Sunday, 30 November 2014

पुण्यार्कवास्तुमंजूषा-79

         अध्याय १७.गृह-समीप-(क) वृक्षादि विचार 
    
पूर्व के विविध प्रसंगों में वृक्ष-पादप-क्षुप-वल्लरी आदि के सम्बन्ध में यत्र-तत्र थोड़ी चर्चा हुयी है। अब यहाँ उनके गुण-दोषों की विशेष रुप से चर्चा की जा रही है।
तुलसी का पौधा- यही एक अपवाद पादप है,जिसे वास्तुमंडल के मध्य में भी स्थापित किया जा सकता है।हिन्दु-घरों की पहचान है- यह पवित्र पौधा। शायद ही किसी हिन्दु का घर हो,जहां तुलसी का पौधा न लगा हो।इसे सुन्दर गमले(चौरा) में आंगन में लगाने से विभिन्न प्रकार के वास्तु-दोषों का निवारण होता है। इसके अतिरिक्त कोई भी पौधा(छोटा या बड़ा) वास्तुमंडल के अन्दर नहीं होना चाहिए।
    ब्रह्मवैवर्तपुराण,श्रीकृष्ण खण्ड १०३/६२-६३ में कहा गया है कि घर के भीतर लगायी हुई तुलसी अति कल्याणकारी है।धन-पुत्र-यश-पुण्यादि प्रदान करती है। नित्य प्रातः तुलसी का दर्शन मात्र भी सुवर्ण-दान-तुल्य फलदायी है।
    भविष्यपुराण में कहा गया है कि यमदूतों से त्राणपानाहै,उन्हें दूर भगाना है, तो तुलसी को घर में लगायें, और नित्य पूजन-सेवन करें;और यदि उन्हें आहूत करना है, तो इस पवित्र पादप को वास्तुमंडल के दक्षिण दिशा में लगा दें।अर्थात् दक्षिण दिशा में इसे कदापि न लगायें।
          
