यक परीक्षण हो जाने के बाद परिष्कार का उपाय करना चाहिए। परिष्कारोपचार हेतु समय और शारीरिक मुद्रा परीक्षण क्रमांक क की तरह ही होनी चाहिए। यानी सुबह शौचादि से निवृत होने के बाद,खाली पेट में ही प्रथम उपचार होना चाहिए। बाद के उपचार के लिए सुविधानुसार अन्य समय का चुनाव भी किया जा सकता है, किन्तु पेट का खाली रहना आवश्यक है। यानी भोजन के दो-तीन घंटे बाद के कोई समय का चुनाव किया जा सकता है। उपचार प्रातः-सायं पर्याप्त है।
        उपचार की भी कई विधियां है। सुविधानुसार एकाधिक विधि का प्रयोग किया जा सकता है। ऐसा कोई कठोर नियम नहीं है कि उपचार की एक विधि अपना ली गयी,तो अब दूसरे का प्रयोग वर्जित है। जीर्ण और जटिल स्थिति में तो एकाधिक विधियों का प्रयोग एकाधिक बार करना ही पड़ता है। दूसरी बात यह कि प्रत्येक रोगी के लिए,प्रत्येक उपचार, प्रत्येक स्थिति में करना सम्भव भी नहीं हो पाता। अतः स्थिति और आवश्यकतानुसार विधि का प्रयोग (चुनाव) करना श्रेयष्कर है। मुख्य विधियाँ निम्नांकित हैः-
(1)नाभिचक्र की स्थान-भ्रष्टता को नाड्योपचार की लोकप्रिय विधि से आसानी से ठीक किया जा सकता है। ऊपर दिये गये उदर-प्रदेश के चित्र में हम देख रहे हैं कि नाभि-मंडल के चारों ओर एक-डेढ़ ईंच के वृत्त में क्रमांक दिये गये हैं,जो स्थान-भ्रष्टता के सूचक विन्दु के साथ-साथ शोधक विन्दु भी हैं। परीक्षण क्रम में उस विन्दु को चुटकी से पकड़ने का प्रयास करें,मानों भ्रष्ट स्थान सही रुप से पकड़ा गया है, और अब उसे सही दिशा में यानी केन्द्र की ओर झटके से धक्का दें। धक्का देने में रोगी की उम्र,चमड़ी की बनावट आदि का ध्यान रखना आवश्यक है। यानी बच्चे,बूढ़े,जवान,पुरुष,स्त्री सबके लिए दबाव (धक्के) की मात्रा भिन्न-भिन्न होगी।  इस क्रिया को थोड़ा रुक-रुक कर आठ-दश बार दुहरायें। प्रायः देखा जाता है,नये रोगियों में एक ही बार के (बैठक के) प्रयास से स्थिति सुधर जाती है। पुराने रोगियों में इस क्रिया को अन्य बैठकों में भी करना पड़ता है। नाभिचक्र परिष्कार की यह सर्वोत्तम और सरल विधि है।

(2)पूर्व निर्दिष्ट विधि के अनुसार ही समय,मुद्रा और स्थिति का ध्यान रखते हुए, ऊपर कही गयी परीक्षण विधि- ग के अनुसार पैर के अंगूठे पर गौर करे। तुलनात्मक दृष्टि से जो अंगूठा छोटा मालूम पड़े उसके विपरीत पैर को घुटने से मोड़ दें,यानी उसका कोई उपयोग नहीं है। उपचार कर्ता रोगी के छोटे अंगूठे को कस कर पकड़ ले एक हाथ से,और दूसरे हाथ से उसके पसरे हुए घुटने पर दबाव डाले,तथा पहले हाथ से छोटे अंगूठे को जोर से खींचे- झटका दे-दे कर। इस क्रिया को दो-चार बार करे। और फिर दोनों पैरों को परीक्षण विधि की तरह रख कर मिलान करे। इस क्रिया का  दो-चार बैठकों में प्रयोग करे। नाभिचक्र की स्थान भ्रष्टता दूर हो जायेगी। इस विधि का प्रयोग उस अवस्था में तो विशेष रुप से करे,जब परीक्षण की तीसरी विधि का संकेत मिल रहा हो।

(3)परीक्षण की चौथी विधि के अनुसार भी परिष्कार की विधि है। मान लिया रोगी के बायें हाथ की कनिष्ठिका अंगुली परीक्षण में छोटी प्रतीत हुयी,ऐसी स्थिति में बायां हाख सीधा सामने ले जाये,और दायें हाथ से बायी बांह को (कुहनी और कंधा के मध्य) पूरी ताकत से पकड़ ले। अब प्रभावित (बायी) मुट्ठी को कस कर बन्द करे,और हाथ को झटके से मोड़ कर बायें कन्धे को छूने का प्रयास करे। इस क्रिया को इसी मुद्रा में आठ-दस बार करे। दो-चार बैठकों में नाभिचक्र प्रायः दुरुस्त हो जाता है।

(4)नाभिचक्र की स्थान-भ्रष्टता को ठीक करने के लिए एक विधि आमलोगों में काफी प्रचलित है। अपने आप में यह विधि अच्छी और कारगर तो है,किन्तु किंचित सावधानी  आवश्यक है। अन्यथा काफी परेशानी हो सकती है।
            इस विधि के प्रयोग के लिए समय और स्थिति तो पूर्व विधियों की भांति ही होगी, किन्तु हां,कुछ सामग्री की आवश्यकता होगी। मिट्टी का छोटा सा दीया लेकर घी या तेल की वत्ती पूरित कर दें। बत्ती गोल वाली हो,न कि लम्बी वाली,ताकि दीए में बीचोबीच खड़ा होकर प्रज्ज्वलित हो सके। रोगी के उदर-प्रदेश पर सरसो या तिल तेल की हल्की मालिश कर दें। चित लेटे रोगी के नाभि पर ठीक बीचोबीच दीपक जला कर स्थापित कर दें। अब मिट्टी का एक सकोरा (प्याली- मध्यम आकार का) लेकर उस दीपक पर उल्टा रख दें,और हाथ से हल्का दबाव डालें,ताकि सकोरा स्थिर रहे नाभिमंडल पर। स्वाभाविक है कि थोड़ी देर में सकोरे के अन्दर का ऑक्सीजन शेष हो जायेगा और दीपक बुझ जायेगा। अब,दो-चार मिनट प्रतीक्षा करके,सकोरे और बुझे दीए को हटा लें। इस बैठक का प्रयोग पूरा हो गया। इसी प्रयोग को पुनः-पुनः दो-चार बार प्रयोग करें- प्रातः-सायं क्रम से।
इस विधि में रिक्ततादाब(Vacuum pressure) सिद्धान्त से उपचार हो रहा है। ढक्कन के रुप में व्यवहृत पात्र मिट्टी का ही हो,इस बात का सख्ती से पालन किया जाय। धातु के पात्र से परेशानी भी हो सकती है। रिक्ततादाब के कारण शरीर से पात्र मजबूती के साथ चिपक जायेगा यदि तो निकालना मुश्किल होगा। झटके से खींचना भी उचित नहीं, हो सकता है इससे चमटी उघड़ जाये। मिट्टी का पात्र रहने पर,उसे आसानी से तोड़कर भी हटाया जा सकता है। धातु आदि के साथ ये सुविधा नहीं है। कांच का पात्र रखना भी निरापद नहीं कहा जासकता।

