साधक का द्वन्द्व (आत्ममन्थन का नवनीत)
सातवाँ भाग....गतांश से आगे......पृ.165 से 180 तक
भक्ति की ज्योति
हंसवाहिनी तो सिर्फ वीणापाणी सरस्वती हैं। मैं भला हंसारुढ़ कैसे हो सकता
हूँ ! बाबा ने सपने तो
दिखला दिए, किन्तु सपनों का राजमहल ताश के पत्तों की तरह क्षणभर में ही धराशायी हो
गया। दो क्रमों में बाबा का सुदीर्घ सानिध्य, सुदीर्घ संवाद, सब सपने की तरह आँखें
खुलते ही खत्म हो गए।
काल का पहिया घनघनाकर घूमता रहा। पाँच-छः महीने किधर निकल गए, कुछ पता न
चला। घर-घरनी-घराना की चक्की में पहले की भाँति ही पिसता रहा। मन में मलाल होता
रहा कि समय बीता जा रहा है, कुछ हो नहीं रहा है, कुछ कर नहीं पा रहा हूँ।
रोज रात को नई-नई प्लानिंग करता हूँ, सुबह होते ही, संसारिकता की प्लानिंक
कुछ और ही करने को विवश कर देती है। सिद्धान्ततः तो भलीभाँति समझ गया कि जो कुछ
है, प्रकृति का खेल है , प्रकृति का नृत्य है। इस खेल का दर्शक बन कर रहना है,
खिलाड़ी नहीं। किन्तु ‘न्यूट्रीशन’ की किताब रट लेने से ताकत तो आती नहीं
है। उसके लिए तो विटामिन की गोलियाँ ही खानी होंगी, फल-दूध का सेवन ही करना
पड़ेगा। कुल मिलाकर कहें तो बात वहीं की वहीं अटकी रह गई।
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आज फिर मन बड़ा उदास है। उदासी का कारण है कि औरों का मन नहीं रख पा रहा
हूँ। प्रकृति का दिया एक ‘मन’ भला कितने और मनों को रखे ! अपना ही मन पूरी तरह से रखा नहीं पा रहा है। दूसरे के मनों
का क्या करूँ ! मन के इसी जटिल रख-रखाव के चलते, गोपियों ने
अपना ‘मन’ श्रीकृष्ण को दे डाला
था, सुरक्षित रखने के लिए। और उलाहना भी दिया था कि तुम्हारे पास अपना मन तो है
नहीं। बिना मन वाला भला विरह की वेदना कैसे जाने-समझे...।
पत्नी और बच्चों का मन है कि
प्रयागराज में महाकुम्भ का मेला लगा है। मीडियायी बाबाओं की घोषणा है कि ऐसा सुयोग
पूरे 144वर्षों के बाद आया है और आगे 144वर्षों के बाद ही आयेगा। धर्म-धुरन्धर
सरकार ने अघोषित रूप से रेल-यात्रियों को सुविधा दे रखी है, बिना टिकट यात्रा के
लिए। नतीजन, भीड़भाड़ अनुमान से बहुत ज्यादा है। वैसे भी मुफ़्तखोरी के मरीज़ों की
कोई कमी तो है नहीं हमारे यहाँ। लगे हाथ तीर्थयात्रा का पुण्य भी बटोर लेने में भला कौन चूकना चाहेगा !
किन्तु मैं ऐसा धर्मनिष्ठ हूँ नहीं। पता नहीं धर्म और पुण्य की ऐसी
परिभाषा किस महापण्डित ने समझा रखा है भेड़ों की भीड़ को। मुझे तो संत कवीर की
वाणी ही याद आती है—नहाये धोए क्या भया मन का मल न जाए। मीन सदा जल में रहे, धोए
वास न जाए। धकिया-मुकियाकर, फोकट में तीर्थयात्रा करके, त्रिवेणी में डुबकी
लगा लेने से क्या स्वर्ग मिल जायेगा...? किन्तु भीड़तन्त्र यानी लोकतन्त्र का जमाना है। पत्नी का
कहना है कि आप ही बड़े ज्ञानवान हो गए हैं ! दुनिया पागल है,
जो जा रही है पुण्य लूटने ? आप तो पक्के कँजूस और आलसी हो,
खास कर मेरे लिए तो कभी आपके पास पैसे होते ही नहीं...।
भला इस भाग्यवान को कैसे समझाऊँ मैं कि मेरी डिक्शनरी में पुण्य का ये अर्थ
ही नहीं है। भक्ति भेड़तन्त्र नहीं है। भक्ति के रहस्य को समझना सांख्य और
योगदर्शन से कहीं ज्यादा कठिन है। वर्तमान समय में भक्ति का जो स्वरूप नज़र आ रहा
है समाज में, मेरी समझ से वो भक्ति नहीं, अन्धभक्ति है। सीधे शब्दों में कहूँ तो
पागलपन है। बाबा ने अन्तिम निचोड़ के तौर
पर यही कहा था—ज्ञान के अभाव में और योगानुशासन विहीन भक्ति किसी काम की नहीं।
आज यही विकलता बिना खाए-पीए घर से निकलने को विवश कर दी। कहाँ जाऊँ किधर
जाऊँ...के द्वन्द्व में विष्णुपद मन्दिर की ओर कदम बढ़ चले, किन्तु मन्दिर परिसर
में पहुँचते ही मन उचाट हो गया। क्या जाना उस मन्दिर में, जहाँ पण्डा-पुरोहित-दलालों
की जगघट है। सब अपनी-अपनी दुकान लगाए इन्तज़ार में हैं—कोई मोटा आसामी आ जाए तो
काम बन जाए। बेचारे विष्णु भी परेशान होंगे, एक ही तुलसी पत्र धो-पोंछ कर बार बार
डलिया में सज जाता है, एक ही माला अनेक बार विष्णु-चरणों पर अर्पित होने को विवश
होता है। बाजारवाद सिर पर सवार होकर ताण्डव कर रहा है...। बुदबुदाते हुए वगल की
गली से नदी पार चलने का विचार बना लिया।
किन्तु नदी तट पर पहुँच कर फिर पैर थथमने लगे। नदी के उस पार सामने नागकूट
पहाड़ी और सीताकुण्ड का प्रसिद्ध स्थल बुलावा दे रहा था, जहाँ माता सीता ने हाथ