शमी का पौधा- तन्त्र,ज्योति,वास्तु के बाजारीकरण के विकट दौर में शनि को विशेष रुप से व्याख्यायित करके समाज में भ्रामक भय पैदा कर दिया गया है,जिसके परिणाम स्वरुप एक ओर शनि के मन्दिरों की संख्या बढ़ी है,तो दूसरी ओर घर-घर में तुलसी से भी अधिक महत्त्वपूर्ण शमी हो गया है।नर्सरी वाले इसकी मनमानी कीमत वसूल कर रहे हैं।ज्योतिषशास्त्र ने शनि को क्रूरग्रह (पापग्रह) की सूची में रखा है।वस्तुतः शनि एक कठोर न्यायाधीश हैं,और मनुष्य के पापों को क्षरित कर(दण्ड देकर)जीवन में नूतन आलोक जगा देते हैं। पथभ्रष्ट को सही दिशा में ला खड़ा करते हैं।
लोग समझते हैं कि शमी का पौधा घर में लगाने से शनि का कोपभाजन नहीं बनेंगे।जबकि यह बिलकुल ही बचकानी बात है।जज का खुशामद करके कोई अपराधी बच नहीं जाता,कर्मानुसार उसे दण्डित होना ही है।
    शमी का उपयोग शनि-शान्ति एवं प्रसन्नता हेतु संविधा के रुप में किया जाना चाहिए। इसकी पत्तियाँ और फूल भी शनि की अर्चना में प्रयुक्त होते हैं, साथ ही शिव को भी अतिप्रिय है।शमीपुष्प और पत्तियाँ प्रायः हर देवों को अर्पित की जाती है।इसके प्रयोग से पापों का क्षय होता है।अमंगल का नाश होता है।दुःस्वप्न के प्रभाव को नष्ट करने की अद्भुत क्षमता शमी में है।शास्त्र के वचन हैं कि रात्रि में बुरे स्वप्न यदि देखते हों तो प्रातः उठ कर शमी का दर्शन करें,तथा शमीपुष्प और पत्तियाँ भगवान शिव को अर्पित करें।ऐसा कुछ दिनों तक करने से निरंतर देखे जाने वाले बुरे सपनों का नाश होता है।यथा-
शमी शमय में पापं शमी लोहितकंटका।
धारिण्यर्जुनबाणानां रामस्य प्रियवादिनी।।
अमङ्गलानां शमनीं शमनीं दुष्कृतस्य च।
दुःस्वप्न नाशिनीं धन्यां प्रपद्येऽहं शमीं शुभाम्।।
    वस्तुतः शमी का पंचांग अनमोल है।इसके मूल को पंचोपचार पूजित और शनिमंत्र से अभिमंत्रित करके धारण करने से शनिदेव अति प्रसन्न होते हैं। पूजित अभिमंत्रित मूल को तिजोरी,पर्स,गल्ले आदि में रखने से स्थिर लक्ष्मी का वास होता है।अज्ञात कारणों से हो रहे धनक्षय का शमन होता है।
उपयोगिता की दृष्टि से इसे गृहवाटिका में लगाना चाहिए,न कि घर के भीतर या मुख्यद्वार पर।वास्तुमंडल के पश्चिम दिशा में,जहाँ शनि का क्षेत्र है, मंडल से तीन या पांच हाथ की दूरी पर लगाना सर्वाधिक श्रेष्ठ है।अन्य दिशाओं में नहीं लगाना चाहिए।पूर्वाभिमुख भवन के मुख्यद्वार के आसपास लगा देना सर्वाधिक अशुभ है।इसका प्रभाव वासकर्ता के तेज,शौर्य,प्रतिष्ठा,पिता,सन्तान आदि पर सदा प्रतिकूल पड़ेगा।