साधक का द्वन्द्व (आत्ममन्थन का नवनीत)
पाँचवाँ भाग---- गतांश से आगे पृ.105 से 145तक
योग की साधना
पितामहेश्वर घाट, अपने डेरे के ठीक सामने बीचो बीच फल्गु की सूनी-प्यासी
रेत पर पेट के बल उकड़ू लेटे आँसू बहा रहा हूँ । ऐसा लगता है मानों आज सीताशापित
फल्गु को जलप्लावित करके ही छोड़ूँगा। जहाँ तक मुझे याद है, इतने आँसू पहले कभी
नहीं बहे होंगे। इन आँसुओं को कैसे परिभाषित करुँ ये भी नहीं कह सकता। खिन्न हूँ,
पर दुःखी तो नहीं। आँसू खुशी के होते है, पर वो भी तो नहीं। फिर ये धाराप्रवाह
अश्रुपात क्यों?
तभी अचानक, बेहद बदबू का भभाका कहीं से आकर जबरन घुसने लगा नथुनों में और
इसके साथ ही किसी ने पीछे से धकियाआ।
विचारों का प्रवाह भंग हो गया। पीछे मुड़ कर देखा—मलावृत मलभोजी विशालकाय
जन्तु मेरे गुदामार्ग पर थुथुना रहा है। मन एकदम भिन्ना उठा। नाक पर हथेली रखे
सोचने लगा—क्या करूँ, कैसे भगाऊँ इस धृष्ट जानवर को, तभी वह उछलकर सामने आ गया,
गुर्राते-घूरते हुए।
आमतौर पर पितामहेश्वर घाट के ईर्द-गिर्द की ये आम घटना है, क्योंकि
लोकतन्त्र के दुलरुओं को सूअरपालन का प्रोत्साहन मिलते रहता है, भले ही गोपालन की
कभी आवश्यकता नहीं समझी गई इनके लिए।
मैंने गौर किया कि आम सूअर तो इतना बड़ा होता नहीं है, हाँ वनैले सूअरों का
आकार बड़ा भयंकर होता है। किन्तु इस इलाके में ऐसे सूअर तो हैं नहीं...।
अभी सुअरों के नस्ल की बात सोच ही रहा था कि वातावरण में स्वरलहरी तैर उठी—
“ विद्याविनय
सम्पन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि। शुनि चैव श्वपाके च पण्डिताः समदर्शिनः।। ”
और नदी के रेत पर घने कुहरे का आभास हुआ। कुहरा इतना घना कि नदी
के उस पार मानपुर का इलाका बिल्कुल ही दीख नहीं रहा था और न पीछे पितामहेश्वर
मन्दिर ही। वनैले सूअर का कहीं अता-पता
नहीं और न दुर्गन्ध के भभाके ही मिल रहे थे नथुनों को। धूप-धूना-गुगुलु की मदिर
सुगन्ध ने वातावरण को आप्लावित कर दिया था।
क्षणभर में ही कुहरे का भ्रम जाता रहा और गीक्तोक्त डण्डे का प्रहार करते
हुए, काषाय परिधान में, बाबा उपद्रवीनाथजी सामने खड़े मुस्कुराते नजर आए ये कहते
हुए —
“ सांख्य तोतारट की चीज नहीं है बच्चे! घोंटने-पीने-पचाने की चीज है। इतनी
उम्र हो गई, किन्तु गीक्तोक्त वचनों का किंचित् संस्कार भी नहीं पड़ा है। क्या कहा
है श्रीकृष्ण ने—ब्राह्मण, गाय, हाथी, कुत्ता और चाण्डाल में पण्डित की समदृष्टि
होती है। सभी जीवों में वही एकमात्र ‘परमचेतन’ ही सक्रिय है। उसके सिवा कुछ और है ही
कहाँ इस जगत् में ! ”
हर्षातिरेक सहित भावविभोर होकर, लपक कर मैं उनके चरणों में लोट गया। अपने
सिर पर बाबा की हथेली का कोमल स्पर्श पाकर मैं धन्य हो गया। उस दिन तो अपना चरण भी
छूने नहीं दिए थे, जबकि आज चरण-रज ने मेरे मलिन मन-मुकुर को धो-पोंछकर स्वच्छ कर
डाला। अश्रुपात पूर्ववत जारी हो गया।