पसारे दशरथ को पिण्डदान किया था कुशासन पर और स्वसुरजी ने आशीष भी दिया था, उनकी
बुद्धिमत्ता से प्रसन्न होकर, किन्तु पिण्डार्थ कन्द-मूल-फलादि लेकर विलम्ब से आए
श्रीराम ने विश्वास न किया और साक्षियों (गऊ, पहाड़, फल्गुनदी) ने भी सीता को झूठी
करार दे दिया।
ऐसी मिथ्या साक्षी पहाड़ी पर क्या जाना...। कदम फिर मुड़ गए सड़क की ओर।
आगे दक्षिण-पश्चिम कोण पर सिर उठाए उत्तुंग शिखर ने फिर आमन्त्रण भेजा आँखों को। कदम
बढ़ चले उसी ओर।
ये है गयाजी के सर्वोच्च शिखरों की शान—ब्रह्मयोनि पहाड़, जिसके शिखर पर
पहुँचने के लिए कोई चार सौ चौबीस सीढ़ियाँ चढ़नी होती है। लगभग इतना ही ऊँचा एक और
पहाड़ है उत्तर दिशा में—रामशिला। ये दोनों शिखर गयाजी के दो ध्रुवों की भाँति
अविचल, अनवरत संवाद करते रहते हैं भूत और भविष्य की। वर्तमान की दुर्दशा पर
चिन्तित भी रहते हैं, जहाँ शासन-प्रशासन की लापरवाही और आरक्षित समुदाय की
हड़पनीति से बड़ी बदहाली है। बढ़ती आबादी के दबाव में, पहाड़ अब नगर में तबदील
होने की स्थिति में है। इधर कुछ स्वयंसेवकों का ध्यान गया है इस ओर और नष्ट हो रही
वन-सम्पदा को आबाद करने के ‘गिलहरी-प्रयास’ में लगे हैं। फलतः सीताशापित वृक्ष-विहीन
गयाजी के पहाड़ों पर भी थोड़ी हरियाली नज़र आने लगी है। इसी ब्रह्मयोनि की तलहटी
में एक रमणीक उद्यान—ब्रह्मवन बनाया गया है नवयुवकों द्वारा, जो पर्यटकों
को बरबस ही अपनी ओर आकर्षित करते रहता है।
मैं उसी ओर चल दिया। करीब आधी सीढ़ियाँ तय करने के बाद आसपास ही दो प्राचीन
बहुत संकरी गुफाएँ हैं, जिन्हें ‘मातृयोनि’ ओर ‘ब्रह्मयोनि’ के नाम से जाना जाता है। इसी गुफा ने
इस पहाड़ का नामकरण भी सुनिश्चित किया है। ऊपर शिखर पर भव्य मन्दिर है, जहाँ ब्रह्माजी की
मूर्ति स्थापित है। साथ ही अन्य देवताओं
को भी स्थान मिला हुआ है।
खिन्न चित्त ऊपर चढ़ता
चला जा रहा था। ठीक मातृयोनि के करीब से गुजरा, तो पैर अचानक ठिठक गए। लगा कि कोई
अदृश्य शक्ति खींच रही है गुफा के अन्दर से।
अब से पहले भी कई बार
इसके अन्दर जा चुका हूँ। भुक्ति-मुक्ति पुण्यलाभ की आज़माइस में प्रायः लोग उस
संकरी दरार में घुसने का प्रयास करते हैं। किंवदन्ती हैं कि पुण्यात्मा आसानी से पार हो
जाते हैं और पापी बीच में ही अटक जाते हैं दरारों में। ज्यादातर लोग तो हिम्मत भी
नहीं जुटा पाते, क्योंकि अपने कुकर्मों का भय उन्हें घुसने से मना करता है। मैं तो
कई बार आरपार नाप चुका हूँ। इसका ये अर्थ नहीं कि मैं पुण्यात्मा हूँ। सीधा-सपाट
कारण है शरीर का लचीला होना, दुबला-पतला होना।
आसपास की गन्दगी के
अम्बार को नज़रअन्दाज़ करते आगे बढ़ा। मातृयोनि गुफा के अन्दर झाँकने का प्रयास
किया तो भीतर नीली सी रौशनी का आभास हुआ। ऐसी रौशनी पहले तो नहीं थी, हो सकता है
किसी भक्त ने विजली के लट्टू लटका दिए हों, क्योंकि नगरनिगम की कृपा से खम्भे और
तार पहुँच गए हैं यहाँ तक।
अन्दर दाख़िल हुआ तो
वहाँ का अद्भुत दृश्य देखकर आवाक रह गया—छोटी चौकीनुमा शिला पर पद्मासन मुद्रा में
श्वेत संगमर्मर की बनी एक दिव्य मूर्ति है। ये नीली रौशनी उस मूर्ति से ही निकल
रही है। श्रद्धावनत सिर झुक गया मूर्ति के पादपद्म में।
अगले ही क्षण, सिर पर
कोमल हथेली का सुखद स्पर्श पाकर चौंका। उत्सुकता से सिर उठाया तो संगमर्मरी मूर्ति
के स्थान पर साक्षात् बाबा उपद्रवीनाथजी विराजमान नज़र आए।
प्रफुल्लित होकर बोले— “ तीव्र व्यग्रता तो है
तुम्हारे अन्दर, किन्तु हमारे उपदेशों और निर्देशों का समुचित प्रभाव नहीं पड़ रहा
है। क्या कूरूँ क्या न करूँ की संशयात्मक व्यग्रता को समेटकर, किसी खूँटे से तो बाँधना
ही पड़ेगा न मन को। बहुत कुछ करने की तुलना में, कुछ न करना, कहीं ज्यादा कठिन
होता है। कुछ न कुछ तो करते ही रहे हो
इतने दिनों से। अब न करने की आदत डालो। सारे रास्ते तुम्हें दिखलाए जा चुके हैं।
किन्तु हाथ में ब्लूप्रिंट लेकर टहलते रहने से तो काम नहीं चलेगा न ! मंजिल पर पहुँचने के लिए रास्ते पर चलना होता है। और ये काम तो तुम्हें
ही करना है। तुम्हारे बदले कोई और तो कर नहीं सकता। सांसारिक जंजाल के लिए
पत्नी-बच्चे या कोई और दोषी नहीं, दोषी तुम्हारा अपना ही मन है, जो खूँटे से बँधने
से भड़क रहा है। ”
हाथ भर पीछे सरक कर मैं
इत्मिनान से बैठ गया। अपनी अकर्मण्यता पर खीझ हो रही थी, किन्तु क्या उत्तर दूँ !