छोटे आकार के शहरी मकानों में जहाँ भूतल पर स्थान न हो, तो ऊपरी छत पर भी मध्य पश्चिम दिशा में गमले में लगा सकते हैं, किन्तु यह वैकल्पिक व्यवस्था है।ध्यातव्य है कि शमी पादप नहीं,वृक्ष है;और किसी भी वृक्ष को गमले में कैद करना वानस्पतिक अपराध है।अतः वनस्पति तन्त्र इसकी आज्ञा नहीं देता।इससे एक ओर चन्दमा कुपित होते हैं,तो दूसरी ओर जिनसे सम्बन्धित वह पौधा है।
क्रमशः...

Wednesday, 26 November 2014

पुण्यार्कवास्तुमंजूषा-78

गतांश से आगे....
अध्याय सोलह-गृहनिर्माणःसामग्री-विचार भाग छः
(घ) भवन-निर्माण-सामग्री सम्बन्धी कुछ अन्य बातें-
§  युगानुसार, पूर्णरुप से शास्त्रीय नियमों पर खरा उतरना तो वाजार व्यवस्था में असम्भव है,फिर भी लकड़ी की जाति और गुणवत्ता का विचार यथासम्भव करना ही चाहिए।
§  बहु प्रकार भेद से भी बचना चाहिए।
§  निषिद्ध लकड़ियों का प्रयोग कदापि न करें।
§  कच्ची और पक्की दोनों तरह की ईंटों का प्रयोग करना हो तो उन्हें एक तान में न करके,क्रमिक विभाजन से करे-अर्थात पहले थोड़ी ऊँचाई तक पक्की ईंटों को जोड़ ले,फिर कच्ची ईंटों को जोड़ें.पुनः पक्की ईंटों को।
§  पत्थर के ईंटों का पूर्णतः प्रयोग करना हो तो कोई बात नहीं,किन्तु साथ में मिट्टी के पक्के ईंटों को भी लगाना हो तो पहले जहाँ तक सम्भव हो पत्थर का प्रयोग कर लें,फिर मिट्टी के ईंटो का प्रयोग करें।
§  गोलाकार स्तम्भादि बनाने के लिए,तथा कूपबन्धन के लिए विशेष प्रकार के सूर्यमुखी और अर्द्धवृत्ताकार ईंटों का प्रयोग करना चाहिए।(हालांकि आजकल आकार सम्बन्धी सारे कार्य कंकरीट और छड़ के सहयोग से किये जाते हैं,जो युगानुरुप सरल है।)
§  पत्थर के बेडौल टुकड़ों का प्रयोग करने से परहेज करें।वास्तुभूमि के विविध आकारों के शुभाशुभ प्रभाव की तरह ही इनके भी प्रभाव हैं।जहाँ तक हो सके सुन्दर,सुडौल टुकड़े काम में लाये जाँय।
§  संगमर्मर,ग्रेनाइड आदि पत्थरों का प्रयोग रंग और आकार का विचार करते हुए ही करें।
§  रंगों का चुनाव पूर्व अध्याय में वर्णित मित्रामित्र सारणी के अनुसार विचार करके ही करना चाहिए।
§  आजकल भवन निर्माण में लोहे और पत्थर(कंकरीट) का प्रयोग सर्वाधिक हो रहा है।इनकी गुणवत्ता पर विशेष ध्यान देना जरुरी है।
§  सुन्दरता और टिकाऊपन के लिए कृत्रिम एडेसिव,और रसायनों का उपयोग धड़ल्ले से हो रहा है,जिसका प्रायः अशुभ प्रभाव पड़ता है।अतः इनका प्रयोग सोच-समझकर करना चाहिए।
                   ----()()----



