Wednesday, 30 September 2015

पुण्यार्कवास्तुमंजूषा-160

गतांश से आगे....अध्याय 27 भाग 2

आगे के चित्र में मोबाइल टावर के ऋणात्मक ऊर्जा प्रवाह को भवन की ओर आने से रोकने के लिए, उस दिशा में ईंगित (फोकश) करते हुए त्रिशूल का चित्र दिखलाया गया है। विजली के उच्चशक्ति वाले टावरों के लिए भी इसी भांति त्रिशूल का प्रयोग किया जाना चाहिए। हालाकि इन दोनों के ऊर्जा-प्रवाह-क्षेत्र में काफी अन्तर है,फिर भी लाभ अवश्यमभावी है। पाश्चात्य चिन्तन इन बातों को स्वीकारे, या न स्वीकारे,किन्तु भारतीय विज्ञान का यह अमोघ अस्त्र है-  इसे न भूलें।


२.वास्तुवंशी-प्रयोग-साधना — इसकी थोड़ी चर्चा २६वें अध्याय  में ही की जा चुकी है। यहाँ इसकी साधना की बात करते हैं। ध्यातव्य है कि वाँसुरी बाजार से सीधे खरीद कर,लगानी नहीं है,बल्कि विधिवत प्राण- प्रतिष्ठा-पूजा करके लगायी जाये। पूजा की विधि सामान्य सी है,अन्य पूजा की तरह ही। वंशी में श्रीकृष्ण की भावना करके पूजा करनी है, और पूजा के बाद कम से कम एकसौआठ बार प्रत्येक वाँसुरी के लिए (वाँसुरी की संख्या के अनुसार) ऊँ श्रीकृष्णाय नमः मन्त्र का जप अवश्य कर लिया जाय। अधिक जप से अत्यधिक ऊर्जा मिलेगी- इसमें दो राय नहीं। हो सके तो अधिकाधिक जप किया जाय। किसी शुभ दिन(पंचाग शुद्धि विचार करके)क्रिया की जा सकती है।आगे दो चित्रों के माध्यम से इसके प्रयोग को दर्शाया गया है।पहले चित्र में कई संख्याओं में वंशी लगायी गयी है,जिनका क्रम एक दूसरे से विपरीत दिशा में है। वंशी की संख्या वीम(शहतीर)की लम्बाई पर निर्भर है,जो विषय संख्या में ही होनी चाहिए। और दूसरे चित्र में सिर्फ दो ही वंशी है- जिसे प्रवेश द्वार पर लगाना है। किसी गोल पतले डण्डे में चित्रानुसार बांध देना है। ध्यातव्य है कि अगले भाग में दोनों वंशियों के बीच की दूरी सिर्फ दो अंगुल होगी,और पिछले भाग की दूरी नौ अंगुल।अतः आधारभूत डंडा भी उसी हिसाब से बड़ा-छोटा लेना चाहिए। पीले रंग के रिबन से बाँध कर प्रवेश द्वार पर इसे लटका देना है। स्वाभाविक है कि हवा में हिलता हुआ वंशी का जोड़ा अपनी दिशा भी बदलता रहेगा,किन्तु इसकी चिन्ता नहीं करनी है।बस ध्यान रहे कि बन्धन ऐसा डाला जाय कि अधिक समय तक मुखभाग (दोअंगुल वाला) बाहर ही हो। नकारात्मक ऊर्जा को बाहर भेज कर सकारात्मक ऊर्जा को अन्दर लाना इसका कार्य है। जैसे शरीर के दो नासाछिद्र अपना कार्य करते हैं।


क्रमशः...

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