(5)नाभिचक्र की भ्रष्टता को दूर करने के लिए नाड्योपचार के विभिन्न प्रतिबिम्ब केन्द्र समूहों में कई केन्द्र भी ऐसे हैं,जिनसे लाभ पाया जा सकता है। उपचार की विधि अन्य व्याधियों की भांति ही है—चित्रांक 22 क-ख क्रमांक 19,20,21 और 29 इसके लिए विशेष उपयोगी हैं।
            चित्रांक 23 क-ख क्रमांक 19,20,21 और 29 इसके लिए विशेष उपयोगी हैं।
(6) नाभिचक्र की भ्रष्टता को दूर करने के लिए कुछखास योगासनों का प्रयोग भी किया जाता है। यथा-उत्तानपादासन, मत्स्यासन, धनुरासन, चक्रासन, वक्रासन आदि। इनके नियमित अभ्यास से धीरे-धीरे नाभिचक्र यथास्थान स्थित हो जाता है। इन आसनों की सही विधि जानने के लिए किसी अधिकारी (श्रेष्ठ)योगासन पुस्तक का अवलोकन करना चाहिए।

(7) नाभिचक्र की भ्रष्टता को दूर करने के लिए पारम्परिक कुछ अन्य विधियां भी हैं,जिनमें एक बहुप्रचलित विधि है—पैर के अंगूठे में (विकृत दिशा में) चांदी के छल्ले पहने से भी भ्रष्टता दूर होती है। स्वस्थ स्थिति में धारण किये रहने से भ्रष्टता की स्थिति ही नहीं बनने पाती। कुछ ऐसे ही वैज्ञानिक शोधपूर्ण अनुभव रहे होंगे भारतीय परम्परा में,जिससे प्रेरित होकर प्रायः महिलायें पैर में चांदी का पोरुआ(विछिया)पहनती हैं। अनजाने में ये प्रथा अब भी जारी है,प्रायः हर समाज में।

(8)आयुर्वेद का एक अद्भुत प्रयोग है नाभिचक्र भ्रष्टता को दूर करने हेतु—आंमले का चूर्ण अदरख-स्वरस में पेस्ट जैसा बना कर नाभिक्षेत्र पर लेप कर,सहज रुप से सूखने के लिए छोड़ दें। बाद में धो डालें। एक दूसरा प्रयोग है—सौंफ और गुड़ का कुछ दिनों तक सेवन- गरम पानी के साथ- खासकर रात सोते समय। इससे पेट भी साफ रहता है, और पित्तज विकृतियां—गैस,अफारा इत्यादि का भी शमन होता है। स्वस्थ व्यक्ति भी इसे सेवन करके , लाभान्वित होसकते हैं।
            उपर्युक्त नियमानुसार नाभिचक्र का परीक्षण और उपचार करने के पश्चात् ही अन्य नवीन या जीर्ण उदर-व्याधियों का उपचार करना उचित है,क्यों कि यदि नाभिचक्र सही नहीं है, तो अन्य कोई भी उदर-व्याधि-उपचार(औषधीय वा एक्युप्रेशरीय) लाभदायक नहीं होगा।
                                   

                                         क्रमशः.... 


Friday, 27 January 2017

नाड्योपचारतन्त्रम्(The Origin Of Accupressure)

