बाबू
अकड़ूनाथ
सौभाग्य
या कहें दुर्भाग्य से, इस जन्म के पुण्य-प्रताप से या कहें पिछले जन्म के बचे-खुचे
पाप से, बाबू अकड़ूनाथ से मेरा परिचय बहुत पुराना है। मध्यवर्गीय धर्मनिष्ट
सुबुद्ध परिवार में जन्मे सात भाइयों में ठीक बीच वाले भाई हैं अकड़ूनाथ यानी तीन
आगे और तीन पीछे।
बैलगाड़ी
के चक्के में छः अरों के बीच एक ‘मुठधूरा’ होता है न, जो सभी अरों को आपस में जोड़े रहता
है, ठीक उसी तरह बाबू अकड़ूनाथ मानों छहों अरों के बीच मुठधूरा की भूमिका निभाने
की कव़ायद में हमेशा रहते हैं। ये लालसा और कोशिश ही इनका गुण है और आप चाहें तो
इसे ही इनका दोष भी कह सकते हैं। वैसे भी दार्शनिक दृष्टि से दोष तो कुछ होता
नहीं, जो भी है वह गुण ही है। ठेठ शैली
में कहूँ तो कह सकता हूँ कि सभी भाइयों पर अपना प्रभाव जमाने की कोशिश में रहते
हैं—किसी पर राय-सलाह से, तो किसी पर हुकूमती अन्दाज़ में। परिवार के बड़े-छोटे बाकी सदस्यों के साथ भी कुछ ऐसा
ही व्यवहार रहता है।
ऐसा
नहीं है कि इनमें ऐसी कोई खासियत है, जिसके कारण लोग इनका लोहा मानने को राज़ी
हों, बल्कि यूँ कहें कि लोहा मनवाने की लाईलाज़ मानसिक बीमारी है अकड़ूनाथ को। कहते
हैं न कि ‘पूत के पाँव पालने में ही झलक जाते हैं’।
यही लोकोक्ति चरितार्थ होती हुई सी लगी होगी, इसी कारण गुस्से में लाल, माँ ने
पाँच साल के बच्चे का कान उमेठते हुए नामकरण कर दिया—“अकड़ुआ”। और फिर क्या, वाप-दादे का धरा असली नाम स्कूल की बही तक ही सिमटा रह गया। एक बार अकड़ुआ हो गए, तो हो गए।
घर-बाहर सभी अकड़ुआ कहने लगे। किन्तु हाँ, थोड़ा बड़ा होने पर
किसी ने जरा संस्कारित कर दिया उसी नाम को— बाबू
अकड़ूनाथ।
पुराने ‘नख-शिख-शास्त्र’ के
जानकारों का मानना है कि जिस आदमी की आँखें बहुत छोटी, सिकुड़ी सी होती हैं, वो
आदमी बहुत ही काईयाँ होता है। दूसरे के पेट का चावल-दाल भी गिनने की कोशिश करता है
और अपनी हथेली का हुलिया भी नहीं जताता। क्या-कहाँ-कब-कैसे...सबकुछ रहस्यमय ही रखना
पसन्द करता है।
बचपन में बाबू अकड़ूनाथ पढ़ने-लिखने में ज्यादा क़ाबिल
नहीं थे, तो कोई गदूश़ भी नहीं कहे जा सकते। पढ़-लिखकर आगे बढ़ने की बड़ी ललक
थी । किन्तु नींद पर काबू जरा भी न था। बिना टोक-टाक, छोड़ दिया जाए तो अठारह घंटे
आराम से ख़र्राटे ले लेते। मैट्रिक का रिजल्ट बहुत अच्छा नहीं आया, तो आई.ए.के लिए
पहले से ही डर बन गया। रात भर जागकर पढ़ने की धुन सवार हो गई। इसी बीच किसी मूरख
ने उन्हें नींद न आने वाली दवा सुझा दी। दवा के दुष्प्रभाव से नींद ऐसी भागी कि अब
चाह कर भी चैन से गहरी नींद नहीं ले पाते। ग्रैजुएशन की बाउण्ड्री लाँघते-लाँघते बीसियों
शारीरिक समस्याएं शुरु हो गई। नींद की दवा भी नाकामयाब होने लगी। मज़ेदार बात ये
है कि साथ वाले को भी चैन से समय पर सोने की मनाही करते हैं। ऐन सोने के वक्त कुछ
