साधक का द्वन्द्व (आत्ममन्थन का नवनीत)
तीसरा भाग-- गतांश से आगे......(पृ.31 से 80तक)
“ अब तुम पुनर्जन्म की यात्रा कैसे शुरू होती है, इसे समझो। आगे की
बातों को हम बिलकुल आधुनिक शैली में—मोबाइल, कम्प्यूटर आदि के तकनीकी शब्दों का
प्रयोग करते हुए तुम्हें समझाने का प्रयास कर रहे हैं, ताकि किसी तरह की परेशानी/उलझन न हो। तुम्हें लगता होगा कि एक ही
बात को बारबार अलग-अलग ढंग से क्यों कह रहा हूँ। दरअसल कुछ नई बात कहने के लिए कुछ
पुरानी बात का सहारा लेना पड़ता है, ताकि विषयवस्तु का पुनर्स्मरण हो जाय। आगे की बातों
को तीन चरणों में समझाते हैं—
(क) सूक्ष्म शरीर का 'कोर' (The Composition)-- इस अठारह तत्वों वाले सूक्ष्म शरीर में शामिल हैं—
· बुद्धि (महत्) – निश्चय करने
वाली शक्ति।
· अहंकार – 'मैं' का भाव।
· मन – संकल्प-विकल्प करने वाला।
· दस इन्द्रियाँ (पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ
+ पाँच कर्मेन्द्रियाँ)।
· पाँच तन्मात्राएँ (शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध—जो सूक्ष्म विषय हैं)।
इस सूक्ष्म शरीर को एक पिटारा या 'कंटेनर' के समान समझो, जिसके भीतर हमारे सारे संस्कार (Impression) धर्म-अधर्मादि संचित रहते हैं।
(ख) अब इसे एक अन्य उदाहरण से समझा रहा हूँ—'चित्र' और 'दीवार' का उदाहरण— ईश्वरकृष्ण की सांख्यकारिका (कारिका
४०-४२) में एक बहुत ही सुन्दर
उदाहरण दिया गया है। जैसे कोई चित्र बिना आधार/दीवार के खड़ा नहीं रह सकता, वैसे ही 'पुरुष' (आत्मा) बिना सूक्ष्म शरीर के और सूक्ष्म
शरीर बिना संस्कारों के नहीं रह सकता। मृत्यु के बाद, यह
सूक्ष्म शरीर पुरुष के साथ वैसे ही चलता है जैसे फूलों के पास से गुजरने वाली हवा
अपने साथ सुगन्ध लेकर
चलती है। हवा (पुरुष) निर्लिप्त है, लेकिन वह सुगन्ध
(संस्कार) को ढोए जा रही है।
“ और अब देखो अगली यात्रा का 'सॉफ्टवेयर' (The
Driving Force) कैसे तैयार होता है। तुम पूछोगे कि अगला जन्म कहाँ होगा? कैसे होगा? कैसा होगा? तो ये सब बातें इन दो
चीजों से तय होती है—
·
भाव— जिसे तुम अंग्रेजी में Predispositions कहते
हो। हमारी बुद्धि के धर्म (ज्ञान, वैराग्य, ऐश्वर्य, धर्म और
इनके विपरीत)।
·
कर्माशय— पिछले जन्मों के अनगिनत कर्मों का प्रभाव। सांख्य के अनुसार, प्रकृति एक चुम्बक की तरह काम करती है। जिस पुरुष के सूक्ष्म शरीर में जैसे 'भाव' प्रबल होते हैं, प्रकृति
उसे वैसे ही माता-पिता और वैसा ही नया पञ्चभौतिक शरीर (स्थूल शरीर) उपलब्ध करा
देती है। ”
धन्य हैं, धन्य
हैं महाराज ! आज आप मेरी बहुत सी पुरानी
गुत्थियों को बिलकुल सरल-सहज भाव से, बड़े रोचक ढंग से सुलझा-समझा रहे हैं।
इसके लिए मैं आपका सदा आभारी रहूँगा। सूक्ष्म शरीर के लिए कन्टेनर वाला उदाहरण भी
न्यारा है। किन्तु यहाँ मुझे पुनः जिज्ञासा हो रही है कि पुनर्जन्म का उद्देश्य
क्या है? कर्मों का क्षय कराना या... ?
बाबा मुस्कुराते हुए बोले— “ तुम भूल जाते
हो। 'भोग' और 'अपवर्ग' दोनों उद्देश्य है। दोनों प्रयोजन है। प्रकृति यह सब पुरुष के लिए ही करती
है। पुनर्जन्म का चक्र तब तक चलता है, जब तक भोग यानी पुरुष प्रकृति के
सुख-दुख का अनुभव पूरा न कर ले। और अपवर्ग (मोक्ष) यानी पुरुष को यह अहसास न हो जाए कि "मैं यह सूक्ष्म शरीर नहीं हूँ,
मैं तो केवल द्रष्टा (Observer) हूँ। जिस क्षण
पुरुष को यह विवेक-ज्ञान हो जाता है, सूक्ष्म शरीर का पुरुष के साथ जुड़ाव
खत्म हो जाता है। इसे ही सांख्य में 'मोक्ष' कहते हैं। इसके बाद फिर कोई नया 'डाउनलोड'
(नया जन्म) नहीं होता। यानी तुम्हारे कम्प्यूटर का हार्डडिस्क
ही ब्रेक हो गया। तुम्हारे मोबाइल का मेमोरीचीप्स ही नष्ट हो गया।
“ प्रसंगवश एक रोचक बात और बतला दूँ कि
सांख्य की मान्यता
है कि सूक्ष्म शरीर बहुत ही शक्तिशाली होता है। यह बहुत कुछ कर सकता है। पहाड़ों
के पार जा सकता है। देश-काल की सीमा इसे बाधित नहीं कर सकती। किन्तु इसे अनुभव
करने के लिए एक स्थूल शरीर (Hardware) की जरूरत पड़ती ही है। इस सूक्ष्मशरीर की कुछ और
विशेषताओं पर प्रकाश डालता हूँ। इसे भी ध्यान से सुनो।
“सूक्ष्मशरीर के लिए 'कंटेनर' वाला उदाहरण तुम्हें सटीक लगा। अच्छी बात है। सांख्य दर्शन की सबसे बड़ी विशेषता यही है कि वह
जीवन को विज्ञान की तरह देखता है—जहाँ कुछ भी चमत्कारिक, जादुई
या अचानक जैसा नहीं होता, प्रत्युत हर चीज़ के पीछे एक 'कॉज एंड इफेक्ट' का रहस्य छिपा होता है। चलो, अब तुम्हें इस 'कंटेनर' (सूक्ष्म शरीर) को थोड़े और गहराई से दिखाने का प्रयास करते हैं, क्योंकि इसकी कुछ बातें बहुत ही
विस्मयकारी हैं—
v
यह कभी नष्ट नहीं होता (जब तक मोक्ष न हो)— प्रलय के समय जब
पूरी दुनिया 'डिलीट' हो जाती है,
तब भी यह सूक्ष्म शरीर नष्ट नहीं होता। यह प्रकृति की हार्डड्राइव
में 'बैकअप' की तरह
सुरक्षित रहता है।
v
यह तुम्हारा 'सच्चा इतिहास' है— हमारा स्थूल शरीर
(हाड़-मांस) तो हर जन्म में बदल जाता है—कभी हम पुरुष बनते
हैं, कभी स्त्री, कभी पशु, कभी पक्षी,
कभी कीट-पतंग...। लेकिन यह सूक्ष्म शरीर अनादि काल
से वही चला आ रहा है। इसमें हमारे करोड़ों जन्मों की स्मरण
और संस्कार सूक्ष्म रूप से सुरक्षित पड़े हुए
हैं।
v
संस्कारों की 'कोडिंग'—जिन्हें तुम 'संस्कार' कहते हो, वे वास्तव में इस सूक्ष्मशरीर के भीतर 'सी.डी.इम्प्रेशन'
की तरह अंकित हैं। कुछ वैसे ही, जैसे एक सफेद कपड़े पर अगर इत्र
छिड़क दिया जाए, तो इत्र उड़ जाने के बाद भी उसकी खुशबू
कपड़े के रेशों में रह जाती है। ठीक वैसे ही, कर्म खत्म हो
जाते हैं, पर उनका प्रभाव इस सूक्ष्म शरीर में चिपका रह जाता
है। ”
क्षणभर ठहर कर, बाबा ने गहरी सांस भरी और मेरी ओर गौर से देखते हुए, फिर
शुरु हो गए— “ तुम शायद नहीं जानते, सांख्य
दर्शन के अनुसार, यह सूक्ष्म शरीर ही 'सुख-दुख' का अनुभव करता है, पुरुष नहीं। पुरुष तो केवल उस 'कंटेनर' में लगे विजली के एक बल्ब की तरह है,
जिसका काम सिर्फ उजाला देना है। बल्ब को फर्क नहीं पड़ता कि डिब्बे
के अन्दर सोना रखा है या मिट्टी। किन्तु हाँ, बल्ब के उस उजाले की वजह से वह
डिब्बा (सूक्ष्म शरीर) चमकता हुआ दिखाई देता है। ”
जी महाराज! अब आपकी बातें बिलकुल
घुस रही हैं मेरे दिमाग में। लगता है, आपने कोई कीमती वाला ‘एन्टीवायरस’ अपलोड कर दिया
मेरे कम्प्यूटर में। कृपा करके आगे उस रहस्यमय कन्टेनर— ‘कर्माशय’ के बारे में
समझाएँ। क्योंकि आपकी बातों से मेरी प्यास और-और बढ़ती जा रही है।
बाबाने सिर हिलाया और अपनी हथेली पर हथेली मारते हुए कहने लगे—“ बिलकुल सही कहा तुमने।
ये प्यास बढ़ने ही वाली है। इसे बढ़ने दो। कल्याणकारी ही है ये। सांख्य और योग
दर्शन की शब्दावली में कर्माशय को समझना बहुत जरूरी है, क्योंकि यही हमारे जीवन की 'नियति' तय करता है। इसके बारे में कुछ मुख्य
बातें जान लो—
(क) संचित कर्मों का गोदाम: हम जो भी कर्म
करते हैं (मानसिक, वाचिक या शारीरिक), उसका
फल तुरन्त नहीं मिलता। उसका एक 'संस्कार' बनता है, जो कर्माशय में जाकर जमा हो जाता है।
(ख)
फल देने की तीन स्थितियाँ: कर्माशय से जब फल पक कर बाहर आता है, तो वह तीन रूप लेता है (जिसे योग सूत्र में भी समझाया गया है)—
१.
जाति: यानी किस योनि में
जन्म होगा (मनुष्य, पशु आदि)।
२.
आयु: उस शरीर की उम्र
कितनी होगी।
३.
भोग: जीवन में कितने
सुख और कितने दुख मिलेंगे।
(ग)
पुरुष की तटस्थता: कर्माशय 'प्रकृति' का हिस्सा है, 'पुरुष' का
नहीं। पुरुष केवल इसका द्रष्टा (साक्षी) है। लेकिन अज्ञानता
के कारण पुरुष को लगता है कि "मैं सुखी हूँ" या "मैं दुखी
हूँ", जबकि सुख-दुख के ये अनुभव केवल कर्माशय के फल हैं,
जो बुद्धि में प्रतिबिम्बित हो रहे हैं। ध्यातव्य है कि सांख्य दर्शन के इस वैज्ञानिक
नजरिए ने ही आगे चलकर कर्म सिद्धान्त को इतनी मजबूती दी।
“ आशा है कर्माशय सम्बन्धी
तुम्हारी जिज्ञासा का समुचित समाधान
अब मिल गया होगा। ”—कहते हुए बाबा आँखें मूंदकर मौन हो गए। किन्तु उनके
मौन में भी मुझे कुछ संवाद का भान हुआ।
मैं
पल भर के लिए पुनः संशयग्रस्त हो गया। सूक्ष्मशरीर और उसकी गति पर सवाल उठने लगे, साथ
ही इस बात का भी संशय होने लगा कि क्या सच में साक्षात नूतन कलेवर में
बाबाउपद्रवीनाथजी हमारे समक्ष बैठे सीधे संवाद कर रहे हैं या बाबा का सूक्ष्मशरीर
ही अपना करिश्मा दिखा रहा है।
कुछ
देर इसी ऊहापोह में रहा। किन्तु बाबा ने पुनः जब आँखें खोली, तब मेरी जिज्ञासा ने
नयी करवट ली। मैंने अगला सवाल किया— सूक्ष्मशरीर और कर्माशय पर ही मेरा सवाल है
महाराज ! ‘साधक संजीवनी’ में श्रीरामसुखदासजी ने जिसे संचित
कर्म, प्रारब्ध कर्म और
क्रियमाण कर्म कहा है। इन्हीं तीनों कर्म के प्रकारों को विस्तार से समझना चाहते
हैं विलकुल दार्शनिक अन्दाज में। कर्मरहस्य बड़ा ही जटिल लगता है-- हम करें तो
क्या करें—किं कर्म किमकर्मेति...कर्म, अकर्म, विकर्म, पाप, पुण्य सुकर्म, कुकर्म इत्यादि पर विस्तार से हम चर्चा करना चाहेंगे आपसे।
बाबा
ने सिर हिलाते हुए कहा— “ यह बहुत ही गहन विषय है और बहुत ही महत्वपूर्ण भी। तुमने रामसुखदासजी का
संदर्भ देकर इस संवाद को और भी प्रामाणिक बना दिया । कर्म की गति को समझना वाकई 'गहना कर्मणो गतिः' वाली बात है। सांख्य और
गीता के दार्शनिक दृष्टिकोण से, किन्तु आधुनिक शब्दावली में इसे ऐसे समझो, जैसे
कोई बहुत बड़ा इनवेस्टमेंट पोर्टफोलियो हो। सच पूछो तो इस कर्म के तीन मुख्य विभाग हैं। इसे हम किसानों के घर में
बना कोठिला (मिट्टी का बड़ा पात्र)—'अनाज के गोदाम'
के उदाहरण से समझाते हैं—
·
संचित कर्म (The Warehouse): यह तुम्हारे अनन्त जन्मों के कर्मों का विशाल 'गोदाम' है। तुमने जो भी कर्म किए, वे संस्कार बनकर 'सूक्ष्म शरीर' के 'कर्माशय' में जमा
हो गए। सांयन्स की भाषा में इसे तुम 'पोटेंशियल एनर्जी' कह सकते हो।
·
प्रारब्ध कर्म (The Allotted Portion): संचित कर्मों के उस विशाल गोदाम में से, कर्मों का वह हिस्सा, जो इस जन्म में फल देने के लिए 'पक' गया है, इन्स्योरेंस
पॉलिसी की तरह मेच्योर हो गया है, उसे ही 'प्रारब्ध'
कहते हैं। प्रायः इसे ही हम 'भाग्य'
