साधक का द्वन्द्व (आत्ममन्थन के नवनीत) चौथा भाग

 


साधक का द्वन्द्व (आत्ममन्थन के नवनीत) 

        चौथा भाग..,

                          गतांश से आगे पृ.80 से 105

कृपया मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः। बन्धाय विषयासक्तं मुक्त्यै निर्विषयं स्मृतम्।। को पुनः स्पष्ट करें।

 

            इस बार बाबा बड़े जोर से ठहाका लगाए अपने पुराने अन्दाज में। ठहाके की ध्वनि चहुँ ओर व्याप गई माँ मंगलेश्वरी के शिखर तक। फिर शान्त होकर कहने लगे— मूलतः ये श्लोक अमृतबिन्दु उपनिषद्  का है, जिसकी चर्चा विष्णुपुराण में भी है। यह श्लोक सांख्य के 'मन' और 'मोक्ष' के अन्तः सम्बन्धों को समझने की कुँजी है । प्रधान (पुरुष) के अतिरिक्त सांख्य के चौबीस तत्वों में विकासक्रम में  इसका स्थान तीसरा है, ये तुमने सही कहा। प्रकृति महत् (बुद्धि) अहंकार मन। इसे इन्द्रियों का राजा कहा गया है। सांख्य की दृष्टि से ये 'उभयात्मक इन्द्रिय'  है, क्योंकि यह ज्ञान भी ग्रहण करता है और कर्म की प्रेरणा भी देता है। सांख्य के अनुसार, मन अपने आप में न बुरा है न अच्छा। यह एक 'दर्पण' या 'खिड़की' की तरह है। उक्त श्लोक में बन्धाय विषयासक्तं (बन्धन का कारण) की जो बात आयी हैयानी  मन जब 'अहंकार' के प्रभाव में आकर बाहरी दुनिया (विषयों) की ओर खिंचता है, तो वह पुरुष (आत्मा) को यह भ्रम दिला देता है कि "मैं सुखी हूँ" या "मैं दुखी हूँ"। सांख्य में बन्धन का अर्थ हैपुरुष का प्रकृति के साथ गलत तादात्म्य (Identification)। मन ही वह सेतु है, जो पुरुष को प्रकृति के विषयों में फँसा देता है। मुक्त्यै निर्विषयं (मुक्ति का कारण)— जब वही मन अन्तर्मुखी होकर 'बुद्धि' के प्रकाश में यह देखने लगता है कि विषय केवल क्षणभंगुर तमाशा हैं, तो वह 'निर्विषय' (बिना विषयों के) होने लगता है। जब मन शान्त हो जाता है, तब 'पुरुष' को अपना अलग होना स्पष्ट रूप से दिखने लगता है। अब ये समझो कि मन को 'सबसे जटिल' क्यों कहा गया? सांख्य की दृष्टि में मन की जटिलता के तीन प्रमुख कारण हैं—

     अति-चंचलता (Speed): यह बुद्धि (Intelligence) से नीचे है, लेकिन इन्द्रियों के सबसे करीब है। यह पल भर में विषयों का ताना-बाना बुन लेता है।

     संकल्प-विकल्प: मन का स्वभाव ही है—"यह करूँ या वह?" "यह मेरा है या नहीं?" इसी ऊहापोह में सत्य (विवेक ज्ञान) छिप जाता है।

     द्वैत का निर्माता: सुख-दुख, लाभ-हानि और पाप-पुण्य जैसे द्वन्द की उत्पत्ति मन के स्तर पर ही होती है।

मन को समझने का व्यावहारिक सूत्र—सांख्य कहता है कि मन को वश में करने का तरीका 'लड़ना' नहीं, बल्कि 'दूरी' बनाना है। जब तुम मन को 'तीसरा तत्व' मान लेते हो (यानी वह तम नहीं, बल्कि तुम्हारा एक 'उपकरण' है) तब उसकी जटिलता सुलझने लगती है। सांख्य की गहराई में उतरने का यह बहुत ही सुन्दर क्रम है। मन, बुद्धि और विवेक को एक साथ रखने से बोलचाल में गड्ड-मड्ड (mix) हो जाता है। अतः सुनो पहले 'विवेक' को स्पष्ट करते हैं। आम तौरपर 'विवेक' का अर्थ होता हैअच्छे और बुरे में फ़र्क करना। सांख्य का 'विवेक ख्याति' (Discriminative Enlightenment) इससे कहीं अधिक वैज्ञानिक और सूक्ष्म है। सांख्य का विवेक  केवल 'सही-गलत' का चुनाव नहीं है। यह 'जड़' (प्रकृति) और 'चेतन' (पुरुष) को एक-दूसरे से पूरी तरह अलग देख लेने की क्षमता है। इन दोनों में अन्तर को समझो—

·           मन: विषयों को पकड़ता है (संकल्प-विकल्प)।

·           बुद्धि: निर्णय लेती है ।

·           विवेक-ख्याति: जब बुद्धि इतनी शुद्ध हो जाए कि वह दर्पण की तरह चमकने लगे और उसमें यह साफ दिखने लगे कि"मैं (आत्मा) यह बुद्धि, मन या शरीर नहीं हूँ।"  इसी 'अलगाव' के अनुभव को विवेक-ख्याति कहते हैं।

·           निष्कर्ष: सांख्य का विवेक ही अन्तिम सत्य है; सामान्य बोलचाल वाला विवेक तो बस उसका शुरुआती स्तर है।

अब  मन के अन्य सूक्ष्म कार्यों की बात करते हैं— बुद्धि और अहंकार के साथ तालमेल की बात — मन अकेला काम नहीं करता। इन्द्रियाँ हज़ारों सूचनाएं लाती हैं, मन उनमें से किसे चुनता है? यह उसके संस्कारों पर निर्भर है। यहाँ अहंकार का प्रभाव है— जैसे ही मन कोई सूचना लाता है (जैसे: "यह फूल है"), अहंकार तुरन्त जुड़ जाता है—"यह मेरा फूल है।" यहीं से सारा द्वन्द्व शुरू होता है। अन्त में बुद्धि तय करती है कि उस फूल का क्या करना है।

सांख्य दर्शन की यह परिणति बहुत ही रोचक है। जब एक व्यक्ति को 'विवेक-ख्याति' प्राप्त हो जाती हैअर्थात वह जान जाता है कि वह 'पुरुष' (शुद्ध चेतना) है और उसका इस 'प्रकृति' के खेल से कोई वास्तविक सम्बन्ध नहीं हैतो उसके जीवन में एक बहुत बड़ा मनोवैज्ञानिक बदलाव आता है। तुम्हारे संशय को सुलझाने के लिए हम इसे तीन बिंदुओं में देख रखते हैं—

1. ज्ञानी का आचरण: क्या वह मर्यादाहीन हो सकता है? बिलकुल नहीं। यहाँ सांख्य की दृष्टि बहुत स्पष्ट हैविवेक प्राप्त व्यक्ति कभी मर्यादाहीन नहीं होता, बल्कि वह 'स्वाभाविक रूप से सत्वगुणी' हो जाता है। इसका कारण है मर्यादाहीनता या बुरा आचरण 'रजस' (लालच/क्रोध) और 'तमस' (मोह/अज्ञान) से पैदा होता है। जिसके पास विवेक है, उसके भीतर से रज और तम की जड़ें कट चुकी होती हैं। जैसे एक बुझा हुआ दीया फिर से आग नहीं फैला सकता, वैसे ही जिसका 'अहंकार' शांत हो गया है, वह किसी को दुःख नहीं पहुँचा सकता। उसका आचरण समाज के लिए 'धर्म' बन जाता है, इसलिए नहीं कि वह किसी नियम से डरा हुआ है, बल्कि इसलिए क्योंकि अब उसके भीतर कोई स्वार्थ (अहंकार) बचा ही नहीं।

