विकास का दौरा
जी
हाँ, आपने विलकुल सही सुना है। पढ़ने वाले से न तो ‘स्लिप ऑफ टंग’
हुआ है और न लिखने वाले से ही ‘स्लिप ऑफ पेन’। ऐसे
में भला सुनने वाले से ‘स्लिप ऑफ साउण्ड’ कैसे हो सकता है !
किन्तु
वास्तव में जो कुछ हुआ है, उसे लिखने-बोलने में भी जरा संकोच हो रहा है। फिर भी कह
ही देता हूँ। हो सके तो आप भी सुने, गुने और औरों को भी
सुनायें।
बेचारे
सोढ़नदास जी ज्यादातर खुद को ‘हाउसअरेस्ट’ यानी ‘कोरेनटाइन’ रखते हैं। पिछले दिनों कोरोना
महामारी के समय लोगों को ‘वर्क फ्रॉम होम’ की लत लगायी गई या कहें लगानी पड़ी। बाद में
हालात सामान्य होने पर भी लोगों की पसन्द बन गई घर बैठे काम निपटाने की।
आप
जानते ही हैं कि ज्यादातर सरकारी दफ्तरों में बाबुओं से लेकर पदाधिकारियों तक की मटरगस्ती
और कामचोरी की लत तो स्वतन्त्रता की अहम पहचान है न ! सरकारी
नौकरियों की मारामारी के पीछे मुख्य दो रहस्य छिपे हैं—कामचोरी और घूसखोरी। जबकि
तीसरा रहस्य जग-ज़ाहिर है—आरक्षणकोटा का विशेषाधिकार। यानी ‘नो टेन्शन फॉर क्वायलिटी एण्ड इन्टेलीजेन्सी’ ।
हालाँकि
हमारे सोढ़नदासजी इन तीनों में कहीं नहीं आते, क्योंकि नौकरी कभी किए नहीं या कहें
समय पर मनोनुकूल नौकरी मिली नहीं। धक्के खाते रहे घर-परिवार से बाहर तक। किसी तरह जीवन गुज़रता गया—थोड़ी सी खेती-बारी
और इने-गिने यजमान। नतीजन, उम्र के एक खास पड़ाव पर आकर उनकी ये आदत सी बन गई— घर
से बाहर न के बराबर निकलने की। जाएँ तो कहाँ जाएँ ! ‘अपडेट-मॉडर्न’ बाबाओं के सामने भला इन्हें कौन
पूछने वाला है ! नाच-कूदकर, झूमर-झुमटा-विरहा गाकर शादी-विवाह,
श्राद्ध, यज्ञ आदि कराना सीखे नहीं। समय के साथ खुद को संवार नहीं सके,
ढोंगढसोशला-ठगहारी की बहती बैतरनी में हाथ धोना आया नहीं, ऐसे में विशुद्ध वैदिक श्लोकों को सुनने का धैर्य भला किस
यजमान में है ! ‘आउटडेटेड’ तो
होना ही पड़ेगा न !