क्रमशः....अध्याय सत्रह...

Friday, 21 November 2014

पुण्यार्कवास्तुमंजूषा-77

गतांश से आगे.....अध्याय १६. गृह-निर्माण-सामग्री-विचार भाग पांच

प्रसंगवश अब काष्ठछेदन की बात करते हैं-
विश्वकर्मप्रकाश,वास्तुरत्नाकर,वृहत्संहिता आदि ग्रन्थों में पेड़ कब और कैसे काटा जाय- इस विषय की भी चर्चा है-
द्व्यङ्गराशिगते सूर्ये माघे भाद्रपदे तथा।
वृक्षाणां छेदनं कार्यं सञ्चयार्थं न कारयेत्।।
सिंहे नक्ते च दारुणां छेदनं नैव कारयेत्।
ये मोहाच्च प्रकुर्वन्ति तेषां गेहेऽग्नितो भयम्।।
अर्थात् द्विस्वभाव(मिथुन,कन्या,धनु,मीन)राशियों में सूर्य के रहने पर (विशेषकर भाद्र और माघ मास में) वृक्ष काटना चाहिए,किन्तु संचय के लिए काटना उचित  नहीं है।यानी शीघ्र प्रयोग के लिए काटा जा सकता है।पुनः कहते हैं कि सिंह और मकर के सूर्य रहने पर उक्त महीनों में भी गृहकार्यार्थ वृक्षछेदन नहीं करना चाहिए।अज्ञान,या स्वार्थ वश यदि ऐसा करता है तो उसे अग्नि का कोपभाजन बनना पड़ता है।यानी अग्निभय की आशंका रहती है।
सौम्यं पुनर्वसुं मैत्रं करं मूलोत्तरात्रये।
स्वाती च श्रवणं चैव वृक्षाणां छेदने शुभम्।।
अर्थात् मृगशिरा,पुनर्वसु,अनुराधा,हस्ता,मूल,उत्तराफाल्गुनी,उत्तराषाढ़,उत्तरभाद्रपद, स्वाती,और श्रवण- इन दस नक्षत्रों में पेड़ काटना उत्तम होता है।
  चन्द्रमा के दस नक्षत्रों की चर्चा करके अब अगले श्लोक में सूर्य के नक्षत्रों की महत्ता पर प्रकाश डालते हैं-
 सूर्यभाद्वेदगोतर्कदिग्विश्वनखसम्मिते।
चन्द्रर्क्षे दारुकाष्ठानां छेदनं शुभदायकम्।।
अर्थात् सूर्य के नक्षत्र से(जहाँ सूर्य हों)चौथे,नौवें,छठे,दशवें,तेरहवें और बीसवेंनक्षत्र
पर चन्द्रमा के रहने पर वृक्षछेदन उत्तम होता है।
नोटः- यहाँ यह ध्यान देने योग्य है कि उक्त दिन चन्द्रमा का नक्षत्र, वृक्षछेदन हेतु ग्राह्य नक्षत्र-सूची में होना चाहिए।अन्यथा ग्राह्य नहीं होगा।
अब एक अति विशिष्ट योग को इंगित करते हैं-
कृष्णपक्षे चतुर्दश्यां रेवतीरोहिणीयुते।
यदा तदा गुरौ लग्ने गृहार्थं तु हरेद्रुमान्।
अर्थात् कृष्णपक्ष की चतुर्दशी को यदि रेवती या रोहिणी नक्षत्र पर चन्द्रमा का संक्रमण हो, तो वृहस्पति जहाँ बैठे हों उस लग्न का चयन करके वृक्षछेदन करना अति उत्तम होता है।
  इसी प्रसंग में तृणादि से गृहछादन का भी निर्देश कर रहे हैं।(भले ही आजकल ज्यादातर कंकरीट-सरिया की ढ़लाई,पत्थर की पट्टिकाओं,या टीन और सीमेंट की चादरों का प्रयोग करके मकान का छादन(छावनी) करते है,फिर भी ऐसे मकान भी काफी मात्रा में बन रहे हैं,जिन्हें तृणादि से छावनी करनी पड़ती है।उनके लिए इस मुहूर्त का औचित्य और महत्त्व जरुर है।)कहते हैं-
लग्ने शुक्रे गुरौ केन्द्रेष्वगराशौ गृहोपरि।तृणादिभिः समाच्छाद्यो न चैवाग्निभयं भवेत्।। अर्थात् लग्न में शुक्र,केन्द्र(१,४,७,१०)में गुरु,और स्थिर राशि का लग्न-
वृष,सिंह,वृश्चिक,कुम्भ हो तो तृणादि से गृहछादन करने पर अग्नि-भय नहीं रहता।
अन्य प्रसंग में कहा गया है कि धनिष्ठा,शतभिष,पूर्वभाद्र,उत्तरभाद्र,एवं रेवती इन पांच नक्षत्रों की पंचक संज्ञा है।इसमें काष्ठसंचय और गृहछादन वर्जित है।