2. 'जीवनमुक्त' की स्थिति (The Living Liberated)सांख्य में इसे 'जीवनमुक्ति' कहते हैं। शरीर वैसे ही चलता रहता है, जैसे कुम्हार का चाक डंडा हटा लेने के बाद भी पिछले वेग (momentum) के कारण घूमता रहता है।

·                 कर्मों का स्वरूप: वह कर्म तो करता है, पर वे कर्म 'बीज' नहीं बनाते। यानी उन कर्मों से कोई नया 'पाप-पुण्य' पैदा नहीं होता।

·                 इसे 'दग्ध-बीज' (जला हुआ बीज) न्याय कहते हैं। जैसे भुने हुए चने को मिट्टी में बोने पर पौधा नहीं उगता, वैसे ही विवेकशील व्यक्ति के कर्मों से 'संसार' का नया बंधन नहीं बनता।

ऐसे में तुम्हें  आशंका हो सकती है कि उसका लोकव्यवहार कैसा होगा। वस्तुतः वह 'बिना कटे' ही प्रेम की गहराई में उतर जायेगा। जैसा कि हमने पहले चर्चा की थी, विवेक प्राप्त व्यक्ति अब रिश्तों और कार्यों को एक 'साक्षी' की तरह देखता है। वह प्रेम करता है, लेकिन उसमें 'अधिकार' नहीं होता। वह सेवा करता है, लेकिन उसमें 'कर्तृत्व' (Doership) नहीं होता कि "मैंने किया"। वह दुःख में भी विचलित नहीं होता, क्योंकि वह जानता है कि दुःख 'बुद्धि' को हो रहा है, 'पुरुष' को नहीं। जब व्यक्ति इस 'शून्य' (जहाँ कोई व्यक्तिगत इच्छा नहीं है) में टिक जाता है, तो उसकी क्रियाशीलता 'लोक-संग्रह' (संसार के कल्याण) के लिए होती है। वह इसलिए काम नहीं करता कि उसे कुछ पाना है, बल्कि इसलिए करता है, क्योंकि शरीर और इन्द्रियों का 'स्वभाव' ही कर्म करना है।

            मैं फिर फँस गया— सांख्य कहता है कि सब कुछ 'प्रकृति' ही कर रही है और 'पुरुष' केवल दृष्टा है, तो फिर मैं प्रयास क्यों करूँ किसी कार्य के लिए ? या साधना की क्या आवश्यकता है?

          बाबा फिर मुझे संशय के दलदल से निकालने का उद्योग करने लगे— दिमाग की खिड़की खोल कर,कान के मैल साफ कर, ध्यान से मेरी बातों को सुनो  कि 'प्रकृति के भरोसे छोड़ देने' और 'विवेक में प्रतिष्ठित होने' में क्या अन्तर है? सांख्य दर्शन के इस 'क्रांतिकारी मोड़' पर तुम्हारी जिज्ञासा बहुत ही मौलिक है। यहाँ 'चित्त' की स्थिति और 'प्रयास' की आवश्यकता को समझना ही साधना का असली मर्म है। इसे आगे तीनों बिंदुओं में खोलते हैं—

1. चित्त और मन: एक या दो? (The Anatomy of Inner Instrument)

सांख्य और योग दर्शन के अनुसार, जिसे हम सामान्य भाषा में 'मन' कह देते हैं, वह वास्तव में 'अन्तःकरण' (Inner Instrument) का एक हिस्सा है। चित्त (Chitta): यह वह 'स्टोरहाउस''स्मृति भण्डार' है, जहाँ जन्म-जन्म के संस्कार और वासनाएं दबी होती हैं। शरीर में इसका स्थान हृदय प्रदेश के सूक्ष्म केन्द्र में माना जाता है। यह एक झील की तरह है, जिसकी सतह पर विचार की तरंगे सदा उठती रहती हैं। जबकि मन चित्त की सतह पर उठने वाली 'तरंग' है। इसका मुख्य स्थान मस्तिष्क (Sensory processing) से जुड़ा है। यह केवल संकल्प-विकल्प (करूँ या न करूँ?) करते रहता है। इसे कम्प्यूटर की भाषा में यूँ कहा जा सकता है कि हमारा  चित्त 'हार्डडिस्क' है और मन उसका  'सॉफ्टवेयर/इंटरफेस'। चित्त में अगर 'भय' का संस्कार है, तो मन में 'भय के विचार' उठेंगे।

2. "मैं प्रयास क्यों करूँ?"(The Paradox of Effort)जब सांख्य कहता है कि "प्रकृति ही सब कुछ कर रही है," तो साधक के मन में प्रमाद (Inertia) आ सकता है कि "फिर मैं हाथ पर हाथ धर कर क्यों न बैठ जाऊं?" यहाँ सूक्ष्म अन्तर समझो—

·       अहंकार का प्रयास: "मैं (अहंकार) मोक्ष पाऊँगा"यह प्रयास बन्धन है।

·       विवेक का प्रयास: यह बोध करना कि "मैं केवल दृष्टा हूँ और शरीर का हिलना-डुलना प्रकृति का गुण है।"

·       साधना की आवश्यकता: साधना प्रकृति को 'बदलने' के लिए नहीं, बल्कि प्रकृति के साथ अपनी 'गलत पहचान' (Wrong Identification) को तोड़ने के लिए है। जब तक तुमको प्यास लग रही है, तब तक तुम यह नहीं कह सकते कि "प्रकृति पी रही है," क्योंकि तुम उस प्यास का 'अनुभव' (Enjoyment) कर रहे हो। जब तक तुम 'भोक्ता' (Enjoyer) बने हुए हो, तब तक तुमको 'प्रयास' करना ही होगा।

3. प्रकृति के भरोसे छोड़ना और विवेक में प्रतिष्ठित होना—इन दोनों में आकाश-पाताल का अन्तर है—प्रकृति के भरोसे छोड़ना (Fatalism): यह अक्सर 'तमस' (आलस्य) होता है। आदमी अपनी जिम्मेदारियों से भागता है और कहता है "जो होगा देखा जाएगा।" सच ये है कि यहाँ अहंकार सूक्ष्म रूप में मौजूद रहता है। जबकि विवेक में प्रतिष्ठित होना (Self-Realization): यह 'शुद्ध सत्व' है। यहाँ व्यक्ति कर्म तो करता है, लेकिन फल की चिंता उसे नहीं जलाती। वह जानता है कि प्यास बुझाना 'प्रकृति' का धर्म है और पानी पीना 'शरीर' का कार्य, मैं (पुरुष) तो इन दोनों को देख रहा हूँ। यहाँ चित्त और विवेक का द्वन्द्व चलते रहता है। विवेक की चमक बार-बार इसलिए फीकी पड़ जाती है, क्योंकि चित्त में पुराने संस्कार (Impulses) बहुत गहरे हैं। जैसे ही शांत बैठते हो, चित्त का कोई पुराना 'डर' या 'लालच' मन के पर्दे पर आकर खड़ा हो जाता है और तुम फिर से 'कर्ता' बन जाते हैं। सांख्य दर्शन के अनुसार, 'ज्ञान' ही वह अग्नि है, जो इन संस्कारों के बीजों को भून (दग्ध) देती है।

 