आदमी भी बड़ा अजीब होता है—कहता है प्यास है, भूख है। किन्तु सत्प्रयत्न
करने में बारबार चूक जाता है। मैं भी अजीब हूँ। अड़तीस वर्षों बाद बाबा की कृपा-प्रसाद का
लाभ मिला था उस दिन माँ मंगलेश्वरी के आशीष से और इसे भी विसार दिया जागतिक-जंजाल
में...।
अगले ही क्षण चित्त की चंचल लहरों ने कहा—पत्नी अर्द्धांगिनी होती है, यदि
उसे सिर्फ भोग्या न समझ लिया जाए। नारीमात्र महाशक्ति की प्रतीक है। उनकी ही विविध
विभूतियाँ हैं—या श्रीः स्वयं सुकृतिनां भवनेष्वलक्ष्मीः पापात्मनां कृतधियां
हृदयेषु बुद्धिः। श्रद्धा सतां कुलजनप्रभवस्य लज्जा तां त्वां नताः स्म परिपालय
देवि विश्वम्।। विद्याः समस्तास्तव देवि
भेदाः स्त्रियः समस्ता सकला जगत्सु। त्वयैकया पूरितमम्बयैतत् का ते स्तुतिः
स्तव्यपरा परोक्तिः।। लक्ष्मी, सरस्वती, सद्बुद्धि सभी रूपों में तो तुम ही हो
न ! ‘त्रिया-हास्य’ सिर्फ
महाभारत ही नहीं कराता,पुरुष का कल्याण भी कराता है। तुलसी और विल्वमंगल इसके
ज्वलन्त उदाहरण हैं।
*************
प्रशस्त बालुकाराशि पर पद्मासन में बाबा विराज
गए। मैं वज्रासन लगाये सामने बैठ गया। शब्द-शक्ति का विचार किए वगैर, आदतन बकबक
करने वाले के शब्दकोश में डाका पड़ा है आज। मैं कुछ बोल ही नहीं पा रहा हूँ। क्या
बोलूँ, क्या पूछूँ—कुछ समझ ही नहीं पा रहा हूँ। कण्ठ अवरुद्ध हो गया है।
किंचित् प्रतीक्षा के पश्चात् बाबा स्वयं पहल
किए— “ किताबी जानकारियों
की मोटरी बटोर लेने से, इससे-उससे पूछ-पाछकर सूचनाएँ इकट्ठे कर लेने से कुछ
होना-जाना नहीं है बच्चे! बोलने वाले
बोलते आए है, लिखने वाले लिखते आए हैं, श्रुति-स्मृति-पुराण से लेकर आधुनिक
पुस्तकों की अम्बार है सनातन ज्ञानधारा में।
किन्तु इनसे वास्तविक उद्धार कितनों का हुआ ! इसीलिए कृष्ण ने दावे के साथ कहा है—मनुष्याणां सहस्रेषु
कश्चिद्यतति सिद्धये। यततामपि सिद्धानां कश्चिन्मां वेत्ति तत्त्वतः।। अब ये
तुम्हारे हाथ में है कि तुम कहाँ रहना चाहते हो—हजारों-लाखों की भीड़ का हिस्सा
बनकर रह जाना चाहते हो या उनसे अलग—सत्यखोजी ? सांख्य की समझ
के साथ सत्यान्वेषण के लिए जबतक नहीं निकलोगे,सत्य को लब्ध नहीं कर लोगे, प्रकृतिनटी
को पहचान नहीं लोगे, तबतक तो वो नाचती ही रहेगी न ! और इस
भ्रम में भी न रहना कि घरबार छोड़कर, बीबी-बच्चों की जिम्मेवारियों से मुँह मोड़कर
जंगल-पहाड़ का रास्ता धर लेने से सत्य मिल जायेगा। नहीं...बिल्कुल नहीं। एक स्त्री
की आश पुराने में असफल हो रहे हो, अनेक स्त्रियों का सामना कैसे करोगे—एक ओर स्त्री
काली, दुर्गा, लक्ष्मी, सरस्वती, सद्बुद्धि स्वरूपा है, तो दूसरी ओर दरिद्रा,
दुर्बुद्धि, वासना, इच्छा भी तो उसी महामाया का स्वरूप है न ! ”
यही तो विडम्बना है महाराज ! सबकुछ जानते-समझते हुए भी सत्मार्ग में गति नहीं हो पा रही
है निरन्तर। आप ही बतलाएँ आँखिर इसके लिए क्या करूँ?