बाबा ठीक ही कह रहे हैं। रास्ते की जानकारी से रास्ता तय नहीं हो
जाता। सबकुछ सुन-जान लेने के बावजूद कपिल, पतञ्जलि और नारद के द्वन्द्व में उलझा
हूँ। ‘गीता का तोता’ भी है इतने
दिनों से पास में। फिर भी वहीं के वहीं ठिठका हूँ। बाबा से कुछ और पूछने की साहस भी
नहीं जुटा पा रहा हूँ।
मेरे मनोभावों को समझकर
बाबा ने स्वयं पहल किया। कहने लगे— “ उस दिन तो हमलोगों की
बातें पूरी हो ही गई थी। आशा किया था कि अब तुम्हें भटकाव नहीं होगा। किन्तु देखता
हूँ कि अभी भी कुछ जिज्ञासा और द्वन्द्व बचा हुआ है । चलो आज उसे भी समाप्त ही किए
देता हूँ। भक्ति और अन्धभक्ति के बारीक अन्तर को समझ लो तो काम बन जाए।
“ ‘भक्ति’ भारतीय दर्शन और अध्यात्म का सबसे सरल, सुलभ, कोमल, मधुर और निरापद मार्ग है। 'भक्ति' शब्द संस्कृत की 'भज्' धातु से बना है, जिसका
अर्थ है—सेवा करना, प्रेम करना,
भजना या पूरी तरह से लीन हो जाना। ईश्वर
के प्रति परम, निस्वार्थ और अटूट प्रेम का नाम ही भक्ति है। पहले
इसकी सही परिभाषा और स्वरूप को गहराई से समझो। शाण्डिल्य भक्ति सूत्र में
कहा गया है— "सा परानुरक्तिरीश्वरे" अर्थात् ईश्वर के प्रति 'परम अनुरक्ति' (सर्वोच्च और अनन्य प्रेम) ही भक्ति है। नारद भक्ति सूत्र के वचन हैं— "सा त्वस्मिन् परमप्रेमरूपा" अर्थात्
वह (भक्ति) ईश्वर के प्रति परम प्रेम स्वरूपा है। आगे वे कहते हैं कि अमृत स्वरूपा
भी है, जिसे पाकर मनुष्य तृप्त और अमर हो जाता है। भगवान श्री कृष्ण कहते हैं कि मन और बुद्धि को पूरी तरह से ईश्वर
में समर्पित कर देना और हर कर्म को उनके चरणों में अर्पण करना ही सच्ची भक्ति है।
“ ऐसे में सवाल उठ सकता
है कि भक्ति का वास्तविक स्वरूप क्या है? सचपूछो
तो हम भक्ति के वास्तविक स्वरूप को ही नहीं जानते । भक्ति के स्वरूप को लेकर पहले
भी बहुत भ्रान्तियाँ थी, अब तो कहने लायक ही नहीं। जिसे जो मन भाता है, परिभाषा और
स्वरूप गढ़ लेता है। ज्यादातर भक्त तो भगवान को भी इन्सान की तरह घूसखोर, लालची,
स्वार्थी समझ लिए हैं। मन्दिर, मूर्ति, पूजा, उपासना, कर्मकाण्ड सबका अर्थ गलत लगा
लिया है लोगों ने। पावन तीर्थयात्रा पर्यटन बन गया है। मन्दिर भिखारियों का अड्डा
बन गया है—भक्त भक्ति के लिए मन्दिर जाता ही नहीं, वह अकूत सांसारिक कामनाओं की
भीख माँगने के लिए जाता है सिर्फ। या फिर भगवान को घूस देने जाता है, प्रलोभन देने जाता है, ठगने जाता है—मेरा ये काम कर दो भगवान! मैं ये दूँगा...वो दूँगा। अरे मूरख! तुम्हारे पास
अपना है ही क्या जो देने जा रहे हो! किसको देने जा रहे हो, जरा
ये भी तो सोचो। कुछ गिने-चुने भक्त थोड़ा आगे बढ़ते भी हैं भक्ति के सही रास्ते
पर, किन्तु वे भी ईंट-गारे के मन्दिर और पत्थर की प्रतिमा से बाहर निकल ही नहीं
पाते। मूर्ति-पूजा उनके लिए मार्गदर्शिका नहीं, बल्कि बेजान खूँटा बनकर रह जाता
है। मूर्ति के पार वे पहुँच ही नहीं पाते। सच पूछो तो मूर्ति मात्र एक अवलम्ब है अमूर्त
तक पहुँचने के लिए। मूर्ति साधन है, न कि साध्य। नाव नदी पार करने का साधन मात्र है।
नदी पार पहुँचकर तो नाव को छोड़कर ही आगे का रास्ता तय करना पड़ता है—मूर्ति को
भेद कर, अमूर्त को पहचानना पड़ता है और फिर उसमें विलीन हो जाना पड़ता है।
“ अतः भक्ति केवल
पूजा-पाठ या कर्मकाण्ड नहीं है। इसका वास्तविक स्वरूप आन्तरिक रूपान्तरण है,
जिसके मुख्य स्तम्भ हैं—
·
निस्वार्थता— सच्ची भक्ति व्यापार नहीं है। इसमें ईश्वर से सांसारिक सुख, धन या मोक्ष की भी
मांग नहीं होती। भक्त केवल प्रेम के लिए प्रेम करता है।
·
अनन्यता—भक्त का मन संसार की सभी वस्तुओं से
हटकर केवल और केवल अपने आराध्य पर टिक जाता है।
·
पूर्ण समर्पण – इसमें
'मैं' (अहंकार) का पूरी तरह विसर्जन हो जाता है। भक्त स्वयं को ईश्वर की कठपुतली
मानकर उनके विधान में सदा सुखी रहता है।
“ श्रीमद्भागवत महापुराण में भक्त
प्रह्लाद ने भक्ति के नौ रूपों (स्वरूपों) का वर्णन किया है, जिसे 'नवधा भक्ति' कहा जाता है। भक्तिमार्ग में क्रमिक
विकास की विधि है ये —
१.