          मेरे दोनों हाथ अनायास ही जुड़ कर बाबा की ओर लपक पड़े। चरण  छूने का प्रयास करते हुए मैंने कहा—आप पहले भी संकेत कर चुके हैं, पुनः खुलासा करें कि चित्त के पुराने संस्कारों (वासना) को 'ज्ञान' की अग्नि से कैसे भूनें? साथ ही ये भी कि 'चित्त' का स्थान शरीर के किन सूक्ष्म केंद्रों से जुड़ा है, ताकि हम व्यावहारिक साधना की ओर बढ़ सकें।

            बाबा ने कहा— सांख्य और योग के मेल से ही 'चित्त की शुद्धि' और 'दैहिक केन्द्रों' का रहस्य समझा जा सकता है। सांख्य हमें सिद्धान्त देता है और योग हमें उसे शरीर में उतारने की विधि बतलाता है। इसे यूँ समझो— 1. चित्त के संस्कारों को 'ज्ञान' की अग्नि से कैसे भूनें? (Burning the Seeds)सांख्य में इसे 'दग्ध-बीज' प्रक्रिया कहा जाता है—ये पहले भी बता चुका हूँ। संस्कार बीज की तरह होते हैं; अगर उन्हें 'अनुभव' और 'अनुकूल परिस्थिति' की मिट्टी मिल जाए, तो वे कर्म का पौधा बन जाते हैं। ऐसा न होने पाये,इसके लिए तुम्हें प्रयास करना होगा—

·            साक्षी भाव (Observation): जब चित्त से कोई पुराना संस्कार (जैसे क्रोध या डर) मन की सतह पर आए, तो उसे 'दबाओ' नहीं और न ही उसके साथ बहने की कोशिश करो।

·            बस यह देखोप्रकृति के गुण (रजस) बुद्धि में हलचल मचा रहे हैं, मैं (पुरुष) तो केवल इसका साक्षी हूँ।

·            तटस्थता का प्रभाव: संस्कार 'कर्ता' और 'भोक्ता' के भाव से ही जिंदा रहते हैं। जब तुम साक्षी हो जाते हो, तो संस्कार को मिलने वाली 'ऊर्जा' (Input) कट जाती है। ऊर्जा के अभाव में वह संस्कार धीरे-धीरे निर्बल होकर निष्क्रिय हो जाता है, जिसे बीज का 'भुनना' कहा जाता है।

·            विवेक का अभ्यास: बार-बार स्वयं को याद दिलाना कि यह विचार मेरा नहीं है, यह स्मृति का हिस्सा है। इस अभ्यास की पुनरावृत्ति चित्त की पुरानी वायरिंग को काट देती है।

अब चित्त के स्थान पर प्रकाश डालता हूँ। ताकि व्यावहारिक साधना की ओर बढ़ने में सुविधा हो।

2. चित्त का स्थान और दैहिक-आध्यात्मिक केन्द्र (Micro-Cosmic Location)यद्यपि सांख्य सूक्ष्म तत्वों की बात करता है, लेकिन योग शास्त्र और तन्त्र के अनुसार इन तत्वों का शरीर के खास केंद्रों (Chakras) से गहरा सम्बन्ध है—

·       हृदय प्रदेश (अनाहत चक्र): सांख्य और उपनिषदों में चित्त का मुख्य निवास 'हृदय-गुहा' को माना गया है। यह वह स्थान है, जहाँ हमारी गहरी भावनाएं और जन्म-जन्म के संस्कार 'संकीर्ण' (Compressed) रूप में रहते हैं। जब हम गहरे ध्यान में 'हृदय' पर एकाग्र होते हैं, तो दबे हुए संस्कार बाहर निकलने लगते हैं।

·       मस्तिष्क (आज्ञा चक्र): यह 'मन' और 'बुद्धि' का केंद्र है। यहीं से संकल्प-विकल्प उठते हैं और निर्णय लिए जाते हैं। जब विवेक जागता है, तो आज्ञाचक्र (जिसे तीसरी आँख कहते हैं) सक्रिय होता है, जिससे हमें प्रकृति और पुरुष का भेद साफ़ दिखने लगता है।

·       नाभि केंद्र (मणिपूर चक्र): यह 'अहंकार' और क्रियाशक्ति का केंद्र है। हमारी वासनाएं और 'कुछ करने की तड़प' यहीं से बल पाती हैं।

 

मैं बहुत हर्षित और आशान्वित हुआ कि सांख्य की चर्चाक्रम में ही बाबा स्वतः तन्त्र-योग की चर्चा में ऊतर आए। कायगत चक्रों के प्रति मेरी जिज्ञासा बहुत पुरानी रही है। किन्तु कभी अवसर न मिला किसी योग्य साधक से इसे जानने-समझने का। किन्तु सिर्फ तीन चक्रों का नाम-धाम बता कर, बाबा ने बात बदल दी।

 

आँखें मूँदकर, बहुत ही गहरी सांस लेकर, आहिस्ते से छोड़ते हुए, बाबा ने पुनः आँखें खोली और कहने लगे— चक्रों की गहराई में अभी जाने की जरुरत नहीं है। अवसर मिला तो इस पर फिर कभी बात होगी।  वैसे भी ये तन्त्र और हठयोग का विषय है। सांख्य का सीधा सम्बन्ध इससे नहीं है। ये बात दिगर है कि सांख्य के मार्ग से चिन्तन-मनन करने वाले व्यक्ति की आन्तरिक चक्रक्रिया(चक्रशुद्धि) स्वतः ही होती रहती है, जैसे बढ़ई तो लकड़ी चीरने का काम करता है—उससे तक्थे बनाने हेतु, किन्तु बुरादा (कुनाई) स्वतः ही निकलता है चिराई की प्रक्रिया में।

 

ठीक है, जैसी आपकी इच्छा। मेरे लिए जो उचित लगे उसे ही प्रकाशित करें। फिलहाल चक्रसाधना की जिज्ञासा को आपके भरोसे ही  छोड देता हूँ। किन्तु अभी आप ये बतलाने की कृपा अवश्य करें कि अभ्यास क्रम में मानसिक पीड़ा और अशान्ति क्यों महसूस होने लगती है।

 

बाबा ने कहा— जब साधक अपने संस्कारों को भूनने बैठता है, तो उसे अक्सर 'मानसिक पीड़ा' या 'अशान्ति' महसूस होती है। लोग इसे 'बुरा' समझते हैं, लेकिन सांख्य कहता है कि यह 'निकासी' (Cleaning) है। सांख्य के कोरे सिद्धान्त से काम नहीं चलेगा। बिना प्रैक्टिकल के सांख्य केवल 'बौद्धिक व्यायाम' बनकर रह जाता है। जब हम चित्त के संस्कारों को भूनने के लिए बैठते हैं, तो वह किसी 'युद्ध' से कम नहीं होता। अतः अब हम इन्हीं विन्दुओं पर प्रकाश डालते हैं।

सांख्य और योग के अनुसार, संस्कारों से निपटने के लिए मुख्यतः

चार व्यावहारिक चरण हैं—

1. 'द्रष्टा' का आसन (The Observer's Seat)अभ्यास के दौरान जब कोई विचार या संस्कार (जैसे: पुरानी टीस, गुस्सा या वासना) उठे, तो उसे 'मेरा' कहना बन्द कर दो।

·       प्रैक्टिकल टिप: मन में कहो—"यह संस्कार 'चित्त' (Hard Drive) का है, यह 'मैं' (User) नहीं हूँ।" जैसे तुम स्क्रीन पर फिल्म देखते हो, वैसे ही अपने विचारों को देखो। जब  'मेरा गुस्सा' की जगह 'प्रकृति का गुण' कहना शुरू करते हैं, तो आधे संस्कार वहीं दम तोड़ देते हैं, क्योंकि उन्हें  'अहंकार' मिलना बंद हो जाता है।