बाबा ने कहा—“ गाड़ी वहीं अटकी है—क्या करूँ, क्या न करूँ वाली दलदल में। सांख्य के
रास्ते का पूरा हिसाब, पूरी खाका तो तुम देख लिए। अब इस पर योग की विधि से कदम
बढ़ाने की आवश्यकता है। महर्षि कपिल का सांख्य किंचित् रूक्ष (शुष्क-नीरस) प्रतीत
हुआ बाद वालों को, तो महर्षि पतञ्जलि ने बिना ईश्वर वाले दर्शन में ईश्वर को ला
विठाया। निरीश्वर सांख्य का सहयोगी सेश्वर सांख्य बन गया। पतञ्जलि
ने हमें आठ डण्डों वाली एक सुव्यवस्थित सीढ़ी दी, जिसके सहारे हम सहज ही सत्य तक
पहुँच सकते हैं। किन्तु इस सहजता का अर्थ आधुनिक लोगों वाली आरामतलबी और विलासिता
से मत ले लेना। नवसिखुआ सांयन्स तरह-तरह की सुविधाएं उपलब्ध कराता रहा मनुष्य को
और आलसी मनुष्य और-और की चाह में निर्बल-निकम्मा होता चला गया। तुम भी इस भूल में
न रहो कि पतञ्जलि का योग रसगुल्ले की तरह है—चट से मुँह में डालो और खट से गटक
जाओ। आठ डण्डों वाली सीढ़ी है तो बड़ी सुन्दर-सुव्यवस्थित, किन्तु उस पर कायदे से
चढ़ने की कला तो तुम्हें सीखनी ही होगी। अभ्यास तो करना ही होगा। यहाँ एक और बात
कान खोलकर सुन लो—ये कोई दिन, महीने, साल
वाला ‘सिलेबस’ नहीं है। इसमें
समय-सीमा तय करना महामूर्खता है। ”
आपके सानिध्य से इतना तो जरुर जान लिया हूँ कि कोई भी साधना समय-सीमा में
बाँधने जैसी नहीं है, किन्तु ये विश्वास उस जानकारी से कहीं ज्यादा मजबूत है कि
आपकी कृपा होगी, तो समय सीमा समाप्त हो जायेगी या कहें समय का पहिया थम जायेगा। युद्धभूमि
में विषादग्रस्त अर्जुन की तरह मैं तो सिर्फ इतना ही कह सकता हूँ —यच्छ्रेयः
स्यान्निश्चितं ब्रूहि तन्मे शिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम् ।
मेरी बात सुनकर अपने पुराने अन्दाज में बाबा ने ठहाका लगाते हुए कहा— “ तुम्हारी चतुराई भी
काबिले तारीफ़ है। कितनी सहजता से अर्जुन की तरह शिष्यत्व स्वीकार कर लिए। ये भी
नहीं सोचे कि मैं तुम्हारा गुरु या सारथी बनने को राज़ी भी हूँ या नहीं। खैर, तुम्हारे
भीतर गुण-ग्राह्यता है, तो मैं भी स्नेह-सिक्त होकर, तुम्हें श्रेयस्कर मार्ग
दिखलाने में जरा भी नहीं चूकूँगा। अच्छा है पिछली दफा हमलोग भीमसेनी एकादशी को
मिले थे माँमंगलेश्वरी के निवास भस्मकूट पहाड़ी पर और आज मिल रहे हैं गीताजयन्ती
वाली एकादशी को पावन फल्गु की प्रशस्त बालुका-पर्यंक पर। सुयोग उत्तम है। अतः पतञ्जलि
के राजयोग पर आज थोड़ी चर्चा हो ही जाए हमलोगों के बीच। ”
मैंने सिर झुका कर अभिवादन किया। बाबा ने चर्चा प्रारम्भ की— “ महर्षि पतञ्जलि ने ‘अथ
योगानुशासनम्’ के विषय-प्रवेश के पश्चात् ‘योगश्चित्तवृत्ति निरोधः’ से अपनी बात शुरु की
है योगदर्शन के दूसरे सूत्र में और आगे बारहवें सूत्र में जाकर इसका एकमात्र उपाय
सुझाते हैं— ‘अभ्यासवैराग्याभ्याम्
तन्निरोधः’। अंग्रेजी में तुम इसे
Practice & Detachment कह सकते हो। भले ही कृष्ण बड़ी सहजता से ‘योगःकर्मसु कौशलम्’ कह कर
निकल गए हों, किन्तु पतञ्जलि चित्तवृत्तियों को ही सारे खुराफ़ातों की जड़
मानते हैं। यानी चित्तवृत्तियों का निरुद्ध हो जाना ही योग है। इसके लिए सतत
अभ्यास और वैराग्य सहयोगी घटक हैं। बार-बार
चित्त को स्थिर करने का प्रयास अभ्यास है और इसके परिणामस्वरूप बोध हो जाना कि
"जो दिख रहा है (प्रकृति), वह क्षणिक है। सांख्य प्रसंग
में द्रष्टा-दृश्य विवेक की बात कही गई थी। यानी जब कोई विचार उठे (जैसे:
"मुझे गुस्सा आ रहा है"), तो तुरन्त एक छोटा सा 'गैप' (विराम) पैदा करो और कहो कि यह वृत्ति उठी।
जैसे ही तुम विचार को 'नाम' दे
देते हो, तुम उससे अलग हो जाते हो। यही शुरुआत है 'निरोध' की । ऋषि कहते हैं— तत्र स्थितौ
यत्नोऽभ्यासः—जहाँ मन शान्त हुआ, उस 'शान्ति' में कुछ पल रुकने का यत्न करो। शुरुआत में
यह केवल कुछ सेकंड होगा, लेकिन यही वह स्थिति है जहाँ 'प्रकृति' अपना नृत्य रोक देती है और 'पुरुष' अपनी महिमा में प्रकट हो जाता है। जब तुम
कोई काम कर रहे हो, तो 'पूरी तरह' काम में डूब जाओ। यह एकाग्रता है। लेकिन जैसे ही काम पूरा हो, तुरन्त 'पूरी तरह' उससे बाहर निकल आओ (यह निरोध है)। काम को अपने साथ घर न ले जाओ और घर को
अपने साथ काम पर न ले जाओ। ”
व्यवधान के लिए क्षमा करें महाराज ! आपके उपदेशों से मैं इतना
समझ चुका हूँ कि मंजिल तो एक ही है, भले ही रास्ते अनेक हों। यहाँ मेरी
जिज्ञासा है कि कुछ लोग कुण्डलिनी-साधना पर जोर देते हैं इस दावे के साथ कि इसका परिणाम अति
शीघ्र प्राप्त होता है। यानि यात्रा जल्दी पूरी हो जाती है। इस सम्बन्ध में आपका
क्या विचार हैं?