गतांश से आगे...
ग्यारहवें अध्याय का दूसरा भाग-

शरीर को रोग- मुक्त रखने (करने) में इस नाभि-केन्द्र (solar plexus) का बहुत महत्त्व है। उक्त स्थान(नाभि के गड्ढे में) पर हाथ के अंगूठे से हल्का सा दबाव देते हुए,स्पर्श किया जाय तो एक विशिष्ट प्रकार की घड़कन(स्पन्दन) महसूस की जा सकती है। नाभिकेन्द्र के परीक्षण का सही तरीका यही है। हां,इस परीक्षण के समय परीक्षार्थी (रोगी) की शारीरिक मुद्रा भी विशेष ढंग की होगी—पीठ के बल चित लेटकर,दोनों पांव को घुटने से मोड़ते हुए,खड़ा रखे। इस मुद्रा में उदर-प्रान्त की सही जांच हो पाती है। समय का भी ध्यान रखना जरुरी है- सर्वोत्तम है- सुबह खाली पेट, शौचादि के ठीक बाद।
            नाभि-केन्द्र के स्पन्दन का सही स्थान पर होना,इस बात की सूचना है कि परीक्षार्थी उदर रोग-मुक्त है,क्यों कि यह केन्द्र सही ढंग से काम कर रहा है। निदान और चिकित्सा के एक्यूप्रेशरीय सिद्धान्त के अनुसार नाभिचक्र अपने आप में अपवाद है। यही एकमात्र ऐसा प्रतिबिम्ब-केन्द्र है,जहां एक्युप्रेशर का मूल मन्त्र—जहां दुःखे,वहीं दबावो—लागू नहीं होता, न निदान हेतु और न चिकित्सा हेतु ही। स्पन्दन का अपने स्थान पर सही अनुभव होना ही,इस केन्द्र के स्वस्थ होने की सूचना है,यानी निदान हो गया,चिकित्सा की आवश्यकता नहीं है। अपवादात्मक विशेषताओं में एक दूसरी विशेषता यह भी है कि पूरे शरीर में यही एक केन्द्र है जो स्थान-भ्रष्ट हो जाता है,यानी अपने नियत स्थान से ऊपर-नीचे,बांयें-दायें कहीं भी खिसक जा सकता है,जिसके परिणामस्वरुप शरीर में कई तरह के लक्षण प्रकट होने लगते हैं। ये लक्षण अलग-अलग रोगों के सूचक हैं। इसके स्थान-भ्रष्टता के कारण कई अन्य प्रतिबिम्ब-केन्द्र भी प्रभावित होकर,अपनी विकृति की सूचना देने लगते हैं।
            अतः सामान्य तौर पर एक्यूप्रेशर चिकित्सक का कर्तव्य होता है कि आगन्तुक रोगी का सर्वप्रथम नाभिकेन्द्र-परीक्षण करे। चिकित्सक का यह कर्तव्य तब और बढ़ जाता है,जब रोगी सुस्त,चिड़चिड़ा,पाचनतन्त्र की विविध व्याधियों का शिकार हो। इस केन्द्र की लाक्षणिक गड़बड़ी एकमात्र स्थान-भ्रष्टता ही है; और यह सिर्फ लक्षण ही नहीं,बल्कि कारण भी बनता है- अन्यान्य व्याधियों का। अतः सर्वप्रथम इस लक्षण के कारण पर विचार किया जाय।
            आमतौर पर लोग प्रायः यही जानते हैं कि भारी बोझ उठाने से कभी-कभी नाभि सरक जाता है,जिसे आम भाषा में नाला उकसना या धरण पड़ना कहते हैं। डॉक्टरी भाषा में इसे वेनाकाभा का सरकना (displacement of Venacaba ) कहते हैं। आधुनिक जीवन-शैलीभाग-दौड़, तनाव-दबाव भरे प्रतिस्पर्धा-पूर्ण वातावरण में काम करते रहने के कारण व्यक्ति का नाभि-चक्र निरंतर क्षुब्ध होते रहता है। परिणामतः नाभिचक्र अव्यवस्थित हो जाता है। झटका या भारी बोझ उठाना तो मुख्य कारण है ही। पेट की पुरानी बीमारियों में भी प्रायः धीरे-धीरे नाभिचक्र प्रभावित होने लगता है,और फिर अन्य लक्षण भी प्रकट होने लगते हैं। इस स्थान के संतुलक तन्तु शनैःशनैः ढीले होने लगते हैं,और जरा-जरा में नाभि सरकने की समस्या खड़ी हो जाती है। जीर्ण उदर रोगियों में ऐसी घटना का इतिहास प्रायः अवश्य मिलता है। 
      जैसा कि पूर्व में ही कहा जा चुका है,इस केन्द्र की स्थान-भ्रष्टता चारों ओर कहीं भी हो सकती है। चार ही नहीं, दशो दिशाओं में कहना उधिक उचित होगा। भ्रष्टता की ये स्थितियाँ मुख्य रुप से दो प्रकार की होती हैं—प्रथमतः विशिष्ट अथवा तीव्र प्रभावकारी, जिसका लक्षण भी सद्यः प्रकट हो जाता है। नानाविध परेशानियां शुरु हो जाती हैं,फलतः ध्यान तुरत चला जाता है, किन्तु  द्वितीय स्थिति में अति सामान्य भ्रष्टता होती है,जिसका अनुभव रोगी को प्रायः नहीं हो पाता है,क्यों कि तत्काल कोई लक्षण(कष्ट) प्रतीत नहीं होता । यहां तक कि सामान्य भ्रष्टता का निदान चिकित्सक के लिए भी कठिन होता है। यह सामान्य भ्रष्टता ही आगे चल कर जटिल उदर-व्याधियों के गिरफ्त में ले जाता है। लंबे समय तक नाभि-चक्र के अव्यवस्थित रहने से उदर विकार के अलावा आसपास के क्षेत्र—मूत्राशय, गर्भाशय,डिम्बाशय आदि भी प्रभावित होने लगते हैं। स्त्रियों का मासिक-चक्र असंतुलित हो जा सकता है। इतना ही नहीं दांत, नेत्र, बाल आदि के स्वास्थ्य पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ने लगता है। दांतों की स्वाभाविक चमक कम होने लगती है। यदाकदा दांतों में पीड़ा होने लगती है। नेत्रों का सौन्दर्य व ज्योति क्षीण होने लगती है। बाल असमय सफेद होने लगते हैं। आलस्य,थकान,चिड़चिड़ाहट,काम में मन न लगना,दुश्चिंता,निराशा,अकारण भय जैसी नकारात्मक वृत्तियाँ भी हावी होने लगती हैं। कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि नाभिचक्र के असंतुलन से मनुष्य शारीरिक-मानसिक, आध्यात्मिक  तीनों रुपों से प्रभावित हो जाता है।
नाभिचक्र के स्थान-भ्रष्ट होने की घटना ज्यादातर ऊपर या नीचे ही होती है। ऊपर की ओर सरकने से कठोर कोष्ठबद्धता ( constipation), सामान्य या तीब्र सिरदर्द (माइग्रेन या आधाशीशी), आँखों तले अन्धेरा छाना,रोशनी कांपती हुयी प्रतीत होना, सुस्ती, थकान, बैचैनी, चिड़चिड़ापन, अन्यमनस्कता आदि लक्षण दृष्टिगोचर होते हैं। एवं नाभि-केन्द्र के नीचे की ओर सरकने से उदर में असह्य वेदना,पतले दस्त,मरोड़,मिचली ,वमन, वदहजमी आदि लक्षण पाये जाते हैं। अन्य दिशाओं में भ्रष्टता की स्थिति में उक्त दोनों में से कुछ भी,या मिश्रित लक्षण देखे जाते हैं,ऐसी स्थिति में निदान(निश्चय) करना कठिन हो जाता है।
यदि नाभि-स्पंदन ऊपर की तरफ चल रहा है याने छाती की तरफ तो अग्न्याशय और फेफड़े भी प्रभावित होने लगते हैं।  मधुमेहअस्थमा, ब्रोंकाइटिस जैसी बीमारियाँ होने लगती हैं। यदि यह स्पंदन नीचे की तरफ चली जाए तो पतले दस्त होने लगते हैं। बाईं ओर खिसकने से शीतलता की कमी होने लगती है, सर्दी-जुकाम, खाँसी, कफ-जनित रोग जल्दी-जल्दी होते हैं। दाहिनी तरफ हटने पर यकृत(Liver) खराब होकर अरुचि,मंदाग्नि, अपच,अफारा जैसी बीमारियाँ  हो सकती है। पित्ताधिक्य, एसिडजलन आदि की शिकायतें होने लगती हैं। चुंकि इसमें सूर्यचक्र निष्प्रभावी हो जाता है, जिसके लक्षण स्वरुप गर्मी-सर्दी का संतुलन शरीर में बिगड़ जाता है। 
यदि नाभि पेट के ऊपर की तरफ आ जाए यानी आगे की ओर निकल(खिसक) आये, तो मोटापा हो सकता है, या वायु विकार (गैस आदि शिकायत) हो सकता है। नाभि नीचे (पीछे) की ओर (रीढ़ की हड्डी की तरफ) चली जाए तो व्यक्ति कुछ भी खाए, वह दुबला होता चला जाएगा,यानि पोषक-तत्त्वों का संतुलन विगड़ जायेगा। मानसिक एवं आध्यात्मिक क्षमताएँ भी कम हो जाती हैं।
गौर तलब है कि नाभि-चक्र सही रुप से काम कर रहा होता है, तभी स्त्रियाँ गर्भ-धारण योग्य होती हैं। यदि  मध्यम स्तर से खिसककर नीचे (पीछे) रीढ़ की तरफ चली जाए तो ऐसी स्थिति में गर्भ-धारण कदापि नहीं हो सकता। वस्तुतः इस अवस्था में डिम्बवाहिनी नलिका ( Fallopian tube) अवरुद्ध होकर,प्रभावित हो जाती है। और जब डिम्ब का संचार ही नहीं, फिर गर्भ-धारण कैसे !  
इस प्रकार हम देखते हैं कि नाभि-चक्र का महत प्रभाव और उपयोग है मानव जीवन में। अतः इसकी महत्ता को ध्यान में रखते हुए,सम्यक् परीक्षण और फिर परिष्कार की आवश्यकता है।
नाभि-चक्र-परीक्षण-विधिः-
नाभि-चक्र-परीक्षण की अनेक विधियां हैं,जिनमें तीन-चार प्रमुख हैं। यथा-
(क)प्रातःकाल खाली पेट की स्थिति में रोगी को शान्त मुद्रा में पीठ के बल लिटा कर,तथा दोनों पैरों को घुटनों से मोड़कर खड़ा रखते हुए, चिकित्सक अपने हाथ का अँगूठा रोगी के नाभि-स्थान पर(गड्ढे में)हल्के दबाव पूर्वक रखे। इस स्थान पर हृद्स्पन्दन-तुल्य अनुभूति होगी। सामान्य स्थिति में कुछ अनुभव न हो तो,जरा और दबाव देकर देखना चाहिए। क्यों कि खास कर चर्वीदार उदर में नाभि-चक्र की सही स्थिति के लिए थोड़े गहराई में जाना पड़ता है। पुरुष की तुलना में भी नारियों में अपेक्षाकृत अधिक गहराई में जाना पड़ता है,तभी पता चल पाता है। सही स्थान पर सही रुप से स्पन्दन की अनुभूति नाभि-चक्र के सही होने की सूचना है।
       उक्त स्थिति में प्रथम परीक्षण-क्रम में स्पन्दन सही स्थान पर,सही रुप से न मिले तो उसी अवस्था में धीरे-धीरे अंगूठे को अगल-बगल—यानी अंगूठा तो पूर्ववत नाभि गह्वर में ही रहेगा,किन्तु दबाव विविध दिशाओं में देंगे। ध्यान देने की बात है कि अंगूठे के प्रत्येक परिवर्तन पर जरा रुके,और स्पन्दन की प्रतीक्षा करे,ऐसा नहीं कि शीघ्रता से भ्रमण करता रहे। आहिस्ते-आहिस्ते स्थान परिवर्तन(दाब की दिशा) करते हुए,स्पन्दन की खोज करे। कहीं न कहीं स्पन्दन अवश्य मिल जायेगा। हां,यह आवश्यक नहीं कि प्रत्येक व्यक्ति में स्पन्दन की मात्रा(वेग) और अवधि समान हो। किसी किसी व्यक्ति में स्पन्दन इतना मन्द होगा कि नये अभ्यासी (परीक्षक) को जरा भी अनुभव नहीं हो पायेगा। अतः परीक्षक को शान्त चित्त होकर परीक्षण करना चाहिए। कभी-कभी ऐसा भी हो सकता है कि एक बार के परीक्षण में कुछ भी अनुभव न मिले। ऐसी स्थिति में कुछ देर बाद पुनर्परीक्षण करे।  कहीं न कहीं स्पन्दन तो मिलना ही है। स्पन्दन की दिशा-परिवर्तन ही भ्रष्टता की सूचना है। परीक्षण की यह विधि सबसे अच्छी और विश्वस्त कही गयी है।