2. 'प्रतिपक्ष भावनम्' (Counter-Thought)यह सांख्य का एक बहुत प्रभावी मनोवैज्ञानिक टूल है। जब चित्त में कोई 'तमोगुणी' विचार (जैसे आलस्य या घृणा) आए, तो जानबूझकर उसके विपरीत 'सत्वगुणी' विचार को स्थान देना चाहिए।

·       प्रैक्टिकल टिप: अगर किसी के प्रति नफरत का संस्कार उभर रहा है, तो उस समय उसकी बुराई करने के बजाय, अपनी बुद्धि को उस व्यक्ति की किसी एक अच्छी बात या उसकी मजबूरी पर केन्द्रित करो। यह संस्कारों की 'री-वायरिंग' (Re-wiring) है।

इतना समझाकर बाबा पल भर के लिए रूके। मेरे चेहरे पर गौर करते हुए बोले— आशा है सांख्य की गुत्थियाँ अबतक खुल गई होंगी। उसकी व्यावहारिकता को भी ठीक से समझ चुके होओगे। अतः उचित ये होगा कि अब ये चर्चा समाप्त की जाय। उदर-आहार की भाँति मनसआहार भी गरिष्ठ होता है। एक ही बार ज्यादा ग्रहण करोगे, तो परेशानी होगी।

बाबा की इन बातों से मैं थोड़ा उदास हो गया। बाबा विषय पर विराम देना चाहते हैं, जबकि मेरी तृष्णा को तृप्ति नहीं मिली है अभी। अतः

अनुनय किया—ठीक है महाराज ! आपकी जैसी इच्छा। किन्तु मेरी इच्छा है कि सांख्य से सम्बन्धित एक अहम जिज्ञासा का शमन करके ही अभी की ये चर्चा को विराम देने की कृपा करें।

प्रारब्ध बना कैसे? पुराने शरीर की मृत्यु के बाद पञ्चमहाभूतों का तो लय हो गया, शेष अठारह तत्वों को लेकर सूक्ष्म शरीर आगे बड़ा इत्यादि बातें हो चुकी हैं। मेरी जिज्ञासा है कि अठारह तत्वों वाला वो शरीर कहाँ गया, क्या किया, कैसे फिर वापस आया धरती पर नया शरीर लेकर प्रारब्ध का भोग करने हेतु?

 बाबा मुस्कुराते हुए बोले— राजहठ, त्रियाहठ की तरह बालहठ भी बड़ा विचित्र होता है। अब तुम्हारी यही इच्छा है तो चलो इस पर भी थोड़ी चर्चा हो जाय।  

तुमने बिल्कुल सही बिंदु पकड़ा है चर्चा के लिए यदि पञ्चमहाभूत (स्थूल शरीर) यहीं छूट गए, तो वह कौन सी 'कड़ी' है, जो कर्मों के फल को अगले जन्म तक ढोकर ले जाती है? सांख्य दर्शन और भारतीय तत्वमीमांसा के अनुसार, इस यात्रा को 'लिंग शरीर' (सूक्ष्म शरीर) की यात्रा कहा जाता है। इसे चरणबद्ध रूप से समझो,बिलकुल आधुनिक शैली में —

1. सूक्ष्म शरीर का 'हार्ड डिस्क' (The Data Storage)जैसा कि हमने चर्चा की थी, अठारह तत्वों वाला सूक्ष्म शरीर मृत्यु के समय नष्ट नहीं होता।

·            इस सूक्ष्म शरीर के भीतर 'धर्म-अधर्म' और 'संस्कार' बीज के रूप में अंकित रहते हैं। इसे सांख्य की भाषा में 'भाव' कहते हैं।

·            जैसे इत्र की शीशी टूट जाने पर भी सुगन्ध हवा के साथ बहती रहती है, वैसे ही स्थूल शरीर के नष्ट होने पर यह सूक्ष्म शरीर अपने संस्कारों की 'सुगंध' या 'दुर्गंध' लेकर निकल पड़ता है।

1.      वह शरीर कहाँ गया और क्या किया?—ये प्रश्न उठता है।

मृत्यु और पुनर्जन्म के बीच की स्थिति को लेकर सांख्य और वेदांत में 'आतिवाहिक शरीर' की चर्चा आती है।

·            आकर्षण का सिद्धान्त—वह सूक्ष्म शरीर अन्तरिक्ष में आवारा नहीं घूमता। वह अपने संचित कर्मों (प्रारब्ध) की 'चुम्बकीय शक्ति' से खिंचा चला जाता है।

·            सांख्य के अनुसार, प्रकृति के पास अनन्त सम्भावनाएं हैं। वह सूक्ष्म शरीर अपने संस्कारों के अनुरूप 'लोक' (Dimension) चुनता है। यदि सत्व गुण प्रधान है, तो ऊँचे लोकों की ओर; यदि तमस है, तो नीचे की ओर। वहाँ वह तब तक रहता है, जब तक कि उसके उन कर्मों का फल (भोग) पूरा न हो जाए, जिन्हें केवल मानसिक रूप से भोगा जा सकता है। यहाँ ये बात स्पष्ट कर दूँ कि ये लोक कोई भौगोलिक स्थान विशेष नहीं है, बल्कि आयाम हैं।

3. धरती पर वापस आने की प्रक्रिया— जब सूक्ष्म शरीर के कुछ विशेष कर्मों के भोग का समय आता है, जिन्हें केवल 'हाड़-मांस के शरीर' से ही भोगा जा सकता है, तब 'प्रकृति' उसे वापस धरती की ओर खींचती है।

·       प्रवेश का मार्ग: शास्त्रों में इसे 'पञ्चाग्नि विद्या' के रूप में भी संकेत दिया गया है। सूक्ष्म शरीर वर्षा की बूंदों, अन्न के दानों, वनस्पतियों या औषधियों के माध्यम से पिता के शरीर में और फिर माता के गर्भ में प्रवेश करता है।

·       प्रारब्ध का ब्लूप्रिंट: गर्भधारण के समय ही वह सूक्ष्म शरीर तय कर देता है कि नया स्थूल शरीर कैसा होगा। बुद्धि की प्रखरता, इन्द्रियों की क्षमता और जीवन की प्रमुख घटनाएँ उस 'सूक्ष्म शरीर' में पहले से व्यवस्थित—लोड  की हुई फाइल की तरह होती हैं।

4. प्रारब्ध का भोग यानी नया नाटक, पुराना अभिनेता—जैसे ही नया शरीर मिलता है, वे अठारह तत्व फिर से सक्रिय हो जाते हैं। पञ्चमहाभूतों से बना यह नया शरीर केवल एक 'किराये का घर' है—ऐसा समझो।

·            पुराना 'प्रारब्ध' अब स्थितियों के रूप में सामने आता है। जो संस्कार पिछली चर्चा में 'भुने' नहीं गए थे, वे अब फिर से 'वृत्तियाँ' बनकर उठने लगते हैं।

·            सांख्य कहता है कि यह सूक्ष्म शरीर तब तक भटकता और जन्म लेता रहेगा, जब तक कि 'विवेक-ज्ञान' के द्वारा इसे भंग न कर दिया जाए। जिस दिन ज्ञान हो जाता है कि "मैं यह सूक्ष्म शरीर भी नहीं हूँ," उस दिन इस अठारह तत्वों के यन्त्र का 'पावर कट' हो जाता है और यह विलीन हो जाता है।

सांख्य दर्शन की इस 'वापसी यात्रा' को समझने के लिए आधुनिक विज्ञान और तकनीक का उदाहरण (Analogies) सबसे बेहतर काम करता है। इन्हें इस प्रकार समझो—