ऐसी बात निकाल देंगे कि सामने वाला उसी में उलझा रह जायेगा। भोर होते-होते अपने तो
खर्राटे भरने लगेंगे पहरभर दिन चढ़ने तक और अगला, झकमार कर अपनी नित्यक्रिया में
लग जायेगा। यही कारण है कुछ परिचित लोग उनके पास जाने-ठहरने से भी कतराते हैं।
बाबू अकड़ूनाथ की एक और विशेषता है, जो इनके नाम को सार्थक
करने में सहयोगी सिद्ध होता है। आप बातचित भी उनके हिसाब से ही करें। यहाँ तक कि
शरीर का प्राकृतिक बेग—छींक-ढकार-प्रदूषित वायु भी उनके नियम मुताबिक ही निकालें, अन्यथा
आप कोई भी रिस्ते-नाते-उम्र-ओहदे वालें क्यों न हों, आपको तपाक से टोक दिया जायेगा
। खुद खर्राटे इतना भरेंगे कि मुहल्ले वाले की भी बी.पी. बढ़ जाए, किन्तु पासवाले
का सामान्य खुसुर-फुसुर भी बर्दास्त नहीं होता उन्हें। झट से चरक-सुश्रुत-वाग्भट्ट
का ‘स्वस्थवृत्त’ समझाने लगेंगे।
नये जमाने में हर कोई मोबाइल वाला है। अतः उन्हें आगाह
कर देना मुझे जरुरी लग रहा है कि उनके यहाँ पहुँचने के पहले मोबाइल को ‘स्लीप
या वाइब्रेशन मोड’ में डाल
दें, अन्यथा आपका ‘सोशल- हाईजेनिक’ क्लास
लग सकता है। इनके कठोर नियमों का प्रभाव इतना व्यापक है कि चूल्हे पर बैठा प्रेसर-कूकर
भी डरते-डरते सीटियाँ बजाता है। रसोई के बरतनों को भला कहाँ हिम्मत कि धोते-माँजते
वक्त भी वे बेजान धातु जरा भी चीखें-चिलायें। प्राकृतिक हवा-रौशनी भी इनके इज़ाज़त
की ख्वाहिश़मन्द रहती है कमरे में घुसने के लिए।
धर्म-नियम,शुद्धि-अशुद्धि,आचार-विचार,आहार-विहार
सब कुछ अपने हिसाब से तय करते हैं अकड़ूबाबू। इन सबके लिए अपनी ही बनायी परिभाषा
भी है इनके पास। आँगन-चौके की लिपाई भी ‘परकाल-गुनियाँ’ से नापते-परखते हैं। इतना ही
नहीं, इन सारे नियम-संयम वाले अकड़ूबाबू दूसरे की समान्य जीवन शैली, रुचि-अभिरुचि
पर भी बात-बात में ‘क्लास लगाने’ में गहरी अभिरुचि रखते हैं।
संयोग से तन्त्र-मन्त्र-योग सिखाने वाले दो-चार गुरु मिल
गए बाबू अकड़ूनाथ को, जिनमें दो महागुरु तो मौका पाकर चेलिनों से ही सम्बन्ध बना
बैठे। हर
तरह से देखा-परखा ‘लाइफपार्टर’
भला और कहाँ मिलता !
हालाँकि इसमें आश्चर्च की कोई बात नहीं है।
तन्त्र-मन्त्र-योग में तो ये सब माफ ही है। “मद्यं
मांसं च मीनं च, मुद्रा मैथुनमेव च। मकार पञ्चकं प्राहुर्योगिनां मुक्ति दायकम्।। ” — ये
बात तो किसी साधना ग्रन्थ में ही कही गई है न। भले ही कहने वाले ने कुछ और भाव से
कहा हो और समझने वाला कुछ और समझ बैठा हो।
वैसे भी हमारी प्राचीन विद्याओं का ज्यादातर उपयोग
नासमझों ने ही किया है। ज्यादातर समझदार लोग तो ज्ञान-सम्पदा पर ताला लगाने में ही
रह गए।
शहर से योगगुरु के पलायन के बाद खेमा थोड़ा तितर-बितर हो
गया। बाहर कोई मिला नहीं कहने-पूछने, सीखने-सिखाने वाला तो मन बड़ा अकुलाने लगा।
आयुर्विज्ञान कहता है कि अन-पचा हुआ खाद्य ‘आमदोष’ और
वायुविकृति पैदा करता है और मनोविज्ञान कहता है कि अन-पचा हुआ ज्ञान या कहें
