लोकतन्त्र में ठगविद्या का योगदान

 

लोकतन्त्र में ठगविद्या का योगदान

  आप जानते ही हैं कि हमारे यहाँ पारम्परिक रूप से अनेकानेक विद्याओं का प्रचलन है। आपको ये जानकर हैरानी हो सकती है कि आजकल के वाट्सऐप ग्रूप की तरह तन्त्र-शास्त्र में भी विद्याओं का  एक ग्रूप है, जिसे सिर्फ देवियाँ ही ऑपरेट करती हैं। देवताओं को न तो ग्रूप एडमिन ही बनाया गया है और न उन्हें चैटिंग का ही अधिकार मिला है।  इस अनोखे तन्त्र-ग्रूप को  महाविद्या कहा जाता है। अलग-अलग मन्तानुसार, अलग-अगल तन्त्र-ग्रन्थों में कहीं वारह, कहीं सोलह, तो कहीं बत्तीस महाविद्याओं की चर्चाएं मिलती है ।

किन्तु हमारे सोढ़नदासजी इस बात को लेकर बहुत दुःखी और चिन्तित हैं, क्योंकि किसी मतावलम्बी ने अपनी महाविद्या-सूची में  इस महासंकटमोचक ठगविद्या को शामिल नहीं किया है।  

हालाँकि सोढ़नदासजी समाज अध्ययन के विद्यार्थी नहीं हैं और नहीं होने का कारण, उनकी मूर्खता नहीं बल्कि बुद्धिमत्ता है। उनका कहना है कि समाज-अध्ययन को जब से सोशल-सांयन्स मान लिया गया है, तब से उन्हें इस विषय के प्रति वितृष्णा हो गयी है। भारतीय परम्परागत विज्ञान को  अंग्रेजी वाले सांयन्स मान लिए हैं—यहाँ तक थोड़ी माफी दी जा सकती है, किन्तु मजेदार बात ये है कि इस बचकाने सांयन्स को अब सब के साथ, बिना फेवीकोल के ही चिपका दिया जा रहा है, जैसे पोलीटिकल सांयन्स... । न्यू जेनेरेशन को  ये भलीभाँति पता होना चाहिए कि इस पोलीटिकल सांयन्स का ही हाईब्रीड जेनेरेशन है लोकतन्त्र।

सांयन्स को विज्ञान मानने में सोढ़नदासजी को जो आपत्ति है, उसका कारण स्पष्ट है। उनका मानना है कि भोग और मोक्ष दोनों प्रदान करने वाला विषय ही विज्ञान कहलाने योग्य है, न कि सिर्फ भोग और विनाश का जन्मदाता , महज दो-तीन सौ साल का अनाड़ी बालक— सांयन्स । सांयन्स सांयन्स ही रहेगा और विज्ञान  विज्ञान। विज्ञान को सांयन्स कहना, मानना, सिद्ध करना सिर्फ मूर्खता ही नहीं अज्ञानता भी है, जिसे कतई बरदास्त नहीं किया जा सकता।

लोकतन्त्र के पहरुओं से सोढ़नदासजी का सीधा सवाल है कि विज्ञान को यदि सांयन्स मान ही लिया गया है, तो इस हिसाब से यानी यूनिवर्सललॉ के अनुसार लोकतन्त्र, प्रजातन्त्र, जनतन्त्र, भ्रष्टाचारतन्त्र, उत्पाततन्त्र, आतंकतन्त्र, लव-ज़िहाद-तन्त्र इत्यादि को भी तन्त्रशास्त्र की सूची में क्यों नहीं शामिल किया गया अब तक?

तलवार की बदौलत शासन करने वालों से लेकर मेकालेमन्त्र की जादुई छड़ी चला कर और फिर भानुमती के झूठे पिटारे वाला इतिहास पढ़ा-पढ़ाकर और इनके भी बाद जुमलेबाजी कर-करके कई चुनावी-चरण गुजार देने वाले भी इस अहम मुद्दे पर ध्यान नहीं दिए कभी—ये बड़ी चिन्ता की बात है।

हमें तो दुनिया का भविष्य अन्धकारमय प्रतीत हो रहा है। ठगविद्या को महाविद्या का दर्ज़ा न देना, एटमबम के आविष्कार और प्रयोग से भी कहीं ज्यादा खतरनाक है। विशेषकर लोकतन्त्र को ज्यादा खतरा है।

कलियुग के लिए असली सिद्ध विद्या—ठगविद्या ही है। इसे महाविद्या की सूची में अवश्य शामिल होना चाहिए और लोकतन्त्र को तन्त्र सूची में—इस काम में लापरवाही और भूल कर हम बहुत बड़ी भूल कर रहे हैं।