सुसंस्कृत-संयमित
जीवन शैली के कारण कोरोना की जानलेवा बीमारी से तो ‘क्लीनचिट’ पाकर बच गए, किन्तु इधर कुछ दिनों से वे अजीबोगरीब हरकतें करने लगे
हैं। उन्हें विकास का दौरा पड़ने लगा है—ठीक मिर्गी के दौरे की तरह।
बाहर जहाँ कहीं भी अत्याधुनिक विकास का
दृश्य दिखता है, उन्हें जोरदार झटका लगता है और कुछ देर के लिए अचेत हो जाते हैं।
कभी-कभी हाथ-पैर पटकने लगते हैं। सिर पीटने लगते हैं। बकबक भी करने लगते हैं। यही
कारण है कि कभी-कभार मजबूरन ट्रेन-बस से यात्राएँ करनी पड़ती है, तो कोरोना वाले ‘मॉस्क’ को मुँह-नाक के बजाय आँखों पर बाँधकर सीट पर
बैठ जाते हैं, ताकि बाहरी दुर्दशा का दृश्य उनके विचारों को झकझोरे नहीं।
सच
कहें तो वुद्धिमान होने के साथ-साथ विचारवान होना भी बड़ा ही खतरनाक हो गया है
आजकल। फिल्म ‘मेरा नाम जोकर’ के नायक के साथ भी कुछ ऐसी
ही बात हुयी थी—उसका साढ़ेतीन ईंच वाला दिल इतना विशाल हो गया था कि उसमें पूरी
हस्ती समा जाए। नतीजन उस समय के बुद्धिमानों ने उसके दिल को चीर-फाड़कर बाहर निकाल
दिया था। हमारे सोढ़नदासजी की भी कुछ ऐसी ही स्थिति है। खैरियत है कि अभी तक
किसीने इनके दिल का चीर-फाड़ तो नहीं किया है, किन्तु निकट भविष्य में करना पड़ेगा—ऐसा
विचार शुभचिन्तक लोग बना रहे हैं।
दरअसल
‘सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयाः । सर्वे भद्राणि पश्यन्तु, मा
कश्चित दुःख भाग्भवेत्।’ का संदेश देने वाले
आर्यावर्त, जिसे दुर्भाग्यवश अब शकुन्तला पुत्र भरत वाला भारतवर्ष भी नहीं, बल्कि
अंग्रेजों वाला ‘इण्डिया’ कहा
जाने लगा है। इस मॉडर्न इण्डिया को भी नये पैटर्न वाले विकास की बीमारी लग
गई है। मर्दों को चुटिया रखना, तिलक लगाना, धोती पहनना बिलकुल नहीं भाता। इससे भी
ज्यादा बेहाल औरतें हैं—भुतनी सी खुली सेम्पू से घुली फरफराती बालों वालियों के
शरीर पर जितने कम से कम कपड़े हों, उतनी ही ‘मॉडर्नीटी
पैनल पर हाई रैंकिंग’ है उनकी। माँग में सिन्दूर की लाली
रहे ना रहे, काले-थुलथुल होंठ टहाटह लाल दीखने चाहिए। किशोर-किशोरियों के बावत तो
कुछ कहना ही गुनाह है, जो अपने पापा-मम्मी की नहीं सुनते, वो भला पड़ोसी की क्यों
सुनें! दरअसल पहले जमाने में जनक-जननी, माता-पिता हुआ करते
थे। अब तो पाप वाले पापा हैं, डेड डैड हैं और मिस्री सभ्यता वाली ममियाँ,
जिन्होंने खुद ही संस्कृति-सभ्यता तो तिलाँजलि दे दी हो, वो भला नयी पीढ़ी को कहाँ
से संस्कार दे पायेंगे! अब तो उन्हें सुसंस्कार के वजाय कट्सी/विहेवियर सिखाने वाले कन्वेन्टी फादर और सिस्टर हैं
ही। और कन्वेन्ट का अर्थ तो आप जानते ही होंगे—लावारिश/नाज़ायज़ का परवरिश करने वाली संस्था...। भले ही
आपका बच्चा जायज़ है, किन्तु अच्छी शिक्षा के नामपर नाजायज ब्राण्ड वाले
स्कूलों में ही भेजना है।
खैर,
इन दकियानूसी विचारों से भला आज के लोगों को क्या लेना-देना। वो तो पश्चिमी वयार
में उड़ते-पड़ते, औंधेमुँह गिरते चले जाने में यक़ीन रखने वाले लोग हैं। जबकि हमारे
सोढ़नदास जी सत्रहवीं शताब्दी के सोच वाले ठहरे। ऐसे में छत्तीश का आँकड़ा तो
बनेगा ही न !
