Tuesday, 27 January 2015

पुण्यार्कवास्तुमंजूषा-97

गतांश से आगे...अध्याय अठारह भाग बारह


3.शिक्षण संस्थानः-शिक्षण संस्थान समाज और राष्ट्र का मेरुदण्ड होता है।भारतवर्ष की परम्परा रही है- गुरुकुल व्यवस्था,जहाँ उच्चातिउच्च शिक्षा और सम्यक् स्वास्थ्य- समदोषः समाग्निश्च,समधातु मलक्रियः, प्रसन्नात्मेन्द्रियमनाः स्वस्थ्य इत्यभिधीयते।(सुश्रुतसंहिता १-२-४४) के अनुसार सर्वांगीण स्वास्थ्य की बात की जाती थी- वह भी सेवाभाव से।शिशा और स्वास्थ्य की जिम्मेवारी राजा की होती थी;किन्तु आज पूर्णरुपेण इनका व्यापारीकरण हो चुका है।उच्च और आधुनिक शिक्षा के नाम पर लूट मचा है,और समझदार कहे जाने वाले वर्ग ही सबसे अधिक लुटे जा रहे हैं।यहाँ मेरा अभीष्ट इसे व्यापारिक खाचें में रखकर वास्तुसम्मत विचार देने मात्र से है।
   शिक्षण-संस्थान के लिए बड़े भूखण्ड की आवश्यकता होती है,तदन्तर्गत कार्यालय,कक्षाएँ,सभागार,छात्रावास,नाट्यशाला,क्रीड़ास्थल,शिक्षक तथा शिक्षकेत्तर कर्मचारियों के आवास,सामान्य औषधालय,भोजन-जलपानादि के लिए अलग-अलग छोटे-बड़े भवनों का निर्माण अपेक्षित होता है।इतना ही नहीं, शिक्षण-संस्थान का परिवेश भी अपने आप में काफी महत्त्व रखता है।भीड़-भाड़-प्रदूषणादि से मुक्त,प्राकृतिक मनोरम वातावरण ही विद्या की अधिष्ठात्री देवी