(ख)पूर्ववत मुद्रा में ही रोगी लेटा रहे। करीब 30-40 से.मी. लम्बा, जरा मोटा धागा लेकर, उसका एक छोर नाभि स्थान पर रखे,तथा दूसरे छोर को चुचुक(nipple) पर रखे,और इस स्थान पर निशान डाल दे धागें पर। अब पहले छोर को यथावत नाभि पर ही रखते हुए,दूसरे छोर को उठाकर,दूसरे चुचुक पर ले जाये,और ये देखे कि पूर्व में लगाये गये निशान पर ही आया है,या कि भिन्न(आगे-पीछे)। चुचुक(वायें-दायें) परिवर्तन क्रम में सावधानी वरतें कि नाभि-केन्द्र पर रखे गये धागे का स्थान न सरक जाये,अन्यथा निर्णय गलत होगा,क्यों कि मापन का आधार-विन्दु नाभि ही है। दोनों चुचुकों से नाभि-केन्द्र की दूरी की समानता स्वस्थ नाभि-केन्द्र का सूचक है,और असमानता,अस्वस्थ का। ध्यातव्य है कि इस परीक्षण में सिर्फ दो ही विकल्प (रिजल्ट) हैं। स्थान भ्रष्टता की सही दिशा (दश में कौन) का निश्चय कदापि नहीं हो पाता। इस परीक्षण-विधि की सबसे बड़ी  खामी ये है कि पुरुषों में तो इसका प्रयोग आसान और व्यवहारिक है,किन्तु स्त्रियों में अव्यवहारिक के साथ-साथ काफी उलझाउ भी। फिर भी परीक्षण की यह विधि काफी लोक-प्रचलित है। नाभि-चक्र का जरा भी ज्ञान रखने वाला हर जानकार इस विधि का प्रयोग प्रायः करता ही है।