श्रवण: ईश्वर की महिमा, कथा और नाम को ध्यान से सुनना।
२.
कीर्तन: भगवान के गुणों, नामों और लीलाओं का गान करना।
३.
स्मरण: उठते-बैठते, हर क्षण ईश्वर को याद रखना।
४.
पाद-सेवन: ईश्वर के चरणों की सेवा करना (संसार में हर जीव को ईश्वर का रूप मानकर
उनकी सेवा करना)।
५.
अर्चन: धूप, दीप, पुष्प आदि से
विधिपूर्वक पूजा करना।
६.
वन्दन: ईश्वर के सामने पूरी तरह नतमस्तक होना और कृतज्ञता प्रकट करना।
७.
दास्य: स्वयं को ईश्वर का सेवक या दास मानना । (हनुमत्भाव)
८.
सख्य: ईश्वर को अपना
सबसे प्रिय मित्र मानना (अर्जुन या सुदामा का भाव)।
९.
आत्मनिवेदन: अपने शरीर, मन, बुद्धि और
आत्मा को पूरी तरह ईश्वर को सौंप देना (सर्वोच्च अवस्था)।
“संक्षेप में ये समझो कि भक्ति का सही स्वरूप बाहरी दिखावा
नहीं, बल्कि आन्तरिक भाव है। जब व्यक्ति का हृदय इतना पवित्र
हो जाए कि उसे हर जीव में ईश्वर के दर्शन होने लगें, वही भक्ति
की पूर्णता है।” भक्ति मार्ग में ईश्वर के साथ सम्बन्ध बनाने के लिए ऋषियों
ने पाँच मुख्य भावों (पञ्च भाव) की चर्चा की है। इन भावों के माध्यम से भक्त अपने आराध्य के
सबसे करीब पहुँच जाता है, क्योंकि ईश्वर बाहर कहीं दूर रहने
वाली शक्ति नहीं हैं, बल्कि हमारे ही भीतर विराजमान हैं। इन पाँचों भावों को उनके
स्वरूप और उदाहरण के साथ विस्तार से समझाते हैं—
१. शान्त भाव—इस भाव में भक्त ईश्वर की असीम शक्ति, ऐश्वर्य और ब्रह्माण्डीय
रूप को देखकर शान्त, मौन और विस्मित रहता है। इसमें कोई चञ्चलता
नहीं होती, केवल गहन सम्मान और शान्ति होती है। ईश्वर को
सृष्टि का नियन्ता मानना और उनके प्रति मौन समर्पण रखना ही इस भाव को दृढ़ करता है।
२.
दास्य भाव— यहाँ भक्त स्वयं को एक छोटा सेवक (दास) और ईश्वर को अपना सर्वशक्तिमान
स्वामी मानता है। इस भाव में अहंकार पूरी तरह मिट जाता है और केवल सेवा की इच्छा
बचती है। "स्वामी जो कहेंगे,
मैं वही करूँगा।" पूर्ण आज्ञापालन और समर्पण इसका मूल है।
भक्तप्रवर श्री हनुमानजी का श्री राम के प्रति
भाव, दास्य भाव का अन्यतम उदाहरण है।
३.
सख्य भाव— इस भाव में भक्त और भगवान के बीच की दूरी समाप्त हो जाती है। भगवान को कोई
बड़ा स्वामी या राजा नहीं, बल्कि अपना सबसे पक्का और बराबर का मित्र माना जाता है।
भक्त ईश्वर से रूठ सकता है, उन पर अधिकार जता सकता है और हँसी-मजाक
भी कर सकता है। भयमुक्त प्रेम, समानता का भाव और गहरी
आत्मीयता ही इस भाव का स्वरूप है। अर्जुन और सुदामा का भगवान कृष्ण के प्रति भाव इसका अन्यतम उदाहरण है।
४.
वात्सल्य भाव—इस अद्भुत भाव में भक्त ईश्वर को एक छोटे, अबोध बच्चे के रूप में देखता है। भक्त स्वयं माता या पिता
की भूमिका में आ जाता है और भगवान की देखभाल, सुरक्षा और
लालन-पालन की चिंता करता है। इसका स्वरूप है—ममता, निस्वार्थ
स्नेह और भगवान को हर संकट से बचाने का भाव। माता यशोदा का बाल-कृष्ण के प्रति प्रेम इस भाव के लिए अन्यतम उदाहरण है।
५.