1. संस्कारों का स्थानान्तरण, आधुनिक विज्ञान की भाषा में कहो—'क्लाउड कम्प्यूटिंग' और 'हार्ड ड्राइव'सांख्य का 'सूक्ष्म शरीर' बिल्कुल वैसा ही है जैसे मोबाइल फोन खराब होने पर सारा डेटा (फोटो, मैसेज, कॉन्टैक्ट्स) 'क्लाउड' (Cloud) या 'हार्ड ड्राइव' में सुरक्षित रहता है।

·            डेटा —हमारे संस्कार और कर्म।

·            हार्ड ड्राइव— सूक्ष्म शरीर।

·            नया फोन— नया स्थूल शरीर (आकाश, वायु, अग्नि, जल पृथ्वी यानी पञ्चमहाभूत)। जब नया फोन (नया जन्म) लेते हो, तो पुरानी आई.डी. (अहंकार) डालते ही सारा पुराना डेटा अपने आप नए फोन में सिंक (Sync) हो जाता है। इसी को संस्कारों का स्थानान्तरण कहते हैं। सांख्य कहता है कि यह स्थानांन्तरण इतना सटीक है कि पिछले जन्म की 'अधूरी इच्छाएं' ही इस जन्म की 'रुचियाँ' और 'प्रतिभा' बनकर उभरती हैं।

2.वापसी की यात्रा: आकाश से गर्भ तक—यह सुनने में थोड़ा काव्यात्मक

लग सकता है, लेकिन इसका एक व्यवस्थित क्रम है, जिसे 'पञ्चाग्नि' मार्ग कहा जाता है—

·            सूक्ष्म शरीर अपनी कर्म-ऊर्जा के अनुसार अन्तरिक्ष से वर्षा के माध्यम से पृथ्वी पर आता है।

·            वह अन्न और औषधियों में प्रवेश करता है।

·            वही अन्न जब पिता द्वारा ग्रहण किया जाता है, तो वह 'वीर्य' (प्रजनन शक्ति) का हिस्सा बनता है।

·            अन्ततः माता के गर्भ में उसे पंचमहाभूतों (मिट्टी, जलादि) का लेप मिलता है और इस प्रकार एक नया 'स्थूल शरीर' तैयार हो जाता है।
सांख्य यहाँ बहुत स्पष्ट हैयह यात्रा कोई 'ईश्वर' नहीं करवा रहा, बल्कि यह प्रकृति का अन्ध-नियम है, जो कर्मों के खिंचाव से स्वतः चलता है।

अब जिज्ञासा होगी कि क्या हम अपना भाग्य बदल सकते हैं? तो इसे ऐसे समझो कि ये एक क्रान्तिकारी हिस्सा है। इस विषय को पहले भी समझा चुके हैं —

·       प्रारब्ध (Destiny): वह तीर है जो कमान से छूट चुका है। जैसे जन्म कहाँ हुआ, माता-पिता कौन हैं,  शारीरिक बनावट कैसी है—इसे बदल नहीं सकते, इसे केवल 'भोग' कर ही खत्म किया जा सकता है।

·       पुरुषार्थ (Will Power/Effort): यह हाथ का अगला तीर है। सांख्य कहता है कि 'प्रारब्ध' केवल परिस्थितियाँ देता है, लेकिन उन परिस्थितियों में हम 'प्रतिक्रिया' (Reaction) क्या देंगे, यह पुरुषार्थ है।
यदि प्रारब्ध एक कठिन स्थिति (जैसे गरीबी या बीमारी) में डालता है, तो 'पुरुषार्थ' (विवेक) यह शक्ति देता है कि उस स्थिति से दुःखी न हों। जैसे ही 'साक्षी' होकर उस दुःख को देखते हैं, उस प्रारब्ध की शक्ति क्षीण हो जाती है। पुरुषार्थ प्रारब्ध को 'मिटा' नहीं सकता, लेकिन उसके 'प्रभाव' को न्यून या शून्य अवश्य कर सकता है। यहाँ ध्यान देने वाली एक और बात है कि जब सूक्ष्म शरीर अन्न के माध्यम से प्रवेश करता है, तो वह अपने साथ 'त्रिगुणों' का वह पुराना हिसाब-किताब (बैलेंस सीट) भी लाता है। यही कारण है कि एक ही घर में पैदा हुए दो बच्चों का स्वभाव (सत्व, रज, तम) एकदम अलग होता है।

आपकी इन विविध व्याख्याओं से मन गदगद हो गया। किन्तु विवेचनाओं के बीच से नए संशय भी तो उभर ही आते हैं अनचाहे रूप से।  अभी एक श्लोक कौंध गया दिमाग में— उद्योगिनं पुरुष सिंह मुपैति लक्ष्मी दैवे न देयमिति कापुरुषा वदन्दि। दैवं निहत्य कुरु पौरुष आत्मशक्त्यः, यत्ने कृते न सिद्धति कोऽत्र दोषः।। इसके अनुसार तो लगता है कि पुरुषार्थ से प्रारब्ध भले ही बदला जा सकता हो, किन्तु उसके ऊपर भी दैव नाम की कोई चीज है, जो सिद्धि-असिद्धि में सहायक या बाधक हो सकता है।

     हर्षगदगद होकर बाबा ने कहा— तुम्हारी चतुराई भी उत्साह वर्द्धक है। यह बहुत ही अद्भुत संयोग है कि तुमने इस श्लोक को उद्धृत किया ! यह श्लोक पुरुषार्थ (Effort) और दैव (Destiny/Luck) के द्वन्द्व को सांख्य दर्शन की भाषा में समझने का सबसे बेहतरीन जरिया है। सांख्य की दृष्टि से इस श्लोक की व्याख्या तुम्हारे संशय को पूरी तरह स्पष्ट कर देगी। सांख्य में 'दैव' क्या है?सांख्य दर्शन में 'दैव' कोई रहस्यमयी ईश्वरीय इच्छा नहीं है। सांख्य के अनुसार, 'दैव' पिछले जन्मों के पुरुषार्थ का संचित परिणाम है। जो कल 'पुरुषार्थ' था, वही आज फल देने के समय 'दैव' (प्रारब्ध) कहलाता है। इसलिए जब श्लोक कहता है कि "कायर लोग इसे दैव का दिया मानते हैं," तो सांख्य इसका समर्थन करता है कि दैव कुछ बाहरी नहीं, बल्कि अपनी 'प्रकृति' का पुराना निवेश (Investment) है। दैवं निहत्य कुरु पौरुषमात्मशक्त्यः— (दैव को दबाकर पुरुषार्थ करो)— यहाँ 'निहत्य' (मारना या दबाना) शब्द बहुत गहरा है। सांख्य कहता है कि प्रकृति

(प्रारब्ध) जड़ है, लेकिन पुरुष (चेतना) चेतन है। भले ही पुराना प्रारब्ध प्रतिकूल हो, लेकिन 'आत्मशक्ति' (विवेक और वर्तमान का पुरुषार्थ) इतनी प्रबल हो सकती है कि वह पुराने संस्कारों के प्रभाव को 'ओवरराइड' कर दे। जैसे तेज हवा (प्रारब्ध) के खिलाफ भी एक कुशल नाविक अपनी पतवार (पुरुषार्थ) के बल पर नाव को सही दिशा में ले जाता है। यत्ने कृते न सिद्ध्यति कोऽत्र दोषः? (प्रयत्न के बाद भी सफलता न मिले तो दोष कहाँ है?) यही इस श्लोक का सबसे 'सांख्यिक' हिस्सा है। यदि तुमने पूरी शक्ति लगा दी और फिर भी काम सिद्ध नहीं हुआ, तो दोष कहाँ है?