भी कह देते हैं। जबकि भाग्य इससे बिलकुल भिन्न है। हमारा शरीर,
माता-पिता, बुद्धि, आयु इत्यादि—यह सब प्रारब्ध है। जैसे गोदाम से एक बोरी अनाज रसोईघर में आ गया या कहो
तिजोरी से निकाल कर पैसे पर्स में रख लिए।
·
क्रियमाण कर्म (New Action): जो कर्म हम 'अभी' वर्तमान में कर रहे हैं। यह हमारे हाथ में है। यह आने वाले समय के लिए 'संचित' में जाकर जुड़ जाएगा या प्रारब्ध को
प्रभावित करेगा। या कहो, किसान खेत में नया बीज बो रहा है अभी । फसल तैयार होना
बाकी है।
“ अब तुम्हारी
दूसरी जिज्ञासा पर आता हूँ। तुमने पूछा— कर्म, अकर्म और विकर्म की बात । श्रीकृष्ण ने गीता में कहा था कि किं कर्म किमकर्मेति
कवयोऽप्यत्र मोहिताः। तत्ते कर्म प्रवक्ष्यामि
यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात्।। कर्म क्या है और अकर्म क्या है, इसमें बड़े-बड़े
विद्वान भी मोहित हो जाते हैं। अतः इसे ठीक से समझो—
·
कर्म: जो शास्त्रसम्मत
और कर्तव्य समझकर किए जाएं। ठीक ड्यूटी की तरह ईमानदारी से निभाने वाली बात हुई
यहाँ।
·
विकर्म: जो शास्त्र के विरुद्ध हों, स्वार्थवश किए जाएं या
जिनसे दूसरों का अहित हो। जिन्हें हम 'पाप' या 'कुकर्म' कहते हैं।
·
अकर्म इसे अंग्रेजी में तुम कह सकते हो—The State of Non-Action— सबसे अधिक गहन है इसे समझना । यहीं
लोग प्रायः चूक जाते हैं। इसका अर्थ 'हाथ पर हाथ धरकर बैठ जाना' नहीं है। 'अकर्म' का अर्थ है—कर्म
करते हुए भी उसके कर्तापन (Ego) से मुक्त रहना। जब पुरुष (आत्मा) जान लेता है कि "गुण ही गुणों में बरत रहे हैं,
मैं कुछ नहीं कर रहा", तब वह कर्म 'अकर्म' हो जाता है। वह कर्म 'कर्माशय' में बीज बनकर संचित नहीं होता।
“ और तुम्हारा तीसरा संशय है—पाप-पुण्य, सुकर्म-कुकर्म। इसके विषय में जान लो कि दार्शनिक रूप
से इनका वर्गीकरण गुणों के आधार पर होता है। गुणों के बारे में मैं पहले ही स्पष्ट
कर चुका हूँ। पुनः स्मरण दिला देता हूँ—
v
सुकर्म (पुण्य): जब बुद्धि में 'सत्व गुण' प्रधान होता है। यानी जो दूसरों की सेवा, आत्मज्ञान
और सत्य से प्रेरित होता है। इसका फल 'सुख' और 'ज्ञान' है।
v
कुकर्म (पाप): जब बुद्धि में 'रज और तम' प्रधान होते हैं। यानी जो लोभ, क्रोध और मोहादि से
प्रेरित होता है। इसका फल 'दुःख' और 'अज्ञान' है।
v
निष्काम कर्म: यह सुकर्म से भी ऊँचा है। यहाँ पुण्य की भी इच्छा नहीं
होती। यही मोक्ष का द्वार है।
“ अब कर्मरहस्य
की जटिलता पर प्रकाश डालता हूँ— किं कर्म किमकर्मेति...विचारणीय है। विचारणीय-मननीय
इस कारण है, क्योंकि कर्मरहस्य सच में जटिल है। सांख्य दर्शन कहता है कि "कर्म प्रकृति करती है, पुरुष नहीं।" सारा संकट तब शुरू होता है, जब पुरुष (आप) प्रकृति के सूक्ष्म शरीर के साथ
'तादात्म्य' (Identification) कर
लेता है। जब हम कहते हैं कि "मैं कर
रहा हूँ", तो तुम कर्म के बंधन में फँस जाते हो। अगर तुम
समाधान जानना चाहते हो कि हम करें तो क्या?,
तो इसका उत्तर साफ है— 'कर्तव्य-बोध' । यानी फल की चिंता और 'मैं कर्ता हूँ' के अहंकार को छोड़कर, जो कार्य सामने है, उसे पूरी
कुशलता से करना ही 'सुकर्म' है।
कर्म को परिभाषित करते हुए गीता में श्रीकृष्ण कहते हैं—योगःकर्मषु कौशलम् । ये
बड़ी अद्भुत बात है। कर्म की कुशलता समझ जाओ तो बेड़ा पार समझो।”
मैं फिर घिर गया विचारों के वयार में—सांख्य
की दो धाराओं —‘सेश्वर’ और ‘निरीश्वर’ के संशय में। ईश्वर को मानने वाला सांख्य और
नहीं वाला सांख्य। शब्दार्थ और शव्द विश्लेषण में अटक गया मैं। किन्तु बाबा
मेरे चिन्तन पर ताड़ गए।
मुस्कुराते हुए बोले—“ लगे हाथ
सांख्य के साथ तुम्हें व्याकरण भी पढ़ा ही दूँ। व्याकरण के अनुसार, जब 'अ' या 'आ' के बाद 'इ' या 'ई' आता है, तो दोनों
मिलकर 'ए' हो जाते
हैं। इसे 'गुण संधि' कहते
हैं। स (अ) + ईश्वर (ई) = सेश्वर (जैसे: गण + ईश = गणेश, नृप + ईश = नृपेश) इसलिए 'सीश्वर' नहीं, 'सेश्वर'
शब्द व्याकरण की दृष्टि से शुद्ध है। इसका अर्थ वही है, जो तुमने
समझा— 'स' (सहित) + 'ईश्वर' यानी 'ईश्वर के साथ वाला
सांख्य' । सेश्वर सांख्य बनाम
निरीश्वर सांख्य के बारे में पहले भी समझा
चुका हूँ। तुमने कर्मों के जो प्रकार (संचित, प्रारब्ध,
क्रियमाण) के बारे में पूछा, उनमें भी यही 'सेश्वर' और 'निरीश्वर'
का अन्तर काम आता है।
निरीश्वर सांख्य में कर्म का फल 'प्रकृति'
के नियमों से मिलता है। सेश्वर सांख्य में ईश्वर को 'कर्मफल-प्रदाता' या उस प्रक्रिया का मार्गदर्शक
माना जाता है। ”
मैंने
कहा—महाराजजी ! यही सब गुत्थी सुलझाने में खपता जा रहा
है जीवन । बदली साफ होकर, फिर-फिर घिर आती है। अतः कर्म-सिद्धान्त को जरा और
बारीकी से समझाने की कृपा करें। ‘किसान की कोठिला’ वाला उदाहरण बहुत ही सटीक लगा। कुछ ऐसे ही अन्य उदाहरणों से गुत्थी
सुलझाएँ महाराज ! फिर पाप-पुण्य, स्वर्ग-नरक की गुत्थी
भी सुलझानी ही है।
मेरी जिज्ञासा के आंशिक
व्यवधान के पश्चात् बाबा का व्याख्यान पुनः प्रारम्भ हुआ—“...
सांख्य और गीता के परिप्रेक्ष्य में प्रारब्ध,
संचित और क्रियमाण का सम्बन्ध 'कारण-कार्य' (Cause and Effect) के शाश्वत नियम
पर आधारित है। इसे समझने के लिए हम एक 'धनुर्धर'
का शास्त्रीय उदाहरण लेते हैं, जो
दार्शनिक चर्चाओं में सबसे सटीक माना जाता है—
१. संचित कर्म (The Quiver - तरकश)—एक तरकश की तरह है। धनुर्धर की
पीठ पर जो तरकश टंगा है, जिसमें सैंकड़ों तीर रखे हुए हैं, वही 'संचित कर्म' है।
“ अब इसके दार्शनिक अर्थ
को समझो—अनन्त जन्मों से तुमने जो भी सोचा, विचारा, किया, वे सब के सब संस्कार
बनकर तुम्हारे 'सूक्ष्म शरीर' यानी
कि कर्माशय में जमा हैं। यह तुम्हारे पूर्वकृत समस्त कर्मों का कुल भण्डार है। हालाँकि
यह अभी सक्रिय (क्रियाशील) नहीं है, बस वहाँ संरक्षित है।
२. प्रारब्ध कर्म (The Arrow in Flight - छूटा हुआ तीर)— वह तीर जिसे धनुर्धर छोड़ चुका है और जो अब हवा में है, वही 'प्रारब्ध'
है।
“ अब इसके दार्शनिक अर्थ
को समझो— संचित कर्मों के उस बड़े तरकश में से कुछ तीर (कर्म) इस जन्म के लिए चुन
लिए गए हैं। चूँकि तीर तरकश से ही नहीं, बल्कि धनुष से भी निकल चुका है, इसलिए उसे अब बीच हवा में वापस नहीं बुलाया जा सकता। अश्वत्थामा के
ब्रह्मास्त्र की तरह, जिसे वापसी की विधि
ही नहीं ज्ञात थी।
“ तुम्हारा जन्म कहाँ हुआ, शरीर कैसा है, अचानक मिलने वाले
सुख-दुख—ये सब के सब 'प्रारब्ध'
हैं। इसे ही हम 'भाग्य' कहते
हैं। हालाँकि मतान्तर से ये भाग्य नहीं है। बारीक बातें ये है कि इस तीर पर अब
हमारा सीधा नियन्त्रण नहीं रह गया है। अतः इसे केवल भोगकर ही समाप्त किया जा सकता है। भोगलेना ही इसकी सार्थकता है। भोग ही इसकी
नियति है।
३.क्रियमाण कर्म (The Arrow on the Bow - चढ़ाया हुआ तीर)—
वह तीर जो अभी धनुष पर चढ़ा हुआ है,जिसे छोड़ने की तैयारी चल रही
है। हो सकता है कि किसी कारण वश वह पुनः तरकश में वापस रख दिया जाय। यानी यह तीर
धनुर्धर के पूरे नियन्त्रण में है। यही 'क्रियमाण' है।
“ अब इसके दार्शनिक अर्थ को समझो— यह तुम्हारे 'वर्तमान का पुरुषार्थ' है। तुम अभी इस क्षण जो
निर्णय ले रहे हो, जो विचार कर रहे हो, जो कार्य कर रहे हो वह क्रियमाण है।
“ ध्यान देने वाली और समझने वाली बारीक बात ये है कि यही वह बिंदु है, जहाँ मनुष्य की 'स्वतन्त्र
इच्छा' जिसे तुम Free Will कहते हो, काम करती है। ‘हम तो कठपुतली हैं’—कह कर वच नहीं सकते। क्योंकि क्रियमाण कर्म के लिए तुम
स्वतन्त्र हो। ध्यान रहे— यही क्रियमाण भविष्य के लिए 'संचित' बनाएगा। ”
कर्मरहस्य को प्रकाशित करता यह धनुर्धर-सिद्धान्त
मुझे बड़ा ही अच्छा लगा। किन्तु इससे जुड़ा एक नया सवाल उठ खड़ा हुआ— प्रारब्ध और पुरुषार्थ के संघर्ष
का सवाल—क्या प्रारब्ध बदला जा सकता है?
“ तुम हो बड़े
चतुर, प्रत्युत्पन्नमती भी । ”— बाबा ने हँसते हुए कहा— “ सांख्य के पास
तुम्हारे इस सवाल का भी जवाब है। सांख्य कहता है— प्रारब्ध शरीर के लिए है,
तुम्हारे लिए नहीं ; प्रारब्ध से
अनुकूल या प्रतिकूल परिस्थितियाँ (सुख-दुख) तो आएंगी, लेकिन
उन परिस्थितियों में तुम कैसा व्यवहार करोगे,
यह तुम्हारे 'क्रियमाण' (वर्तमान विवेक) पर निर्भर है। क्रियमाण किंचित् शक्तिशाली भी है। यदि तुम्हारा प्रारब्ध तुमको दुःख दे रहा है, तो तुम्हारा
'क्रियमाण' (विवेक, धैर्य) उस दुःख के प्रभाव
को शून्य वा न्यून कर सकता है। जैसे—धूप (प्रारब्ध) को रोका
नहीं जा सकता, लेकिन छाता लगाकर (क्रियमाण) उससे बचा तो जा
सकता है न ! जंगल में
घूम रहे हो। रास्ते में कांटे हैं। जूता तो पहन ही सकते हो ।
और सर्वप्रमुख बातें हैं कि सांख्य कहता है— जैसे ही 'विवेक ज्ञान' होता है कि "मैं पुरुष (आत्मा) हूँ, शरीर
नहीं", वैसे ही जन्म-जन्मान्तर
का अकूत संचित कर्म जलकर राख हो जाता है। रुई के भण्डार में आग लगाने के लिए माचिस की एक तिल्ली ही काफी है। दीपक
ये नहीं सोचता कि अन्धकार कितना पुराना है। ‘विवेकबोध की चिंगारी’ से संचित के गोदाम में आग लग जाती है।
यहाँ एक और बात पर ध्यान देने की जरुरत है कि यहाँ सिर्फ संचितकर्म ही भस्म
हुआ है। विवेकबोध के परिणाम स्वरूप क्रियमाण भी नया बंधन नहीं बना
पायेगा, किन्तु प्रारब्ध यानी छूटा हुआ तीर अपने गन्तव्य तक जायेगा ही । तब तक जायेगा जब तक वर्तमान
शरीर की गति समाप्त न हो जाए।
संक्षेप में इन बातों को यूँ समझो कि—
v संचित = इतिहास (History)
v प्रारब्ध = वर्तमान परिस्थितियाँ (Environment)
v क्रियमाण = भविष्य का निर्माण (Creation)
क्या अब हम पाप-पुण्य और कर्म-अकर्म के उस पेचीदा मोड़ पर चलें,
जहाँ यह तय होता है कि कौन सा 'क्रियमाण'
हमें बंधन में डालेगा और कौन सा मुक्त करेगा? ”
महाराज ! आपके साथ संवाद करने से बड़ी शान्ति मिल रही है। किन्तु नई जिज्ञासाएँ भी
बारम्बार जन्म ले ही रही है। आदमी बड़ा स्वार्थी होता है। सरल रास्ते पर चलना ही
रुचिकर लगता है। जैसा कि आपने कहा कि क्रियमाण वाला तीर अपने नियन्त्रण में है, लेकिन
प्रारब्ध वाला तीर तो छूट कर परिणाम देगा ही। अतः अब आप कृपा करके मुझे ये समझाएँ कि 'प्रारब्ध'
के कष्टों के बीच 'क्रियमाण' को शुद्ध(सही) कैसे रखा जाए?