बाबा मुस्कुराए
और बोले—“ इस जल्दबाजी की ललक ने ही दुनिया का बहुत नुकसान
किया है। जल्दीबाजी का गुण दीखता है, दोष नहीं। दिल्ली की यात्रा पैदल भी
कर सकते हो और विमान से भी। पैदल जाने के लिए किसी और के पैर का सहारा नहीं लेना है, किसी जानकार का दिशा-निर्देश ही
पर्याप्त होता है। जबकि विमान किसी और के हाथों संचालित हो रहा है। उस यन्त्र-चालित
विमान के लिए समुचित ईंधन भी आवश्यक है और पग-पगपर खतरे भी हैं। वस्तुतः कुण्डलिनी
साधना तन्त्र और हठयोग का मार्ग है, जो तलवार की धार की तरह है। ऐसा भी
नहीं है कि इसके बिना तुम्हारा काम ही नहीं चलेगा। सृष्टि का सर्वोत्तम तान्त्रिक योगेश्वर
श्रीकृष्ण ने ज्ञान, कर्म और भक्ति में ही गीता का सर्वोच्च ज्ञान समाहित कर दिया।
उन्होंने भी कभी-कहीं कुण्डलिनी-साधना का अनुमोदन नहीं किया। मैंने पहले भी कहा था, तुमने शायद ध्यान नहीं
दिया मेरी बातों का—ये कोई कम समय में सिद्ध हो जाने वाला आसान रास्ता नहीं है।
अपेक्षाकृत खतरे भी बहुत हैं इसमें। और ये अनिवार्य भी नहीं है कि तुम इसी रास्ते
का चुनाव करो। कृपालु ऋषियों ने अनेक मार्ग सुझाए हैं गन्तव्य तक पहुँचने के लिए। चित्तवृत्ति
निरोध के लिए षट्चक्र साधना, जिसे ‘कुण्डलिनीयोग’ के नाम से जाना जाता है, निश्चित
रूप से एक प्रभावशाली मार्ग है। षट्चक्र-साधना अनिवार्य नहीं, लेकिन सहायक है। यह शरीर की ऊर्जा को 'ऊर्ध्वगामी'
बनाती है, जिससे एकाग्रता आसान हो जाती है।
लेकिन सांख्य कहता है कि यदि 'तीक्ष्ण विवेक' है, तो बिना किसी तान्त्रिक क्रिया के भी सीधे 'बुद्धि' के प्रकाश से वृत्तियों का निरोध कर
सकते हो। चित्तवृत्ति निरोध का मतलब 'विचारों को मारना'
नहीं है, बल्कि विचारों के 'प्रभाव' से मुक्त होना है। जैसे आकाश में
बादल आते-जाते हैं, पर वे आकाश को गीला नहीं कर पाते,
वैसे ही वृत्तियाँ चित्त में उठें पर वे तुमको (पुरुष को) छू न
सकें। प्रभावित न कर सकें। महर्षि पत़ञ्जलि और कपिल ने कई 'सीधे'
और 'मनोवैज्ञानिक' उपाय
बताए हैं। अभी इसी पर थोड़ी चर्चा करते हैं—
“ षट्चक्र साधना वनाम सांख्य-योग मार्ग— षट्चक्र साधना मुख्य रूप से 'प्राण' (Energy)
के माध्यम से चित्त को साधने की विधि है। यह एक 'हठयौगिक' प्रक्रिया है। लेकिन सांख्य और पातञ्जलयोग
‘विवेक’ और 'बुद्धि' के माध्यम से निरोध की बात करते
हैं। महर्षि पतञ्जलि ने चित्तवृत्ति निरोध के लिए 'अष्टांग योग' (यम, नियम,
आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार,
धारणा, ध्यान, समाधि) का
मार्ग दिखलाया है। इसमें चक्रों की चर्चा सीधे रूप से बिल्कुल नहीं है, किन्तु
सूक्ष्म रूप में समाहित अवश्य है। महर्षि पतञ्जलि ने कुछ ऐसे 'शॉर्टकट' और प्रभावी तरीके बतलाए हैं, जो हर
किसी के लिए सुलभ हैं।
· अभ्यास और वैराग्य (Consistency & Detachment): यह सबसे बड़ा उपाय
है। बार-बार चित्त को विषय से हटाकर केन्द्र पर लाना 'अभ्यास'
है, और यह जान लेना कि बाहरी दृश्य क्षणिक