ट्रेन-बस
की सुविधा रहते हुए, बैलगाड़ी से सफर करने की बात बेमानी है। समसामयिक प्रगति और
विकास बहुत जरुरी है, किन्तु अवांछित, देखादेखी, होड़-तोड़ वाला विकास? मई-जून के महीने में कोई गरमकोट पहने तो हम भी पहनें ! जीरो डिग्री वाला कल्चर अड़तालिस डिग्री वाले देश में ! ये कैसी सोच !! कैसी नकल है भई !!!
सुना
है कि हमारे यहाँ का एक शिष्टमण्डल विदेशी दौरे पर गया था। वहाँ से मॉडर्निटी का
ब्लूप्रिन्ट उठा लाया। आप जानते ही हैं कि हमारे यहाँ राजा-महाराजा सड़कें
बनवाते थे, किनारों पर छायादार वृक्ष लगवाते थे, यात्री विश्राम हेतु निःशुल्क धर्मशालाएँ
बनवाते थे...। भोगवादी विकास के ब्लूप्रिन्ट में ये सारी बातें तो मिली
नहीं। ऐसे में घुटने से ऐँड़ी तक दिमाग रखने वाला शिष्टमण्डल भला क्या दिशा-निर्देश
देता !
सड़क-विस्तार
योजना के तहत पुराने पेड़ दुश्मनों की भाँति तराश दिए गए, जैसे आतंकवादी हमलों में
आमलोग धराशायी किए जाते हैं। बड़, पीपल, गूलर, पांकड़, आम, महुआ के बड़े छायादार पेड़ों
को नष्ट कर, बीच सड़कों पर छोटी-छोटी झाड़ियाँ लगा दी गई, जिसके नीचे आदमी तो
क्या, चूहा भी राहत नहीं महसूस कर सकता भीषण गर्मियों में। ‘जमोट’ डालकर, वरुणदेव की स्थापना किए,
शीतल-सुस्वादु जलपान कराने वाले कुएँ भरे जाने लगे, ताकि विसलरियों का धन्धा फले-फूले।
अतिथि-विश्राम-गृह और धर्मशालाओं की जगह आलीशान होटलों ने अख़्तियार कर लिया, जहाँ
जेब काटने से लेकर, गर्दन काटने तक का धन्धा चलने लगा।
गाँव-गाँव,
नगर-नगर को आपस में जोड़ने के लिए, परिवहन और यातायात की सुविधा के लिए सड़कों और
रेललाइनों की जरुरत तो है, किन्तु सारी कृषि योग्य भूमि पर कोलतार और कंकरीट के ‘हाईवे और एक्सप्रेस वे’ बना डालें ? पचास प्रतिशत भूभागों पर सड़कों और रेलवेट्रैक की जाल बिछा दें !
आँधी
की तरह बढ़ती आबादी के पनाह के लिए सिर पर
छत तो चाहिए ही, किन्तु पेट में कूदते चूहों के लिए चावल-गेहूँ के दाने क्या खूबसूरत
प्लास्टिक के गमलों में उगायें ‘ मार्बल-टाइल्स
लगे ड्राईंगरूमों ’ में सजाकर ? या
भूख की शान्ति ‘फुड ग्रेन्स कैप्सूल’ से करें? सारी ऊर्जा हथियारों की खोज में खपा दें?
अच्छी पैदावार के लोभ में, ‘हाईब्रीड’ के नाम पर असली स्वाद-गुणवाले सभी
बीजों को नष्ट कर दिया है हमने विकास के नाम पर। सुनहरे-पीले के बजाय गुलाबी पपीते
उगाने लगे हैं हम । देशी ‘स्वर्णक्षीरी’ गायों की नस्ल समाप्त प्रायः है। जेनेटिक विकृति वाले गायों की भरमार है।
बछड़ों को मार देते हैं,क्योंकि हल-बैल की जरुरत नहीं रही। ‘हार्मोनिक इन्जेक्शन’ वाले दूध का स्वाद चख रहे
हैं आधुनिकता की आड़ में ।
अनाज
से लेकर फल-सब्जियों तक के पैदावार खूब बढ़ाया हमने । और इसके साथ ही ‘कैन्सर रिसर्च हॉस्पीटल’
और ‘कैन्सर ट्रेन’ भी
हम ही चला रहे हैं। क्या ही काबिलेतारीफ़
विकास किया है हमने !