अति मुदित मन, बाबा ने कहा— “ यह एक अत्यन्त व्यावहारिक और जीवनोपयोगी प्रश्न है। हालाँकि दार्शनिक रूप
से इसे समझना जितना रोचक और प्रीतिकर है, व्यावहारिक जीवन में इसे उतारना उतना ही कष्टकर और चुनौतीपूर्ण
है। ये समझते हुए भी कि ये प्रारब्ध है, प्रारब्ध जनित परेशानियाँ (रोग-बीमारी,
अपमान, आर्थिक हानि, प्रियजन वियोग इत्यादि)
सामने आते ही हमारा 'क्रियमाण'
(वर्तमान प्रतिक्रिया) सन्तुलन खो बैठता है। दुःख, चिन्ता, क्रोध,
हताशा, निराशा, लोभ इत्यादि से हमारा
क्रियमाण प्रदूषित हो जाता है। अतः सांख्य और गीता के अनुसार क्रियमाण को शुद्ध
रखने के लिए तीन 'मानसिक अस्त्रों' का प्रयोग किया जा सकता है— पहला है—'साक्षी
भाव' (The Witness Attitude)—सांख्य
दर्शन का सबसे बड़ा मन्त्र है—मैं द्रष्टा हूँ, कर्ता नहीं। जब प्रारब्ध जनित किसी प्रकार का कोई
कष्ट आए, तो स्वयं को एक फिल्म देखने वाले दर्शक की तरह देखो
और सोचो—
·
"यह कष्ट मेरे 'सूक्ष्म
शरीर' और 'स्थूल शरीर'
को मिल रहा है, जो कि प्रकृति का हिस्सा है।
मैं (पुरुष) तो केवल इसका प्रकाशक हूँ।
·
जब इस कष्ट के साथ 'तादात्म्य' (Identification) तोड़ (छोड़) देते हैं, तो हमारा क्रियमाण शुद्ध हो जाता है, क्योंकि हम प्रतिक्रिया (Reaction)
के बजाय प्रतिसाद (Response) देना शुरू
कर देते हैं।
दूसरा है—'सत्कार्यवाद' का उपयोग (Acceptance
of Reality)—
सांख्य का सत्कार्यवाद कहता है कि जो हो रहा है, वह पहले से ही कारण
रूप में मौजूद था।
·
कष्ट आने पर यह समझो कि "यह मेरे ही किसी पुराने 'संचित' का पका हुआ फल (प्रारब्ध) है, जो अब समाप्त
हो रहा है।
·
जब हम कष्ट को 'पुराने ऋण का भुगतान' जैसा समझने लगते हैं,
तो मन में शिकायत (Complaining) खत्म
हो जाती है। शिकायत का न होना ही क्रियमाण की शुद्धि है।
तीसरा है— 'विवेक' द्वारा गुणों का संतुलन—प्रारब्ध का कष्ट आने पर मन में प्रायः
'तमस' (उदासी/आलस्य) या 'रजस' (बेचैनी/गुस्सा) बढ़ जाता है।
·
क्रियमाण को शुद्ध रखने का अर्थ है—बलपूर्वक 'सत्व गुण' को ऊपर लाना।
·
स्वामी श्रीरामसुखदासजी कहा करते थे कि परिस्थिति कैसी भी क्यों न हो, "सावधानी" न खोएं। वर्तमान में अपना कर्तव्य (Duty) पूरी
ईमानदारी से करें, भले ही परिणाम अपने पक्ष में न हो।
इसे एक एक व्यावहारिक उदाहरण से समझो—मान लो व्यापार में भारी घाटा
हुआ (यह प्रारब्ध है)।
·
यहाँ अशुद्ध क्रियमाण होगा— हताश, निराश होकर बैठ जाना या किसी को धोखा देने की
सोचना या खुद को कोसना । ध्यान रहे ये सब नया 'संचित'
बिगाड़ देगा)।
·
जबकि शुद्ध क्रियमाण होगा— यह सोचना कि व्यापार में ऊपर-नीचे होते ही रहता है। घाटा
प्रारब्ध था, लेकिन मेहनत करना मेरा धर्म है। शान्त मन से दुबारा
योजना बनाना और नीति पर टिके रहना ही शुद्ध क्रियमाण है। निष्कर्ष ये कि
क्रियमाण को शुद्ध रखने का अर्थ है—प्रारब्ध को 'प्रसाद' की तरह स्वीकार करना और वर्तमान कर्म को 'पूजा' की तरह करना। ऐसा
करने से नया कर्म 'अकर्म' में
बदल जाता है और वह आगे के लिए बन्धन नहीं बनता। वस्तुतः सांख्य की जटिलता का अन्त
इसी व्यावहारिक सरलता में है। ”
बाबा की प्रस्तुति—कर्ममीमांशा बड़ी प्रीतिकर लगी। आगे कुछ कहने को
सोच रहा था, किन्तु कुछ कह न पाया, क्योंकि वे स्वयं मेरे ही मन की बात पर चर्चा
शुरु कर दिए— “ अब हम कर्म के उस रहस्यमय संसार में प्रवेश करने जा रहे हैं, जिसे तुमने 'किं कर्म किं कर्मेति' के माध्यम से पूछा
था। सच पूछो तो ये सब मात्र लोक-व्यवहार के नियम हैं। अतः सांख्य और गीता
के चश्मे से पाप-पुण्य, सुकर्म-कुकर्म
और अकर्म का दार्शनिक विश्लेषण पुनः इस प्रकार समझाता हूँ —
१. सुकर्म और कुकर्म (The Quality of Action)—
लोक-व्यवहार
में जिसे हम 'अच्छा' और 'बुरा' काम कहते हैं, सांख्य उन्हें 'गुणों' के आधार
पर देखता है। तुमको पहले भी बता चुके हैं कि गुण तीन हैं—सत्व, रज, तम ।
v सुकर्म (सत्व प्रधान): वे कर्म जो विवेक,
दया और निस्वार्थ भाव से किए जाते हैं। इनका उद्देश्य दूसरों का हित
और स्वयं की शुद्धि मात्र है।
v कुकर्म (रज-तम प्रधान): वे कर्म जो केवल काम,
क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर और अहंकार के वशीभूत होकर किए जाते हैं।
२. पाप और पुण्य (The Ledger of Karma)—पाप और पुण्य कर्मों के 'फलों' (परिणामों) के नाम हैं—
Ø पुण्य— सुकर्म करने से
बुद्धि में जो 'प्रकाश' और 'सुख' का संस्कार बनता है, वह
पुण्य है। यह ऊर्ध्वगति (Higher evolution) देता है।
Ø पाप—कुकर्म करने से जो 'अंधकार' और 'दुःख' का बीज कर्माशय (जिसके लिए पहले कॉन्टेनर का उदाहरण
दिया जा चुका है) में जमा होता है, वही पाप है। यह हमेशा अधोगति
(Lower evolution) ही देता है।
यहाँ यह ध्यान देने वाली बात है कि सांख्य कहता है कि पुण्य 'सोने की जंजीर' है और पाप 'लोहे की जंजीर',
लेकिन हैं तो दोनों जंजीरें ही, क्योंकि दोनों
ही पुरुष को जन्म-मरण के चक्र में बाँधे रखती हैं। अब ये बात अलग है कि तुम एक को
सोने का कंगन समझे बैठे हो और दूसरे को लोहे की हथकड़ी। सांख्य की दृष्टि में ये
दोनों एक समान घातक(बन्धक)हैं।
३. कर्म, विकर्म और अकर्म (The Secret of Liberation)— यहाँ श्रीकृष्ण का गीक्तोक्त ‘कर्मरहस्य’ अपने शिखर पर
है—
v
कर्म: जो हमारा नियत
कर्तव्य (Duty) है।
v
विकर्म: जो 'निषिद्ध' है,
यानी जो लोकव्यवस्था और धर्म के विरुद्ध है।
v
अकर्म (Inaction
in Action): यह सबसे
महत्वपूर्ण है। जब मनुष्य कर्म तो करता है, लेकिन दो चीजों
का त्याग कर देता है— 'कर्तापन का अभिमान' (मैं कर रहा हूँ) और 'फल की आसक्ति' (मुझे यह मिलना ही चाहिए), तब वह कर्म 'अकर्म' हो जाता है।
Ø ध्यातव्य है कि ऐसा कर्म 'कर्माशय' में कोई नया बीज नहीं बोता। जैसे भुना हुआ बीज (Roasted seed) दुबारा नहीं उग सकता, वैसे ही 'अकर्म' की अग्नि में जले-भुने हुए कर्म नया जन्म
नहीं देते।
४.
"किं कर्म किं कर्मेति..." का समाधान— अब यदि तुम यहाँ इस संशय में हो कि क्या सही है और क्या गलत, तो सांख्य का 'विवेक-ख्याति' (Discrimination) मार्ग
दिखाता है—
·
यदि कर्म करते समय मन में शान्ति (सत्व) है,
तो वह सुकर्म है।
·
यदि मन में अशान्ति और उद्वेग (रजस/तमस) है, तो वह कुकर्म की
श्रेणी में आ सकता है।
निष्कर्ष के तौर पर कहेंगे कि सांख्य हमें 'पाप-पुण्य' से भी ऊपर उठकर 'शुद्ध पुरुष' होने की प्रेरणा देता है। ”
गूढ़ और जटिल विषय पर बाबा का सरल-सुगम विश्लेषण सुन कर मन गदगद हो गया।
नतमस्तक होकर मैंने कहा—क्रियमाण को शुद्ध रखने का अर्थ है—प्रारब्ध को 'प्रसाद' की तरह स्वीकार करना और वर्तमान कर्म को 'पूजा' की तरह करना। ऐसा करने से नया कर्म 'अकर्म' में बदल जाता है और वह कर्ता को आगे नहीं बाँधता—
बहुत ही अच्छा निष्कर्ष दिया आपने। अब मैं ये जानना चाहता हूँ कि 'अकर्म' की स्थिति को अभ्यास (Practice) में कैसे लाया जाए? यानी हाथ-पांव चलते
रहें पर मन 'अकर्ता' बना रहे—यह कला कैसे सीखी जाए?
अपने स्वाभाविक अट्टहास के साथ बाबा फिर शुरु हो गए—“ तुम बड़े ही चतुर हो। सबकुछ एक ही
बैठकी में उगलवा लेना चाहते हो। सांख्य और गीता का सारांश तुमने बहुत ही सुन्दर और
सारगर्भित ढंग से पकड़ा है। जब दर्शन केवल दिमाग तक रहता है, तो वह नीरस, शुष्क (Dry) होता
है, लेकिन जब वह आचरण में उतरता है, तो
वह 'जीवन-कला' (Art of Living) बन जाता है। अनाड़ियों द्वारा आजकल इसकी दुकानें खूब चलायी जा रही है—नये-नये
‘लेबल’ लगाकर जीने की कला सिखलाई जा रही है। खैर,
इससे हमें क्या लेना। संसार में बहुत सजग-सावधान होकर रहना है हर पल। उक्त निष्कर्ष में तीन उपयोगी रसौषधियाँ छिपी हुई हैं। इन्हें पहचानों और प्रयोग करो—
१. स्वीकार (Acceptance)— जब हम प्रारब्ध को
'प्रसाद' मान लेते हैं, तो हमारे भीतर से 'शिकायत' और 'तुलना' का
विष समाप्त हो जाता है। ईश्वर ने मुझे ही यह दुख क्यों दिया?
यह सवाल ही मिट जाता है।
२. समर्पण (Dedication)— जब कर्म 'पूजा' बन जाता है,तो उसकी गुणवत्ता (Quality) बदल जाती है। तुम किसी
को दिखाने के लिए या सिर्फ पैसा कमाने के लिए काम नहीं करते, बल्कि उस कर्म को ही अपना ‘अर्घ्य’ बना देते हो। इससे मन में 'तनाव' की जगह 'प्रसन्नता' उदित हो जाती है।
३.
मुक्ति (Liberation)—जब 'अकर्म' घटित होता है, तो हम संसार में रहते हुए भी वैसे ही
अछूते रहते हैं जैसे कमल का पत्ता पानी में रहकर भी गीला नहीं होता ...लिप्यते न स पापेन पद्मपत्रमिवाम्भसा । सांख्य
दर्शन का लक्ष्य भी यही है—'दुखत्रय अभिघात' (दैहिक,दैविक,भौतिक तीन प्रकार के दुःखों का समूल नाश) और वह नाश तभी सम्भव
है, जब पुरुष (यानी हम) प्रकृति के इस खेल को समझ लें और उसमें उलझना बन्द कर दें।”
प्रेमाश्रुसिक्त
नेत्रों से बाबा को निहारते हुए मैंने कहा— कर्मरहस्य और विभागत्रय की बड़ी अच्छी विवेचना आपने की। इसके लिए
साधुवाद। किन्तु संचित-प्रारब्ध-क्रियमाण की गुत्थी सुलझाने में अभी भी कुछ कसर
है, उसे सुलझा लेना चाहता हूँ—
१. क्रियमाण से प्रारब्ध को
सिर्फ थोड़े समय के लिए पीछे हटाया जा सकता है या पूरे तौर पर नष्ट (समाप्त) किया जा सकता है?
२. यदि ऐसा सम्भव है तो पितामह भीष्म का कोई क्रियमाण क्यों नहीं सफल हुआ और
सैकड़ों जन्म पीछे का चला आ रहा संचित या प्रारब्ध उन्हें शर-शैय्या पर व्यथित
होने को विवश किया?
३.क्रियमाण से प्रारब्ध
में बदलाव लाया जा सकता है यदि, तो फिर विष्णुपुराण का कथन—अवश्यमेव भोक्तव्यं
कृतं कर्म शुभाभुभम् का क्या औचित्य या फिर भविष्यपुराण का कथन (आदित्यहृद्यस्तोत्र
में)—यदह्ना कुरुते पापं तदह्ना प्रतिमुच्यते। यद्रात्र्या कुरुते पापं तद्रात्र्या
प्रतिमुच्यते का क्या मतलब हुआ ?
हर्ष-गदगद होकर, बाबा ने ताली बजाते
हुए कहा—“ तुम्हारी ये
जिज्ञासाएँ कर्म-सिद्धान्त के उस केन्द्र बिन्दु पर प्रहार कर रही हैं,
जहाँ बड़े-
बड़े दार्शनिक भी मौन हो जाते हैं। तुमने पितामह भीष्म का
उदाहरण और पुराणों के अन्तर्विरोधी (Contradictory) प्रतीत होने वाले सूत्रों को रखकर आज की चर्चा को बहुत ऊँचा स्तर दे दिया
है। आओ, इन तीनों गुत्थियों को एक-एक करके सुलझाते हैं—
(क) क्या क्रियमाण से प्रारब्ध को पूरी तरह
नष्ट किया जा सकता है?
सांख्य और वेदान्त का स्पष्ट उत्तर है— बिल्कुल नहीं। क्योंकि प्रारब्ध उस तीर की तरह है, जो धनुष से छूट चुका है। वह अपना
लक्ष्य (शरीर का भोग) पूरा करके ही शान्त होगा। क्रियमाण प्रारब्ध को नष्ट नहीं करता, बल्कि क्रियमाण दो काम करता है—
v वह तुम्हारे संचितकर्म (गोदाम) को भस्म कर सकता है ज्ञानाग्नि से ।
v वह प्रारब्ध को भोगने की शक्ति दे सकता है
तुम्हें और तुम्हारा दृष्टिकोण बदल सकता है। जैसे—बारिश (प्रारब्ध) को बन्द नहीं किया जा सकता, लेकिन
छाता (क्रियमाण) लेकर तुम भींगने से बच सकते हो। प्रारब्ध शरीर को कष्ट देगा,
लेकिन शुद्ध क्रियमाण उस कष्ट को 'पीड़ा'
(Suffering) में नहीं बदलने देगा।
(ख) पितामह भीष्म और शरशैय्या का रहस्य—यह प्रश्न बहुत ही मार्मिक है। भीष्म
जैसे धर्मात्मा को शताधिक जन्म पहले की
घटना (अनजाने में एक गिलहरी को कांटों पर तड़पने के लिए विवश करना) का फल
भोगना पड़ा। इसे ठीक से समझो तो बात बने। यहाँ दो गहरे दार्शनिक संदेश हैं—
v
प्रारब्ध की अकाट्यता: यह उदाहरण हमें डराने के लिए नहीं, बल्कि यह समझाने के लिए है कि 'प्रकृति' का नियम कितना सटीक है। भीष्म का इस जन्म का 'क्रियमाण'
(इच्छा मृत्यु का वरदान, ब्रह्मचर्य, धर्म रक्षा) इतना प्रबल था कि उन्होंने मृत्यु का समय स्वयं चुना, लेकिन जो तीर छूट चुका था (पुराना पाप), उसे भोगकर
उन्होंने अपना कर्माशय (खाता Account) पूरी तरह नील (Zero)
कर दिया।
v
सफलता का पैमाना: तुम्हारा संशय है कि उनका क्रियमाण सफल नहीं हुआ?