(ग)परीक्षण की इस तीसरी विधि में भी रोगी की शारीरिक मुद्रा पूर्ववत ही रहेगी। रोगी के पैर के दोनों अंगूठों को आपस में सटाकर,दोनों नोकों पर परीक्षक गौर करे। यहां ध्यान रखने की बात है कि दोनों पैर के टखनों (ankle) को आपस में सटायेंगे(मिलायेंगे) और तब अंगूठों के नोक को देखेंगे। यानी मापन का आधार विन्दु टखना है। यदि दोनों अंगूठे समान ऊँचाई बतलावें तो समझना चाहिए कि नाभिचक्र यथा स्थिति सही है। स्थान-भ्रष्टता कि स्थिति में एकाध सें.मी. तक का अन्तर पाया जा सकता है। वैसे मी.मी.का अन्तर भी शरीर को प्रभावित करने हेतु पर्याप्त है,जो कि नये परीक्षक की पकड़ में भी नहीं आ पाता। ध्यातव्य है कि यहां भी इस बात का निर्णय नहीं हो पा रहा है कि भ्रष्टता किस दिशा में है। परीक्षण की विधि तो अति सरल है, किन्तु निदान ठोस नहीं हो पाने के कारण त्रुटिपूर्ण ही है।

(घ)परीक्षण की एक चौथी विधि भी कही गयी है। शान्त चित पलथी मार बैठ जाये। दोनों हथेलियों को आपस में सटाये। ध्यान रहे कि हथेली में आयुरेखा कही जाने वाली मोटी लकीर,जो कनिष्ठा के नीचे से प्रारम्भ होकर अंगूठे की ओर जाती है,को आपस में मिलाना है। यानी इस परीक्षण-विधि में आधार-विन्दु यही रेखा है। अब दोनों हाथ की कनिष्ठा अंगुली की नोक को देखे। यदि वे बिलकुल बराबर हैं, यानी इधर आयुरेखा मिल रही हो,और उधर कनिष्ठा का नोक मिल रहा हो,तो समझे कि नाभिचक्र सही स्थान पर है,अन्यथा भ्रष्ट है। परीक्षण की इस विधि में भी वही त्रुटि है जो ऊपर कही गयी विधि—ग में है। इसे चित्रांक 34 में दिखलाया गया है—चित्र में स्पष्ट देखा जा सकता है कि कनिष्ठाग्र के साथ-साथ दोनों हथेली की आयुरेखा और मातृरेखा का मिलन हो रहा है,यानि नाभिचक्र सही स्थान पर है।




इस प्रकार हम पाते हैं कि नाभिचक्र परीक्षण की सर्वोत्तम विधि प्रथम विधि ही है, जो अपने आप में परिपूर्ण है। नये परीक्षकों को चाहिए कि सुविधानुसार सभी विधियों को आज़मा कर अवश्य देखें। परीक्षण हो जाने पर उपचार की बात आती है।
क्रमशः...

Tuesday, 24 January 2017

नाड्योपचारतन्त्रम्(The Origin Of Accupressure)

गतांश से आगे...
ग्यारहवां अध्याय का पहला भाग


                                एकादश अध्याय   
                         नाभिचक्रःएक विशिष्ट केन्द्र      
      पिछले अध्याय में नाड्योपचार तन्त्र के विभिन्न प्रतिबिम्ब-केन्द्रों के बारे में विशद रुप से परिचय प्राप्त किया गया,किन्तु एक विशिष्ट केन्द्र की चर्चा अभी बाकी है,जिसके बिना परिचय अधूरा है। वस्तुतः इस परिचयात्मक श्रृंखला को यथावत वहीं होना चाहिए था,किन्तु इसका वहां रहना,इसकी महत्ता और सार्वभौमिकता को नकारना जैसा होता, अतः इसकी विशिष्टता को ध्यान में रखते हुए,स्वतन्त्रता का दर्जा दिया गया।
     प्राणीमात्र लोक के अन्तर्गत है,भले ही उसका चरम(परम)लक्ष्य परलोक है। इहलोक में रहते हुए,या कहें रहकर ही परलोक की साधना सम्भव है,क्यों कि कर्मभूमि यही है,अन्यत्र नहीं। योगशास्त्रों में इसकी अद्भुत महिमा बतलायी गयी है। इस पर विजय(पराजय का विपरीत नहीं,प्रत्युत पराजय के पार जाना) प्राप्त करने का विशिष्ट महत्त्व है,विशेष विधि भी। योगियों ने इस केन्द्र को ही लोक माना है।       
   ‘लोक यानि समस्त का मूल, सबका आधार। अपनी साधनात्मक यात्रा में थका योगी,यहां ठहर कर कतिपय विश्राम पाता है। लोकाकांक्षी तो प्रायः यहीं आकर ठहर जाते हैं,भटक भी जाते हैं। अतः उनके लिए भी यह केन्द्र बड़ा ही महत्त्वपूर्ण है। उन्हें अपने आध्यात्मिक स्वास्थ्य-लाभ हेतु इसी केन्द्र पर ध्यानोपचार करना चाहिए। आगे की यात्रा में भी यह बहुत उपयोगी है। नाभिचक्र की उपादेयता जीवन ही नहीं, प्रत्युत जीवन-चक्र को व्यवस्थित करने में है। वस्तुतः इसे पूरी महायात्रा का मध्यान्तरी कहना चाहिए। इसका विशद वर्णन योग-ग्रन्थों में विशद रुप से उपलब्ध है।
  शास्त्रों में नाभि को पाताल लोक भी कहा गया है। एक रहस्यमय बात यह है कि  घोषित प्रत्यक्ष मृत्यु के बाद भी प्राण-वायु नाभि-चक्र में सोलह पल(यानी करीब छः मिनट) तक चैतन्य रहता है। उच्च योग-साधक वैसी स्थिति में आत्मबल का प्रयोग कर, चाहें तो व्यक्ति की प्राणवायु को वापस लाकर,हृदय में स्थापित कर सकते हैं। यानी कि घोषित मृत को पुनर्जीवित भी किया जा सकता है।
प्रसंगवश यहां शरीर-शास्त्र(विज्ञान)के अनुसार थोड़ा विचार कर लिया जाय। उदर- प्रदेश में आमाशय के निचले भाग में प्राकृत आवर्त-पूर्ण(गड्ढेदार) जो स्थान है,जिसे आम भाषा में नाभि कहा जाता है,यही वह स्थान है ,जिसकी प्रशस्ति योग-शास्त्रों में व्यापक रुप से गायी गयी है। आधुनिक शरीरविज्ञान (Anatomy) के अनुसार भी इसकी महत्ता कम नहीं है। इस आवर्त-युक्त स्थान में ध्यान से देखने पर कई छोटे-छोटे छिद्र नजर आते हैं,जो दो शरीरों के आपसी सम्पर्क के द्वार है। सद्यःजात शिशु में यहां एक लम्बी,पोली,मांसल डोरी(नाड़ी) नजर आती है,जिसका दूसरा शिरा कमल(Placenta) से जुड़ा होता है,फलतः इस नाड़ी विशिष्ट को कमल-नाल के नाम से जाना जाता है। गर्भगत बालक का माता से सीधा सम्पर्क-सूत्र इस नाड़ी-द्वारा ही होता है। भ्रूण का पालन-पोषण,श्वसन,रक्त-संचालन आदि सारी क्रियायें इसी माध्यम से होती हैं। गर्भगुहा से बाहर आ जाने के पश्चात्,शिशु के लिए इसकी कोई उपयोगिता नहीं रह जाती,फलतः जन्म के कुछ देर बाद इसका विच्छेदन कर दिया जाता है। हालांकि इस छेदित नाल का भी बहुत उपयोग है। प्राचीन समय में तन्त्र और आयुर्वेद दोनों में इसका प्रयोग होता था। बाद में,धीरे-धीरे ये चीजें लुप्त वा गुप्त होती गयी। अभी कुछ दिनों से आधुनिक शरीर-शास्त्रियों का भी ध्यान इस ओर गया है,और नाल(Umbilical cord)को लम्बे समय तक सुरक्षित रखने की व्यवस्था की जा रही है,जिससे भविष्य में उस नाल-धारक के किंचित जटिल और असाध्य रोगों की चिकित्सा सुलभ हो।
 वस्तुतः शरीरगतगत समस्त नाड़ियों का संगम-स्थल है—नाभिकेन्द्र । ध्यातव्य है कि नाड़ियां ही योग-साधना का आधार है। नाड़ियों की गति,स्थिति और अवरोध पर ही अवलम्बित है- नाड्योपचारतन्त्र यानी आधुनिक एक्युप्रेशर चिकित्सा विज्ञान। इस प्रकार इस विशिष्ट केन्द्र की उपादेयता स्वयमेव सिद्ध है।