·            सांख्य कहता है: दोष 'पंच-प्रत्यय' या 'सामग्री' की कमी में है।

·            सिद्धि के लिए केवल पुरुषार्थ काफी नहीं है, उसके साथ  'काल' (समय), 'स्थान' और 'उपकरण' का तालमेल भी चाहिए।

·            अगर सिद्धि नहीं मिली, तो इसका मतलब है कि अभी प्रकृति के गुणों (सत्व-रज-तम) का वह विशेष 'कॉम्बिनेशन' तैयार नहीं हुआ है, जो उस सफलता के लिए जरूरी है।

सांख्य का समाधान: 'अनासक्त पुरुषार्थ'यहीं पर सांख्य और गीता का सम्मिलन होता है। जब श्लोक कहता है "कोऽत्र दोषः" (दोष कहाँ है?), तो सांख्य का ज्ञानी मुस्कुराकर कहेगा"दोष कहीं नहीं है। "

·            पुरुषार्थ करना 'रजस' का काम है।

·            सफलता का मिलना 'सत्व' का परिणाम है।

·             असफलता में विचलित न होना 'विवेक' (पुरुष का स्वरूप) है।

निष्कर्ष ये है कि यह श्लोक हमें 'लाचारी' से निकालकर 'जिम्मेदारी' की ओर ले जाता है। यह कहता है कि परिणाम प्रकृति के हाथ में हो सकता है (दैव), लेकिन 'प्रयास' करना पुरुष का धर्म है। यदि हार मानकर बैठ गए, तो  'कापुरुष' (कायर) हैं। लेकिन यदि  प्रयास करके असफल हुए और फिर भी शान्त हैं तो 'पुरुष-सिंह' हैं।  उक्त श्लोक के भावों वाला ही एक श्लोक गीता में भी है, जहाँ श्रीकृष्ण ठीक इसी सांख्य सिद्धान्त की पुष्टि करते हैं। यहाँ वे किसी भी कर्म की सिद्धि (सफलता) के लिए पाँच कारणों की चर्चा करते हैं।

            पञ्चैतानि महाबाहो कारणानि निबोध मे।

            सांख्ये कृतान्ते प्रोक्तानि सिद्धये सर्वकर्मणाम्।। (हे महाबाहो! समस्त कर्मों की सिद्धि के लिए सांख्य शास्त्र में ये पाँच कारण बताए गए हैं, उन्हें तुम मुझसे सुनो। वे पाँच कारण ये हैं—

              अधिष्ठानं तथा कर्ता करणं च पृथग्विधम्।

              विविधाश्च पृथक्चेष्टा दैवं चैवात्र पञ्चमम्।।

यहाँ 'वजन' डालने वाली बात यह है कि कृष्ण ने 'दैव' को पाँचवाँ और अन्तिम कारण माना है। अब इन पाँचों को 'पुरुषार्थ' वाले श्लोक से जोड़कर देखते हैं—

       अधिष्ठानं—वह शरीर या क्षेत्र जहाँ कर्म हो रहा है। (जैसेबीज बोने के लिए जमीन)।

       कर्ता—काम करने वाला (अहंकार से युक्त व्यक्ति)।

       करणं—हमारी इन्द्रियाँ और उपलब्ध साधन (जैसेकलम, कुदाल या बुद्धि)।

       चेष्टा—तुम्हारा पुरुषार्थ, मेहनत और विभिन्न प्रयास।

       दैवं (The Divine/Destiny) वह पाँचवाँ तत्व, जो हमारे वश में नहीं हैपिछले जन्मों के कर्मों का फल या प्रकृति की अदृश्य सहायता।

कृष्ण यहाँ अर्जुन को (और हम सबको) यह समझा रहे हैं कि सफलता केवल 'चेष्टा' (पुरुषार्थ) पर निर्भर नहीं है। यदि आप अपनी तरफ से चार चीजें (शरीर, कर्ताभाव, साधन और मेहनत) सही लगा देते हैं, फिर भी सफलता नहीं मिलती यदि, तो इसका अर्थ है कि वह 'पाँचवाँ तत्व' (दैव) अभी अनुकूल नहीं है। यहाँ सांख्य का वैज्ञानिक दृष्टिकोण स्पष्ट है। इस श्लोक से यह स्पष्ट हो जाता है कि जिसे हम 'हार' या 'दोष' कहते हैं, वह केवल एक 'कमी' है। जैसे ऑक्सीजन और हाइड्रोजन मिलने पर ही पानी बनता है, वैसे ही इन पाँचों तत्वों के मिलने पर ही 'सिद्धि' होती है। यदि एक भी तत्व (दैव) कम है, तो परिणाम नहीं आएगा। यहाँ समझने वाली बात ये है कि हमें अभिमान और अवसाद से मुक्ति मिल रही है अनजाने में ही। अगर जीत गए, तो याद रखो कि केवल 'मैं' (कर्ता) कारण नहीं था, अन्य चारतत्व भी साथ थे। और यदि हार गए, तो यह न सोचो कि मैं 'निकम्मा' हूँ; बल्कि यह समझो कि 'दैव' या 'अधिष्ठान' जैसे बाहरी कारणों में कहीं कमी रह गई। स्पष्ट है कि उक्त पाँचो तत्वों का समुचित तालमेल मनुष्य के अधीन है ही नहीं।

            अब इसे गणितीय सूत्र से समझ लो—आम तौर पर तनाव तब होता है जब हम 100% परिणाम पर अपना अधिकार चाहते हैं। लेकिन सांख्य का गणित कहता है कि तुम्हारा योगदान = 20% (सिर्फ 'चेष्टा' और 'साधन') हैं। बाकी 4 तत्व = 80% (अधिष्ठान, दैव, आदि)। अतः जब तुम यह स्वीकार कर लेते हो कि "मैं पूरी सफलता का मालिक नहीं हूँ, तो तुम्हारे कंधों से 'अहंकार का बोझ' उतर जाता है। बोझ हटते ही मन 'तनाव-मुक्त' हो जाता है। यह आलस्य नहीं है, यह 'बुद्धिमानी भरा समर्पण' है।

अब इसे गीता की स्थितप्रज्ञता या  सांख्य की 'साक्षी' अवस्था के रूप में समझो। गीता में जिसे 'स्थितप्रज्ञ' कहा गया है, सांख्य में उसे 'विवेक-ख्याति' में स्थित पुरुष कहा जाता है। इसकी पहचान है— सफलता में 'मद' (Pride) नहीं, क्योंकि वह जानता है कि 'दैव' और 'प्रकृति' ने साथ दिया, तभी यह हुआ। विफलता में 'विषाद' (Grief) नहीं, क्योंकि वह जानता है कि उसने अपना 20% पुरुषार्थ पूरा किया, अब अगर प्रकृति का गणित (80%) अनुकूल नहीं बैठा, तो इसमें 'स्वयं' को दोष देने की कोई बात ही नहीं। तनाव से बचने के लिए सांख्य एक बहुत व्यावहारिक तरीका बतलाता है' गुणा गुणेषु वर्तन्ते' (गुण ही गुणों में बरत रहे हैं)। अतः अभ्यास करो—जब भी गुस्सा आए या तनाव हो, तो सोचो—"यह मेरा गुस्सा नहीं है, यह रजोगुण (प्रकृति) की लहर है, जो मन (यंत्र) के पर्दे पर आई है। मैं (द्रष्टा) इसे देख रहा हूँ। जैसे ही तुम 'गुस्से' से 'गुस्से को देखने वाले' बनते हो, तनाव की शक्ति खत्म हो जाती है। अब स्थितप्रज्ञता की कसौटी परखो— स्थितप्रज्ञ वह नहीं जो पत्थर की तरह संवेदनाहीन है, बल्कि वह है, जो 'समुद्र' की तरह है। समुद्र में हज़ारों नदियाँ (सुख-दुख के विचार) गिरती हैं, पर वह अपनी मर्यादा नहीं छोड़ता। सांख्य की दृष्टि में, जब तुम अपनी 'अकेली सत्ता' (पुरुष) को पहचान लेते हो, तो संसार की कोई भी घटना तुम्हें हिला नहीं सकती।