दार्शनिक दृष्टि से वह पूर्ण सफल हुआ। शरशैय्या पर लेटे होने के बावजूद उनका मन 'कृष्ण'
में स्थिर रहा। क्रियमाण की सफलता यह नहीं है कि कष्ट न आए, बल्कि यह है कि कष्ट के बीच भी चित्त न डगमगाए। उन्होंने उस
प्रारब्ध को हँसते हुए भोगकर स्वयं को अनन्त काल के लिए मुक्त कर लिया।
v
अभी हाल में कलिकाल में परमहंस रामकृष्ण हुए हैं, जो लम्बे समय तक गले के
कैंसर से जूझते-कराहते रहे। अज्ञानी नरेन्द (विवेकानन्द) तथा अन्य शिष्यों को इस
पर सदा संशय होता रहा। क्योंकि लोकचर्चित है कि माँकाली उनका सिर सहलाती हैं, जब
सिर में वेदना होती है। क्या ममतामयी माँ गले का कैंसर ठीक नहीं कर सकती?
v प्रारब्ध और क्रियमाण कर्म का भेद तथा
रामकृष्ण परमहंस के कैंसर से जुड़ा संशय अध्यात्म के अत्यन्त गहरे विषय हैं। इसे
समझने के लिए कर्म के सिद्धान्त और महापुरुषों के चरित्र को अलग-अलग करके देखना
होगा।
v कैंसर जैसी किसी गम्भीर बीमारी का शरीर में आना प्रारब्ध है। लेकिन उस बीमारी के आने पर सही इलाज करवाना, सकारात्मक
सोच रखना या ईश्वर की शरण में जाना हमारा क्रियमाण कर्म है। क्रियमाण से हम प्रारब्ध के दुःख को सहने की शक्ति पा सकते हैं या
भविष्य के दुःखों को काट सकते हैं।
v श्रीरामकृष्ण परमहंस जैसे उच्च कोटि के
साधक या जीवन्मुक्त महापुरुषों के संदर्भ में प्रारब्ध और बीमारी का रहस्य साधारण
मनुष्यों से सर्वथा भिन्न है। इसे आगे के बिन्दुओं से समझो—
Ø
प्रकृति के नियम का सम्मान: महापुरुष जब हाड़-मांस का मानव शरीर धारण करते हैं,
तो वे प्रकृति के भौतिक नियमों (बीमारी, बुढ़ापा,
मृत्यु) का उल्लंघन नहीं करते। शरीर पञ्च तत्वों से बना है, इसलिए उसमें रोग-व्याधि का आना स्वाभाविक है।
Ø
शिष्यों और भक्तों के पापों का वहन: बहुत बार ऐसा
भी होता है कि आध्यात्मिक गुरु अपने शरणागत शिष्यों के संचित और प्रारब्ध कर्मों
के भयंकर परिणामों को अपने ऊपर ले लेते हैं।
Ø
श्रीरामकृष्ण ने भी कई अयोग्य और पापी व्यक्तियों को स्पर्श मात्र से मुक्त
किया था। इस कारण उनके शिष्यों का ये भी मानना था कि जगत् के कल्याण और शिष्यों के
पापों को ग्रहण करने के कारण उनके गले में यह रोग उत्पन्न हुआ।
Ø
शरीर और आत्मा का अलगाव: स्वामी विवेकानन्द (नरेन्द्र) और अन्य शिष्य तब तक
पूर्णतः आत्मज्ञानी नहीं हुए थे, इसलिए वे श्रीरामकृष्ण के
शारीरिक कष्ट को देखकर दुःखी होते थे। परन्तु श्रीरामकृष्ण स्वयं कहते थे, "रोग शरीर को है, मुझे (आत्मा को) नहीं।" वे भयंकर शारीरिक पीड़ा में भी ब्रह्मानन्द में मग्न रहते थे।
v ऐसे में ये सवाल उठ सकता है कि माँ
काली ने कैंसर ठीक क्यों नहीं किया?
v यही संशय नरेन्द्र के मन में भी उठा था
और उन्होंने श्रीरामकृष्ण से आग्रह किया था कि वे माँ काली से कहकर अपना गला ठीक क्यों
नहीं करवा ले रहे हैं।
v
अहंकार रहित पूर्ण समर्पण: जब नरेन्द्र के बार-बार कहने पर श्रीरामकृष्ण ने माँ
काली से कहा, "माँ ! मैं इस गले के कारण कुछ खा
नहीं पाता, इसे ठीक कर दे।" तब माँ काली ने उन्हें उत्तर दिया, "क्यों?
तुम तो इतने सारे (भक्तों
के) मुखों से खा रहे हो, क्या वह पर्याप्त नहीं है?" यह सुनकर श्रीरामकृष्ण लज्जित हो गए। दरअसल उनके भीतर 'मेरा शरीर' या 'मेरी व्यक्तिगत
इच्छा' जैसी कोई भावना ही नहीं बची थी।
v
माँ की इच्छा में ही अपनी इच्छा: श्रीरामकृष्ण पूर्णतः माँ काली के यन्त्र थे। यदि माँ
की इच्छा उनके शरीर को इस कष्ट के माध्यम से लीला समेटने (मृत्यु) की ओर ले जाने
की थी, तो श्रीरामकृष्ण अपनी ओर से कोई प्रार्थना करके, उस
विधान को नहीं बदलना चाहते थे।
v
इस प्रसंग में जगत् के लिए सीख ये
है कि यदि
महापुरुष अपनी सिद्धियों से अपने ही शरीर को सदा अमर या निरोगी बनाए रखते, तो मनुष्य कभी यह नहीं
समझ पाता कि दुःख और बीमारी में भी आत्म-स्थिति कैसे कायम रखी जा सकती है।
उन्होंने कैंसर जैसी पीड़ा के बीच भी ईश्वर-प्रेम की पराकाष्ठा दिखाकर संसार को
क्रियमाण कर्म की सर्वोच्च दिशा दिखाई। ”
इतना
समझाने के बाद बाबा पल भर के लिए रुके, मानों मेरे शेष प्रश्नों को याद कर रहे
हों। फिर मुस्कुराते हुए बोले— “ भीष्म और रामकृष्ण के प्रसंग तो बहुत पुराने
हो गए। यदि तुमने अखबारी बाबू और गायत्री के साथ मेरे संवादों वाला ‘चिट्ठा’ पढ़ा हो, तो
तुम्हें ज्ञात ही होगा कि मेरे जैसा सांख्यवादी-हठयोगी
भी ‘उस स्त्री’ की हत्या के
ज़ुर्म में पूरे अठारह वर्षों का कारावास झेला, जिससे न तो मैंने विवाह किया था और
न उसकी हत्या ही। ”
जी हाँ,महाराज! मैं अवगत हूँ उस प्रसंग से कि किन
हालातों में आपको मन्दिर मालिक द्वारा हत्यारा घोषित कर जेल भिजवा दिया गया था, जबकि
उस लड़की ने माँ काली की कटार खुद ही अपने पेट में भोंक ली थी। आप तो घबराये हुए, उसके
पेट से कटार खींचने की कोशिश कर रहे थे, तभी मालिक आ पहुँचा था और बिना कुछ पूछे-जाने-समझे,
आपको हत्यारा घोषित कर दिया गया। आखिर ये सब कैसा खेल है भाग्य का—समझ नहीं आता।
बाबा ने कहा— “ यही है प्रारब्ध का खेल। हो सकता है, मैंने भी
भीष्म की तरह
कभी जाने-अनजाने कोई हत्या की हो। खैर, चलो आगे अब सुलझाता हूँ तुम्हारे उन पौराणिक
प्रसंगों पर उठ रहे संशयों को— नियम वनाम प्रायश्चित—
v
यहाँ पौराणिक श्लोकों में विरोधाभास
नहीं, बल्कि दो अलग-अलग स्तरों (Levels) की बात कही गई है—
v
विष्णुपुराण (नियम): "अवश्यमेव भोक्तव्यं... " — यह प्रकृति का 'लॉ ऑफ थर्मोडायनामिक्स' है। जो किया है, उसका फल बीज रूप में उपस्थित है। यह नियम उन लोगों के लिए है, जो अज्ञान
में जी रहे हैं। वस्तुतः बिना भोगे कर्म समाप्त नहीं होता।
v
भविष्यपुराण/आदित्यहृदय प्रसंग— (कृपा/प्रायश्चित): "...तदह्ना
प्रतिमुच्यते..." — यह 'प्रायश्चित'
और 'शरणागति' का
विज्ञान है।
ü
जब हम सूर्य उपासना या शुद्ध भाव से कोई मन्त्र जप करते हैं, तो वह हमारे 'क्रियमाण' की तीव्रता को इतना बढ़ा देता है, जिसके
कारण पाप का 'संस्कार' भस्म हो जाता है।
ü
इसे ऐसे समझो— एक गंदा दाग (पाप) लगा है। नियम कहता है कि दाग है तो रहेगा।
लेकिन साबुन (उपासना/क्रियमाण) उस दाग को मिटा सकता है।
ü
महत्वपूर्ण बात ये है कि यहाँ पाप 'मुच्यते' (छूटने) का अर्थ
यह भी है कि उस पाप का जो 'मानसिक प्रभाव'
(Guilt/Darkness) तुम्हें नीचे गिराने वाला था, वह ईश्वर की कृपा या ज्ञान से धुल कर स्वच्छ हो गया। हो सकता है शारीरिक
फल (प्रारब्ध) थोड़ा बहुत भोगना पड़े, लेकिन उसकी मारक क्षमता
खत्म हो जाती है।
कुल मिला कर कहें तो, इन बातों का निष्कर्ष ये निकला कि प्रारब्ध 'अनिवार्य' है, लेकिन क्रियमाण 'शक्तिशाली' है। प्रारब्ध भूतकाल का निर्णय है, क्रियमाण वर्तमान
की स्वतन्त्रता। भीष्म ने प्रारब्ध को भोगा ताकि वे शुद्ध होकर परमात्मा में मिल
सकें। दूसरी ओर भविष्यपुराण हमें आशा देता है कि हम अपने पुरुषार्थ से आज के मैल
को कल के लिए 'संचित' न
होने दें। मैं फिर कहना चाहूँगा कि भीष्म का शरशैय्या पर लेटना उनकी हार नहीं,
बल्कि प्रारब्ध पर उनकी अन्तिम विजय थी। ”
प्रारब्ध पर भीष्म की विजय वाली बातों
से मुझे याद आया, एक बहुत ही उलझाऊ और दिलचस्प सवाल—स्वर्ग-नरक का मामला आखिर
क्या है—ये भी मेरे उलझन वाले प्रश्नों में शामिल है, जिसका उत्तर अभी तक नहीं मिल
पाया है। अतः बाबा से इसी बात के लिए पुनः आग्रह किया—महाराज ! मेरा एक पुराना सवाल
छूटा जा रहा है।
“ हाँ हाँ मुझे
याद है।” बाबा ने हामी भरी और सिर हिलाते हुए कहा— “स्वर्ग-नरक के
चक्कर—लोभ या भय में तो हमारा बहुत कुछ नष्ट हुआ जा रहा है। इसे ठीक से समझना
जरुरी है। अब मैं उसी विषय पर आता हूँ।
“ सांख्य और वेदान्त दर्शन के अनुसार स्वर्ग
और नरक कोई भौतिक या
भौगोलिक स्थान नहीं हैं (जैसे बादलों के
ऊपर कोई महल या ज़मीन के नीचे कोई दहकती हुई आग का कुआँ और खौलते तेल भरे कड़ाह — ये
सब कलियुगी मतावलम्बियों की ख़ुराफ़ात मात्र है)। वस्तुतः ये मानसिक अवस्थाएँ और कर्मों के फल भुगतने के
सूक्ष्म आयाम हैं। इस विषय पर इन दोनों दर्शनों का दृष्टिकोण अत्यन्त
वैज्ञानिक है—
(क) सांख्य दर्शन की दृष्टि से— सांख्य दर्शन पूर्णतः प्रकृति और पुरुष के विवेक पर आधारित है। सांख्य के
अनुसार, सब कुछ प्रकृति के तीन गुणों—सत्व (पवित्रता/ज्ञान), रज (गति/इच्छा)और तम (अज्ञान/आलस्य)—के खेल
से उत्पन्न होता है। इसे यूँ समझो—
v स्वर्ग की व्याख्या (सत्वगुण की
पराकाष्ठा)—जब मनुष्य का मन पूरी तरह से सत्वगुण से भर जाता
है, जहाँ केवल शान्ति, प्रसन्नता,
सन्तोष और ज्ञान होता है, तब वही स्थिति 'स्वर्ग' है। मृत्यु के बाद, ऐसा सूक्ष्म शरीर उच्च लोकों (सत्वप्रधान आयामों) में जाता है,
जहाँ वह अपने पुण्य कर्मों का सुख भोगता है।
v नरक की व्याख्या (तमोगुण और रजोगुण का
पतन)— जब मन तमोगुण (क्रोध, मोह, अज्ञान, ईर्ष्या) और रजोगुण (अत्यधिक वासना, अशान्ति) के नियन्त्रण में होता है,
तो वह 'नरक' की स्थिति है। मृत्यु के बाद, ऐसा विकृत चित्त निम्न
योनियों या कष्टकारी सूक्ष्म आयामों (नरक) में जाता है।
v सांख्य का अन्तिम निष्कर्ष—स्वर्ग और नरक दोनों ही प्रकृति के सीमा
में हैं। ये दोनों ही बन्धन हैं, क्योंकि ये क्षणिक
हैं। सांख्य का लक्ष्य स्वर्ग जाना नहीं, बल्कि प्रकृति से
अलग होकर 'कैवल्य' (पुरुष का
अपने वास्तविक स्वरूप को जान लेना/मुक्ति) प्राप्त
करना है।
(ख)वेदान्त दर्शन की दृष्टि से — वेदान्त (अद्वैत वेदान्त) इस सिद्धान्त
पर चलता है कि केवल ब्रह्म ही सत्य है और यह संसार (तथा स्वर्ग-नरक)
केवल ‘अध्यास’ ( आभास) या प्रतीति (माया) मात्र है।
v स्वर्ग और नरक केवल मानसिक कल्पना — वेदान्त के अनुसार,
जैसे स्वप्न देखते समय सुखद स्वप्न 'स्वर्ग'
और डरावना स्वप्न 'नरक' बन जाता है (जबकि जागने पर दोनों झूठ सिद्ध होते हैं), वैसे ही जाग्रत अवस्था में मन अपनी इच्छाओं और कर्मों के अनुसार स्वर्ग या
नरक की रचना करता है।
v कर्मफल के सूक्ष्म लोक—वेदान्त यह स्वीकार करता है कि जब तक
जीव अज्ञान में है, तब तक उसके लिए स्वर्ग और नरक का अस्तित्व वैसा ही सच है, जैसा इस संसार का। पुण्य कर्मों से 'स्वर्ग लोक'
और पाप कर्मों से 'नरक लोक'
की प्राप्ति सूक्ष्म शरीर को होती है, न कि आत्मा
को ।
v क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकं विशन्ति....—गीता, उपनिषद और वेदान्त स्पष्ट
कहते हैं कि स्वर्ग शाश्वत नहीं है। जैसे बैंक बैलेंस खत्म होने पर व्यक्ति को
होटल का कमरा खाली करना पड़ता है, वैसे ही पुण्य समाप्त होते ही जीव को वापस मृत्युलोक
(संसार) में आना पड़ता है।
v वेदान्त का अन्तिम निष्कर्ष— "अहं
ब्रह्मास्मि" (मैं ब्रह्म हूँ) को जान लेना ही
परम आनन्द है, जिसके आगे स्वर्ग का सुख भी तिनके के समान है।
अज्ञानता ही नरक है और ज्ञान ही मुक्ति है।
स्पष्ट है कि दोनों ही दर्शन मानते हैं कि स्वर्ग और
नरक अन्तिम सत्य
नहीं हैं। ये केवल कर्मों के फल भुगतने के अस्थाई पड़ाव
हैं। बुद्धिमान व्यक्ति न तो स्वर्ग की इच्छा करता है और न ही नरक से डरता है,
बल्कि वह इन दोनों से ऊपर उठकर आत्मज्ञान
(मुक्ति) का प्रयास करता है। ”
बच्चे को जितना अधिक टॉफी दो, उतना ही
और माँगता है ललक-ललक कर। बाबा के कृपा-प्रसाद से मैं सन्तुष्ट तो हो गया, किन्तु
तृप्ति नहीं मिल रही थी। समय भी मानों ठिठक गया था।
मैंने करवद्ध प्रार्थना की—आपने मेरा बहुत पुराना संशय दूर कर दिया आज। आपकी
इच्छा हो तो अब आगे 'विवेक-ख्याति' (वह ज्ञान जिससे पुरुष और प्रकृति अलग दिखने
लगते हैं) के व्यावहारिक उपायों पर प्रकाश डालें, ताकि ये मूरख बारबार आपसे बचकाने
सवाल न करे।
बाबा हर्षित हुए— “ यह जानकर बहुत सन्तोष हुआ कि तुम्हारे संशय