हैं, 'वैराग्य' है।
· चित्त-प्रसादन (Mental Embellishment): पतञ्जलि एक बहुत अच्छा
सूत्र दिए हैं—मैत्रीकरुणामुदितोपेक्षाणाम्... यानी सुखी के प्रति मित्रता, दुःखी के प्रति करुणा,
पुण्यात्मा के प्रति हर्ष और पापी के प्रति उपेक्षा । अगर तुम ये
चारो भाव पाल लो, तो चित्त की आधी वृत्तियाँ (हलचल) अपने आप
शान्त हो जाती हैं।
· ईश्वरप्रणिधान—सांख्य भले ही 'निरीश्वर' (बिना ईश्वर के) लगे,
लेकिन योग सूत्र कहता है कि अपने अहंकार को किसी 'विराट सत्ता' को समर्पित कर देने से
भी चित्त शान्त हो जाता है।
“अब हम 'निरोध' की तीन अवस्थाओं (गहराइयों) पर प्रकाश डालते हैं। जब हम निरोध की गहराई में उतरते हैं,
तो मन तीन स्तरों से गुजरता है—
१
व्युत्थान निरोध: जहाँ हम जबरदस्ती मन को बुरे विचारों से हटाकर अच्छे
विचारों पर लगाते हैं। (यह संघर्ष की स्थिति है)।
२
एकाग्रता निरोध: जहाँ केवल एक ही विचार (जैसे—साक्षी
भाव) रह जाता है, बाकी सब शान्त हो जाते हैं। यहाँ 'दीपक का लौ' स्थिर हो जाता है।
३
निरुद्ध अवस्था –जहाँ वह 'एक विचार' भी विलीन हो जाता है। यही वह गहराई है जहाँ 'पुरुष' अपने शुद्ध रूप में चमकता है। यहाँ
न कोई चक्र है, न कोई विचार, बस 'होने का बोध' है।
“ अब तुम्हें सीढ़ी के उन आठ डण्डों से परिचय करा रहा हूँ, जिसकी प्रशंसा ऋषि
ने राजयोग कह कर की है। यही अष्टांग योग है, जिसकी सम्यक् साधना शनैःशनैः चित्त को धीरे-धीरे
शान्त कर देती है। इसे ही चित्त-शान्ति की आठ सीढ़ियाँ कहते हैं। महर्षि पतञ्जलि
का यह मार्ग एक 'फिल्टर' की तरह है, जो बाहर से भीतर तक सुव्यवस्थित रूप से सफाई
करता है। इन्हें संक्षेप में इस प्रकार समझो
—
· यम (Social Discipline): अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और
अपरिग्रह। इनका अभ्यास बाहरी संघर्षों को समाप्त करने में सहयोगी होता है। यदि तुम
हिंसा करोगे, झूठ बोलोगे, चोरी करोगे, कामवासना में लिप्त
रहोगे, नानाविध संचय में लगे रहोगे, तो चित्त कभी शान्त नहीं रह पाएगा।
· नियम (Personal Discipline): शौच (शुद्धि),
सन्तोष, तप, स्वाध्याय
और ईश्वर-प्रणिधान। ये तुम्हारे स्वभाव को व्यवस्थित करते हैं। 'सन्तोष' आते ही भविष्य की आधी चिंताएँ समाप्त हो
जाती हैं। बाहर-भीतर की शुद्धि, जप-तप, सद्ग्रन्थों का अध्ययन-मनन और ईश्वर की
शरणागति—इन सबके अभ्यास से चित्त निर्मल होता है।
· आसन (Stability): शरीर को शान्त और
स्थिर रखना इसका उद्देश्य है। सांख्य कहता है कि यदि शरीर हिलेगा, तो बुद्धि विचलित होगी।
· प्राणायाम (Energy Control): श्वास की गति को
लयबद्ध करना। श्वास और चित्त का गहरा सम्बन्ध है—श्वास शान्त,
तो मन शान्त।
· प्रत्याहार (Withdrawal): इन्द्रियों को बाहरी
विषयों से समेटना। जैसे कछुआ अपने अंगों को भीतर खींच लेता है। यह अभ्यास 'दीये' को हवा से बचाने जैसा है।
· धारणा (Concentration): चित्त को किसी एक
बिंदु (जैसे हृदय या आज्ञा चक्र) पर टिकाना।