(नोट- पंचक में सिर्फ पांच कर्म ही वर्जित हैं- काष्टसंचय,गृहछादन,खटिया बुनना,शवदाह,और दक्षिण दिशा की यात्रा।कुछ विद्वान अन्यान्य शुभ कार्यों की भी वर्जना करते हैं।)
वृक्षछेदन मुहूर्त-चर्चा के बाद अब छेदन और रक्षण का विचार किया जा रहा है-
रात्रौ कृतबलिंपूजं प्रदक्षिणं छेदयेद्दिवा वृक्षम्।
धन्यमुदक्प्राग्वदनं न ग्राह्योऽन्यथा पतितः।।(वृहत्संहिता५२/११९)
अर्थात् रात्रि में वृक्ष के समीप बलि(दधिमाष)विधान करके,अगले प्रातः पुनः प्रार्थना पूर्वक दक्षिणावर्त रीति से वृक्ष को काटे।पूर्व-उत्तर में गिरे तो उत्तम अन्यथा अग्राह्य होता है।
अब अन्यत्र प्रसंग में (वृहत्संहिता५८/११९)वृक्ष की प्रार्थना की विधि कहते हैं-
यानीह भूतानि वसन्ति तानि बलिं गृहीत्वा विधिवत्प्रयुक्तम्।
अन्यत्र वासं परिकल्पयन्तु क्षमन्तु ते चाऽद्य नमोऽस्तुतेभ्यः।।
वृक्षं प्रभाते सलिलेन सिक्त्वा मध्वाज्यलिप्तेन कुठारकेण।
पूर्वोत्तरस्यां दिशि सन्ति कृत्य प्रदक्षिणं शेषमतो विहन्यात्।।
अर्थात् "हे भूतगण(प्राणीगण) जो इस वृक्ष पर निवास करते हों,उनको मैं प्रणाम करता हूँ।वे मेरे द्वारा विधिवत् दी गयी बलि को ग्रहण करके अन्यत्र अपना निवास स्थान बनावें,और मेरी इस धृष्टता को क्षमा करें।"- रात्रि में इस प्रार्थना और बलि के पश्चात् ,अगले प्रातः काल वृक्ष को जल से सिंचित करके,कुल्हाड़ी में मधु और घी का लेपन करके,पूरब या उत्तर की ओर से काटना प्रारम्भ करे, और दक्षिणावर्त ही कर्तन करे।
  वृक्ष को कैसे काटे और काटने के बाद वृक्ष किस दिशा में गिरता है,इस पर विश्वकर्मप्रकाश(१०३५) का मत है-
छेदयेद्वर्तुलाकारं पतनञ्चोपकल्पयेत्।
प्राग्दिशि पतने कुर्याद्धनधान्यसमर्चितम्।।
आग्नेयामग्निदाहः स्याद्दक्षिणे मृत्युमादिशेत्।
नैऋत्यां कलहं कुर्यात्पश्चिमे पशुवृद्धिदम्।
वायव्ये चौरभीतिः स्यादुत्तरे च धनागमः।
ईशाने च महच्छ्रेष्ठं नानाश्रेष्ठं तथैव च।।(वास्तुरत्नाकर ६/७०-७२)
अर्थात् वृक्ष को वर्तुलाकार(गोलाकार) काटे। काटने पर पूर्व दिशा में गिरे तो धनधान्य की वृद्धि,अग्निकोण में गिरे तो अग्निभय,दक्षिण में गिरे तो मृत्यु (अति अशुभ),नैऋत्य में गिरे तो कलह,पश्चिम में गिरे तो पशुवृद्धि,वायव्य में गिरे तो चौरभय,उत्तर में गिरे तो धनप्राप्ति,और ईशान में गिरे तो अनेक प्रकार के उत्तम फल प्राप्त होते हैं।
    कटे हुए वृक्ष की लकड़ियों को तत्काल उपयोग में नहीं लाना चाहिए,बल्कि कुछ दिनों(दो-तीन सप्ताह)तक जल और कीचड़ के संयोग में गाड़ देना चाहिए।इससे लकड़ी में कीड़े नहीं लगते;किन्तु ध्यान रहे महानिम्ब(बकाईन), सागवान,गम्भारी जैसे कोमल लकड़ियों को सिर्फ जल में ही  डुबोकर रखे,और अपेक्षाकृत कम दिनों तक,अन्यथा काष्ठ की गुणवत्ता में कमी आजायेगी।इस सम्बन्ध में विश्वकर्मप्रकाश-१०४०,और वास्तुरत्नाकर ६/७३ में कहा गया है-
काष्ठं नो भक्ष्यते कीटैर्यदि पक्षं धृतं जले ।यहीं पुनः ध्यान दिलाते हैं –कृष्णपक्षे छेदनश्च न शुक्ले कारयेद्बुधः – शुक्लपक्ष में वृक्ष काटने का काम कदापि न किया जाय।