की वह पुरानी गाँठ खुल गई आज मेरे सानिध्य में। आगे अब तुम्हारी इच्छानुसार हम सांख्य दर्शन के
सबसे महत्वपूर्ण और 'प्रैक्टिकल' हिस्से पर आते हैं— 'विवेक-ख्याति' की चर्चा करते हैं।
“ सांख्य के अनुसार, हमारे समस्त दुःखों का
एकमात्र कारण है 'अविवेक'
यानी पुरुष (चेतना) और प्रकृति (जड़/शरीर/मन) को एक ही मान लेना। 'विवेक-ख्याति' वह उच्च अवस्था है, जहाँ हमें यह
स्पष्ट अनुभव होने लगता है कि "मैं यह नाचती हुई प्रकृति नहीं,
बल्कि उसे देखने वाला अविचल प्रकाश हूँ।"
“आओ अब इसके व्यावहारिक उपायों
की चर्चा करें। सुविधा के लिए इसे हम तीन चरणों में समझा रहे हैं—
(क) द्रष्टा-दृश्य भाव का अभ्यास (Subject-ObjectDifferentiation)— यह सबसे पहला कदम है। दिन भर के कार्यों के बीच स्वयं को यह स्मरण दिलाना
कि जो कुछ भी देखा जा रहा है, वह मैं नहीं हूँ। इसके लिए तुम्हें कुछ विधि बतला रहा
हूँ। इसे ठीक से समझो और यथासम्भव पालन करो। ध्यान रहे—उकताना बिल्कुल नहीं।
व्यापारी की तरह नफा-नुकसान का हिसाब भी नहीं रखना। यह एक अभ्यास है। बहुत लम्बे
समय का अभ्यास । सीधे कहो, जीवन भर का अभ्यास। सतत अभ्यास करते रहो। बस,अभ्यास...।
v विधि: जब तुम्हें क्रोध
आए, तो यह न कहो कि "मैं क्रोधित हूँ।" कहो(सोचो)—
"बुद्धि में क्रोध की एक लहर उठी है और मैं उसे देख रहा
हूँ।"
v तर्क: जो 'दृश्य' है (काम, क्रोध, भूख, प्यास,
विचार), वह 'द्रष्टा'
(आप) से अलग है। जैसे तुम चश्मे को देख सकते हो, ज़ाहिर है कि तुम
चश्मा नहीं हो। वैसे ही तुम विचारों को भी देख सकते हो, क्योंकि
तुम विचार नहीं हो।
v ये बातें, ये विधि आश्चर्यजनक भले ही हो, किन्तु सतत
अभ्यास के बाद परिपक्वता आनी ही आनी है।
(ख) तत्त्वाभ्यास (Analytical Meditation)—सांख्य दर्शन 'विचार' और 'विश्लेषण' का मार्ग है। इसमें बैठकर यह विश्लेषण
किया जाता है कि यह शरीर किन-किन तत्वों से बना है। इसकी विधि ये है—
Ø अभ्यास: "यह हाथ
मिट्टी (पृथ्वी) है, यह सांस हवा (वायु) है, यह विचार अहंकार का खेल है।"—इस प्रकार नियमित अभ्यास करना चाहिए।
यथासम्भव जितना हो सके। ये कर्मकाण्डीय पूजा नहीं है, इसलिए विशेष औपचारिकता के
चक्कर में भी नहीं पड़ना है।
Ø जब हम हर चीज़ को उसके मूल तत्व (चौबीस
तत्वों) में बाँट देते हैं, तो अन्त में जो शेष बचता है, वह पचीसवाँ तत्व 'पुरुष' (आप) है। इस प्रकार के निरन्तर अभ्यास से एक समय ऐसा आता है, जब बुद्धि इतनी
सूक्ष्म हो जाती है कि वह 'पुरुष' और
'प्रकृति' के बीच के महीन अन्तर को
पहचान लेती है।
अब तुम्हारा तार्किक और जिज्ञासु मन पूछ सकता है कि विवेक-ख्याति के बाद
क्या बदलता है? तो याद करो मैंने एक उदाहरण दिया था सांख्य कारिका का — जैसे एक नर्तकी (Dancer) तब तक नाचती है ,जब
तक दर्शक उसे देख रहे हैं। जैसे ही दर्शक उसे पूरी तरह पहचान लेता है और खेल समझ
जाता है, नर्तकी संकोचवश नृत्य रोक देती है।
इसी प्रकार, प्रकृति भी हमारे लिए तभी तक नाचती
(दुख-सुख देती) है, जब तक हमारे पास 'अविवेक' है। जिस क्षण 'विवेक-ख्याति' सिद्ध हो जाती है, प्रकृति अपना खेल समेट लेती है और
पुरुष अपने स्वरूप में स्थित होकर 'मुक्त' हो जाता है।
इसके लिए एक छोटा सा
सूत्र जो तुम आज से ही प्रयोग कर सकते हो—किसी भी परिस्थिति में खुद से पूछो — "यह किसे
हो रहा है? शरीर को या मन को...इसे देख कौन रहा
है...मैं(द्रष्टा)—यही विवेक-ख्याति की शुरुआत है। जब हम 'विवेक-ख्याति' या 'द्रष्टा
भाव' का अभ्यास शुरू करते हैं, तो ऐसा
नहीं है कि सब कुछ तुरन्त शान्त हो जाता है। जैसे ही हम स्थिर बैठने की कोशिश करते
हैं, मन के भीतर का 'कोलाहल' और बढ़ जाता है। महर्षि पतञ्जलि ने योगसूत्र में इन्हें 'चित्त-विक्षेप' कहा है, जिन्हें सांख्य की साधना में 'मार्ग की
बाधाएँ' माना जाता है। ये नौ प्रमुख बाधाएं हैं,
जो हमारे 'क्रियमाण' को दूषित करती हैं—
1. व्याधि (Sickness)— यह सबसे पहली बाधा है—शरीर का अस्वस्थ होना।
सांख्य कहता है कि यदि पञ्चमहाभूतों का संतुलन बिगड़ जाए, तो
मन कभी स्थिर नहीं हो सकता। इसीलिए 'प्रारब्ध'
के रूप में आने वाली बीमारियाँ सबसे पहले हमारे अभ्यास को रोकती
हैं।
2. स्त्यान (Mental Laziness)—शरीर ठीक है, पर कुछ करने की इच्छा
ही न होना। एक तरह की मानसिक जड़ता (Rigidity) जहाँ व्यक्ति
को लगता है—"छोड़ो, ये सब करके
क्या होगा?" यह 'तमस' का प्रभाव है।
3. संशय (Doubt)—यह सबसे खतरनाक बाधा है। "क्या
मैं वास्तव में पुरुष हूँ? क्या सांख्य सच है? क्या मोक्ष सम्भव
है?" जब तक संशय रहता है, साधक का
पैर एक जगह नहीं टिकता। वह यहाँ-वहाँ पुस्तकों और गुरुओं के चक्कर में भटकते रहता
है।
4. प्रमाद (Carelessness)—जानते हुए भी न करना। जैसे—हमें पता है कि सुबह
उठकर चिन्तन करना अच्छा है, लेकिन "कल से करेंगे"
कहकर टाल देना। यह साधना के प्रति लापरवाही है।
5. आलस्य (Lethargy)—शरीर में भारीपन। सांख्य के अनुसार जब 'तमस' बढ़ जाता है,तब बुद्धि भारी हो जाती है और विवेक का
प्रकाश ढक जाता है।
6. अविरति (Attachment to Senses)—इन्द्रियों का विषयों की ओर भागना।
अभ्यास करते समय भी मन में किसी पुराने भोग या आने वाले सुख का विचार आना। 'चित्त' का विषयों में फँसा रहना ही 'अविरति' है।
7. भ्रान्तिदर्शन (False Perception)— गलत को सही समझ लेना। जैसे—साधना में कोई
छोटी-मोटी सिद्धि या शान्ति मिल गई, तो समझ लेना कि " बहुत
बड़ी उपलब्धि हो गई।" यह 'अहंकार' का सूक्ष्म खेल है।
8. अलब्धभूमिकत्व (Failure to attain a stage)— बहुत मेहनत के बाद भी जब कोई प्रगति महसूस नहीं होती, तो साधक निराश हो जाता
है। उसे लगता है कि उसकी मेहनत बेकार जा रही है।
9. अनवस्थित्त्व (Instability)—कभी-कभी हम बहुत ऊँची स्थिति का अनुभव
करते हैं, लेकिन उसे टिका नहीं
पाते। आज मन बहुत शान्त है, कल फिर वही पुराना गुस्सा आ गया।
इस अस्थिरता से साधक का आत्मविश्वास डगमगा जाता है।”
मैं सोचने लगा कि ये
सारी बातें बाबा मुझे ही लक्ष्य करके तो नहीं कह रहे हैं !
आए दिन ऐसी बहुत सी समस्याओं से मैं निरन्तर जूझ रहा हूँ। कोई सही मार्गदर्शक मिला
नहीं अबतक।
बाबा ने आगे कहा—“अब तुम्हें इन बाधाओं को पार करने का 'सांख्य समाधान' बतलाता
हूँ। सांख्य और योग इन बाधाओं से लड़ने के लिए एक बहुत ही 'साइन्टिफिक' तरीका बताते हैं— 'एकतत्त्वाभ्यास'—
(क) दृढ़ इच्छाशक्ति (पुरुषार्थ)— यह मानना कि ये
बाधाएँ 'प्रकृति' का हिस्सा हैं,
'मेरा' (पुरुष का) नहीं।
(ख) प्रतीक्षा: जैसे बादलों के
आने से सूरज खत्म नहीं होता, वैसे ही इन बाधाओं के आने से हमारा
'विवेक' खत्म नहीं हुआ, बस ढक गया है। अतः साक्षीभाव से इन्हें देखते रहो।
मेरे
चेहरे पर गौर करते हुए बाबा ने पूछा— “ अच्छा एक बात बतलाओ—ऊपर कही गई बाधाओं में तुम्हें कौन सी बाधा
परेशान करती है? या किसी बाधा पर ध्यान ही नहीं गया अबतक?”
मैंने कहाँ—जी हाँ, दूसरा और नौंवा क्रमांक यानी स्त्यान और अनवस्थित्त्व
की बाधा ज्यादा लक्षित होती है। और इसी क्रम में ये सवाल उठता है कि कर्मयोग-ज्ञानयोग-भक्तियोग
में किस मार्ग का अवलम्बन किया जाय या सबका समुच्चय साधना स्वरूप हो? भौतिकजगत् में योग्य गुरु का सर्वथा
अभाव दीखता है। अपनी अनुभूतियाँ कभी सांख्य की ओर खींचती हैं, तो कभी पतञ्जलि के
योगदर्शन की ओर तो कभी विशुद्ध भक्तियोग की झलक मिलती है। ऐसे में संशय और उलझन होना
तो स्वाभाविक है महाराज !
बाबा ने कहा—“तुम्हारी यह स्थिति—जहाँ स्त्यान (मानसिक जड़ता) और अनवस्थित्त्व (अस्थिरता) का अनुभव हो रहा
है—साधना के मार्ग पर चलने वाले हर सच्चे खोजी की है। यह इस
बात का प्रमाण है कि तुम केवल किताबी बातें नहीं कर रहे हो, बल्कि
वास्तव में उस मार्ग पर चलने का प्रयास कर रहे हो। सच्चाई ये है कि जब 'अनुभूतियाँ' अलग-अलग दिशाओं में खींचती हैं, तो संशय होना स्वाभाविक है। आओ,इसे सांख्य और गीतोक्त समन्वय सिद्धान्त से
सुलझाते हैं—
1. स्त्यान और अनवस्थित्त्व
क्यों होते हैं?
·
स्त्यान – यह तब होता है जब बुद्धि पर तमस का पर्दा गिर
जाता है। सांख्य के अनुसार, जब हम बौद्धिक रूप से बहुत अधिक
थक जाते हैं या जीवन में रस की कमी हो जाती है, तो मन
"जड़" होने लगता है।
·
अनवस्थित्त्व – यह रजस का खेल है। एक दिन 'सांख्य' का
ज्ञान बहुत अच्छा लगता है, अगले दिन 'भक्ति'
का रस खींचता है। मन किसी एक पायदान पर टिक नहीं पाता, क्योंकि वह
अभी 'परिणाम' (Result) की तलाश में है।
2. मार्ग का चुनाव: समुच्चय (Integrated Path) या कोई एक?
स्वामी विवेकानन्द और स्वामी श्रीरामसुखदासजी जैसे महापुरुषों ने 'योग-समुच्चय' की बात कही है। मनुष्य केवल 'मस्तिष्क' (ज्ञान) या केवल 'हृदय' (भक्ति)
नहीं है, वह दोनों का मिश्रण है।
· सांख्य (ज्ञानयोग): यह तुम्हारे विवेक को पैना करता है। जब मन उलझन में हो,
तो सांख्य का 'द्रष्टा भाव' काम आता है। यह 'बौद्धिक प्यास' बुझाता है।
· योगदर्शन (साधना): यह तुम्हारे शरीर और प्राण को अनुशासन देता है।
अनवस्थित्त्व (अस्थिरता) को रोकने के लिए पतञ्जलि के यम-नियम और आसन-प्राणायाम 'फ्रेमवर्क' का काम करते हैं।
· भक्तियोग (रस): ज्ञान शुष्क हो
सकता है, लेकिन भक्ति उसे 'सरस'
बनाती है। जब 'स्त्यान' (जड़ता) आए, तो भक्ति का सहारा लेना चाहिए ,क्योंकि
प्रेम और शरणागति तमस को तुरन्त काट देते हैं।
ध्यातव्य है कि इन्हें अलग-अलग 'रास्ते' न मानकर एक ही यात्रा के 'साधन' समझो। वैसे ही जैसे कुछ दूरी पैदल, कुछ
मोटरकार से, कुछ रेल से तयकर गन्तव्य तक पहुँचते हो। उसी भाँति—
· जब बुद्धि सक्रिय हो—सांख्य।
· जब कर्म करना हो—कर्मयोग (प्रसाद भाव)।
· जब मन उदास या जड़ हो—भक्ति।
· जब जीवन को व्यवस्थित करना हो—अष्टांग योग।
3. "योग्य गुरु
का अभाव " और स्वाध्याय—आज के समय में भौतिक रूप से योग्य गुरु मिलना कठिन हो सकता है, लेकिन सांख्य एक बहुत बड़ी
बात कहता है— " विवेक ही परम गुरु है। "
·
जब गुरु बाहर न मिले, तो 'शास्त्र' (गीता, सांख्य सूत्र...) और 'संत-वाणी' (जैसे श्रीराधाबाबा(गीतावाटिका,गोरखपुर),श्रीरामसुखदासजी
आदि के विचार) को ही गुरु मान लेना चाहिए। कृष्णंवन्दे जगद्गुरुम् वाला
रास्ता तो सर्वाधिक निरापद है ही।
·
सांख्य में कहा गया है कि 'प्रकृति' स्वयं पुरुष की गुरु बन जाती
है जब पुरुष मुक्त होना चाहता है। जीवन की हर बाधा और हर अनुभूति कुछ न कुछ सिखाने
आई है।
अब यहाँ कुछ व्यावहारिक सुझाव दे रहा हूँ तुम्हें –
१. छोटा लक्ष्य: अनवस्थित्त्व को
जीतने के लिए एक समय पर एक ही अभ्यास करो (जैसे: रोज केवल पन्द्रह मिनट 'द्रष्टा भाव' का अभ्यास)।
२. प्रेरणा स्रोत: स्त्यान को तोड़ने
के लिए महापुरुषों की जीवनियाँ या ऐसे ग्रन्थ पढ़ो जो हृदय में सकारात्मक उत्साह
भरें।
३. स्वीकार: यह संशय कि
"मैं किस मार्ग पर हूँ?", बुरा
नहीं है। यह मथानी है। इसी मथानी से अन्त में 'निश्चयात्मिका
बुद्धि' का मक्खन निकलेगा।
मैंने फिर नया सवाल कर दिया चित्त के विचलन को लेकर— महाराज ! संसार में हो रहे
अनाचार-कदाचार-पापाचार (युद्ध, व्यभिचार आदि) मन को व्यथित करते हैं और अपना सही
कर्तव्य निश्चित करने में उलझन होता है—धन-सम्पत्ति और यौवन (भोगेच्छा) को लेकर आणविक
विनाश का ताण्डव हो रहा है और हम सांख्य और भक्ति साधन करते रहें? मोक्ष का
पलायनवाद अपनातें रहें कानन-कन्दराओं में भगोड़ुओं की तरह छिप कर? हम दुष्ट और पापियों का संहार करें या कैवल्य का चिन्तन करें—मनुष्य के
नाते मेरा कर्तव्य क्या है—यही सबसे बड़ा यक्ष प्रश्न है मेरे लिए ।
बाबा मुस्कुराकर बोले— “तुम्हारा प्रश्न वही है
जो कुरुक्षेत्र के मैदान में अर्जुन का था— मुझे कुल का विनाश और अधर्म दीख रहा है और आप
युद्ध या योग की बात कह रहे हैं? मेरा कर्तव्य क्या है?
