Thursday, 5 April 2018

लोकतन्त्र का लेटेस्ट सेल्फी


लोकतन्त्र का लेटेस्ट सेल्फी

     लोकतन्त्र ज्यादातर सेल्फीमोड में ही हुआ करता है । सेल्फी लेते समय सेल्फी लेने वाले की जो मनोदशा और भावदशा, या कि बॉड़ीलैंगवेज जैसा हुआ करता है, लोकतन्त्र में भी नागरिकों की प्रायः वैसी ही स्थिति होती है । आसपास-परिवेश का तो सवाल ही नहीं, खुद को भी भूल जाते हैं हम, जब सेल्फीमोड में होते हैं। फिर जिसे वज़ूद का ही पता नहीं, उसे भला औरों की क्या फ़िकर ? वैसे आप स्वतन्त्र हैं- सेल्फी का अर्थ लेने में । क्यों कि हो सकता है एक और वाला अर्थ ही किसी को अच्छा लगे। अच्छा और इच्छा की पूरी गुंजायश है यहां।

    लोकतन्त्र का एक दूसरा नाम प्रजातन्त्र भी है- आप जानते ही होंगे। वैसे मैं सिविक्स; का विद्यार्थी नहीं हूँ, किन्तु कभी किसी विद्वान लेखक की किताब  में बड़े मनोयोग से पढ़ा था कि प्रजातन्त्र का मतलब ही होता है - प्रजा की इच्छा से चलने या कहें रेंगने वाली शासन-व्यवस्था। या कहें- सदा बीमार सी रहने वाली राज्य-व्यवस्था । वैसे आपका विचार हो तो इसका सही नाम- भेड़तन्त्र  या सियारतन्त्र रखा जा सकता है। क्यों कि ये नाम खूब फबता है इस पर। वैसे भी हमने सीखा है भेड़ों और सियारों से ही झुंड बनाने की कला , हुआ-हुआ करने का हुनर और हमेशा मिमियाते रहने की आदत ।

    क्या कभी आपने दौड़ने वाला लोकतन्त्र देखा है ? नहीं न ? तो फिर चौंकिये मत । लोकतन्त्र ज्यादातर बीमार ही रहता है। कम्बल ओढ़े रहना इसकी मजबूरी है। उससे भी काम न चला तो चेहरे पर भी कुछ डाल-डूल लेना पड़ता है। वो भी एक नहीं कई, ताकि एक यदि हवा-वयार में उड़ भी जाये तो दूसरा बरकारर रहे  और असली चेहरे को किसी तरह का नुकसान न हो। चेहरा यानी पहचान बचाना- इस तन्त्र की सबसे बड़ी समस्या है और सबसे अहं कर्तव्य भी। अपना चेहरा ही न बचा तो फिर देश बच करके ही क्या होगा ? यही कारण है कि जब-जब चेहरे पर ज़रब आता है, तब-तब लोकतन्त्र खतरे में पड़ने लगता है और अपने-अपने अन्दाज में, अलग-अलग कोनों से हुआ-हुआ, या मेंऽ मेंऽ मेंऽ में करना पड़ता है। ऐसे जरुरतमन्द लोकतन्त्र को सहेजने के लिए लोकलाज,धर्म,रिवाज,जाति-पाति सबकुछ छोड़कर, एकजुट होना पड़ता है। बे-हयायी और मक्कारी की लोकतन्त्र में सबसे ज्यादे अहमियत है। इसके बिना बिलकुल काम नहीं चलता। लोकतन्त्र की लाश भी यदि सलामत रही, तो भी उसपर चर्चा, वार्ता, प्रेस-कॉन्फरेन्स करके ऐशो-वो-मौज़ की जिंदगी बसर की जा सकती है—अनुभवियों ने कुछ ऐसा ही कहा है। धर्मराज बने रहने से काम नहीं चलने वाला ! जंगलराज क्या कम लोकप्रिय हुआ हमारे यहां ? खैर ।

    हालाकि सदा सेल्फीमोड में रहना लोकतन्त्र की मजबूरी है। दो-चार को परमानेन्ट खुश रखना मुश्किल होता है, फिर यहां तो लाख-करोड़ की बात है। लाख कोशिश करके भी क्या कोई बीबी अपने स़ौहर को असालतन तौर पर खुशमिज़ाज रख पायी है आजतक ? और यही हाल क्या अभागे स़ौहरों का भी नहीं है ? तो फिर औरों को सदा खुश रखने की ज़हमत ही क्यों ? क्यों न खुद को खुश रखने का इन्तज़ाम किया  जाये। हालाकि सेल्फीमोड में खुद का दायरा थोड़ा सा बड़ा होता है, फिर भी मेरा नाम जोकर के दिल की तरह नहीं ।

  तो आइये सेल्फीमोड में । 

 धड़ाधड़ सेल्फी लीजिये । 

खटाखट सेल्फी लीजिये। 

सोशलमीडिया आपका इन्तजार कर रहा है। 

फिर वहीं मिलेंगे ।

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