उदर-प्रदेश के प्रतिबिम्ब-केन्द्रों में इसे चित्रांक 31 में दर्शाया गया है। पुनः यहां चित्रांक 33 में विशेष कर नाभिचक्र की विकृत स्थितियाँ दर्शायी जा रही हैं।
क्रमशः...


Thursday, 19 January 2017

नाड्योपचारतन्त्रम्(The Origin of Accupressure)

गतांश से आगे... 
नाड्योपचारतन्त्रम्(The Origin of Accupressure)
छब्बीसवां भाग(दशवें अध्याय का अन्तिम भाग)



(8) शक्ति-संचार-पथों पर प्रतिबिम्ब-केन्द्र— शरीरान्तर्गत सभी एक्यूप्रेशर प्रतिबिम्ब केन्द्र अपने समीपवर्ती मुख्य धारा से सम्बन्ध रखे हुए हैं। मुख्य धारा(प्रवाह) से निकलने वाली विभिन्न उपप्रवाहों के मार्ग में ही सभी केन्द्र अवस्थित हैं, जहाँ निदान/चिकित्सा-काल में दबाव दिया जाता है,जिनका विस्तृत परिचय ऊपर के समूह-खंडों में दिया गया।
       भौतिक विद्युत-संचार-प्रणाली मे जैसा कि देखा जाता है,कहीं-कहीं सीधे मुख्य धारा से व्यवहार-केन्द्र का सम्पर्क बना रहता है,और वह मुख्य धारा स्थित व्यवहार-केन्द्र भी ठीक उसी भांति कार्य करता है,जैसा उपधारा स्थित व्यवहार-केन्द्र। इसी प्रकार शिरादाब शक्ति-संचार-पथों पर भी अनेक व्यवहार-केन्द्र बने हुए हैं,जिनका उपयोग सामान्य रुप से अन्यान्य प्रतिबिम्ब-केन्द्रों के तरह ही किया जाता है। इस तरह के केन्द्र सभी संचार-पथों(meridians) पर पाये जाते हैं,जिनमें अति विशिष्ट केन्द्रों की क्रमवार तालिका प्रस्तुत की जारही हैः-
1)    विनिश्चय अथवा शासक-प्रवाह-पथ(Governing Vessel Meridian)- इस मुख्य प्रवाह-पथ पर नौ प्रतिबिम्ब केन्द्र विशिष्ट है, इन केन्द्रों का उपयोग निम्नांकित तालिकानुसार किया जाना चाहिए-
केन्द्रांक
उपयोग
1.
कटिशूल,प्रसव-वेदना,नपुंसकता
2.
अर्द्धांगवात,लकवा,पोलियो(वालपक्षाधात)
3.
श्वांस,दमा,कास,जुकाम,नासा-रोग
4.
शिरोशूल,ज्वर,पित्तशयिक व्याधि,शीतपित्त
5.
शिरोशूल,जुकाम,नकसीर
6.
समस्त नासा-रोग
7.
अर्श(बावासीर)
8.
उर्ध्वजत्रुरोग(नाक,कान,आँख,गला)ई.एन.टी
9
हिक्का(हिचकी)विभिन्न कारण जनित बेहोशी
2) धारणा-प्रवाह-पथ(Conception Vessel Meridian)- इस प्रवाह-पथ पर मुख्य रुप से मात्र चार प्रतिबिम्ब-केन्द्र हैं,इन केन्द्रों का उपयोग निम्नांकित तालिकानुसार किया जाना चाहिए-
केन्द्रांक
उपयोग
1.
प्रजनन संस्थान की सभी व्याधियां
2.
दस्त,गर्भाशय,उदर-शूल,कोष्ठबद्धता
3.
आमाशयिक व्याधियां- वमन,गैस आदि
4.
हृदय एवं हृदयावरण, दमा, रक्तचाप