माधुर्य या कान्ता भाव— यह भक्ति की सर्वोच्च अवस्था है। इसमें भक्त ईश्वर को अपना पति, प्रेमी या सर्वस्व मान
लेता है। यहाँ भक्त और भगवान के बीच कोई भी दूरी या पर्दा नहीं रहता। दोनों एकाकार
हो जाते हैं। इसका स्वरूप है—विरह की तड़प, अनन्य
प्रेम और पूर्ण आत्म-विसर्जन। श्री वृषभानु नन्दिनी श्रीराधा सहित व्रज की गोपियाँ
इसके अन्यतम उदाहरण हैं।
“ ....ये पाँचों भाव साधक की अपनी मानसिक और भावनात्मक
प्रकृति पर निर्भर करते हैं। ”
बाबा कहे
जा रहे थे, मैं काष्ठवत वैठा चुपचाप सुने जा रहा था। मेरे चेहरे पर टकटकी लगाए
ह़ुए बाबा कह रहे थे—
“ श्री राधा, मीराबाई और चैतन्य महाप्रभु की भक्ति भारतीय अध्यात्म के इतिहास में 'माधुर्य भाव'
और 'महाभाव' की पराकाष्ठा है। इन तीनों का केन्द्र बिन्दु भगवान श्रीकृष्ण ही हैं,
लेकिन इनके प्रेम की गहराई, स्वरूप और
प्रकटीकरण में अपनी-अपनी अनूठी विशेषताएं हैं। इसे ऐसे
समझो— 1. श्री राधा की भक्ति: 'महाभाव'
और 'ह्लादिनी शक्ति'— वैष्णव दर्शन में श्री राधा केवल एक भक्त नहीं हैं, बल्कि
वे भक्ति का मूल स्रोत हैं। गौड़ीय वैष्णव दर्शन के
अनुसार, राधा जी श्रीकृष्ण की ही 'ह्लादिनी शक्ति' या आनन्द देने वाली ऊर्जा
हैं। वे कृष्ण से अलग नहीं हैं, बल्कि कृष्ण ही प्रेम का आस्वादन
करने के लिए दो रूपों (राधा और कृष्ण) में प्रकट हुए हैं। राधारानी की
भक्ति को 'महाभाव' कहा
जाता है। यह प्रेम की वह सर्वोच्च अवस्था है, जहाँ अपना कोई अस्तित्व नहीं बचता।
इसमें 'स्व-सुख वाञ्छा' (निज सुख की
इच्छा) शून्य होती है और केवल 'कृष्ण-सुख वाञ्छा' (कृष्ण को सुखी देखने की इच्छा) होती है। विरह और मिलन की पराकाष्ठा है
राधा का प्रेम। इनका प्रेम मिलन से अधिक विरह में
चमकता है। विरह में भी वे कण-कण में कृष्ण को ही देखती हैं।
2. मीराबाई की भक्ति—'कान्ता भाव' और 'सामाजिक क्रान्ति' का ज्वलन्त उदाहरण है। मीराबाई
की भक्ति ऐतिहासिक रूप से जीवात्मा की परमात्मा के प्रति अनन्य पुकार है, जो सामाजिक बन्धनों को
तोड़कर प्रकट हुई। मीरा की भक्ति 'कान्ता भाव' या 'पति रूप' की भक्ति है। बचपन में ही
उन्होंने श्रीकृष्ण (गिरधर गोपाल) को अपना पति मान लिया था—"मेरे तो गिरधर गोपाल, दूसरो न कोई।" मीरा की भक्ति में विरह की तीव्र वेदना और लोक-लाज का पूर्ण त्याग है। राजघराने की बहू होने के बावजूद उन्होंने
संतों की संगति की, गली-गली नाचीं और गायीं। उनकी भक्ति में
आत्मसमर्पण इतना गहरा था कि वे राणा द्वारा दिए गए विष को भी कृष्ण का चरणामृत
समझकर पी गईं। श्री राधा स्वतः सिद्धा और कृष्ण की अपनी शक्ति हैं
(नित्य-सिद्धा)। जबकि मीराबाई इस भौतिक संसार के संघर्षों, दुखों
और तानों को झेलते हुए साधना के बल पर कृष्ण में लीन हुईं (साधन-सिद्धा)।
3. चैतन्य महाप्रभु की
भक्ति: 'राधा-भाव' का साक्षात
प्रकटीकरण—चैतन्य महाप्रभु की भक्ति कोई साधारण साधना नहीं थी; दर्शनशास्त्र उन्हें राधा और कृष्ण का संयुक्त स्वरूप मानता है। पौराणिक प्रसंगानुसार स्वयं श्रीकृष्ण यह जानने के लिए व्याकुल थे कि
"राधा मुझसे इतना प्रेम क्यों करती हैं? मेरे प्रेम में
ऐसा क्या सुख है जो राधा को मिलता है?" इसी रस को चखने
के लिए श्रीकृष्ण ने स्वयं श्री राधा के भाव
(राधा-भाव) और उनके स्वर्णिम अंग-कांति (रंग) को
धारण किया और चैतन्य महाप्रभु के रूप में प्रकट हुए। महाप्रभु की भक्ति 'कीर्तन और संकीर्तन' की थी। वे कृष्ण के
विरह में इतने व्याकुल रहते थे कि 'हरे कृष्ण' महामंत्र का जप करते हुए उनकी आँखों से आँसु की धारा बहती रहती थी और वे
मूर्छित हो जाते थे। उन्होंने जगन्नाथ पुरी में अपने जीवन के अन्तिम अठारह वर्ष
पूरी तरह से राधा के विरह-भाव में बिताए। उन्होंने 'अचिन्त्य भेदाभेद' दर्शन दिया और पूरे
विश्व को "नाम-संकीर्तन" (सामूहिक रूप से भगवान का नाम गाना) का सबसे
सरल मार्ग दिया। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि श्री राधा प्रेम का महासागर हैं।
चैतन्य महाप्रभु उसी महासागर के
कृष्ण रूपी अवतार हैं, जो राधा के भाव में डूबकर जगत् को प्रेम बाँटने आए और मीराबाई उसी महासागर की एक बूंद हैं, जिन्होंने कलयुग में यह