· ध्यान (Meditation): जब वह एकाग्रता
बिना टूटे एक प्रवाह बन जाए।
· समाधि (Absorption): जहाँ ध्यान करने
वाला, ध्यान की प्रक्रिया और ध्येय (लक्ष्य) तीनों एक हो जाते
हैं।
“ महर्षि पतञ्जलि ने
अपने योगदर्शन में इन पर विस्तार से चर्चा की है।
सांख्य दर्शन के अनुसार, समाधि वह स्थिति है, जहाँ प्रकृति का खेल रुक जाता है और
पुरुष की महिमा प्रकट हो जाती है। इसके मुख्य दो स्तर हैं—
क) संप्रज्ञात समाधि (सबीज अवस्था)— यहाँ अभी 'बीज' बाकी है। यानी चित्त में एक सूक्ष्म विचार या आलम्बन (जैसे कोई मन्त्र या
साक्षी भाव) बना रहता है। इसके भी चार स्तर होते हैं, जहाँ
साधक तर्क, विचार, आनन्द और अन्ततः
केवल 'अस्मिता' (होने का भाव) में टिक
जाता है। यहाँ शान्त तो हैं, लेकिन अभी वापस आने की सम्भावना
बनी रहती है।
ख) असम्प्रज्ञात समाधि (निर्बीज अवस्था)—यह चित्तवृत्ति निरोध की
पराकाष्ठा है। यहाँ कोई विचार, कोई बीज, कोई आलम्बन शेष नहीं रहता।
चुँकि यहाँ संस्कारों के सारे बीज भुन चुके होते हैं, इसलिए इसे 'निर्बीज समाधि' भी कहते हैं । यहाँ 'पुरुष' अपने
असली स्वरूप में स्थित हो जाता है। यही वह 'कैवल्य' है, जिसकी चर्चा सांख्य करता है। इसके बाद आवागमन (पुनर्जन्म) का चक्र रुक
जाता है, क्योंकि सूक्ष्म शरीर को चलाने वाला ईंधन (वासना) समाप्त हो गया है।
“ अष्टांग योग एक प्रक्रिया है और समाधि उसकी परिणति। सांख्य कहता है कि समाधि कोई ऐसी चीज नहीं है,
जिसे बाहर से पाना है, बल्कि यह वह है, जो 'पर्दा' हटने के बाद अपने आप बचता है। जब तुम 'अपरिग्रह' (यम) से शुरू करते हो और 'ध्यान' तक पहुँचते हो, तो धीरे-धीरे अपने 'पुरुष' स्वरूप
के करीब आते जाते हो। समाधि का अर्थ संसार से भागना नहीं, बल्कि
संसार में रहते हुए स्वयं में पूरी तरह ठहर जाना है। यम, नियम, आसन, प्राणायाम इन
चार सीढ़ियों को प्रारम्भिक अभ्यास के तौर पर रखा जा सकता है। इन चारो का अभ्यास
एक साथ चलाया जा सकता है। ध्यान रहे कि ये कोई दिन-महीने-साल की सीमा में बँधा
विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम की भाँति नहीं है। सच पूछो तो ये जीवनभर की साधना है।
जीवन भर का अभ्यास है। किन्तु हाँ, इतनी बात अवश्य है कि प्रारम्भिक कुछ वर्षों के
अभ्यास के बाद (बिना इन्हें छोड़े) आगे का अभ्यास भी प्रारम्भ किया जा सकता है
क्रमिक रूप से। पाँचवें क्रम में सीढ़ी का जो डंडा है, उसे प्रत्याहार कहा गया है।
तुम इसे चौखट भी कह सकते हो—चार बाहरी क्रियाएं और तीन आन्तरिक क्रियाएं और ये बीच
का चौखट—कमरे के बाहर और कमरे के भीतर—कमरे में घुसने से पहले एक सीमा होती है
चौखट। प्रत्याहार उस चौखट के समान है। बाहरी दुनिया से इन्द्रियों को धीरे-धीरे
समेटते हुए घर के चौखट पर आकर, थोड़ा रूकते हैं, फिर अन्तरंग में प्रवेश करते है। अब
चेतना का असली खेल शुरु होता है। अन्तरंगसाधना की इन तीन पायदानों—धारणा, ध्यान,
समाधि के लिए ऋषि ने ‘संयम’
शब्द का भी प्रयोग किया है।
१.