“ सच पूछो तो जब संसार में आणविक विनाश, व्यभिचार और अनाचार का ताण्डव हो रहा हो, तो सांख्य
और भक्ति केवल 'व्यक्तिगत शान्ति' के
साधन नहीं रह जाते, बल्कि वे 'युद्ध
के अस्त्र' बन जाते हैं। आओ, इस
समुच्चय को कर्तव्य के साथ जोड़कर देखते हैं—
1. सांख्य का उत्तर है— "मोह का त्याग और क्षत्रिय
धर्म"—सांख्य हमें सिखाता है कि जो 'विनाश' हो रहा है, वह प्रकृति का एक तामसिक खेल है। लेकिन सांख्य का अर्थ 'पलायन' (भागना) नहीं है।
· यदि सामने अन्याय हो रहा है और हममें
रोकने की शक्ति है, तो उस समय 'मौन रहना' या
'केवल मोक्ष-चिंतन करना' अकर्म नहीं,
बल्कि पाप ही होगा।
· सांख्य कहता है कि 'पुरुष' निर्लिप्त है, लेकिन जिस शरीर और समाज में है,
वहाँ 'सत्व' की रक्षा
करना प्राकृतिक धर्म है।
2. भक्ति का उत्तर है— "ईश्वर के निमित्त बनना"— भक्ति का अर्थ केवल माला जपना नहीं है।
सच्चा भक्त वह है जो अधर्म के विरुद्ध ईश्वर का 'निमित्त' (Instrument) बन जाए।
· हनुमान जी परम भक्त थे, लेकिन उन्होंने
विध्वंस भी किया और युद्ध भी। उनका युद्ध 'भोगेच्छा' के लिए नहीं, बल्कि 'राम-काज'
(धर्म की स्थापना) के लिए था।
· आज के संदर्भ में, यदि तुम अन्याय के
विरुद्ध आवाज उठाते हो या समाज में शुद्धि के लिए कार्य करते हो, तो वह तुम्हारी सबसे बड़ी भक्ति है। सच पूछो तो आज के लोग भक्ति और
संन्यास का अर्थ भी गलत ले लिए हैं।
3. कर्तव्य की उलझन: "संहार या चिन्तन?"— यहाँ 'समुच्चय' का असली अर्थ प्रकट होता है। इसे ठीक से समझो—
·
हृदय में भक्ति (समर्पण): ताकि क्रोध या अहंकार न आए।
·
बुद्धि में सांख्य (विवेक): ताकि यह समझ सके कि कौन सा कार्य 'धर्म' है और कौन सा 'स्वार्थ'।
·
हाथों में कर्म (शक्ति): जो पापी और दुष्ट हैं, उनका
मानसिक, सामाजिक या कानूनी विरोध करना 'मानव धर्म' है।
अब ये समझो कि वास्तविक कर्तव्य क्या है? एक मनुष्य के नाते कर्तव्य है— 'मर्यादा और
न्याय की रक्षा'।
·
अगर अन्याय देखकर व्यथित हो रहे हो, तो यह तुम्हारे भीतर के 'सत्व
गुण' की पुकार है।
·
सांख्य और भक्ति 'कमजोर' बनाने के लिए नहीं, बल्कि 'स्थितप्रज्ञ' बनाने
के लिए हैं ताकि जब अधर्म के खिलाफ लड़ो, तो खुद अधर्मी न बन
जाओ (जैसे अक्सर गुस्से में लोग बन जाते हैं)।
निष्कर्ष
ये कि मोक्ष का चिन्तन और दुष्टों का प्रतिकार अलग-अलग नहीं हैं। 'अधर्म का
विरोध करना भी मोक्ष की साधना है', बशर्ते वह विरोध
अहंकार से नहीं, बल्कि कर्तव्य-बोध से प्रेरित हो। इस
निष्कर्ष की गहराई को समझने के लिए हमें सांख्य के
विवेक और गीता के
कर्म-कौशल को एक साथ जोड़कर देखना होगा। आमतौर पर हम समझते हैं कि 'मोक्ष' का अर्थ है संसार से आँखें मूँद लेना, जबकि सांख्य
कहता है कि मोक्ष का अर्थ है 'प्रकृति के खेल को
सही-सही समझ लेना'। इस निष्कर्ष को इन तीन विन्दुओं से स्पष्ट
किया जा सकता है—
1. प्रतिकार जब 'स्वार्थ' नहीं, 'यज्ञ' बन जाए— सांख्य के अनुसार, जब हम किसी का विरोध 'व्यक्तिगत
दुश्मनी' या 'क्रोध' (रजस) के कारण करते हैं, तो हम नए कर्म-बन्धन (संचित)
बनाते हैं। लेकिन जब हम समाज में हो रहे अनाचार का विरोध इसलिए करते हैं क्योंकि
वह 'मर्यादा' को तोड़
रहा है, तो वह विरोध 'अकर्म' बन जाता है।
· जैसे एक डॉक्टर जब मरीज के शरीर से सड़ा हुआ
अंग काटता है, तो वह हिंसा नहीं,
'चिकित्सा' है। वैसे ही, समाज के 'कैंसर' (दुष्टों) का प्रतिकार करना समाज की चिकित्सा है। यह मोक्ष की साधना इसलिए है क्योंकि
यहाँ अपने 'स्वार्थ' के लिए नहीं,
बल्कि 'समष्टि' (Universe) के लिए खड़े हैं।
2. अहंकार बनाम
कर्तव्य-बोध—यही वह महीन रेखा है, जो एक 'क्रांतिकारी' और एक 'साधक' के बीच होती है।
·
अहंकार से प्रेरित विरोध: "मैं इसे सबक सिखाऊँगा," "मेरी बात कैसे टाली।" यहाँ 'मैं' बड़ा है। यह तुम्हें और ज्यादा बाँध देगा संसार में ।
·
कर्तव्य-बोध से प्रेरित विरोध: "यह कार्य मानवता के विरुद्ध है, इसलिए इसे रोकना मेरा उत्तरदायित्व है।" यहाँ तुम केवल एक 'निमित्त' (माध्यम) हो।
सांख्य का 'पुरुष' यहाँ साक्षी
है कि बुद्धि अपना कर्तव्य निभा रही है। जब 'कर्तापन'
के अहंकार को त्याग कर धर्म की रक्षा करते हो, तो वही संघर्ष हृदय को शुद्ध कर देता है और चित्त की शुद्धि ही मोक्ष का
द्वार है।
3. अधर्म का विरोध 'साधना' कैसे है?—साधना का अर्थ है—अपने 'सत्व गुण' को बढ़ाना और 'तमस'
(जड़ता/डर) को खत्म करना।
·
अन्याय को चुपचाप सहना 'शान्ति' नहीं, बल्कि 'तमस' (कायरता) है।
तमस में डूबा हुआ व्यक्ति कभी मोक्ष प्राप्त नहीं कर सकता।
·
जब तुम अन्याय के विरुद्ध खड़े होते हो, तो अपने भीतर के डर और मोह को काटते हो। अर्जुन का युद्ध
लड़ना ही उसकी साधना थी, क्योंकि उस युद्ध के बिना वह अपने 'मोह' (अविवेक) को नहीं जीत
पाता।
·
निष्कर्ष यह है कि मोक्ष का अर्थ पलायन नहीं, बल्कि 'पूर्ण जागृति' है। एक जागृत पुरुष संसार
में अंधकार (पाप) को बढ़ते देख हाथ पर हाथ रखकर नहीं बैठ सकता। वह लड़ता है, पर उसका मन 'कृष्ण' (चेतना)
में स्थिर रहता है।
“ एक व्यावहारिक कसौटी— यदि विरोध करते समय मन में 'घृणा' पैदा हो रही है, तो समझ लो कि 'अहंकार' आ गया है। लेकिन यदि विरोध करते समय मन
में 'करुणा और दृढ़ता' है कि "इसे रोकना ही धर्म है", तो समझ लो
कि 'मोक्ष की साधना' ही कर रहे हो। भीष्म पितामह ने अधर्म का साथ दिया (मौन रहकर), इसलिए उन्हें शरशैय्या मिली। लेकिन भगवान कृष्ण ने शस्त्र न उठाने की
प्रतिज्ञा तोड़कर भी धर्म की रक्षा की, क्योंकि वे 'अकर्ता' भाव में स्थित थे। सच्चाई ये है कि 'मौन' रहना भी कभी-कभी सबसे बड़ा पाप हो सकता है।
“क्या तुमको लगता है कि समाज को सुधारना 'प्रकृति' का काम है, तुम्हारा
नहीं? या ये कहना चाहते हो कि 'बिना घृणा के विरोध' कैसे सम्भव है?
यही असली चुनौती है। सच पूछो तो मौन रहना भी पाप है ।
'बिना घृणा के विरोध' कैसे संभव है?-
अब इसी बात पर चर्चा करते हैं। हमारी यह चर्चा अब उस बिंदु पर पहुँच
गई है, जहाँ दर्शनशास्त्र 'युद्ध-शास्त्र' और 'जीवन-कला' दोनों बन
जाता है। सांख्य और गीता के प्रकाश में इन दोनों गुत्थियों को सुलझाते हैं—
1. मौन रहना पाप क्यों है? (The Sin of Silence)— सांख्य दर्शन में 'तमस' को जड़ता और अन्धकार
माना गया है। जब हम अन्याय होते देखकर भी मौन रहते हैं, तो
वह 'शान्ति' नहीं, बल्कि 'तमस' है।
· सहमति का मौन— नीति कहती है— 'मौनं सम्मति लक्षणम्' (मौन रहना सहमति का
लक्षण है)। यदि सामने किसी निर्बल पर
अत्याचार हो रहा है और चुप हैं, तो सांख्य के अनुसार उस
अत्याचार की प्रकृति (System) का हिस्सा बन गए हैं। तुमने
अपनी ऊर्जा (शक्ति) का उपयोग अधर्म को रोकने में नहीं किया, इसका
अर्थ है कि तुमने परोक्ष रूप से अधर्म को फलने-फूलने की अनुमति दे दी।
· कर्तव्य का त्याग: सांख्य में हर 'पुरुष' (आत्मा) का एक प्राकृतिक गुणधर्म होता है।
यदि विवेकशील है, तो उस विवेक का धर्म है—सत्य को अभिव्यक्त करना। सत्य को जानकर भी उसे न बोलना अपने 'स्वरूप' के साथ द्रोह करना है। इसीलिए भीष्म
जैसे धर्मात्मा को भी 'मौन' रहने
के कारण दण्डित होना पड़ा।
2. बिना घृणा के विरोध कैसे सम्भव है? —यही वह कला है, जो एक 'साधारण विद्रोही' और एक 'स्थितप्रज्ञ साधक' के बीच अन्तर करती है। इसे
सांख्य की 'द्रष्टा-भाव' तकनीक से समझा जा सकता है:—
·
बीमारी और बीमार का अन्तर: जैसे एक डॉक्टर 'कैंसर' से नफरत करता है, 'मरीज' से
नहीं। वह पूरी ताकत से कैंसर को काटता है, लेकिन मरीज के
प्रति उसके मन में करुणा होती है। ठीक वैसे ही, विरोध 'कृत्य' (Action) का होना चाहिए, 'कर्ता' (Person) का नहीं।
·
जब तुम 'पाप' से लड़ते हो, तो तुम धर्म कर रहे होते हो।
·
जब तुम 'पापी' से नफरत करने लगते हो, तो तुम अपने भीतर क्रोध और द्वेष का नया 'संस्कार' (नरक) पैदा कर लेते हो।
·
अहंकार का विसर्जन (The 'Instrument' Logic): घृणा तब होती है जब 'मैं'
(अहंकार) लड़ता है। लेकिन जब यह बोध होता है कि "मैं तो केवल
व्यवस्था (प्रकृति) का एक उपकरण हूँ, जिसे इस समय इस अन्याय को रोकना है",
तो घृणा की जगह 'दृढ़ता'
(Firmness) ले लेती है। जैसे एक पुलिसकर्मी जब अपराधी को
पकड़ता है, तो वह अपना 'कर्तव्य'
निभाता है। यदि वह अपराधी को गाली दे या व्यक्तिगत दुश्मनी निकाले,
तो वह 'घृणा' है। यदि वह
केवल कानूनन कार्रवाई करे, तो वह 'शुद्ध
विरोध' है।
·
सांख्य का 'गुण' सिद्धान्त: यह सोचो कि हमारे सामने
वाला व्यक्ति 'तमस' और 'अज्ञान' के वश में होकर यह बुरा कार्य कर
रहा है। वह अपनी बुद्धि का दास है। उस पर क्रोध करने के बजाय उसकी 'मूर्खता' पर दया आनी चाहिए, लेकिन
उसकी 'शक्ति' को कुचलना अपना कर्तव्य
होना चाहिए।
· व्यावहारिक सूत्र: "ठंडा दिमाग, गर्म हाथ। "
·
'बिना घृणा के विरोध' का अर्थ कायरता
या ढीलापन नहीं है। तुम पूरी शक्ति से प्रहार करो, लेकिन
भीतर से शान्त रहो।
·
विरोध (Action): प्रबल और प्रभावी
हो।
·
मन (Mind): निर्लिप्त और शान्त
हो।
निष्कर्ष यह कि मौन रहकर तुम तमस के अपराधी बनते हो और घृणा करके रजस के बन्धन में फँसते हो। इन दोनों के
बीच का मार्ग है— 'सत्व'।
यानी सत्य के लिए खड़े होओ, अन्याय को रोको, लेकिन अपने हृदय के 'प्रेम' और 'साक्षी भाव' को न
खोओ।