हरी-भरी
खुशहाल धरती को तो तबाह कर डाला, अब अन्तरिक्ष को भी तबाह करने की होड़ लगी है। पड़ोसी
के यहाँ कंकरीट के जंगल हैं, तो हम भी पेड़-पौधे-पहाड़ों की प्राकृतिक सम्पदा को
नष्ट-ध्वस्त करने की कम्पीटीशन में उतर आए हैं। सीमेन्ट के पेड़-पौधे बनाकर ‘इनडोर गार्डेन’ का लुफ़्त
ले रहे हैं।
कोल्डस्टोरेज़ के रैकों में सजी बोरियों की तरह
या कहें ट्रेन के वर्थ की तरह ‘अपार्मेन्टी’
सभ्यता का अन्धाधुँध चलन, जहाँ न कायदे की रौशनी है और न हवा । जहाँ न अपनी जमीन
है और अपना आसमान
! सिर है, न पैर, वस पेट है। वास्तुमण्डल के ‘ब्रह्मस्थान’ यानी आँगन के ‘कन्सेप्ट’ को तो नासमझों को समझाना पहाड़ से सिर
टकराने के बराबर है। बाप-दादों की पाँच-दस बीघा खेतीहर जमीन बेंचकर, नगर-महानगर में
चटाई भर जमीन वाली कबूतरखानेनुमा फ्लैट खरीदकर लोग ‘भवन
मालिक’ बन रहे हैं। लानत है
तुम्हारी सोच पर भाई !
24X7X365X…जीवन-ऊर्जा-प्रदायी पीपल, वट, तुलसी को उजाड़ कर, बालकॉनी के गमलों में क्रिसमसट्री,
कैरोटन, मनीप्लान्ट और कैकटस उगा रहे हैं—क्या ही ‘अल्ट्रामॉर्डन’ सोच है हमारी !
दरअसल
हमारे विचार ‘कुन्द’ हो गए हैं, दिग्भ्रमित-दिशाहीन हो गए हैं। ‘धर्म’ को ‘रेलीज़ियन’ का पर्याय मान लिए हैं हम। ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ के पावन सूत्र को विसार दिए हैं। हमारा जीवन-दर्शन खो गया है। हरकोई
प्रतियोगी या शत्रु नजर आता है। पड़ोसी का सुख-चैन हमें चैन से रहने नहीं दे रहा
है। पड़ोसी होना पारस्परिक सम्बन्ध है न । हम जिसके पड़ोसी है, वो हमारा पड़ोसी
है। हम बेचैन हैं उसके चैन से, वो बेचैन है हमारे चैन से। सन्तोष के फल में कीड़े
पड़ गए हैं। किन्तु इसे दूर करनेवाले ‘हर्बल पेस्टीसाइड’ की जरुरत है, लैबोरेट्री वाले केमिकल की नहीं।
अपनी
पुरानी सभ्यता, पुरानी सोच, पुरानी समझ—वेदोपनिषद-आरण्यक वाले विचारों को
फिर से पनपाने की जरुरत है। और इसके लिए आवश्यकता है—‘कन्वेन्टी कल्चर’ को समूल
नष्ट करके ‘गुरुकुल’ परम्परा को
पुनर्स्थापित करने की। ‘ब्रह्मास्त्र’ हमें चाहिए, किन्तु अर्जुन वाला, न कि
अश्वत्थामा वाला, कर्ण वाला । अस्तु।
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