धारणा: मन एक बन्दर की तरह है, जो स्वभाव से ही अति चंचल है। मन को किसी एक खूँटे
से बाँधने की कला है धारणा। इसकी व्यावहारिक विधि ये है कि अपनी बुद्धि को
किसी एक 'तत्व' पर टिकाते हैं—जैसे हृदय की धड़कन, श्वास का स्पर्श या कोई मन्त्र।
इसका लक्ष्य है चित्त को एक 'देश'
(स्थान) में बाँध देना। जैसे ही मन भागता है, उसे
प्रेम से वापस लाना। यहाँ 'प्रयत्न' मुख्य है।
२.
ध्यान (Meditation)—तेल की अविच्छिन्न धार की भाँति— जब 'धारणा' परिपक्व हो जाती है, तो वह 'ध्यान' बन जाता है।
धारणा में रुकावटें होती हैं। मन भागता है। लेकिन ध्यान में विचार का प्रवाह एक-सा हो जाता
है। जैसे बर्तन से पानी गिराने पर वह बूँद-बूँद गिरता है (धारणा), लेकिन तेल गिराने पर वह एक सीधी धार में गिरता है (ध्यान)।
सांख्य की दृष्टि से इसे कह सकते हैं कि यहाँ 'ज्ञाता'
(ध्यान करने वाला) और 'ज्ञेय' (जिसका ध्यान कर रहे हैं) के बीच एक सीधा तार जुड़ जाता है। इस अवस्था में
समय का बोध समाप्त हो जाता है।
३.
समाधि (Absorption
) विलीन हो जाना—जहाँ 'स्व' विलीन हो जाता है और केवल 'सत्य' शेष रहता है। यह योग की पराकाष्ठा है। यहाँ ध्यान इतना गहरा हो
जाता है कि ध्यान करने वाला अपने अस्तित्व को भूल जाता है। जैसे नमक पानी
में मिलकर अपना अलगवाला अस्तित्व खो देता है, वैसे ही समाधि
में 'अहंकार' पूरी तरह विलीन हो जाता
है। समाधि वह क्षण है, जहाँ 'प्रकृति' का नाच पूरी तरह थम जाता है और 'पुरुष' (शुद्ध चेतना) को पहली बार यह अनुभव होता है कि "मैं अकेला, शुद्ध और मुक्त हूँ।
“ पतञ्जलि कहते हैं कि जब धारणा, ध्यान
और समाधि एक ही वस्तु पर टिक जाते हैं, तो उसे 'संयम' कहते हैं। इस संयम से 'प्रज्ञा' (Intuitive Wisdom) का उदय होता है। यही वह
स्थिति है, जहाँ सांख्य की 'विवेक-ख्याति' घटित होती है—यानी जड़ और चेतन का भेद सूरज की तरह
साफ हो जाता है। ”
बाबा ने बड़े सरल ढंग से राजयोग की सीढ़ी से परिचय तो करा दिया। किन्तु
सिर्फ सीढ़ी देख लेने से, सीढ़ी को पहचान लेने से ही मंजिल मिल नहीं जाती। सीढ़ी
पर चढ़ने का प्रयास करना पड़ता है। चढ़ने में किंचित् बाधाएँ (परेशानियाँ) भी आनी
ही है। अतः उन बाधाओं से भी परिचित होना जरुरी है और फिर उनसे निपटने का तरीका भी
मालूम होना चाहिए – मैं सोच ही रहा था ये सब पूछने के लिए, किन्तु बाबा ने अवसर न
दिया। गौर से मेरे चेहरे पर उमड़ते-घुमड़ते भावों को परखा और फिर शुरु हो गए— “ मैं समझ रहा हूँ कि
अभी तुम्हारे भीतर कौन से सवाल कुलबुला रहे हैं। चलो तुम्हारे मानसिक तूफान को ही
शान्त कर लूँ पहले, फिर कोई और बात होगी।
“ चित्त की चंचलता को दूर करने के क्रम में मुख्य रूप से दो
बाधाएं आती हैं— सांख्य और योग साधना में 'उबाऊपन' और 'विक्षेप'
सबसे प्रबल बाधाएँ हैं। अक्सर लोग इनके बारे में बात नहीं करते,
परन्तु हर साधक इनसे जूझता है। धारणा के समय जब हम मन को किसी एक केन्द्र
पर लाने की कोशिश करते हैं, तो मन विद्रोह करता है। इन
बाधाओं को सांख्य के त्रिगुणों (सत्व, रज, तम) और पतञ्जलि के 'चित्त-विक्षेप' के चश्मे से देखते हैं और फिर इनके व्यावहारिक समाधान की ओर बढ़ते हैं—
Ø उबाऊपन (Boredom): तमस और सत्व
का संघर्ष—धारणा के