दिखला दिया कि एक सामान्य जीव भी यदि चाहे तो राधा-भाव को छूकर कृष्णमय हो सकता
है।
“अब तुम्हें इस अचिंत्य
भेदाभेद दर्शन का रहस्य समझाता हूँ। गौड़ीय वैष्णव सम्प्रदाय के प्रवर्तक श्री
चैतन्य महाप्रभु ने इस अद्भुत दर्शन की स्थापना की। इसका शाब्दिक अर्थ है—वह सम्बन्ध जो 'भेद' और 'अभेद' दोनों है, परन्तु बुद्धि
से परे यानी 'अचिन्त्य' है। यह दर्शन दो विपरीत विचारधाराओं (अद्वैतवाद और द्वैतवाद) का बहुत सुन्दर
समन्वय है। अद्वैतवाद कहता है कि जीव और ब्रह्म
(ईश्वर) एक ही हैं। जबकि द्वैतवाद कहता है कि
जीव और ब्रह्म बिल्कुल अलग हैं। इसके सम्बन्ध में महाप्रभु
का सिद्धान्त कहता है— ईश्वर (परमात्मा) और जीव (आत्मा) एक ही समय में एक
दूसरे से अलग भी हैं और एक भी हैं। इसे समझने के लिए शास्त्रों में दो मुख्य उदाहरण दिए गए हैं—
·
अग्नि और उसकी चिंगारी—जैसे एक विशाल आग से छोटी-छोटी चिंगारियाँ निकलती हैं। तत्व के रूप में
चिंगारी और आग दोनों एक ही हैं (दोनों में गर्मी और प्रकाश है - यह 'अभेद' है)। लेकिन आकार और शक्ति में आग विशाल है और चिंगारी बहुत छोटी है,
चिंगारी आग को नहीं जला सकती (यह 'भेद'
है)।
·
सूर्य और उसकी किरणें –सूर्य की किरण सूर्य का ही हिस्सा है (अभेद), लेकिन किरण स्वयं सूर्य नहीं है (भेद)।
“अब तुम कह सकते हो कि यह
'अचिन्त्य' क्यों है ? अतः इसे ठीक से समझो—मानव मस्तिष्क या
तर्कशास्त्र एक ही समय में किसी चीज़ को पूरी तरह एक और पूरी तरह अलग स्वीकार नहीं
कर सकता। चूँकि ईश्वर की यह शक्ति हमारी बुद्धि की सीमा से परे है, इसलिए इसे 'अचिन्त्य' (जिसे केवल अनुभव किया जा सके, तर्क न किया जा सके)
कहा गया है। इस दर्शन के अनुसार, जीव भगवान का नित्य दास है और
भक्ति के द्वारा ही वह इस दिव्य सम्बन्ध का अनुभव कर सकता है।
“ अब आगे तुम्हें इन
तीनों के तुलनात्मक स्वरूप का दिग्दर्शन कराता हूँ। मीराबाई के पदों में दार्शनिक
जटिलता नहीं है, बल्कि प्रेम
की तरलता और आत्मा का समर्पण है। उनके पदों की
मुख्य विशेषताएं हैं—कांता भाव (पति रूप में स्वीकार करना),
लोक-लाज का त्याग और विरह की तड़प। मीरा की भक्ति में अनन्यता और
पूर्ण समर्पण का भाव है—"मेरो तो गिरधर गोपाल,
दूसरो न कोई। जाके सिर मोर मुकुट, मेरो पति सोई।।” इसका गूढ़ आध्यात्मिक अर्थ है । मीराबाई संसार के सभी रिश्तों से नाता तोड़कर
केवल ईश्वर के साथ अपना अनन्य सम्बन्ध घोषित करती हैं। वे कहती हैं कि जिसने
गोवर्धन पर्वत को अपनी उँगली पर उठाया था (गिरधर), वही मेरा
सब कुछ है। संसार का कोई भी अन्य पुरुष या भौतिक वस्तु मेरी नहीं है। यह पद अचिन्त्य
भेदाभेद के उस रूप को दर्शाता है, जहाँ जीव अपने स्वामी को पहचान चुका है। मीरा की
भक्ति में विरह की चरमावस्था है—"हे री मैं
तो प्रेम दिवानी, मेरो दरद न जाणै कोई। सूली ऊपर सेज
हमारी,सोवण किस बिध होई।।” इस पद में मीराबाई के हृदय की
व्याकुलता प्रकट होती है। वे कहती हैं कि मैं कृष्ण के प्रेम में दीवानी हो चुकी
हूँ, लेकिन संसार के लोग मेरी इस मानसिक और आध्यात्मिक
स्थिति को पागलपन समझते हैं; वे मेरा दर्द नहीं जानते। 'सूली ऊपर सेज' का अर्थ है कि भक्ति का मार्ग कांटों
भरा है (संसार के ताने, राणा का विरोध), ऐसी स्थिति में चैन की नींद कैसे आ सकती है? मीरा की
भक्ति में सर्वस्व त्याग की पराकाष्ठा की झलक मिलती है। लोक-लाज-अहंकार सब कुछ त्याग
चुकी है मीरा। "पग घूँघरू बाँध मीरा नाची रे। लोग
कहै मीरा भई बावरी, न्यात कहै कुलनासी रे।।" समाज और परिवार (न्यात) ने मीरा को 'कुलनासी'
(कुल का नाश करने वाली) कहा क्योंकि वे महलों को छोड़कर संतों के
साथ नाचती थीं। लेकिन आध्यात्मिक दृष्टि से, पैर में घूँघरू
बाँधकर नाचना इस बात का प्रतीक है कि मीरा ने अपने 'अहंकार'
और 'सामाजिक प्रतिष्ठा' की
बेड़ियों को पूरी तरह काट दिया है। जहाँ लोक-लाज खत्म होती है, वहीं से वास्तविक भक्ति की शुरुआत होती है। यदि
तुम ध्यान से देखो, तो चैतन्य महाप्रभु का 'अचिंत्य भेदाभेद दर्शन'
जिस 'राधा-भाव' और कृष्ण-प्रेम की बात सैद्धान्तिक रूप से करता है, मीरा
के पद उसी भाव का व्यावहारिक-जीवन्त रूप हैं। ”