·       ऐसी स्थिति में सवाल उठ सकता है कि अगर हम इतने शान्त हो गए, तो क्या हमारी 'प्रगति' रुक जाएगी? सांख्य इसका सुव्यवस्थित उत्तर देता है। सांख्य की यह सबसे व्यावहारिक और रोमांचक चुनौती है कि कैसे एक हाथ में 'साक्षी भाव' का दीया हो और दूसरे हाथ में 'विराट कर्म' की तलवार। तलवार तुम्हारी विराट महत्वाकांक्षायें हैं । यह रजोगुण की वह शक्ति है, जो संसार में कुछ रचने, बाधाओं को काटने और आगे बढ़ने के लिए आवश्यक है। बिना इसके जीवन जड़ (Static) हो जाएगा। दीया (साक्षी भाव) का अभ्यास है। यह वह प्रकाश है जो तलवार चलाने वाले को यह होश देता है कि "मैं युद्ध तो कर रहा हूँ, पर मैं युद्ध नहीं हूँ।" यह रोशनी तुमको अपनों को चोट पहुँचाने से और स्वयं को अहंकार की आग में जलने से बचाती है। अतः अब तुम्हें इन दोनों विरोधाभासी दिखने वाले तत्वों को एक साथ समझाते हैं—

विराट महत्वाकांक्षा और साक्षी भाव—प्रायः लोग सोचते हैं कि महत्वाकांक्षा (Ambition) का मतलब 'बेचैनी' है। लेकिन सांख्य कहता है कि बेचैनी 'अहंकार' से आती है, कार्य की विराटता से नहीं। महत्वाकांक्षा का सांख्यिक रूप ये है कि जब तुम एक बहुत बड़े लक्ष्य (जैसे—व्यापार, आविष्कार आदि) चुनते हो, तो इस लक्ष्य को 'प्रकृति' के खेल का हिस्सा है—ऐसा जानो। उस विराट कर्म को एक 'दिव्य खेल' (Cosmic Play) की तरह खेलो। विराट महत्वाकांक्षा 'रजोगुण' की शक्ति है और साक्षी भाव 'सत्व' की स्थिरता। जब साक्षी होते हो, तो तुम्हारी ऊर्जा  'चिंता' में नष्ट नहीं होती। एक तनावग्रस्त व्यक्ति अपनी आधी ऊर्जा डर में खो देता है, जबकि एक 'साक्षी' व्यक्ति अपनी पूरी ऊर्जा केवल 'कर्म' में लगाता है। इसीलिए, साक्षी भाव वाला व्यक्ति ज्यादा 'विराट' कार्य कर सकता है। निरन्तर साक्षीभाव में रहने का अर्थ यह नहीं कि तुम काम करना छोड़ दो, बल्कि यह है कि 'स्मृति' (Mindfulness) में रहो। विराट महत्वाकांक्षा तुम्हारा 'रथ' है,साक्षी भाव 'सारथी' है और चित्तवृत्ति निरोध वह  'कौशल' है, जिससे तुम रथ को बिना थके-हारे अनन्त काल (लम्बे समय) तक चला सकते हो।

इसके लिए भूमिका का सिद्धान्त (The Actor Method) सर्वाधिक श्रेष्ठ प्रक्रिया है। जैसे एक अभिनेता मंच पर 'राजा' बनता है, तलवार चलाता है, चिल्लाता है, लेकिन भीतर कहीं, उसे भलीभाँति पता होता है कि "मैं राजा नहीं हूँ।" बस यही सूक्ष्म धागा 'साक्षी भाव' की सततता है। इसके लिए व्यावहारिक तरीका ये अपनाओ कि दिन भर में छोटे-छोटे 'अलार्म' लगाओ—अपनी सोच परजब तुम पानी पी रहे हो, तो रुको और देखोपानी पिया जा रहा है, प्यास बुझ रही है, मैं इसका ज्ञाता हूँ -– धीरे-धीरे यह अभ्यास गहरा होकर, तुम्हारी आदतों में बैठ जाएगा।”   

इतना कहकर बाबा उठ खड़े हुए। हाथ उठाकर मुझे विदा लेने की आज्ञा देते हुए बोले— रात बहुत बीत चुकी है। थोड़ी ही देर में भोर होने वाली है। मैं भी अपनी क्रिया में लगूँगा। जाओ, अब वापस चले जाओ। भागिनेय की बारात में कुटुम्बजन तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहे होंगे। आज की इन बातों पर मनन करना घर जाकर। यथासम्भव आत्मसात करने का प्रयास भी करना। आशा ही नहीं पूर्ण विश्वास है कि तुम्हारी बहुत सी शंकाएं निर्मूल हो जायेंगी। और हाँ, स्मरण है न—आज शुक्ल पक्ष की एकादशी है ज्येष्ठमास की, जो भोजनभट्ट भीमसेन के नाम से लोक-प्रसिद्ध है — भीमसेनी एकादशी इसका एक नाम निर्जला एकादशी भी है। यानी इस विशिष्ट एकादशी में फलाहार ही नहीं दुग्धाहार-जलाहार भी वर्जित है। माहात्म्य ये है कि जो व्यक्ति अन्य एकादशियों में व्रत नहीं रख सकता, वह कम से कम वर्ष की चौबीस में से सिर्फ इस एक निर्जला एकादशी को विधिवत व्रत रख कर, वैष्णवी उपासना का लाभ ले सकता है। तुम तो विशुद्ध वैष्णव परिवार से हो न। एकादशी का व्रत करते हो या नहीं?   

जी हाँ, करता हूँ महाराज ! चौबीसो एकादशी करता हूँ—स्वीकृति मुद्रा में सिर हिलाते हुए अपने स्थान से उठकर बाबा के चरणस्पर्श हेतु हाथ बढ़ाया, किन्तु बाबा दो कदम पीछे सरक गए। जुड़ी हथेली पत्थर के ढोंके से टकराकर टिकी रह गई विरहिणी के काँपते हाथों की तरह, जिसे प्रियतम का बाहुभरण न मिल सका।

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पहले से काफी उत्साहित किन्तु किंचित् बोझिल मन लिए जनवास स्थल पर आया तो देखा कि प्रायः लोग भोजनादि से कबके निवृत्त होकर विश्राम मुद्रा में जा चुके हैं। प्रेम-प्रतीक्षित दुल्हे को प्रेम-प्रतीक्षिता दुल्हन से मिलाने हेतु ऊपर बने विवाह-मण्डप में ले जाया जा चुका था। इक्के-दुक्के एनरॉयडी सभ्यता के मरीज पेट के बल लेटे अपनी दुनिया में खोये हुए थे।  व्रत का दिन नहीं होता, तो भी बफेडीनरी भोजन में मुझे सरीक तो होना नहीं था, अतः अपने दूरस्थ स्थानीय निवास पर जाने के वजाय, वहीं पास में ही रामसागर तालाब के पास, बेटी के मकान पर शेष रात्रि-विश्राम के लिए चल पड़ा।

  