क्रमशः...

अकुलाहट: दाम्पत्य-सुख-बाधकःःःःकुछखास बातें

अकुलाहट: दाम्पत्य-सुख-बाधकःःःःकुछखास बातें: दाम्पत्य-सुख-बाधकःःःःकुछखास बातें वर्तमान समय की एक विकट समस्या है- दाम्पत्य-सुख-बाधा।ऐसा नहीं है कि यह पहले नहीं था,किन्तु ये अवश्य क...

अकुलाहट: बहुउपयोगी यन्त्रसाधनाःः 1.भौमयन्त्र

अकुलाहट: बहुउपयोगी यन्त्रसाधनाःः 1.भौमयन्त्र: बहुउपयोगी यन्त्र-साधन:::१. भौमयन्त्र मुख्य उपयोगः- १.समस्त वन्ध्यादोष निवारण हेतु, २.पुत्र प्राप्ति हेतु,(ध्यातव्य है कि वन्ध्यादोष औ...

Saturday, 15 November 2014

पुण्यार्कवास्तुमंजूषा-76

गतांश से आगे....
अध्याय सोलह--  गृह-निर्माण-सामग्री-विचार - भाग चार

(ग) भवन-निर्माण हेतु काष्ठ-विचार- विश्वकर्मप्रकाश में कहा गया है-
   
   एकजात्या द्विजात्या वा त्रिजात्या वा महीरुहाः।
   कारयेत्सर्वगेहेषु तदूर्ध्वं नैव कारयेत्।।
   एकदारुमया गेहाः सर्वशल्यनिवारकाः।
   द्विजात्या मध्यमा प्रोक्तास्त्रिजात्या अधमाः स्मृताः।।(वास्तुरत्नाकर ६-६०)
भवन में एक,दो,या तीन प्रकार की लकड़ियों का ही प्रयोग करना चाहिए।इससे अधिक प्रकार का नहीं।एक प्रकार- उत्तम,दो प्रकार- मध्यम,और तीन प्रकार- के प्रयोग को अधम कहा गया है।इससे अधिक त्याज्य है।विशेष बात यह है कि एक ही प्रकार के काष्ठ के प्रयोग से विभिन्न प्रकार के शल्यदोषों का भी निवारण हो जाता है।अतः यथासम्भव उत्तमकाष्ठ का प्रयोग करना चाहिए।
अब काष्ट की जाति पर प्रकाश डालते हैं-
श्रीपर्णी रोहिणी शाकं सर्जुश्च सरलाः शुभाः।
पतङ्गलोध्रशालाख्यास्तालार्जुनकशिंशपाः।।
चन्दनाशोकबदरी मधूकाश्च कदम्बकाः।
प्रशस्ताश्च शमीनिम्बविल्ववर्ज्यं गृहान्तिके।।
गेहे दारुगुणैर्युक्ते गृहकर्मणि युज्यते।
गृहे काष्ठं समं श्रेष्ठमलिन्दे विषमं शुभम्।।(वास्तुरत्नाकर६/४९-५१)
अर्थात् श्रीपर्णी(कायफल),रोहिणी(रोहिड़ा,कुटकी),शाक(सागवान),सर्ज(धूना,राल), सलई,लोध्र,पतङ्ग,शाल(सखुआ),अर्जुन,शिंशपा(शीशम,सीसो),चन्दन,अशोक,बदरी (बेर),महुआ,कदम्ब,ताल आदि की लकड़ियों का भवन में प्रयोग करना चाहिए। तथा शमी,निम्ब(नीम) और विल्व(वेल) का प्रयोग नहीं करना चाहिए।पुनः कहते हैं- गुणयुक्त काष्ठों का ही प्रयोग करना चाहिए।एवं गृह में सम संख्यक तथा अलिन्द में विषम संख्यक काष्ठ का प्रयोग करना चाहिए।
(नोटः-अन्यान्य ऋषिमत से ताल(ताड़)और बेर का प्रयोग निषिद्ध है,तथा विल्व (वेल) को ग्राह्य कहा गया है।)
अब आगे अशुभ(अग्राह्य) वृक्षों की सूची दी जा रही है-
प्लक्षोदुम्बरचूताख्या निम्बस्नुहिविभीतकाः।
दग्धा कण्टकिनो वृक्षा वटाश्वत्थकपित्थकाः।।
अगस्तिशिग्रुतालाख्यास्तिन्तिणीकाश्च निन्दिताः।
अन्ये च गृहनिर्माणे योजनीया समा द्रुमाः।।(उक्त ५२,५३)
अर्थात् ः- -पाकड़,गूलर,आम,नीम,विभीतक(बहेरा),स्नुहि(सेहुड़),शिग्रु(सहिजन,मुनगा), वट,पीपल,कपित्थ(कैत),अगस्त,ताल,तिन्तिड़ी(इमली)तथा जला हुआ,कांटेवाला, सड़ा हुआ काष्ठ गृह-कार्य में प्रयोग नहीं करना चाहिए।
(नोटः-1.आम का वृक्ष आंगन या गृहवाटिका में लगाने से सन्ताननाश होता है, किन्तु इसकी लकड़ी गृहकार्य में प्रयुक्त हो सकती है- ऐसा अन्य ऋषियों का मत है।
2.स्नुहि और शिग्रु की लकड़ी इस योग्य होती ही नहीं कि इनका प्रयोग भवन में किसी प्रकार किया जा सके।अतः गृह-समीप त्याज्य वृक्ष-सूची में इन्हें रखा जाना चाहिए,न कि गृहकाष्ठ सूची में।)
