Saturday, 26 July 2014

पुण्यार्कवास्तुमंजूषा 11

 अध्याय८. दिशा-देवता और ग्रह

क्रमांक
दिशायें
देवता
ग्रह
पूर्व
इन्द्र
सूर्य
आग्नेय
अग्नि
शुक्र
दक्षिण
यम
मंगल
नैऋत्य
निर्ऋति
राहुकेतु
पाताल
शेषनाग
शून्य
पश्चिम
वरुण
शनि
वायव्य
वायुदेव
चन्द्रमा
उत्तर
कुबेर
बुध
ईशान
शिव
वृहस्पति
१०
आकाश
शून्य
शून्य


     ज्योतिष शास्त्र में निर्दिष्ट दिशायें दश हैं- चार मुख्य दिशायें-पूरब,पश्चिम, उत्तर,दक्षिण; दिशाओं के बीच के चार कोण-ईशान,अग्नि,नैऋत्य,वायु तथा आकाश एवं पाताल।इन दशों दिशाओं के स्वामी एक-एक देवता हैं।तथा नवग्रहों को भी यथोचित स्थान दिया गया है।ग्रहों के सम्बन्ध में विशेष बात यह है कि राहु और केतु को नैऋत्य कोण में एक साथ स्थान मिला है,या कहें कि राहु-केतु एक दूसरे में विलयित से हैं;एवं आकाश एवं पाताल दिशाओं में किसी ग्रह को स्थान नहीं दिया गया है। वास्तुमण्डल में भी यही स्थिति है।वस्तुतः आकाश और पाताल अपने स्थान पर ही हैं, किन्तु वास्तु-चक्र में आकाश को पूर्व और ईशान के बीच, तथा पाताल को पश्चिम और नैऋत्य के बीच स्थान दिया गया है।इनके देवता क्रमशः ब्रह्मा और अनन्त(शेषनाग) हैं।ऊपर के चक्र में इसे स्पष्ट किया गया है,साथ ही अगले चित्र के माध्यम से और अधिक स्पष्ट करने का प्रयास भी किया गया है।




                           ------()()-----

No comments:

Post a Comment