अगली सुबह, जल्दी-जल्दी दैनन्दिनी से निवृत होकर निकल पड़ा भस्मकूट पर्वत पर, जहाँ कल रात बाबा उपद्रवीनाथजी का दर्शन हुआ था। पहर भर दिन चढ़े, पूरे उजाले में पहाड़ी का कोना-कोना छान मारा। आसपास के लोगों से पूछताछ भी किया, किन्तु कुछ भी हासिल न हो सका। वो संकरी गली तो मिली, जिससे आगे निकले थे मन्दिर-प्रांगण से। परन्तु उससे आगे वैसा प्रशस्त मैदानी इलाका, पहाड़ी सिलसिला और चोटी पर बना पर्णकुटीर...कुछ भी नजर न आया कहीं।  आसपास की सघन आबादी में वसे लोगों ने पूछने पर, दावे के साथ कहा कि यहाँ कहीं कोई ऐसा स्थान है ही नहीं और न कोई साधु-सन्त ही यहाँ कुटिया बनाकर रहते  हैं, जैसा कि खोज रहे हैं। कुछ मनचलों ने नशेड़ी-गंजेड़ी-पियांक कहकर माखौल भी उड़ाया।  कुछ ने पागल करार कर आगे जाने का संकेत भी किया।

 खिन्न चित्त, बोझिल कदमों से नीचे उतरने के सिवा कोई चारा नहीं । सीढ़ियाँ उतरते दूर से ही मन्दिर का कंगूरा नजर आया और पल भर के  लिए चित्त सरोवर में भूचाल आ गया—अरे ! ऐसी ही घटनाओं का चित्रण महामहोपाध्याय श्री गोपीनाथजी कविराज ने भी किया है— गन्धबाबा- स्वामी विशुद्धानन्दजी के प्रसंगों में ज्ञानगंज की खूब चर्चा हुई है। बहुत पहले उनकी कई रचनाओं में ज्ञानगंज की संरचना और अवस्थिति का विशद वर्णन  पढ़ने का मुझे भी मौका मिला है। उत्सुकता भी जगी है। संशय भी हुआ है। अविश्वास भी।

अतः ज्ञानगंज से अपरिचित लोगों के लिए यहाँ किंचित् स्पष्टी आवश्यक लग रहा है। स्वामीजी ने कई रोचक प्रसंग सुनाये थे कभी। ज्ञानगंज शब्द में गैरसनातनी बू बिल्कुल नहीं है। भक्तप्रवर नारद को ज्ञान देने के लिए राजा शीलनिधि का राजमहल दिखलाया था विष्णु ने। राजकुमारी से विवाह करने के लिए आतुर नारद ने सुयोग्य रूप माँगा था विष्णु से जिसका परिणाम—मरकटरूप !  और जय-विजय (द्वारपालों)का माखौल। वरमाला पड़ी वर विष्णु के गले....।

श्रीकृष्ण-बलराम को गोकुल से मथुरा लेजाने के क्रम में यमुना के जल में अक्रूरजी को भी कुछ विचित्र दृश्यों का साक्षात्कार हुआ था।

वस्तुतः विष्णु की ये मायानगरी थी—तात्कालिक, क्षणिक जगत् का दर्शन। मुख्यतः ज्ञानगंज के दो स्वरूप होते हैं—एक तो हिमालय, विन्ध्य आदि विशिष्ट पर्वतों पर गुप्त स्थानों में साधकों के सुरक्षित स्थान होते हैं, जहाँ आम आदमी की पहुँच नहीं। आम आदमी की दृष्टि भी वहाँ नहीं जा सकती। भले ही वैज्ञानिक चप्पे-चप्पे छान मारे हिमालय को, किन्तु ज्ञानगंज जैसे संरक्षित स्थानों तक मॉडर्न सांयन्स की पहुँच हो ही नहीं सकती।

इससे किंचित् भिन्न ज्ञानगंज की तात्कालिक सर्जना होती है विशिष्ट साधकों द्वारा, किसी विशेष उद्देश्य-पूर्ति हेतु, किसी विशेष स्थान पर। सिद्ध-महात्मा यदि चाहें तो क्षण भर में घनघोर जंगल में भी नगर बसा दें, फल्गु की सूखी रेत पर भी गंगा की उत्ताल लहरें तरंगित कर दें । 

इस तरह का ज्ञानगंज वस्तुतः त्रि-आयामीय दृश्य जगत का हिस्सा नहीं होता, प्रत्युत किंचित् भिन्न आयाम में ऐसे स्थानों का तात्कालिक सृजन हुआ करता है। जिसे मात्र तीन आयामों की ही समझ है, उसे चौथे-पाँचवें-छठे...अनन्त आयामों के बारे से स्पष्ट समझाना बड़ा कठिन है। वह इसे झूठ या कल्पना ही कहेगा । अन्तर्यामी का सामान्य अर्थ लोग यही लगा लेते हैं कि मन की बातों को जान लेने वालाजबकि इसका असली अर्थ होता है, विविध आयामों में (एक साथ या बारीबारी से) गमन करने की क्षमता वाला।  

लगता है आज मैं भी वैसे ही किसी ज्ञानगंज का तीर्थयात्री बन गया? क्या मैं इतना सौभाग्यशाली हो गया?— सोचते हुए मन ही मन इठलाने लगा।  भस्मकूट पहाड़ी पर बाबा के पुनः नहीं मिलने का दुःख तो बहुत हुआ, किन्तु ज्ञानगंज की कल्पना और सम्भावना ने उससे कहीं अधिक हर्षित किया।    

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कई महीने बीत गए। विगत घटना—बाबा के अप्रत्याशित साक्षात्कार से मिले ज्ञानानुभव के मुक्ता-प्रवाल पर सांसारिकता के धूल की मोटी परत चढ़ गई। सामाजिक-पारिवारिक विविध जंजालों ने विशेष अवसर न दिया अध्ययन-मनन-चिन्तन-साधना हेतु। सांख्य की किताबी जानकारियाँ और अल्पातिअल्प अनुभव का पाथेय लिए, पूर्ववत जीवन जीता रहा, बस जीता ही रहा।  

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आज सुबह से ही मन बड़ा खिन्न है। थोड़ा दुःखी और चिन्तित भी। यूँ कहें तो बात कुछ विशेष नहीं है, किन्तु इसे विशेष नहीं मानना विशेष का अपमान जैसा है। आदतन, आदमी बड़ी घटनाओं को भी नज़रअन्दाज़ कर जाता है और कभी-कभी छोटी-छोटी बात को भी गाँठ दे देता है।  मूरख आदमी को सही जगह, सही तरीके से गाँठ भी लगाना नहीं आता और खुद को काबिल समझता है।

रात की बात बस इतनी ही है कि भाँजी की शादी में मैके जाने की तैयारी में पत्नी ने वनारसी या बंगलोरी साड़ी की माँग की और मैं उबल पड़ा, अपने पर्स के दुबलेपन को देखकर। आधी से अधिक रात गुज़र गई पत्नी को समझाने-बुझाने में ही, किन्तु जनेऊ का धागा जितना सुलझाने का प्रयास करो, उतना ही उलझते जाता है।  रात करीब दो बजे पत्नी के लास्ट अल्टिमेटम के साथ बकझक बन्द हुई—मनमुताबिक साड़ी नहीं आयी तो, तुम्हारी दो धोतियों में से एक पहन कर चली जाऊँगी। सुबह नहाने के बाद तुम मेरी वाली साड़ी लपेट लेना...।

बाहर वालों के तीखे भाले भी कम चुभते हैं, किन्तु पत्नी का मधुर व्यंग्य भी तिलमिलाने के लिए काफी होता है पति के लिए।  इतिहास गवाह है कि  त्रिया-हास्य ने ही तो महाभारत का बीज बोया था। 

>>>>>>कृपया अगली कड़ी की प्रतीक्षा करें>>>>


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