जरा ठहर कर बाबा ने कहा—“अब तुम्हें कलिकाल के
लिए सर्वाधिक सुरक्षित तरणी(नौका) से परिचय करा रहा हूँ। तुम्हें लग सकता है कि ये
तो एक अनपढ़ गवांर भी जानता है, इसमें नई बात क्या है ! तो यही समझो कि सबकी जानकारी ‘शिकारी आयेगा...जाल विछायेगा...दाना डालेगा ...हम नहीं फँसेंगे ’ वाली ही है। असली बात से न तो परिचय है और न जिज्ञासा। अतः कान खोल कर
सुन लो—हरे कृष्ण महामन्त्र केवल कुछ शब्दों का
समूह नहीं है, बल्कि यह सनातन शास्त्रों
में वर्णित कलियुग का सबसे शक्तिशाली और रहस्यमयी ‘ध्वन्यावतार’ है। इन १६ शब्दों और ३२ अक्षरों के मन्त्र का
रहस्य इतना गहरा है कि यह सीधे आत्मा को परमात्मा से जोड़ देता है। बहुश्रुत
लोकचर्चित महामन्त्र है—
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम
हरे राम राम राम हरे हरे।।
“ अब इस महामन्त्र के
प्रामाणिक स्रोत, दार्शनिक अर्थ और छिपे हुए आध्यात्मिक
रहस्यों को विस्तार से समझाते हैं— 1. शास्त्र सम्मत
स्रोत— इस मन्त्र को 'महामन्त्र'
(मन्त्रराज) कहा जाता है। इसका वर्णन कलिसन्तरणोपनिषद् में
मिलता है। कृष्ण यजुर्वेद से सम्बन्धित इस
उपनिषद् में वर्णन है कि जब देवर्षि नारद ने ब्रह्मा जी से पूछा कि "कलियुग के दोषों से पार पाने का क्या उपाय है?" तब ब्रह्मा जी ने उन्हें यह १६ नामों वाला महामन्त्र देते हुए कहा था कि
कलियुग में इससे श्रेष्ठ, सरल और पवित्र उपाय चारों वेदों
में नहीं है। अब महामन्त्र के शब्दों के गूढ़ रहस्य पर
ध्यान दिलाता हूँ—इस महामन्त्र में केवल तीन मूल शब्दों की पुनरावृत्ति है—हरे, कृष्ण और राम। यहाँ 'हरे' का रहस्य है रासेश्वरी श्रीमती
राधारानी। यह 'हरा' शब्द का सम्बोधन रूप
है। 'हरा' भगवान की आन्तरिक आनन्ददायिनीशक्ति
(ह्लादिनी शक्ति) यानी श्री राधा रानी का नाम है। जब हम 'हरे' पुकारते
हैं, तो हम साक्षात् करुणा की प्रतिमूर्ति राधा जी को पुकार
रहे होते हैं। (कुछ विद्वान इसे 'हरी' से
भी जोड़ते हैं, जिसका अर्थ है दुःखों को हरने वाले भगवान)।
दूसरा शब्द 'कृष्ण' का रहस्य
(सर्व-आकर्षक) जानो। संस्कृत में 'कृष्' धातु का अर्थ है आकर्षित करना। कृष्ण वह हैं,
जो अपनी असीम सुन्दरता, प्रेम और माधुर्य से पूरे ब्रह्माण्ड
की आत्माओं को अपनी ओर खींच लेते हैं। वे 'परम पुरुषोत्तम'
हैं। अब तीसरे शब्द 'राम' के रहस्य को समझो। राम यानी आनन्द का स्रोत। 'राम' का अर्थ है वह परम तत्व, जिसमें योगी पुरुष सदा रमण करते हैं और जो असीम
आध्यात्मिक आनन्द का भण्डार है। कृष्ण भक्ति में 'राम'
का तात्पर्य 'राधारमण कृष्ण' (राधा जी को आनन्द देने वाले कृष्ण) या बलराम जी से भी लिया जाता है। जब हम इस महामन्त्र का जप करते हैं, तो आत्मा वास्तव
में एक प्रेम पत्र लिख रही होती है— "हे
दिव्य शक्ति (राधा रानी)! हे सर्व-आकर्षक प्रभु (कृष्ण)! मुझे अपनी भौतिक इच्छाओं
से मुक्त कर अपनी निस्वार्थ प्रेममयी सेवा में लगा लीजिए।" १५वीं शताब्दी से पहले, यह मन्त्र केवल संतों तक ही सीमित था। श्री चैतन्य
महाप्रभु ने इस महामंत्र का एक बड़ा गुप्त रहस्य उजागर किया—उन्होंने
बतलाया कि भगवान और भगवान के नाम में कोई भेद (अन्तर) नहीं है। महाप्रभु ने सिखलाया कि कलियुग में भगवान साक्षात 'नाम' के रूप में अवतरित हुए हैं। जब आप इस मंत्र को शुद्ध भाव से गाते हैं या जपते हैं, तो कृष्ण साक्षात् आपकी जीभ पर नृत्य करते हैं। उन्होंने इस मंत्र को 'नगर-संकीर्तन' (सामूहिक रूप से सड़कों
पर गाना) के माध्यम से जन-जन तक पहुँचाया, जिससे जाति,
पंथ और योग्यता के बन्धन पूरी तरह टूट गए।
“ अब इसके वैज्ञानिक और
मनोवैज्ञानिक रहस्य को समझो—चित्त-दर्पण-मार्जनम् ही इसका रहस्य है। यह ध्वनि तरंग हमारे अवचेतन मन (चित्त) पर
सदियों से जमी जन्म-जन्मान्तर की धूल और वासनाओं को साफ कर देती है। इस मन्त्र के निरन्तर
जप से मस्तिष्क में अल्फा और थिटा तरंगें सक्रिय होती हैं, जो
अत्यधिक तनाव, अनिद्रा और मानसिक चंचलता को समाप्त कर 'साक्षी भाव' और आन्तरिक आनन्द की स्थिति पैदा
करती हैं। इसमें किसी कठिन प्राणायाम या आसन की आवश्यकता नहीं होती, यह 'सहज समाधि' की
स्थिति ला देता है। हरे कृष्ण महामन्त्र का सबसे बड़ा
