Tuesday, 29 April 2014

पुण्यार्कवनस्पतितन्त्रम् 23

(१७) वचआयुर्वेद में मेधा-वर्धक औषधियों में वच की प्रसिद्धि है।मुख्यतः यह दो प्रकार का होता है- मीठा और कड़वा।कड़वे स्वाद वाले वच को घोड़वच भी कहते हैं।यह किंचिंत जहरीला भी होता है- यानी अधिक मात्रा में सेवन प्राण-घातक हो सकता है।सद्यः प्रज्ञा हरा तुण्डी,सद्यः प्रज्ञा करी वचाः –आर्ष-वचन इस बात को ईंगित करता है कि वच आशुगुणकारी है- खासकर प्रज्ञा के मामले में।स्नायुतन्त्र पर बड़ा अच्छा प्रभाव है वच का।संगीत प्रेमियों के लिए वच,मुलहठी,कुलंजन आदि सद्यः आशीष हैं- यदि इच्छित कोकिल नाद स्वरम्, पिव माघ चतुर्दश कृष्ण दिनम्।अद्रक,भद्रक,पीतरसं,वच,वाकुचि,ब्राह्मी,सद्य घृतम्।।
    इस चेतना-साधक वनस्पति को ग्रहण करने के लिए अन्य वनस्पतियों की तरह नक्षत्रों का आधार न लेकर सूर्यादिग्रहण का आधार लेना है;यानी दोनों में से किसी भी ग्रहणकाल में- जो अपेक्षाकृत लम्बा हो। शेष बातें- स्थापन-पूजन विधान पूर्व निर्दिष्ट ही रहेंगे।हाँ,स्थापनोपरान्त वागीश्वरी मंत्र का कम से कम ग्यारह माला जप प्रतिदिन के हिसाब से २१ दिनों तक करना चाहिए,साथ ही दशांश विधि से होमादि कर्म  भी सम्पन्न करने के पश्चात् यह प्रयोग-योग्य हो जाता है।वच का बांदा अथवा वच की गांठ(कुछ भी) इसी भांति साधित करके प्रयोग करना चाहिए।
   वच का चूर्ण वनाकर आधा चम्मच चूर्ण मधु या गोघृत के साथ प्रातः-सायं लागातार इक्कीश दिनों तक सेवन करने से हर प्रकार की स्वरमंडलीय व्याधियाँ- हकलाहट,स्वरभंग,उच्चारण-दोष,जिह्वा-कष्ट आदि ठीक होकर स्वर मधुर बन जाता है। साथ ही अद्भुत रुप से वाक्-सिद्धि भी होती है।नित्य का औषध-सेवन यदि सूर्योदय से पूर्व किया जाय तो लाभ और भी अधिक हो सकता है।
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