जानकारी बड़ा घातक और विस्फोटक होता है। हमेशा बाहर निकलने के लिए व्याकुल रहता
है। न निकल पाए तो तरह-तरह की शारीरिक-मानसिक बीमारियाँ पैदा कर सकता है। आजकल इन
दोनों समस्याओं के शिकार बहुत लोग मिल जायेंगे, यदि आप ढूढ़ना चाहें।
मुझे लगता है कि अकड़ूबाबू के साथ भी यही समस्या है। ज़ाहिर
है कि समस्या का समाधान जरुरी है।
पचे, ना पचे, किन्तु कुछ नौटंकी तो आ ही गई थी महागुरुओं
के सानिध्य में, जिसका रिहर्सल घर-परिवार पर ही करने लगे प्रभाव जमाने के
ख्याल से। पाँच साल के बच्चे से लेकर सत्तर साल की वुढ़िया तक को —कुञ्जल, नेति,
शंख-प्रच्छालन, प्राणायाम, ध्यान सब सिखाने लगे जबरन धड़-पकड़कर। यहाँ तक कि स्वयं
पर रत्ती भर भी नियन्त्रण हो, न हो, भाई-भतीजों को नियन्त्रण का ‘हार्डटास्क’
देने लगे।
एक दिन तो गाँधी को भी मात कर दिए— ‘एक
गाल पर यदि कोई थप्पड़ मारे तो दूसरी गाल को सहर्ष सामने कर दो’। छोटे भाई और
भतीजे को इस बात के लिए पीट-पीट कर घायल कर दिए कि तूने गाल क्यों हटाई जब चाँटा
मारा जा रहा था । छानबीन करने पर पता चला कि बड़े भाई ने उनकी किसी बात पर आनाकानी
कर दी थी, जिसके कारण दो दिनों से काफी उबले हुए थे।
समयानुसार कहीं से प्रेरित होकर ज्योतिष-वास्तु-कर्मकाण्ड
आदि की जानकारी भी बटोर लिए। नतीज़न थोडे ही दिनों में ये सारे के सारे विषय ‘ज्ञान’ बनकर
बिलबिलाने लगे बाहर निकलने को। जैसे ही कहीं मौका मिलता बिन मांगे सुझावों की झड़ी
लगा देते। मज़ेदार बात ये कि पान और गुलाब जैसा पावन पौधा भी उन्हें वास्तुदोष-कारक
ही लगता था। गुलाब में उन्हें सिर्फ कांटे ही कांटे नज़र आए। उसकी खुशबू और
खूबसूरती उन्हें रिझा न सकी। भाई द्वारा कुँए से पानी खींच-खींच कर सींचे गए, वर्षों
से पाले-पोसे सैकड़ों गुलाब नष्ट करवा दिए नौकर को आदेश देकर। चारों ओर फेन्सिंग
पर पसरी पान की बल्लरियों को तहस-नहस करवा दिए। क्यारियों में लगी दुर्लभ
जड़ी-बूटियाँ भी उन्हें ‘वानिकी-वास्तु-दोष-कारक’
प्रतीत हुई।
दरअसल जानकारियाँ बटोर लेने भर से ही ज्ञान नहीं हो
जाता। सौभाग्य से कुछ उपलब्ध हो भी जाए—रगड़घस्स करके, तो उसे कायदे से हज़म करना
बड़ा मुश्किल होता है। तन्त्र-मन्त्र-योग की सिद्धि-सफलता को पचाना तो और भी
मुश्किल होता है।
हालाँकि जानकारियों और ज्ञानार्जन के मामले में ये बिलकुल
ही आम बीमारी है। किन्तु बाबू अकड़ूनाथ में ये बीमारी कुछ ज्यादा ही जोर पकड़ ली
है। इसके कई ज्वलन्त उदाहरण हैं।
उनके ही शब्दों में— “ साधना से शरीर इतना संवेदनशील हो गया कि जान-बेजान हर चीज प्रभावित और विचलित करने लगी है।”
अपनी माँ के प्रति उनके सद्विचार इतने उच्च कोटि के हैं
कि जिस माँ की गोद में पले-बढ़े, उस माँ की रुग्णावस्था के मल-मूत्र में उन्हें
योग-साधना में बाधक ‘हायर रेडियेशन’
मिला।
धन्य है ऐसी साधना !