“ तुम्हें लगता होगा कि समाज में आज जो माहौल है, उसमें 'बिना घृणा का विरोध' व्यावहारिक रूप से कैसे सम्भव है? क्योंकि क्रोध के बिना
अन्याय के विरुद्ध खड़ा होना कठिन है। किन्तु ऐसी बात नहीं है। तुम्हें यहाँ 'क्रोध' और 'क्रोध के नाटक'
(The difference between Anger and showing Anger) के बीच
के अन्तर को समझना होगा, जो इस मार्ग में बहुत काम आता है।”
बाबा की बातें कई
बार ऊपर-ऊपर निकल जाती हैं। सिद्धान्ततः समझ आ जाने पर भी उसकी व्यावहारिकता पल्ले
नहीं पड़ती। अतः पूछना पड़ा—आपने संस्कार शुद्धि की बात कही है। इन 'संस्कारों की शुद्धि' कैसे की जाए ताकि क्रोध
हमें अचानक 'ओवरटेक' न कर ले।
बाबा मुस्कुराकर बोले— “बड़े चालक बनते हो। एक ही सवाल को बार-बार घुमा-फिरा कर
पूछते हो। खैर, कोई बात नहीं। मुझे भी प्रसन्नता होती है,
ऐसे सवालों का जवाब देने में। आओ सुनो बिलकुल ही मॉडर्न स्टाइल में —'संस्कारों की शुद्धि' का अर्थ है अपनी मानसिक 'हार्ड डिस्क' को ‘री-फॉर्मेट’ करना। सांख्य और योग दर्शन के अनुसार, जब क्रोध
हमें 'ओवरटेक' करता है, तो इसका मतलब है कि हमारे अवचेतन मन में 'क्रोध
के पुराने गहरे निशान' (संस्कार) पहले से मौजूद हैं। जैसे ही बाहर कोई वैसी परिस्थिति आती है, वे निशान तुरन्त सक्रिय हो जाते हैं। इसे शुद्ध करने के लिए तीन स्तरों पर कार्य करना होता है—
1. प्रतिपक्ष-भावनम् (The Power of Opposite Thought)—महर्षि पतञ्जलि का यह सूत्र संस्कारों को बदलने का सबसे वैज्ञानिक तरीका
है। जब भी मन में क्रोध या घृणा का संस्कार उठे, तो जानबूझकर उसके विपरीत
विचार को पैदा करने का प्रयास करो।
·
अभ्यास: यदि किसी व्यक्ति के प्रति तीव्र क्रोध आ रहा है, तो
उस क्षण विचार करो— "यह व्यक्ति अज्ञान के वश में है,
यह खुद अपना कर्म बिगाड़ रहा है।
·
इसका परिणाम होगा— जैसे आग पर पानी डालने से आग शान्त होती है, वैसे ही 'करुणा' या 'विवेक' का विचार बार-बार करने से क्रोध का पुराना
संस्कार धीरे-धीरे कमजोर होने लगता है।
2. विवेक-ख्याति का सूक्ष्म अभ्यास—क्रोध और हमारे बीच एक 'दूरी' होनी चाहिए। 'ओवरटेक' वह
तभी करता है , जब हम उसके साथ एक हो जाते हैं।
·
अभ्यास: क्रोध आने के ठीक पहले वाले क्षण को पकड़ना सीखो, जब वह शरीर में 'गर्मी' या 'बेचैनी' पैदा करता है। उस समय खुद से कहो— "क्रोध आ रहा
है, लेकिन मैं क्रोध नहीं हूँ। मैं इसे देख रहा हूँ।
·
इसका परिणाम—जब तुम 'देखने' वाले (Observer) बन जाते हो, तो
संस्कार को वह ऊर्जा नहीं मिलती, जो उसे भड़काने के लिए चाहिए। ऊर्जा के अभाव में
संस्कार धीरे-धीरे सूख जाते हैं,नष्ट जाते हैं।
3. सत्व-शुद्धि और आहार-विहार—सांख्य दर्शन के अनुसार, हमारे संस्कार हमारे 'गुणों' से बनते हैं। यदि तुम बहुत अधिक
राजसिक (मिर्च-मसाले वाला उत्तेजक) भोजन करोगे या बहुत अधिक तनावपूर्ण (हड़बड़ी
वाला) जीवन जीओगे, तो क्रोध के संस्कार हमेशा 'सक्रिय' (Active) रहेंगे।
·
इसका अभ्यास: सात्विक आहार, पर्याप्त नींद और
नियमित स्वाध्याय (अच्छे ग्रन्थों का पठन)।
·
इसका परिणाम: जब बुद्धि में 'सत्व गुण'
बढ़ता है, तो संस्कार 'दग्ध-बीज' (भुने हुए बीज) की तरह हो जाते हैं।
यानी वे भीतर पड़े तो रहते हैं, लेकिन वे अब उग नहीं सकते।
अब, इसके लिए तुम्हें व्यावहारिक 'डेली रूटीन' टिप्स बतला रहा हूँ—
1. मौन का समय: दिन भर में कम से
कम पन्द्रह-बीस मिनट पूरी तरह मौन रहो। यह तुम्हारे मानसिक तन्त्र को 'कूल' रखने में मदद करेगा।
2. क्षमा का अभ्यास: रात को सोने से
पहले उन सभी लोगों को मानसिक रूप से क्षमा कर दो, जिन्होंने तुम्हारा मन दुखाया
है। इससे पुराने संचित संस्कारों की फाइलें 'क्लोज'
हो जायेंगी।
3. सावधानी(Vigilance): श्रीरामसुखदासजी हमेशा
कहा करते थे कि "सावधानी ही साधना है।" बस इस बात के प्रति सावधान रहो कि मेरा 'क्रियमाण'
बिगड़ने न पाए।
निष्कर्षतः —संस्कारों की शुद्धि रातोंरात वाली बात नहीं है। यह 'शनैः शनैः' होने
वाली प्रक्रिया है। जैसे गंदे पानी के बर्तन में हम साफ पानी डालते रहें, तो एक समय ऐसा आता है, जब सारा गंदा पानी बाहर निकल जाता है और केवल शुद्ध
जल बचता है। वैसे ही, सत्व गुणी विचारों के प्रवाह से पुराने
संस्कार धुल जाते हैं। ”
भाऊक नेत्रों से बाबा को
निहारते हुए मैंने कहा— महाराज ! अब आप कृपा करके सात्विक जीवनशैली के व्यावहारिक पक्ष के साथ-साथ क्रोध के 'शारीरिक' (Physiological)
पक्ष पर प्रकाश डालें, ताकि सही ढंग से
इसे जीवन में उतारा जा सके।
मुदित मन बाबा ने कहा—“ तुम्हारी जिज्ञासा बहुत ही महत्वपूर्ण है। किसी भी व्यक्ति
के सामने, विशेष कर जो इन सब बातों को समझना-जानना-अपनाना चाहता है, उसके सामने ये
व्यावहारिक समस्याएँ खड़ी होती है। आओ इसे नये जमाने के कम्प्यूटर शैली में ही
समझाने का प्रयास करता हूँ ।
“ सांख्य और योग दर्शन के आलोक में तुम्हारे द्वारा रेखांकित
निष्कर्ष के दोनों बिंदुओं—सात्विक जीवनशैली और क्रोध का शारीरिक नियन्त्रण— ठीक वैसे ही हैं संस्कारों की शुद्धि के लिए जैसे तुम्हारे कम्प्यूटर के 'हार्डवेयर'
और 'सॉफ्टवेयर' हैं।
ये दोनों समान रूप से जरुरी हैं सही ऑपरेटिंग के लिए। इसे यूँ समझों—
1. सात्विक जीवनशैली— संस्कारों का 'कच्चा
माल' (The Raw Material)— सांख्य दर्शन कहता है— 'आहारशुद्धौ
सत्त्वशुद्धिः'। हम जो कुछ भी ग्रहण करते हैं , वही
हमारे संस्कारों का निर्माता है।
·
आहार –सामान्यतौर लोग आहार का अर्थ मुँह से लिया गया अन्न-जलादि समझते
हैं। किन्तु आहार का गूढ़ अर्थ पञ्च ज्ञानेन्द्रियों द्वारा आहरित (भीतर ग्रहण
किया गया)— भोजन, दर्शन, स्पर्शन, श्रवण आदि
सब कुछ है। तीन गुणों पर आधारित त्रिविध आहार कहे गए हैं। सात्विक आहार
बुद्धि को शान्त करता है। राजसिक-तामसिक आहार काम-क्रोधादि को उत्तेजित करता है। आहार
से विहार और विचार सभी प्रभावित होते हैं।
·
विचार-संग (Environment): क्या पढ़ रहे हैं? किन लोगों के साथ उठना-बैठना हो रहा है? विचारणीय है। यदि हम दिन भर हिंसा, भ्रष्टाचार या नफ़रत
की खबरें पढ़ेंगे, तो हमारे 'क्रियमाण'
में क्रोध का बीज अनजाने में ही पड़ जाएगा।
·
सात्विक जीवनशैली का अर्थ है— 'सूचनाओं का उपवास'। जो विवेक को दूषित करे, उसे
देखना-सुनना बंद करना चाहिए।
·
नियमितता (Discipline): समय पर सोना और जागना 'तमस'
को काटता है। तमस ही वह खाद है, जिससे ताकत पाकर क्रोध और अविवेक के
संस्कार फलते-फूलते हैं।
2. शारीरिक (Physiological) पहलू:
क्रोध पर 'ब्रेक' (The Break Mechanism)—जब क्रोध का संस्कार जागता है, तो वह सबसे पहले शरीर पर हमला करता है। सांसें तेज हो जाती हैं, मांसपेशियाँ
तन जाती हैं और दिल की धड़कन बढ़ जाती है। इस स्थिति में यदि शरीर को सम्भाल लें,
तो क्रोध का संस्कार 'ओवरटेक' नहीं कर पाएगा।
·
प्राण और मन का सम्बन्ध: योग कहता है— 'चले वाते
चलं चित्तं' (जब सांस अस्थिर होती है, तो मन भी अस्थिर होता है)। क्रोध आते ही अपनी सांसों को गहरा और धीमा (Deep
Breathing) करना चाहिए। जैसे ही हम सांसों को नियन्त्रित करते हैं,
मस्तिष्क को संदेश मिलता है कि सब ठीक है, और क्रोध का रासायनिक उफान (Adrenaline
rush) शांत हो जाता है।
·
शीतली और भ्रामरी प्राणायाम: ये दो प्राणायाम सीधे हमारे 'नर्वस
सिस्टम' को शीतल करते हैं। संस्कारों की शुद्धि के लिए
इनका नियमित अभ्यास मन के 'ताप' को कम करता है।
·
शारीरिक शिथिलता (Relaxation): क्रोध आने पर मुट्ठियाँ
भिंच जाती हैं। जानबूझकर अपनी हथेलियों को खुला छोड़ दो और कंधों को ढीला कर दो।
शरीर की यह 'मुद्रा' (Posture) क्रोध
के संस्कार को टिकने की जगह नहीं देती।
“सात्विक जीवनशैली आधार (बेस) को मजबूत करती है, ताकि क्रोध जल्दी आए ही नहीं। शारीरिक नियन्त्रण (प्राणायाम
आदि) उस समय 'इमरजेंसी ब्रेक' का काम करता है,विशेषकर तब जब क्रोध बिलकुल दरवाजे पर खड़ा हो। क्रोध 'आग' है। सात्विक जीवनशैली उस आग के लिए 'ईंधन' (Fuel) को कम कर देती है और शारीरिक नियन्त्रण
उस पर 'पानी' डाल देता है। संसार और
साधना का तालमेल इसी में है कि कैसे दफ्तर की
फाइलों, बाजार की भीड़ और परिवार की जिम्मेदारियों के बीच
अपने 'भीतर के सांख्य' (inner observer) को सदा जीवित रखो।
“अब हम उस बिंदु पर हैं, जहाँ दर्शन (Theory) और जीवन (Practice) का मिलन होता है। संसार में रहते हुए कर्तव्यों का निर्वाह करना और साथ ही
'शून्यावस्था' (State of Pure Consciousness) की ओर बढ़ना, ठीक वैसा ही है, जैसे पानी में रहकर भी
कमलपत्र का सूखा रहना—पद्मपत्रमिवाम्भसा । सांख्य और गीता के आलोक में इसके चार मुख्य चरण हैं—
१.
'कर्तव्य' को 'प्रकृति'
का कार्य मानना—
Ø सांसारिक दायित्वों (ऑफिस, परिवार, समाज) के बीच सबसे बड़ी बाधा 'कार्यभार' का होता है। हम सोचते हैं—"मुझे यह सब करना पड़
रहा है।"
Ø
सांख्य का समाधान: यह समझो कि यह शरीर, बुद्धि और इन्द्रियाँ
'प्रकृति' का हिस्सा हैं और वे अपने
गुणों के अनुसार कार्य कर रही हैं। हम (पुरुष) केवल उसके प्रकाशक हैं।
Ø
व्यावहारिकता: दफ्तर में काम करते समय यह भाव रखे कि "बुद्धि
अपना कौशल दिखा रही है, हाथ अपना काम कर रहे हैं,
मैं तो बस इनका साक्षी हूँ।" जब तुम 'कर्ता' के बोझ को उतार देते हो, तो काम की थकान कम हो जाती है और मन 'शून्यता'
के करीब बना रहता है।
२.