वाराहमिहिर की वृहत्संहिता में कुछ अन्य त्याज्य काष्ठों का वर्णन मिलता है, जिसकी चर्चा वास्तुरत्नावली (६/५४-५८) में भी है-
पितृवनमार्गसुरालयवल्मीकोद्यानतापसाश्रमजाः।
चैत्यसरितसङ्गमसम्भवाश्च घट्योयसिक्ताश्च।।
कुञ्जानुजातवल्लीनिपडिता वज्रमारुतोपहृता।
स्वपतितहस्तिनिपीडितशुष्काग्निप्लुष्टमधुनिलयाः।।
तरवो वर्जयितव्याः शुभदाः स्युः स्निग्धपत्रकुसुमभवाः।
अर्थात् पितृवन(श्मशान,कब्रगाह),रास्ता,देवालय,तपोभूमि,चैत्य(डीह),नदी-संगम,
आदि स्थानों पर पैदा हुए वृक्षों को गृह-कार्य में ग्रहण नहीं करना चाहिए, तथा मधुमक्खियों और वल्मीक(दीमक)युक्त,वन की वल्लियों से लिपटे हुए,घड़े के जल से सींचे हुए,आँधी-तूफान-विजली आदि से ध्वस्त,हाथियों द्वारा उखाड़े गये, स्वयं सूखे-रोग-ग्रस्त,दावानल में जले हुए वृक्षों को भी गृह-कार्य में प्रयोग नहीं करना चाहिए।नीच जाति द्वारा रक्षित-रोपित वृक्ष भी अग्राह्य हैं।चिकने,सुन्दर फूल-पत्तियों वाले पेड़ की लकड़ी को ही भवन में लगाना उत्तम होता है।
पुनः चारो वर्णों के लिए प्रशस्त काष्ठ का निर्देश करते हैं-
सुरदारुचन्दनसमा मधूकतरवः शुभा द्विजातीनाम्।।
क्षत्रस्यारिष्ठास्त्वश्वत्थखदिरविल्वाः विवृद्धिकराः।
वैश्यानां जीवक खदिर सिन्धूक चन्दनाश्च शुभफलदाः।।
तिन्दुककेशरसर्जार्जुनोत्थशालाश्च शूद्राणाम्।
सर्वेषां वा शस्ता सर्वे वृक्षाश्च निन्दिता ये न।।
ब्राह्मणों को देवदारु,चन्दन,मधूक(महुआ);क्षत्रियों को अरिष्ठ(रीठा),पीपल,खदिर (खैर)और बेल;वैश्यों को जीवक(विजयसार,विजैया),खैर,सिन्धूक(म्योड़ी) और चन्दन; तथा शूद्रों को तिन्दुक(कुचला),नागकेसर,सर्ज(धूना) और अर्जुन(कहुवा) का वृक्ष भवन-निर्माण में प्रयोग करना चाहिए।
वहीं पुनः कहते हैं कि वास्तुकार्य के लिए ग्राह्य सभी प्रकार के वृक्ष सभी वर्णों को उपयोग करने चाहिए,किन्तु निषिद्ध काष्ठ सबके लिए सर्वथा वर्जित हैं।
वास्तुराजवल्लभ ५/१६,१७ में कुछ अन्य रुप में गृह-काष्ठ-वर्णन है-
वृक्षं दग्धविशुष्ककण्कयुतं नीडैस्तु चैत्यद्रुमं।
क्षीरं मारुतपातितं च भवने चिञ्चाविभीतं त्यजेत्।।
शाकःशालमधूकसर्जखदिरा रक्तासनाः शोभनाः।
एकोऽसौ सरलोऽर्जुनश्च पनसः श्रीपर्णिका शिंशपा।।
हारिद्रस्त्वपि चन्दनः सुरतरुः पद्माक्षकस्तिन्दुकः।
नैतेऽन्येन युता भवन्ति फलदा शाकादयः शोभनाः।।
अर्थात् जला हुआ,सूखा हुआ,कीड़े लगे हुए,पक्षियों के घोसले वाले,चैत्य(टीले) पर उगे हुए,आँधी में गिरे हुए,अधिक दूध वाले(वट,पीपल,उदुम्बर,पाकड़),इमली तथा विभीतक(बहेरा) के पौधों का प्रयोग भवन-निर्माणमेंनहींकरनाचाहिए।शाक (सागवान),शाल(सखुआ),मधूक(महुआ),सर्ज(धूना),सरल,अर्जुन(कहुआ),पनस (कटहल),श्रीपर्णी(काफर),शिंशपा(सीसो,शीशम),खदिर(खैर),चन्दन,पद्माख,तिन्दुक (कुचला),देवदार आदि वृक्ष सुन्दर पके हुए अति शुभ होते हैं,किन्तु इन्हें अकेले ही प्रयोग करना चाहिए,यानी किसी अन्य काष्ठ के साथ प्रयोग करना उचित नहीं है।
(नोटः-ऊपर के श्लोकों में चन्दन की चर्चा सर्वत्र है,जो ततयुगीन निर्देश है।आज के समय में शुद्ध चन्दन देवताओं के लिए भी दुर्लभ हो रहा है,ऐसी स्थिति में भवन-कार्य में प्रयुक्त होना असम्भव सा है।)
    