रहस्य यह है कि यह 'अचिंत्य भेदाभेद' और 'माधुर्य भाव' की चाबी है। इसमें कोई जटिल नियम-कर्मकाण्ड नहीं हैं। इसे किसी भी समय,
किसी भी अवस्था में जपा जा सकता है। यह बुद्धि का विषय नहीं,
बल्कि आत्मा की परम पुकार है।
“ हरे कृष्ण महामन्त्र
का निरन्तर श्रद्धापूर्वक जप करने से दैनिक जीवन में केवल आध्यात्मिक ही नहीं,
बल्कि शारीरिक, मानसिक
और व्यावहारिक स्तर पर भी चमत्कारी और वैज्ञानिक
बदलाव देखने को मिलते हैं। चैतन्य महाप्रभु ने इसे 'चित्त-दर्पण-मार्जनम्' कहा है, यानी मन रूपी शीशे को साफ करने वाला
विज्ञान। अब इसके व्यावहारिक और चमत्कारी प्रभावों को विस्तार से समझाते हैं—
1. मानसिक स्तर पर— तनाव
से मुक्ति—आधुनिक जीवन में हमारा मस्तिष्क हर समय विचारों के जाल में उलझा रहता है।
महामंत्र के ध्वनि कम्पन मस्तिष्क के 'एमीग्डाला' - जो तनाव और डर पैदा
करता है, को शान्त करते हैं। इसके परिणामस्वरूप अत्यधिक चिंता, डिप्रेशन और
गुस्सा धीरे-धीरे पूरी तरह समाप्त हो जाते हैं। मन में एक गहरी और स्थायी शान्ति
का अनुभव होने लगता है।
2. शारीरिक स्तर पर—
अनिद्रा का अन्त और नई ऊर्जा— चूँकि मन सीधे हमारे शरीर को नियंत्रित करता है, इसलिए मंत्र जप का
शरीर पर जादुई असर होता है। जो लोग रात को सोने से पहले महामंत्र का मानसिक जप
करते हैं, उनका पैरासिम्पेथेटिक नर्वस सिस्टम सक्रिय
हो जाता है। फलतः अनिद्रा (Insomnia) की बीमारी ठीक
हो जाती है और बिना दवाओं के गहरी, सुकून भरी नींद आती है।
सुबह उठने पर शरीर आलस्य से मुक्त और असीम ऊर्जा (Vitality) से
भरा हुआ महसूस होता है।
3. बौद्धिक स्तर पर—
निर्णय क्षमता और एकाग्रता— विद्यार्थियों और कार्यक्षेत्र में काम करने वाले लोगों के लिए यह मंत्र एक
मानसिक टॉनिक की तरह काम करता है। मंत्र के 'अक्षरों की पुनरावृत्ति' मस्तिष्क के
दोनों हिस्सों (Left & Right Hemispheres) में संतुलन
बनाती है। इससे ध्यान भटकने की समस्या दूर होती है, एकाग्रता
और याददाश्त कई गुना बढ़ जाती है। व्यक्ति असमंजस से बाहर निकलकर जीवन में सही और
सटीक निर्णय लेने में सक्षम बनता है। इतना ही नहीं, स्वभाव में बदलाव और
सकारात्मक आभा का सृजन होता है। यानी मन्त्र के निरन्तर जप से व्यक्ति के चारों ओर
एक मजबूत सकारात्मक ऊर्जा का क्षेत्र (Positive Aura) बन
जाता है। जब इसका जप होता है, तो व्यक्ति के भीतर से 'तमस' (ईर्ष्या, द्वेष,
अहंकार आदि) नष्ट होने लगते हैं। व्यक्ति की वाणी मधुर हो जाती है
और उसका चेहरा तेजस्वी दिखने लगता है। घर का वातावरण, जहाँ
यह मन्त्र जपा या सुना जाता है, पूरी तरह कलह-मुक्त और शान्तिपूर्ण
हो जाता है। लोग आकर्षित होने लगते हैं और रिश्तों में कड़वाहट दूर होती है।
4. आध्यात्मिक स्तर पर—
बुरी आदतों से सहज मुक्ति— कई लोग अपनी बुरी आदतों (जैसे- नशा, वासना या सोशल मीडिया की लत ) को छोड़ना चाहते हैं, लेकिन
मन के हाथों मजबूर हो जाते हैं। यह मन्त्र इच्छाशक्ति (Will Power) को इतना मजबूत कर देता है कि व्यक्ति को उन बुरी चीजों से अपने आप ही
वैराग्य होने लगता है। इसके लिए कोई जबरदस्ती नहीं करनी पड़ती, बल्कि मन को कृष्ण नाम का इतने ऊँचे स्तर का मधुर रस मिल जाता है कि वह
निचले स्तर के सुखों को अपने आप ही छोड़ देता है। ”
बाबा का उपदेश पूर्ववत जारी था, किन्तु
मुझे अचानक ऐसा लगा कि नींद में हूँ। नींद की सुखद अनूभूति भी है और स्वप्न का
आभास भी। देख रहा हूँ कि बाबा मेरा हाथ पकड़े हुए, बादलों के ऊपर-ऊपर नीले आकाश
में उड़े चले जा रहे हैं। मेरा स्थूल शरीर वहीं ब्रह्मयोनि की मातृगुहा में यथावत
बैठा है—ये भी स्पष्ट देख पा रहा हूँ और ठीक वैसा ही श्वेताभ शरीर बाबा के साथ
उड़ा चला जा रहा है। चारों ओर अद्भुत प्रकाश है, किन्तु सामान्य प्रकाश से बिलकुल
भिन्न है। अपने दूसरे हाथ से इधर-उधर ईंगित करते हुए बाबा कुछ समझा रहे हैं—आसपास
के दृश्यों से परिचय करा रहे हैं। मैं कुछ पूछना चाहा, किन्तु तभी एक झटके के साथ
उनका हाथ छूट गया। ऐसा लगा मानों वे जानबूझ कर झटका दिए हों हाथ छुड़ाने के लिए।
अगली कड़ी की प्रतीक्षा करें>>>>>>>>>
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