'फल-त्याग' नहीं, 'फल-समर्पण' (Detach from Results)—
·
शून्यावस्था तब भंग होती है, जब हम भविष्य की चिंता (चिंता = रजस) या
परिणाम के डर (डर = तमस) में उलझते हैं।
- सूत्र: अपने काम को पूरी कुशलता (Excellence)
से करो, क्योंकि वह तुम्हारा 'क्रियमाण' है। लेकिन काम खत्म होते ही उसके
परिणाम की फाइल मन में 'बंद' कर दो।
- जैसे
ही तुम परिणाम से मुक्त होते हो, वर्तमान क्षण (Present Moment) में एक 'शून्य'(Space) पैदा होता है। यही
शून्य साधना का आधार है।
“ ध्यान रखो—'भीतर का एकान्त' कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण है, बाहर के एकान्त से — सांसारिक दायित्वों के बीच हमें
शारीरिक एकान्त नहीं मिल सकता, लेकिन 'मानसिक एकान्त' सम्भव है। इसके लिए दिन भर में कई बार थोड़े-थोड़े विश्राम 'माइक्रो-ब्रेक्स' का अभ्यास करो--बस दस-बीस-तीस सेकंड के लिए रुको
और याद करो— "मैं यह नाम-रूप नहीं हूँ, मैं अचल चेतना हूँ।" यह अभ्यास संसार के
कोलाहल के बीच तुम्हारे भीतर एक 'साइलेंट ज़ोन' (Silent
Zone) बना देता है। जब तुम बाहर से बहुत व्यस्त हो, तब भी भीतर से 'शून्य' रहने
की कला यही है। इस 'शून्य' का
अर्थ क्या है? इसे समझो—
·
सांख्य में जिसे 'विवेक-ख्याति' कहते हैं, वही शून्यावस्था का मार्ग है। यहाँ 'शून्य' का अर्थ 'कुछ नहीं' (Nothingness) नहीं है, बल्कि 'विचारों
और संस्कारों की भीड़ से खाली होना' है।
- जब
तुम अपने कर्तव्यों को 'निष्काम भाव' से करते हो, तो पुराने संस्कार
कटने लगते हैं और नए संस्कार बनते नहीं।
- धीरे-धीरे
मन इतना साफ हो जाता है कि वहाँ कोई हलचल रह ही नहीं जाता।
- इस
निर्मलता को 'शून्यावस्था' या 'स्वरूपावस्थानम्' कहते हैं।
“ इसे एक व्यावहारिक उदाहरण से समझो— मान लो कि परिवार में किसी समस्या को
सुलझा रहे हो। ऐसे में—
· अज्ञान की स्थिति: भावुक होकर
चिल्लाते हैं, परेशान होते हैं (यहाँ शून्य खो गया)।
· साधना की स्थिति: तुम पूरी दृढ़ता से
सही बात कहते हो, समस्या सुलझाते हो, लेकिन
भीतर जानते हो कि यह 'प्रकृति का एक दृश्य' है, जो अभी गुजर जाएगा। समस्या सुलझते ही तुम शान्त हो जाते हो। निष्कर्ष
ये कि संसार से भागकर नहीं, बल्कि संसार के बीच 'अकर्ता' होकर रहने से ही शून्यावस्था
उपलब्ध होती है। कर्तव्य का पालन 'बन्धन' नहीं है, बल्कि यदि
वह सही ढंग से किया जाए, तो वह पुराने कर्माशय को धोने का 'साबुन' है।
“ संवाद की इस धारा को अब हम 'शून्यावस्था' के उस शिखर की ओर ले चलते हैं, जहाँ पहुँचकर संसार
का पूरा परिदृश्य ही बदल जाता है।
सांख्य और योग दर्शन की गहराई में 'शून्यता' का अर्थ यह नहीं है कि कुछ
गायब हो गया है, बल्कि इसका अर्थ है कि वह 'भीड़' (Noise) खत्म हो गई है, जो हमें सच
देखने नहीं दे रही थी। इसे समझाने के लिए हम तीन विन्दुओं पर चर्चा करेंगे—
1. 'शून्य' का द्वार: साक्षी भाव की
पराकाष्ठा—संसार में रहते हुए जब तुम अपने कर्तव्यों को 'प्रकृति का कार्य'
मानकर करने लगते हो, तो धीरे-धीरे तुम और
तुम्हारे विचारों के बीच एक दूरी (gap) पैदा होने लगती है। शुरुआत में तुम कोशिश करके खुद को अलग देखते हो,
लेकिन एक स्थिति ऐसी आती है, जहाँ यह स्वतः
(Natural) अलगाव होने लगता
है। जैसे ट्रैफिक को सड़क के
किनारे खड़े होकर देख रहे हो। गाड़ियाँ (विचार/कर्तव्य) आ रही हैं और जा रही हैं,
लेकिन तुम वहीं स्थिर हो। इसी 'स्थिरता'
को शून्य का प्रारम्भ कहते हैं।
2. 'शून्यावस्था' में संसार का स्वरूप
(The Transformed Vision)— जब साधक इस शून्यावस्था के करीब
पहुँचता है, तो उसे संसार वैसा
नहीं दिखता जैसा पहले दिखता था।
· मिथ्यात्व का बोध: उसे समझ आता है कि
जिस 'पद', 'प्रतिष्ठा' या 'अपमान' के लिए वह अब तक
व्यथित था, वे सब केवल 'गुणों
के परिणाम' थे।
· प्रकृति का नर्तन: उसे दिखता है कि
हर व्यक्ति अपनी प्रकृति और अपने संस्कारों के वश में होकर नाच रहा है। जैसे फिल्म
के पर्दे पर आग लगने से पर्दा नहीं जलता, वैसे ही संसार के
युद्धों और प्रलयों से 'भीतर का शून्य' प्रभावित नहीं होता।
· अखण्ड शान्ति: बाहर बहुत शोर हो
सकता है, तुम युद्ध के मैदान में भी हो सकते हैं, लेकिन भीतर एक गहरा सन्नाटा रहता है। यह सन्नाटा डरावना नहीं, बल्कि अत्यन्त आनन्दमयी
और तृप्तिदायक होता है।
3. शून्य से 'पूर्ण' की ओर (From Zero to Whole)— सांख्य कहता है कि जब चित्त पूरी तरह
शून्य (खाली) हो जाता है, तभी उसमें 'पुरुष' (चेतना) का शुद्ध प्रतिबिम्ब झलकता है।
· जब तक दर्पण पर धूल (अहंकार/वासना) है, चेहरा नहीं दिखता।
· शून्य होने का अर्थ है— दर्पण का पूरी
तरह साफ हो जाना।
· हैरानी की बात यह है कि जैसे ही तुम 'शून्य' होते हो, 'पूर्ण' हो जाते हो। अब किसी व्यक्ति या वस्तु से सुख की भीख नहीं माँगते, क्योंकि स्वयं आनन्द-स्रोत बन चुके हो ।
“ यहाँ तुम कह सकते हो कि ऐसी स्थिति में कर्तव्य का निर्वाह
कैसे होगा। तो जान लो कि शून्यावस्था वाला व्यक्ति आलसी नहीं होता। बल्कि वह संसार
में सबसे अधिक सक्रिय होता है। क्योंकि उसके पास 'राग-द्वेष'
(Attachement-Repulsion) नहीं है, इसलिए उसकी
निर्णय लेने की क्षमता (Decision making) अचूक हो जाती है। वह
बिना किसी तनाव के बड़े से बड़े दायित्व निभा लेता है, क्योंकि उसे 'हारने का डर' नहीं और 'जीतने
का अहंकार' नहीं। वह बस 'होने'
के आनन्द में कर्म करता है। यदि तुम
दिन भर के थकान के बाद भी रात को बिना किसी बोझ के, बिना
किसी मानसिक उथल-पुथल के सो पा रहे हो, तो समझ लो कि तुम्हारे
भीतर 'शून्य' का बीज अंकुरित हो रहा
है।
“अब आगे हम 'भीतर के एकांत'
(Inner Solitude) को विकसित करने के व्यावहारिक और विशिष्ट
अभ्यास पर बात करते हैं। इसे तुम 'शून्यावस्था' की ओर जाने वाली सीढ़ी का पहला डंडा मान सकते हो। संसार के कोलाहल के बीच
रहते हुए भी अपने भीतर एक अभेद्य किला बनाने के लिए सांख्य
और योग के कुछ विशिष्ट अभ्यास—
1. 'तटस्थ अवलोकन' का अभ्यास (The
5-Step Observation)— दिन में तीन बार (सुबह, दोपहर, शाम) केवल दो मिनट के लिए इस प्रक्रिया को अपनाया जा सकता है प्रयोग के
तौर पर—
· प्रथम चरण : आँखें बंद करो या खुली रखो, बस
शरीर को स्थिर कर लो।
· द्वितीय चरण: अपने आस-पास की आवाजों को सुनो—बिना
उन्हें कोई 'नाम' दिए (जैसे 'शोर' या 'गाना')। बस उन्हें 'लहरें' मानो।
· तृतीय चरण : अपने शरीर के भीतर उठ रही संवेदनाओं (गर्मी, खुजली, भारीपन) को देखो।
· चतुर्थ चरण : अब मन में उठ रहे विचारों को देखो, जैसे सड़क पर चलती गाड़ियों को देखते हो।
· पञ्चम चरण : अंत में खुद से पूछो— "इन
सबको जो देख रहा है, वह कौन है?"
· यह अभ्यास तुम्हारे और तुम्हारी
परिस्थितियों के बीच एक 'स्पेस' (Space) पैदा कर देता है। यही 'भीतर का एकान्त' है।
2. 'नाम-रूप' का विसर्जन (Dissolving
Labels)— हमारा मन वस्तुओं और व्यक्तियों के साथ जुड़ी 'परिभाषाओं' से परेशान होता है।
·
अभ्यास: जब तुम किसी से बात कर रहे हो या काम कर रहे हो, तो
मन ही मन कहो— "यह केवल 'प्रकृति'
का एक रूप है।"
·
जब तुम बॉस को 'बॉस' न देखकर केवल 'रजोगुण की
सक्रियता' के रूप में देखते हो, तो
उनका प्रभाव कम हो जाता है। ऐसे में काम तो बेहतर करते हो, पर
मानसिक रूप से अछूते रहते हैं।
3. 'अन्तर्मौन' के छोटे क्षण (Micro-Silence)—
·
अभ्यास: मोबाइल बजने पर उसे उठाने से पहले या ईमेल भेजने से पहले, बस एक गहरी सांस लो और स्वयं को याद दिलाओ— "मैं (पुरुष) इस
क्रिया से अलग और शान्त हूँ।
·
ये छोटे-छोटे 'पॉज' (Pause) तुम्हारी तन्त्रिका तन्त्र (Nervous
system) को संसार के साथ पूरी तरह चिपकने (Attachment) से रोकते हैं।
“ शून्यावस्था में पहुँचने के बाद संसार कैसा दिखाई देता
है? इसके बारे में पहले भी बतला चुके
हैं। उसे ही और स्पष्ट करते हैं, ताकि बाद में होने वाली शंकाओं का समाधान तुम्हें
अभी मिल जाए। जब यह 'भीतर का एकान्त' गहरा
हो जाता है और 'शून्यावस्था' में
प्रवेश करते हो, तो संसार का पूरा 'रंग-ढंग'
बदल जाता है—
1. संसार एक 'खेल' (लीला) जैसा—जैसे तुम जानते हो कि फिल्म के पर्दे
पर दिख रहा खून असली नहीं है, वैसे ही शून्यावस्था में व्यक्ति को संसार की सुख-दुख वाली
घटनाएँ 'प्रकृति का नाटक' लगने लगती हैं। ऐसे में वह पूरी गम्भीरता से अपना रोल निभाता है, पर भीतर से जानता है कि यह सब 'अस्थायी' है।
2. राग-द्वेष की समाप्ति—पहले जो व्यक्ति बहुत 'प्रिय' या बहुत 'अप्रिय' लगते थे,
अब वे केवल 'तत्वों का मेल' दिखाई देते हैं। शत्रु के प्रति घृणा खत्म हो जाती है और मित्र के प्रति
आसक्ति भी। इसकी जगह एक 'सहज करुणा' ले लेती है।
3. समय का थम जाना— शून्यावस्था में
व्यक्ति 'अतीत' के पछतावे और 'भविष्य' की चिंता से मुक्त हो जाता है। उसे ऐसा लगता
है जैसे वह 'सनातन वर्तमान' (Eternal Now) में खड़ा है। काम की आपाधापी के बीच भी उसे कोई हड़बड़ी महसूस नहीं होती।
4. नए सौन्दर्य का बोध— जब मन के विचारों
का शोर (Noise) शान्त हो जाता है, तो
प्रकृति के सूक्ष्म रूप (एक पत्ता, बहती हवा, एक बच्चे की मुस्कान) में भी उसे उस 'परम
चेतन' की झलक दिखने लगती है। संसार अब बोझ नहीं,
बल्कि 'चैतन्य का विलास' बन जाता है। 'भीतर का एकांत' वह अभ्यास है और 'शून्यावस्था'
वह अनुभव।
अभ्यास से हम भीड़ में भी अकेले रह सकते हैं और अनुभव होने पर हम अकेलेपन में भी 'पूर्ण' (सबके साथ एक) हो जाते हैं।
“ आओ अब कुछ और व्यावहारिक चुनौतियों और सावधानियों की चर्चा
करते हैं। व्यावहारिक रूप से तादात्म्य की चुनौती आती है। सड़क पर भागती गाड़ियों
को तटस्थ होकर देखना और घर-परिवार के बीच रहने में काफी अन्तर है। क्यों कि एक जगह
जुड़ाव का अभाव है और दूसरी जगह सिर्फ जुड़ाव ही है। इसका समाधान जरा जटिल तो है,
किन्तु अभ्यास जारी रखना है। रिश्तों के व्यवहार को भी 'हाईवे
की गाड़ियों' की तरह देखना होगा। अगर पत्नी, बच्चा या मित्र कुछ कह रहा है, तो मन में कहो—
"यह इस व्यक्ति की प्रकृति बोल रही है।" सामने वाले के व्यवहार को उसका 'निजी
हमला' न मानकर उसकी 'प्रकृति
का गुण' (सत्व, रज या तम) मानो।
जैसे ही तुम सम्बन्धों का 'लेवल' हटा
देते हो, भीतर का एकान्त सुरक्षित हो
जाता है। ध्यान देने की बात ये है कि बाजार की भीड़ में तुम अकेले इसलिए रह
पाते हो, क्योंकि वहाँ तुमको किसी से कुछ चाहिए नहीं। लेकिन रिश्तों में हम 'अपेक्षाओं' का बोझ लेकर चलते हैं। अपेक्षा भंग होते ही भीतर का सन्नाटा चीख में बदल
जाता है। अतः सांख्य का 'सत्कार्यवाद' अपनाओ जिसकी चर्चा पहले भी कर आए हैं। यह मान लो कि सामने वाला वही देगा,
जो उसके पास है। नींबू को निचोड़ने पर संतरा नहीं निकलेगा। जब तुम व्यक्ति को वैसा
ही स्वीकार कर लेते हो, जैसा वह है, तो तुम्हारी अपेक्षाएँ
गिरने लगती हैं और तुम रिश्तों के बीच भी वैसे ही अकेले (स्वतन्त्र) हो जाते हो,
जैसे हाईवे के किनारे। किन्तु पुनः ध्यान दिलाता हूँ कि 'भीतर
का एकांत' का अर्थ बाहर से कट जाना नहीं है। असल में,
जब तुम भीतर से शान्त होते हो, तो तुम्हारी इन्द्रियाँ
और अधिक सक्रिय होनी चाहिए। इसे 'दोहरी चेतना'
(Double Consciousness) कहना चाहिए— एक हिस्सा भीतर 'शून्य' में टिका रहे और दूसरा हिस्सा बाहर के 'ट्रैफिक' (रिश्ते या सड़क) के प्रति पूरी तरह सचेत
रहे। कृष्ण युद्ध के मैदान में पूरी तरह साक्षी भी थे और पूरी तरह युद्ध में रत
भी।
“ रिश्तों में 'एकांत' बनाए रखने के लिए एक छोटे से अभ्यास का
प्रयोग सुझाता हूँ—जब भी कोई चुनौतीपूर्ण सामाजिक-पारिवारिक
स्थिति आए (जैसे किसी बात पर बहस या शोर-शराबा), तो मन ही मन
एक मन्त्र दोहराओ— "दृश्य बदल रहा है, पर देखने वाला (मैं) वही हूँ।"
·
गुस्सा आया (दृश्य)।
·
शांति आई (दृश्य)।
·
अपमान हुआ (दृश्य)।
·
इन सबके पीछे जो 'स्थिर आकाश' है, वही तुम्हारा
एकान्त है।
यानी रिश्तों में 'क्षणभंगुरता' का बोध ही तुमको एकान्त देता है। यह याद रखना कि यह साथ केवल कुछ समय का है, अन्ततः हर पुरुष
(आत्मा) अकेला ही है। ये सोच तुम्हें रिश्तों में प्रेम तो करने देगा, पर गुलाम नहीं होने देगा। ”
काफी देर से मैंने कोई टोकटाक नहीं किया था। अभी अचानक बाबा की
बातों की गहराई में गोते लगाता मन ऊब-चूब होने लगा। बाबा सांख्य का ककहरा पूरा कर
चुके थे, किन्तु मन अभी सांख्य के तीसरे पायदान पर ही अटका पड़ा था।
नतमस्तक,करवद्ध प्रार्थना किया—महाराज ! सारे खुराफातों का जड़ तो ये मन ही है न ! मेरा मन पुनः संशय ग्रस्त हो रहा है । बोलचाल में लोग सीधे मन>बुद्धि>विवेक कह देते हैं, जबकि बात किचित् भिन्न है। अतः कृपया मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः। बन्धाय विषयासक्तं मुक्त्यै निर्विषयं स्मृतम्।। को पुनः स्पष्ट करें।
>>>>> कृपया अगली कड़ी की प्रतीक्षा करें>>>>
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