3)हृदय-संचार-पथ(Heart Meridian)- इस प्रवाह-पथ पर सर्वप्रमुख दो प्रतिबिम्ब केन्द्र हैं, इनमें प्रथम का उपयोग हृदय से सीधे सम्बन्ध रखने वाली सभी व्याधियों से है,और दूसरे केन्द्र का उपयोग कोष्ठबद्धता-निवारण के अतिरिक्त विभिन्न प्रकार की बेहोशी दूर करने के लिए भी किया जाता है। चुंकि दूसरे केन्द्र का सम्बन्ध रक्तप्रवाह से है,इस कारण अनिद्रा निवारण में भी इसका उपयोग कारगर सिद्ध होता है।
4)हृदयावरण-संचार-पथ (Pericardium Meridian)— इस प्रवाह पथ पर भी मुख्य दो ही प्रतिबिम्ब केन्द्र हैं, इनमें प्रथम केन्द्र का उपयोग वमन एवं उबकाई तथा अनिद्रा में किया जाता है,और दूसरे केन्द्र का उपयोग सुस्ती-थकान दूर करने के साथ-साथ निम्न रक्तचाप में किया जाता है।
केन्द्रांक
उपयोग
1.
श्वांस,कास,नजला-जुकाम
2.
फेफड़े से सम्बन्धित समस्त व्यधियां,एवं कुहनी तथा बाहों का दर्द
3.
अर्श(बावासीर)
4.
सर्दी-जुकाम,शिरोशूल,अर्दित,(चेहरे का लकवा)
5.
गले एवं फेफड़े से सम्बन्धित समस्त व्याधियां
6.
गले एवं फेफड़े से सम्बन्धित समस्त व्याधियां
5) फुफ्फुस-संचार-पथ(Lungs Meridian)— इस संचार-पथ पर महत्त्वपूर्ण छः प्रतिबिम्ब केन्द्र हैं, इनका उपयोग निम्नांकित तालिकानुसार होना चाहिए-

 6) यकृत संचार-पथ(Liver Meridian)— इस संचार-पथ पर मुख्य रुप से पांच प्रतिबिम्ब केन्द्र हैं । इनका उपयोग निम्नांकित तालिका के अनुसार करना चाहिए-
केन्द्रांक
उपयोग
1.
शिरोशूल एवं चक्कर
2.
कमर,घुटना,टखना आदि जोड़ों की व्याधियाँ
3.
गर्भाशयिक व्याधिविशिष्ट- कष्टरजादि
4.
वमन,आंत एवं आमाशयिक व्याधि
5.
पक्ष,पर्शुका,स्तन,(दुग्धवर्धक विशेष)















7)प्लीहा संचार-पथ(Spleen Meridian)— इस शक्ति-संचार-पथ पर मुख्य रुप से तीन प्रतिबिम्ब केन्द्र हैं, इनमें प्रथम केन्द्र का उपयोग अनिद्रा, गर्भाशयिक व्यतिक्रम, सन्धिवात, पाचन तन्त्र की गड़बड़ी आदि में किया जाता है। दूसरे केन्द्र का उपयोग खासकर घुटने के दर्द एवं शोथ(सूजन)में होता है। तथा तीसरे केन्द्र का उपयोग स्त्री के प्रजनांगों से है। अनियमित ऋतुस्राव में इसका विशेष उपयोग होता है।
8)वृक्क-संचार-पथ(Kidney Meridian)— इस शक्ति संचार-पथ पर सिर्फ दो महत्त्वपूर्ण
प्रतिबिम्ब केन्द्र हैं, इसमें प्रथम का उपयोग हिक्का,चक्कर, एवं कष्टरज में किया जाता है। एवं दूसरे केन्द्र का उपयोग खासकर वृक्कों से सम्बन्धित सभी प्रकार की व्याधियों में किया जाना चाहिए।
9) बड़ीआंत(Large Intestine Meridian)— इस शक्ति-संचार-पथ पर मुख्य रुप से छः प्रतिबिम्ब-केन्द्र हैं, इनका उपयोग निम्नांकित तालिकानुसार किया जाना चाहिए-
केन्द्रांक
उपयोग
1.
ज्वर एवं दस्त
2.
कोष्ठबद्धता,दस्त,दांतों का दर्द
3.
मानसिक अशान्ति,चिड़चिड़ापन
4.
कन्धे से कलाई पर्यन्त दर्द,अकड़न आदि
5.
कन्धों का दर्द विशेष
6.
सर्दी-जुकाम

10) छोटीआंत-संचार-पथ (Small Intestine Meridian)— इस शक्ति-संचार-पथ पर मुख्य रुप से चार प्रतिबिम्ब-केन्द्र हैं, इनका उपयोग निम्नांकित तालिकानुसार किया जाना चाहिए-
केन्द्रांक
उपयोग
1.
हाथ की अंगुलियों का लकवा(Writer’s cramp
2.
कब्ज
3.
कन्धे का दर्द
4.
कान की समस्त व्याधियाँ
       








11) आमाशय-संचार-पथ (Stomach Meridian)—  )— इस शक्ति-संचार-पथ पर मुख्य रुप से नौ प्रतिबिम्ब-केन्द्र हैं, इनका उपयोग निम्नांकित तालिकानुसार किया जाना चाहिए-
केन्द्रांक
उपयोग
1.
अर्दित,चेहरे की झुर्रियां,आँखों की बीमारियाँ
2.
सर्दी,जुकाम,सायनोसाइटिस
3.
दांत की बीमारियां
4.
दांत की बीमारियां
5.
उच्च रक्त चाप
6.
उदरशूल,प्रवाहिका, दस्त
7.
उदरशूल,प्रवाहिका,एवं घुटने का दर्द
8.
मानसिक अशान्ति
9
उदरशूल,दन्त-शूल आदि