 सरस्वती को प्रिय है,जहाँ योग्य और अनुशासनमय शिक्षा दी जा सके। शान्तिनिकेतन,नेतरहाट,देहरादून आदि कुछ ऐसे ही वर्तमान शिक्षण संस्थान के उदाहरण हैं।
    शिक्षण संस्थान का निर्माण पूर्णतया वास्तुसम्मत होना चाहिए।यहाँ कुछ खास बातों की चर्चा की जा रही है-
v पूर्व या उत्तर में सिंहद्वार रखते हुए चारो ओर से (किनारों पर)भवन योजना उत्तम है,जिसमें कक्षों के साथ प्रसस्त वरामदा भी हो,ताकि किसी भी मौसम की बाधा झेले वगैर पूरे मंडल में सुविधापूर्वक भ्रमण किया जा सके।
v वरामदे भीतर के साथ-साथ बाहर से भी बनाये जा सकते हैं।
v भवन आवश्यकतानुसार बहुमंजिला(तीन से पांच मंजिल) हो सकता है।इससे अधिक मंजिल भी उचित नहीं।
v मध्य का भाग पूर्णतया रिक्त रहना चाहिए।
v उत्तर और पूर्व में पर्याप्त खाली जगह हो,जिसे क्रीड़ास्थल या अन्यान्य उपयोग में लिया जा सके।इन भागों में किनारे-किनारे मनोरम पुष्पादि लगे हों।
v सिंहद्वार पर लताअशोक(दोनों ओर)लगाये जायें।
v आधुनिक फैशन वाले "पाम" आदि लगाने हों तो पश्चिम-दक्षिण परिसर में (कोनों की ओर)लगाये जा सकते हैं।
v दक्षिण-पश्चिम का परिसर उत्तर-पूर्व की तुलना में अत्यल्प हो,जिसमें कुछ पादप-मात्र लगाये गये हों।
v प्राचार्य-कक्ष,प्रशासनिक कक्ष नैऋत्य क्षेत्र में हो।
v शिक्षकों का विश्राम-स्थल,स्वागत-कक्ष आदि ईशान क्षेत्र में बनाये जायें।
v छात्र-छात्राओं के लिए अलग-अलग प्रसाधन-शौचालय आदि मुख्य नैऋत्य को छोड़कर पश्चिम या दक्षिण में बनाये जायें।
v सेप्टीटैंक मुख्य भवन के अन्दर न होकर परिसर में पश्चिम-दक्षिण या पश्चिम-उत्तर (ठीक कोण को छोड़कर) बनाया जा सकता है,जो भीतर बने प्रसाधन-कक्ष से जुड़ा रहेगा।
v पुस्तकालय नैऋत्य क्षेत्र में ही उत्तम होता है।
v वित्तीय-कार्य-कक्ष उत्तर में प्रसस्त है।
v पाकशाला अग्निक्षेत्र में रखना उत्तम है।
v मुख्य जलस्रोत ईशान में हो।
v कक्षा में शिक्षक पश्चिमाभिमुख रहें,और पूर्वाभिमुख छात्रों को सम्बोधित करने की सुविधा हो तो अति उत्तम।ध्यातव्य है कि यह ऐसी अनुकूल व्यवस्था चारों ओर के भवनों को समान रुप से नहीं मिल पायेंगी,फिर भी यथासम्भव अनुकूलता का प्रयास करना चाहिए।
v छात्रावास में भी छात्रों को पूर्व या उत्तर मुख बैठ कर पढ़ने की सुविधा हो।
v संस्थान में शीशे और खुले रुप में लोहे का प्रयोग कम से कम किया जाय।
v भवन का रंग हल्दिया पीला(वृहस्पति का अनुकूल रंग)सर्वोत्तम है।
v प्रांगण में विद्या की अधिष्ठात्री देवी सरस्वती और विघ्नेश्वर गणेश के लिए समुचित स्थान पूर्व-ईशान-उत्तर क्षेत्र में बनाया जा सकता है।
v कार्यालय,कक्षाओं तथा छात्रावास में महापुरुषों,स्वतन्त्रता सेनानियों आदि के प्रेरक चित्र यथोचित स्थान पर अवश्य लगाये जायें। प्राकृतिक दृष्यों वाले भित्तिचित्र भी बनाये जा सकते हैं।
v जगह-जगह प्रेरणादायक श्लोकों,दोहों,या काव्यात्मक पंक्तियों का भित्तिलेखन भी शिक्षण संस्थान के लिए अति महत्त्वपूर्ण है।
v शिक्षण संस्थान किसी सम्प्रदाय विशेष का नहीं, प्रत्युत राष्ट्रनिर्माता का मन्दिर है,अतः प्रांगण में अनुकूल स्थान पर राष्ट्रियध्वजारोहण हेतु व्यवस्था होनी चाहिए,जैसे कि आवासीय भवन में हनुमद्ध्वजादि हुआ करते हैं।
v शिक्षण संस्थान वृहस्पति का प्रतीक है।अतः इसके नामकरण में भी ध्यान रखना चाहिए कि तदनुकूल ही हों।आम्रपाली,मेनका,उर्वशी, गन्धर्व जैसे शुक्र का प्रतिनिधित्व करने वाले नाम न हों।महापुरुषों, संतों आदि के नाम पर विद्यालय हो सकते हैं।देवताओं के नाम भी उत्तम श्रेणी में हैं।
v आजकल मुखिया,प्रमुख,राजनेता आदि अपने जीवन काल में ही निज नाम पर या अपने पूर्वजों के नाम पर शिक्षण संस्थानों की स्थापना कर देते हैं।एक जीवित व्यक्ति का स्मारक होना कितना हास्यास्पद है- इस पर प्रबुद्ध लोगों का जरा भी ध्यान नहीं।
v तन्त्र–ज्योतिष-वास्तु शास्त्र में नाम-धाम और काम(किसके द्रव्य का उपयोग हुआ)जैसी बातों पर विशेष ध्यान दिया गया है।अतः नाम और व्यक्ति का ध्यान तो अवश्य रखा जाना चाहिए।कुकर्म की कमाई से कम से कम शिक्षण संस्थानों को तो बचाया ही जाना चाहिए; ताकि राष्ट्र का मेरुदण्ड नैतिक रुप से कमजोर न हो।   
v शिक्षण संस्थान का सारा काम- निर्माण पूर्व भूमिपूजन से लेकर, शुभारम्भार्थ प्रवेश-पूजन तक- वास्तुनियमों के अनुकूल किये जायें।
आगे,चित्रों के माध्यम से कुछ और स्पष्ट करने का प्रयास किया जा रहा है-
प्रथम चित्र में एक आदर्श विद्यालय का नमूना प्रस्तुत है,जिसके पूरब और उत्तर में पर्याप्त खाली जगह है।भूखण्ड के पश्चिम-दक्षिण में चारों ओर से भवन बना हुआ है,जिसमें बाहर-भीतर दोनों तरफ वरामदे और मध्य में रिक्तस्थान है। 
दूसरा चित्र चार विभिन्न हिस्सों में बने भवनों का प्रारुप है,जिन्हें अलग-अलग रंगों में क्रमांक क,ख,ग,और घ से दर्शाया गया है,जो क्रमशः अधमाधम हैं। क्रमांक घ को लाल रंग से दिखलाया गया है,क्यों कि इसमें उत्तर और पूर्व में भवन बना हुआ है।यह सर्वाधिक त्रुटिपूर्ण निर्माण है।इसकी अपेक्षा पीले रंग में दर्शित क्रमांक ग किचिंत सही कहा जा सकता है।नीले और हरे रंगों में दर्शित क्रमांक क-ख प्रथम एवं द्वितीय श्रेणी के विद्यालय भवन हो सकते हैं।


तीसरे और चौथे चित्र में U आकार की बनावट है,जो क्रमशः पूरब,पश्चिम,उत्तर, और दक्षिणमुखी है।इनमें पूरब और उत्तरमुख भवन को उत्तम श्रेणी में रखा जा सकता है।पश्चिम मुख वाले को मध्यम एवं दक्षिण मुख वाले भवन को अधम श्रेणी में कहना चाहिए।पश्चिम शनि की दिशा है।शनि मन्दगति वाले ग्रह हैं। फलतः एक ओर तो विद्यालय का विकास मन्द होगा,और दूसरी ओर विद्यार्थियों और शिक्षकों तथा अन्य कर्मचारियों में लेटलतीफी की आदत पनपेगी।अतः ऐसे निर्माण से बचें।दक्षिणमुख भवन तो कतई बनाना ही नहीं चाहिए।उसमें विभिन्न तरह की परेशानियाँ आये दिन आती रहेंगी।अकारण लड़ाई-झगड़े,तोड़फोड़,कानूनी और प्रशासनिक समस्यायें,आगजनी,लापरवाही,यहाँ तक कि चारित्रिक पतन की भी आशंका है।   
चित्रांक ३ 
चित्रांक ४
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क्रमशः....

                   


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