Sunday, 12 November 2017

शाकद्वीपीयब्राह्मणःलघुशोधःपुण्यार्कमगदीपिका- तीसवां भाग

गतांश से आगे...

पन्द्रहवें अध्याय का चौथा भाग...

.संध्या-गायत्री,सूर्योपासना— शास्त्र निर्दिष्ट समय पर उपवीति होकर, नित्य (यथासम्भव त्रिकाल, प्रातः-सायं, या सिर्फ प्रातः अनिवार्यतः) संध्योपासन कर्म अवश्य करे। संध्या का अनिवार्य – अपरिहार्य अंग है— गायत्री जप। इसे अष्टोत्तरशत से लेकर अष्टोत्तरसहस्र तक यथासम्भव साधना चाहिए। संध्या की कई प्रचलित शास्त्रीय विधियां हैं- संक्षिप्त, विस्तृत, अति विस्तृत आदि। सुविधानुसार किसी एक का पालन किया जा सकता है। संध्या-गायत्री के पश्चात् नित्य वा कम से कम साप्ताहिक (प्रत्येक रविवार) एवं सूर्य के विशेष पर्व- छठ, सूर्यसप्तमी आदि अवसरों पर अलोन भोजन व्रत रखते हुए, आदित्यहृदय स्तोत्र का एक वा द्वादश आवृत्ति पाठ अवश्य करे। आदित्यहृदय स्तोत्र भी लधु और वृहत् दो प्रकार का है। दोनों का अपना-अपना महत्त्व है। किसी को कमतर नहीं आंका जा सकता। एक है भविष्योत्तरपुराण का अंश और दूसरा है महर्षि वाल्मीकि रचित।
   सच पूछें तो संध्या-गायत्री का रहस्यमय सूत्र पकड़ा कर ऋषियों ने आत्म-कल्याण का अति सरल-सुगम मार्ग प्रशस्त कर दिया है। किशोरावस्था में ही कुलगुरु द्वारा अध्यात्मविद्या का बीज रहस्यमय ढंग से रोपित कर दिया जाता है हमारे भीतर, जो समय पर स्वतः प्रस्फुटित,पल्लवित,पुष्पित और अन्त में फलित हुए बिना रह ही नहीं सकता। किन्तु अज्ञान में हम इस हीरे को कंकड़ समझ कर त्याग दिये हैं। कुछ बन्धु जो इसे कर भी रहे हैं, तो सिर्फ खानापूर्ति रुप में, न कि रहस्य को जान-समझ कर।
 प्रसंगवश यहां इसके रहस्यों पर किंचित प्रकाश डालने का प्रयास करते हैं। संध्या-विधान के कुछ मुख्य कड़ियों पर ध्यान दें— तिलक,शिखाबन्धन,आसन शुद्धि-बन्धन,प्राणायाम,अघमर्षण,सूर्यार्घ्य,उपस्थान,न्यास,पूर्वमुद्रा,गायत्रीजप,उत्तरमुद्रा, गायत्रीस्तोत्र, हृदय,कवचादि । साधना जगत में पदार्पण करके, सम्यक् गतिशील होने के लिए, उक्त कड़ियाँ प्रशस्त पायदानों की भूमिका में होती हैं। शनैःशनैः आगे बढ़ते हुए, परमलक्ष्य को सहज ही लब्ध किया जा सकता है।
 ध्यातव्य और ज्ञातव्य है कि संसार की जो कोई भी साधना विधि हो—वैदिक हो या तान्त्रिक या उभय,किसी भी पंथ,किसी भी सम्प्रदाय का क्यों न हो, गहराई में झांकेंगे तो एक ही बात मिलेगी,क्यों कि परमात्मा एक ही है। ढूढ़ने-पहुँचने-पाने के रास्ते भले ही अनेक हों। ध्यानयोगी हो या कर्मयोगी,भक्तियोगी हो या अष्टांगयोगी - गहरे में बहुत अन्तर नहीं है। विभिन्न पथ-यात्रियों की अन्तःक्रिया (प्रभाव) लगभग समान होती है।
 संध्या-गायत्री नित्यक्रिया के क्रम में वस्तुतः हम जाने-अनजाने सूर्यतन्त्र की साधना ही कर रहे होते हैं। इसका सीधा प्रभाव कुण्डलिनी महाशक्ति पर पड़ता है। शिखा-सूत्र,तिलक ये सभी किसी न किसी भीतरी नक्शे का स्मरण दिलाते हैं। भले ही इन्हें हम सिर्फ धार्मिक चिह्न (साइनवोर्ड) की तरह उपयोग करते आ रहे हैं। विभिन्न तरह का तिलक लगा कर हम यही प्रदर्शित करना चाहते हैं कि हम अमुख सम्प्रदाय के, अमुक परम्परा के हैं। जबकि इनका वास्तविक रहस्य कुछ और ही है। मूलतः अध्यात्म को इन साइनवोर्डों से कोई वास्ता नहीं है। साधना-पथ पर आगे बढ़ा हुआ साधक इन सारे बाहरी आडम्बरों दिखावे) से विलग हो जाता है। उसे न तिलक की अनिवार्यता प्रतीत होती है, न विभिन्न मालाओं की । सच पूछा जाय तो जिसने अन्तस्थ माला को चैतन्य कर लिया (ज्ञान प्राप्त कर लिया), उसे बाहरी माला की क्या आवश्यकता ! पंचप्राणों को जिसने यामित कर लिया उसके लिए तो जीवन और मृत्यु एक खेल भर है।
अब क्रमशः संध्या की एक-एक मुख्य क्रियाओं पर थोड़ा प्रकाश डालते हैं। संध्यार्थ आसन ग्रहण करने के पश्चात् सर्वप्रथम शिखा-बन्धन करते हैं। इसके मन्त्रों पर ध्यान दें—चित्तरुपिणी महामाये...ये हमारी चेतना ग्रन्थि को उद्दीपित करने की विधि है। फिर भूमध्य में तिलक लगाते हैं। साम्प्रदायिक भेद से, मध्य नासिका से लेकर ललाट के उर्ध्वभाग पर्यन्त तिलक का स्वरुप कुछ भी हो सकता है। तिलक वस्तुतः अन्तर्द्वार का संकेत है। स्मरण है। उद्दीपन है। क्रियाकाल की अन्तःवाह्य सुरक्षा हेतु आचमन,विनियोग,आसन शुद्धि और बन्धन आदि करते हैं। उन ऋषियों के प्रति आभार व्यक्त करते हैं- उनके नाम,गोत्रादि सहित,जिन्होंने ये पथ प्रशस्त किये हमारे लिए। फिर नाम-गोत्र, दिक्, कालादि में स्वयं को संतुलित-व्यवस्थित करने का प्रयास करते हैं- संकल्प पूर्वक । जीवन का मूलाधार- प्राणादि पंचप्राणों को संतुलित-नियन्त्रित करते हैं। वस्तुतः साधना रुपी संयन्त्र का ईंधन है— प्राणायाम के समय क्रमशः ब्रह्मा-विष्णु-महेश का तीन विशिष्ट स्थानों पर ध्यान । ध्यातव्य है कि इसका श्रीगणेश वहीं से होता है, जहां कायगत सूर्य की स्थिति है। इस स्थान को ही योगियों ने संसार कहा है। सतत प्राणायाम की क्रिया सम्पन्न करते-करते साध्य छः चक्रों में तीन की सम्यक् शुद्धि हो जाती है, यानी लगभग आधा काम तो अनजाने में ही, हँसी-खेल में ही सम्पन्न होगया। यहीं पर सूर्य को अर्घ्य अपर्पित करते हैं। उपस्थान से स्वयं को उत्थानित करते हैं, तो विविध न्यासों से चेतना को न्यस्त।
  वेदमाता (ज्ञान की कुँजी, या कहें ज्ञान का प्रमुख स्रोत) गायत्री के विशिष्ट वर्णों द्वारा निरन्तर प्रहार— मूल को चैतन्यकर, परम चैतन्य से जोड़ने का अद्भुत कार्य करता है। जप के पूर्व-पर की विभिन्न मुद्राएं अत्याधुनिक इलोक्ट्रोनिक संयन्त्र के सर्किट डायग्राम से कम हैं क्या !  सर्किट डायग्रामको जिसने ठीक से समझ लिया वो तो अभियन्त्रणा-निष्णात् हो गया । अग्नि, वायु और आकाश का प्रतिनिधित्व करती मध्यमा, तर्जनी और अंगुष्ठ के सहारे सरकता रुद्राक्ष-मनका कब तीन तत्त्वों को समाहृत कर देता है, पता भी नहीं चलता। फिर तो साधने को रह जाता है सिर्फ जल और पृथ्वी । सतत प्रणव-प्रहार से पृथ्वी तो पहले ही द्रवित (मुलायम अर्थ में) हुयी रहती है, जहां किसी बीज का अंकुरण सहज ही सम्भव है।