अकड़ूबाबू को जकड़ूबाबू बनाने में परिवारजनों को बड़ी
परेशानी होने लगी। समय बीता जा रहा था, किन्तु वे शादी-विवाह के बन्धन में जकड़ने
से कतरा रहे थे। बिना नाथ-गरौटी के बैल को वैवाहिक बन्धन में जकड़ना बड़ा
कठिन हो रहा था उन दिनों। दरवाजे पर आए लड़की वालों को बड़ी बेईज्जती का सामना
करना पड़ रहा था इनके स्वभाव से।
हालाँकि काफी मसक्कत के बाद कब्जे में आए, किन्तु क्या
कहा जाए, अकड़ुनाथ के अकड़ से, नाथ-गरौटी इनके वजाय अभागी उस लड़की को ही लगी—सांस
भी इनसे इज़ाज़त लेकर ही छोड़ना पड़ता है बेचारी को। औरत >
पत्नी > अर्द्धांगिनी...कितना बन पायी भगवान जाने, प्रत्यक्षतः ‘24X7X365X…वाली
सेविका’ से ऊपर वाला दर्ज़ा तो नहीं दिखता। हाँ, एक चीज स्पष्ट
दिखती है —पतिपरमेश्वर की शिकायत या कि आलोचना सुनना बिलकुल अच्छा नहीं
लगता। यानी वह अपनी नियति से समझौता कर ली है।
एक बार गलती से दाल में नमक दुबारा पड़ गया और सब्जी में
मिर्चा ज्यादा । उस दिन घर का दृश्य देखने लायक था। औरों को अन्नपूर्णा का सम्मान
सिखलाने वाले अकड़ूबाबू ने क्रोधावेश में भोजन की थाली झन्नाटे के साथ फ़र्श पर
फेंक दी और गृहणी को आदेश दिए कि उन्हें थाली में समेट कर खुद खाए।
‘रोबोर्ट’ की
तरह ‘क्लिकिंग कमांड’ का पालन करने लगी थी बेचारी। आँसू को भी इज़ाज़त नहीं था
बाहर निकलने को । इससे भी अधिक चौंकानेवाली बात है कि इतने पर भी अकड़ूबाबू रुके
नहीं, उनकी योग-साधना ने उन्हें कुछ और करतब दिखाने को प्रेरित किया। अगला आदेश हुआ—सौ
ग्राम नमक और सौ ग्राम हरी मिर्च खाने का। सुयोग कहें कि अगले आदेश का पालन अभी
शुरु ही हुआ था कि कुछ लोग आ धमके बिना पूर्व सूचना के।
कर्मठ, युवा, प्रबुद्ध अकड़ूबाबू अच्छे-अच्छे-मानिन्द
पदों पर बैठे जरुर, किन्तु बहुत टिकाऊ न हुए। बेरोजगार बहुल देश में उन्हें पूर्णतः
बेरोजगार तो नहीं, किन्तु आंशिक बेरोजगार कहने में कोई हर्ज़ नहीं।
पहली बार जीने-खाने भर का काम मिला तो लगा कि ‘कारू का
खजाना’ मिल गया
हो, अल्लादीन का चिराग मिल गया हो। पहले से ही रुखड़ी मूँज की रस्सी में ऐंठन कुछ
ज्यादा ही बढ़ गया।
पारिवारिक स्नेह-सौहार्द्र इतना गहरा कि भाई पर जब
दुर्दिन आए तो अगले दस वर्षों तक उससे बोल-चाल भी न किए। किन्तु हाँ, अपनी ‘तटस्थता
नीति’ के तहत भाभी के जेवर बिकवाने में सहयोगी जरुर हुए । भले
ही बाद में इत्तफ़ाकन मुलाकात हो जाने पर रुआँसे होकर सारा दोष काल्पनिक मन्थरा पर
मढ़ दिए और जीवन में पहली बार अपनी दुर्बुद्धि की स्वीकृति दिए।
बाबूअकड़ूनाथ दयावान इतने हैं कि भतीजे-भतीजियों पर
महीने में दो-चार बेलन तो जरुर ही टूटते। पास के जिस दुकान से वे बेलन खरीदते थे, उत्सुकतावश
उसने एक दिन पूछ ही लिया बेलन टूटने का राज़, किन्तु बेचारे क्या
कहते...मुस्कुराकर रह गए।
रिस्तेदारों में अच्छा कहलाने और प्रभाव जमाने के ख्याल
से ‘गिफ्ट’ खूब बाँटते हैं। समय पर भाई-भतीजों को कुछ-कुछ सहयोग भी
कर देते हैं, किन्तु ताने-उलाहनों का भारी गट्ठर इतना लाद देते हैं कि बेचारों में
कराहने की हिम्मत भी नहीं रहती। उनके उलाहने और उपदेशों से उब कर एक भाई ने तो भाभी
को नौ पन्नों का ‘सूसाईड नोट’
रजिस्टर्ड डाक से भेजकर, खुद गंगा में गोता लगा लिया।
ऐसे महान अकड़ूबाबू के विषय में और कितना कहा जाए ! समाज के आइने में झाँकें तो ऐसे
बहुत से अकड़ू मिल जायेंगे। किस पर कितनी कलम चलायी जाए !
आलोचक-समालोचक कहा करते हैं कि साहित्य ‘स-हित’ होना
चाहिए। यानी समाज के लिए हितकारी होना चाहिए। किन्तु ये मत
तो आलोचकों का है न । अदना लेखक बेचारा क्या करें? आँख-कान बन्द करके कितना रहें? खाँव-खाँव
करते विचारों को, चित्तवृत्तियों को कितना नियन्त्रित करे? आम लेखक में ये क्षमता हो ही जाए यदि
तो वो बाबू अकड़ूनाथ जैसा सिद्ध योगी न बन जाए ।
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