काष्टचयन के सम्बन्ध में वास्तुप्रदीप २२,वास्तुरत्नाकर-६/३५ में कहा गया है-   आसन्नगा कण्टकिनोऽथ वृक्षाः स्युः शत्रुदास्त्वर्थहराः सदुग्धाः।
  प्रजाक्षया नेष्टफलाः समस्तास्तस्माद्विवर्ज्याः सकलाश्च वृक्षाः।।
 अर्थात् आसन(करासन)-एक अति कठोर काष्ठ,कांटेदार वृक्ष- वेर,बबूल,अकोल्ह, कटारी आदि,दूध वाले- बट,पीपल,महुआ आदि वृक्ष की लकड़ियों को भवन-कार्य में प्रयुक्त नहीं करना चाहिए।इसके प्रयोग से सन्तान-हानि,शत्रु-भय,धननाश की आशंका रहती है।

क्रमशः....

Friday, 14 November 2014

पुण्यार्कवास्तुमंजूषा-75

गतांश से आगे....अध्याय सोलह भाग तीन

अब तैयार ईंटों को भट्ठे से निकालकर कार्य-प्रयोग हेतु कहते हैः-
त्रिकं पञ्च त्रिकं सप्त पञ्चवेदमितैश्च भैः।शुभाशुभं क्रमेणैवमिष्टिनिःसारणे बुधात्।।
ध्यातव्य है कि यहाँ सत्ताईस नक्षत्रों को ही लिया गया है, और गणना मंगल के वजाय बुध के नक्षत्र से करना है,जिसका फल निम्न सारणी से स्पष्ट है -
२७नक्षत्र
शुभाशुभफल
शुभ
अशुभ
शुभ
अशुभ
शुभ
अशुभ

अब वास्तु कार्य के लिए शिलाच्छेदन (पत्थर तोड़ने- ईँट,रोड़ी आदि बनाने)का मुहूर्त कहते हैं- 
कृष्णाष्टम्यां च सप्तम्यां रौद्रभे यस्य कस्य चित्।
राशौ लग्ने कुजांशे वा शिलाभेदः प्रशस्यते।।
अर्थात् कृष्णपक्ष की अष्टमी और सप्तमी तिथि को रौद्र संज्ञक नक्षत्रों(भरणी,मघा, पूर्वाफाल्गुनी,पूर्वाषाढ़,पूर्वाभाद्रपद)में,मंगल की राशि वा लग्न में(मेष,वृश्चिक),या इन्हीं के नवांश में शिलाभेदन प्रशस्त है।

  ध्यातव्य है कि सभी ग्रह-नक्षत्रों के अपने-अपने गुण,स्वभाव और कार्य हैं। उसके अनुसार ही चयन होना चाहिए।कूआँ खोदने और स्तम्भ-स्थापन के लिए समान ग्रह-नक्षत्र कदापि नहीं हो सकते।
क्रमशः....