सच पूछें तो संध्या-गायत्री अप्रकम्पित आधार शिला है, जिस पर सूर्यतन्त्र का साधना-प्रासाद खड़ा होता है। इसकी महत्ता और गरिमा को प्रकाशित करते हुए ऋषि कहते हैं—
विप्रो वृक्षो मूलकान्यत्र संध्या वेदाः शाखा धर्मकर्माणि पत्रम् । तस्मान्मूलं यत्नतो रक्षणीयं छिन्ने मूले नैव वृक्षो न शाखा ।।
संध्या येन न विज्ञाता संध्या येनानुपासिता ।
जीवमानो भवेच्छूद्रो मृतः श्वा चाभिजायते।।                  
(देवीभागवत पुराण११-१६-६,७)
तथाच-
  संध्याहीनोऽशुचिर्नित्यमनर्हः सर्वकर्मसु ।
  यदन्यत् कुरुते कर्म न तस्य फलभाग्भवेत् ।। (दक्षस्मृति २-२७)
  संध्यामुपासते ये तु सततं संशितव्रताः ।
  विधूतपापास्ते यान्ति ब्रह्मलोकं सनातनम् ।। (अत्रि)
   यावन्तोऽस्यां पृथिव्यां हि विकर्मस्थास्तु वै द्विजाः ।
  तेषां वै पावनार्थाय संध्या सृष्टा स्वयम्भुवा ।।
  निशायां वा दिवा वापि यदज्ञानकृतं भवेत् ।  त्रैकाल्यसंध्याकरणात् तत्सर्वं विप्रणश्यति ।। (याज्ञ्यवल्क्य)

  ब्राह्मण रुपी वृक्ष का मूल संध्या है। चारो वेद इसकी शाखाएँ हैं। धर्म-कर्म पत्ते हैं। अतः मूल की रक्षा यत्न से करनी चाहिए,क्यों कि मूल के छिन्न (नष्ट) होने से वृक्ष और शाखा सब कुछ नष्ट हो जायेगा। अस्तु।
क्रमशः...