12)मूत्राशय-संचार-पथ( Urine -bladder Meridian)—सीधे प्रतिबिम्ब-केन्द्रों की अवस्थिति के अनुसार देखा जाय तो यह संचार-पथ बड़ा ही महत्त्वपूर्ण है। इसका गमन-मार्ग भी काफी लम्बा है,जैसा कि पूर्व प्रसंग में दिये गये चित्र में हम देख रहे हैं कि सधन केन्द्रों को संजोये हुए यह संचार पथ नाक के ऊपरी भाग,आँख के कोने से प्रारम्भ होकर, ऊर्ध्वगमन-रीति से ऊपर सिर को लांघते हुए पीछे मेरुदण्ड प्रदेश से अवरोहित लम्ब की भांति उतरते हुए पूरे पैर को पार कर,पैर के कनिष्ठिका पर समाप्त हो रहा है। इसकी एक सबसे बड़ी विशेषता ये लक्षित होती है कि मुख्य धारा के समानान्तर ही एक सहधारा का विकास हुआ है,जो वस्तुतः सहयोगी जैसा प्रतीत होने पर भी,मुख्य पथ का ही अभिन्न अंग है। जैसा कि चित्रांक में स्पष्ट है,ग्रीवा-प्रदेश से इस पथ की उपधारा थोड़ा हटकर प्रवाहित हुयी है,जो नीचे घुटने के पृष्ठभाग पर आकर पुनः मुख्यधारा में शामिल हो गयी है। विस्तार-व्यापकता के कारण मुख्य रुप से महत्त्वपूर्ण प्रतिबिम्ब केन्द्रों की संख्या में भी वृद्धि होजाना स्वाभाविक है,जैसा कि निम्नांकित तालिका से स्पष्ट है-
केन्द्रांक
उपयोग
1.
नेत्र-व्याधि-दाह,शोथादि
2.
शिरोशूल,सर्दी-जुकाम
3.
खांसी,दमा,फेफड़े की अन्य बीमीरियां
4.
खांसी,दमा,फेफड़े की अन्य बीमीरियां
5.
धारणसंचारपथ (C.V.M)की विशिष्ट गड़बड़ी
6.
हृदय सम्बन्धी विभिन्न व्याधियाँ
7.
शासक-संचार-पथ(G.V.M) की गड़बड़ी
8.
आमाशयिक विकार,उदरशूल
9.
यकृत
10.
पित्ताशय
11.
अग्न्याशय एवं प्लीहा
12.
समस्त उदर व्याधि
13.
दस्त,उदरशूल,फेटीगएसिड की वृद्धि
14.
वृक्क एवं मूत्र-प्रणाली
15.
बड़ीआंत
16.
कटिशूल
17.
छोटीआंत
18.
गर्भाशय
19.
कटिशूल,सायटिका
20.
कमर,घुटना,जांघ की पीड़ा
21.
कमर सहित नीचे के पूरे भाग
22.
मेरुदण्ड
23.
दमा,खांसी,गर्दन एवं कंधे की बीमारियां
24.
दमा
25.
खांसी
26.
हिचकी,वमन,आमाशयिक विकार
27.
उदरशूल,प्रवाहिका(पतले दस्त)
28.
वृक्कशूल,कटिशूल
29.
सायटिका,पैरों का ऐंठन आदि
30.
सायटिका,हिचकी,चक्कर
31.
प्रसववेदना






















































नोटः- उक्त तालिका में क्रमांक 5 एवं 7 C.V.M. & G.V.M. की गड़बड़ी के लिए विशेषज्ञों ने सुझाया है,किन्तु ध्यान देने योग्य है कि इन दो संचालक पथों में अपनी गड़बड़ी शायद ही कभी आये,और यदि आजाय तो समझ लें कि उनका निवारण भी सामान्य उपचार से सम्भव नहीं है। ये किसी भी चिकित्सा से ठीक नहीं हो सकता। हां कोई सिद्ध योगी मिल जाये तो और बात है। आमतौर पर नाड्योपचार-तन्त्र-विशेषज्ञ मात्र चिकित्सा पक्ष के ही अनुभवी होते हैं,न कि साधना पक्ष के।

 13)पित्ताशय-संचार-पथ(Gall Bladder Meridian)— इस शक्ति-संचार-पथ पर मुख्य रुप से तेरह प्रतिबिम्ब-केन्द्र हैं, इनका उपयोग निम्नांकित तालिकानुसार किया जाना चाहिए-
केन्द्रांक
उपयोग
1.
ललाट,आँख एवं आँखों की गड़बड़ी से होने वाला सिरदर्द
2.
कान
3.
सर्दी,जुकाम,सिरदर्द,चक्कर
4.
कन्धे का दर्द,स्तनों में दूध की कमी
5.
पित्ताशय के विविध रोग
6.
आमाशयिक विकार,वमन,उदरशूल आदि
7.
कटिशूल
8.
निम्नांगों में रक्तवाहिनियों की मन्द स्थिति
9.
अर्द्धांगवात(निम्नांग विशेष)(नीचे के अंगों का लकवा)
10.
सिरदर्द,टखने का दर्द
11.
पित्ताशय के विविध रोग एवं पथरी
12.
गर्भाशय विकार (विशेषकर कष्टरज)
13.
गर्भाशय विकार (विशेषकर कष्टरज),एवं पैर के पंजों का दर्द

14)अति उष्मा-संचार-पथ (Tripple Warmer Meridian)— इस उष्मा-प्रदायी पथ पर विशेष महत्त्वपूर्ण मात्र एक ही प्रतिबिम्ब केन्द्र है,जिसका उपयोग कन्धे के दर्द में किया जाता है।       उक्त सभी तालिकाओं को ठीक से समझने के लिए पूर्व में दिये गये चौदह शक्ति संचार पथों से सम्बन्धित चित्रों का पुनरावलोकन करना चाहिए।
चौदह शक्ति-संचार-पथों पर निजी तौर पर स्थित एक्युप्रेशर-प्रतिबिम्ब-केन्द्रों के परिचय के साथ-साथ केन्द्र-परिचय का यह विशिष्ठ प्रसंग समाप्त होता है। यूं तो नित नये एक्युप्रेशर-प्रतिबिम्ब-केन्द्रों का अन्वेषण जारी है विशेषज्ञों द्वारा। हो सकता है कि आने वाले समय में भौतिक विकास के दौड़ में आध्यात्मिक केन्द्र-संख्या तक पहुँच जायें हमारे नये विशेषज्ञ,किन्तु जबतक दौड़ जारी है,तबतक तो अद्यतन केन्द्र-परिचय से ही यथासम्भव लाभान्वित होना चाहिए। अस्तु।

                                      क्रमशः..