Monday, 28 July 2014

पुण्यार्कवास्तुमंजूषा-13

नवम् अध्याय का शेषांश... 

अब उक्त कोष्टकों में एक से लेकर पैंतालिस तक निर्धारित पदों को स्थापित किया जा रहा है- अगले चित्रों में।ध्यातव्य है कि किसी भी क्रमांक को चौंसठ पद में अपेक्षाकृत कम स्थान मिलेंगे,एकाशी पद की तुलना में।
जैसा कि ऊपर कहा जा चुका है- ७×७ से १४×१४ कोष्टक वाले वास्तुमंडल यथावश्यक बनाये जाते हैं।इस प्रकार वर्गों(खंडों) की संख्या न्यूनतम उनचास हो, या अधिकतम एक सौ छियानबे,स्थापित देवादि संख्या सभी में पैंतालिस ही होगी, और वाह्य सीमा पर आठों दिशाओं में चरक्यादि अष्ट शक्तियां ही स्थापित होंगी।अन्तर सिर्फ प्रत्येक को मिलने वाले हिस्से का ही होता है।

अतः यहां सबकी चर्चा न करके,मुख्य रुप से प्रयोग में आने वाले चौंसठ एवं एकाशी पद पर ही सभी चर्चायें की जा रही हैं।

      यहाँ दर्शाये गये (ऊपर और नीचे)दोनों चित्रों(चौंसठ एवं एकाशी खंडों वाले वास्तुमंडल)में दिये गये सारणी के अनुसार पैंतालिस देव-पदों को स्थापित करना चाहिए।
    

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