किन्तु सोढ़नदासजी को खुशी और सन्तोष इस बात को लेकर है कि भले ही तन्त्रशास्त्र में लोकतन्त्र को शामिल नहीं किया गया और न महाविद्या सूची में ठगविद्या को ही पनाह दिया गया अबतक के किसी शासक-प्रशासक द्वारा, परन्तु आधुनिक तन्त्र-साधकों (तान्त्रिकों) ने ठगविद्या को विवाहिता पत्नी की तरह नहीं, बल्कि सहपाठिनी प्रेमिका की तरह अंगीकार कर लिया है। तन्त्र सधे न सधे, ठगविद्या-साधना सबसे सरल है। योग-गुरु कहीं मिलें न मिलें, छोटे-बड़े ठगविद्या-साधना-गुरु हर इलाके में मिल जायेंगे अपने-अपने खेमे में सिंहासन डाले। और यदि किसी को कठिनाई हो रही हो ठगविद्या-गुरु मिलने में तो सोढ़नदासजी का विनम्र सुझाव है कि किसी राजनैतिक खेमे का शरण ले लें। क्योंकि उस खेमें में प्रवेश ही उसी को मिलता है, जो ठगविद्या-सिद्ध होता है।

अपनी इस माँग के साथ ही सोढ़नदासजी निरुक्तकारों और वैयाकरणियों से नतमस्तक होकर क्षमा माँग लिए हैं कि उनके इस मौलिक चिन्तन पर अपने व्याकरण और निरुक्त के नियमों को न लागूँ करें। इस निवेदन के साथ ही दबे ज़ुबान धमकी भी दी है उन विद्वानों को कि अब पतञ्जलि, यास्क. भट्टोजीदीक्षित वाला जमाना नहीं रहा है, जो वैदिक-शास्त्रीय नियमों से चला जाय। जो देश के संविधान से नहीं चलता, वो भला व्याकरण और निरुक्त के नियमों से कैसे चलेगा!

अबतक की बातें तो भूमिका जैसी हो गई, असली बात जो कहना है, वो अब कही जायेगी। कभी-कभी ऐसा भी होता है कि किसी किताब के असली पन्नों  से कहीं ज्यादा उसकी भूमिका और आशीर्वचन के पन्ने ही हो जाते हैं।  

अमेरिकी राष्ट्रपति अब्राहमलिंकन ने सन् 1883 में ही लोकतन्त्र को परिभाषित किया था—Government of  the  people, by the people,  for the people—जनता का, जनता के द्वारा, जनता के लिए शासन— यही लोकतन्त्र  की सर्वमान्य परिभाषा है।

लोकतन्त्र सर्वश्रेष्ठ शासन व्यवस्था है, किन्तु इसमें एक बहुत बड़ी खामी भी छिपी हुई है, ये बात लगता है किसी को समझ नहीं आयी या कहें समझना नहीं चाहा। लोकतन्त्र की रीढ़ है जनता। यानी बहुमत जिसका होगा वही शासक बनेगा। ज़ाहिर है कि जनता जैसी मानसिकता और चरित्र वाली होगी, शासक और शासन-व्यवस्था भी वैसी ही मिलेगी। जनता जागरुक होगी, चरित्रवान होगी, प्रबुद्ध होगी तो निश्चित है कि शासक भी प्रबुद्ध ही होगा, चरित्रवान ही होगा, व्यवस्था भी समुचित होगी। और इसके विपरीत की क्या स्थिति होगी—ये तो हम देख ही रहे हैं।

दो किलो गेहूँ-चावल और अद्धा-पौआ-पाउच पर पाँच वर्षों के लिए उँगली कटवा लेने वाली जनता का बहुमत हो जहाँ, वहाँ का लोकतन्त्र भला कैसा हो सकता है, ये कहने की जरुरत नहीं। दस-बीस हजार रुपये खर्चने से आधारकार्ड, वोटरकार्ड, पैनकार्ड, ड्राईवरी लाईसेन्स जहाँ आसानी से मिल जाता हो, वहाँ का लोकतन्त्र कैसा होगा—ये भी कहना जरुरी नहीं, क्योंकि आप खुद ही समझदार हैं। टैक्सपेयर के बनाए गए वातानुकूलित कक्ष में, नोटों के गद्दे पर जहाँ का न्यायालय आराम फ़रमा रहा हो, वहाँ का लोकतन्त्र कैसा होगा—ये भी आप समझ ही सकते हैं।

सोढ़नदास जी का अहम सवाल यही है ज़ाहिल जनता से कि मुफ़्तखोरी की लत कब छोड़ेगी ? ठगहारी से मुक्त कब होगी ?  ठगविद्या के सिद्धों को कब पटखन्नी खिलायेगी ?  

वोट के लिए नोट, आरक्षण की भीख,  बात-बात पर सब्सीडी — मुफ्तखोरी का वायरल डिजीज़—इन सबसे मुक्ति का उपाय कब सोचेगी जनता ?  

जनता को मालूम होना चाहिए कि ये सब  वोट-बैंक की विधियाँ हैं।  ठगविद्या के गूढ़ कर्मकाण्ड हैं।  

और अन्त में सोढ़नदासजी आपसे ये सवाल कर रहे हैं कि इतनी सारी विशेषताओं के बावज़ूद लोकतन्त्र में ठगविद्या के योगदान को कोई नकार पायेगा? नहीं न !

   #कमलेश पुण्यार्क,

www.punyarkkriti.blogspot.com

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