समय उबाऊपन आने के दो कारण हैं—
·
तमस का प्रभाव: मन को 'हलचल' (रजस) की आदत है। जब तुम उसे स्थिर करते हो, तो वह निष्क्रियता
की ओर भागता है। ऐसे में अभ्यासी को नींद या भारीपन महसूस होता है।
·
उत्तेजना की कमी: हमारा मन हमेशा 'नयापन' खोजता है। एक ही बिंदु पर टिकना उसे 'पुराना'
और 'नीरस' लगता है,
क्योंकि वहाँ कोई 'मनोरंजन' नहीं है।
“ सांख्य कहता है कि उबाऊपन को 'देखो'। जैसे ही तुम्हें महसूस हो कि "मैं बोर हो रहा हूँ", उस बोरियत के प्रति जागरूक हो जाओ। बोरियत के प्रति सजग होते ही वह 'सत्व' में बदल जाती है। अभ्यास को बहुत लम्बा न खींचो,
बल्कि 'गुणवत्ता' पर ध्यान दो। पाँच मिनट की गहरी धारणा, घंटे भर की
उबाऊ बैठकी से बेहतर है।
Ø मानसिक तूफान (Distractions): रजस का नर्तन— पतञ्जलि ने ९ प्रकार के विक्षेप बताए
हैं, जिनमें व्याधि (बीमारी), संशय (Doubt), और प्रमाद (Carelessness) प्रमुख हैं।
धारणा के समय ये तीन रूप में आते हैं—
§
शारीरिक व्याकुलता: अचानक पीठ में खुजली, घुटने में
दर्द या बैठने में असहजता। यह शरीर (प्रकृति) का तरीका है एकाग्रता के अभ्यास को रोकने
का। ऐसे में शरीर को पत्थर की तरह स्थिर रखने का संकल्प (काय-स्थैर्य) बड़ा सहायक
होता है। खुजली होने पर तुरन्त हाथ न बढ़ाओ,
बस उसे देखो। थोड़ी देर में ये संवेदना अपने आप मिट जाएगी।
§
संशय (Doubt): "क्या मैं
सही कर रहा हूँ?", "क्या इससे कुछ होगा?"
यह सबसे घातक विक्षेप है। साधना के समय तर्क की खिड़की बंद कर दो।
जो करना है वह बैठने से पहले तय कर लो, बैठने के बाद केवल 'श्रद्धा' से उस पर टिके रहो।
§
स्मृतियों का सैलाब: पुरानी बातें या भविष्य की योजनाएँ—इन्हें 'ट्रैफिक' की तरह देखो। सड़क किनारे खड़े
हैं और गाड़ियाँ (विचार) गुजर रही हैं। किसी गाड़ी में हमें बैठना नहीं है,
बस उन्हें गुजरते हुए देखना है। जैसे ही 'ट्रैफिक'
के बीच में खड़े होने के बजाय, किनारे (साक्षी) खड़े होते हैं,
धीरे-धीरे तूफान शान्त होने लगता है।
“ आओ अब तुम्हें इस अभ्यास(धारणा) को रोचक कैसे बनाएँ, इस पर
बात करते हैं। ये बात पक्के तौर पर समझ लो कि धारणा का अर्थ 'ज़बरदस्ती' करना नहीं है। जिस
चीज़ पर तुम ध्यान लगा रहे हो (जैसे- श्वास या कोई ज्योति), उसे
'जड़' न समझो। उसे 'जीवन्त' अनुभव करो। श्वास को केवल हवा न
समझो, उसे 'प्राण शक्ति' के रूप में महसूस करो, जो रोम-रोम को छू रही है। दूसरी बात ये कि विश्राम
और एकाग्रता का सन्तुलन बनाये रखना जरुरी है। धारणा में बहुत ज़्यादा 'तनाव' न लाओ। मन को वैसे ही पकड़ो जैसे एक छोटी चिड़िया
को हाथ में पकड़ते हो—इतना ढीला भी नहीं कि उड़ जाए और इतना
कसकर भी नहीं कि उसका दम घुट जाए। बुद्ध ने कहा है कि वीणा के तारों को इतना न कसो
कि वो टूट जाए और इतना ढीला भी न छोड़ो कि स्वर बिगड़ने लगे। सारे स्वर-यन्त्रों
का यही हिसाब है। ये शरीर भी एक स्वर-यन्त्र ही है। ”
जी हाँ महाराज ! आपने बिल्कुल ठीक कहा। मानसिक तूफान बहुत ही परेशान करता है। सारे
खुराफ़ात धारणा के समय ही सामने आ खड़े होते हैं। मन का बन्दर मानता ही नहीं शान्त
होने का सुझाव। अर्जुन ने श्रीकृष्ण से अपनी यही व्यथा व्यक्त की थी— चञ्चलं हि
मनः कृष्ण प्रमाथि बलवद्दृढम्। तस्याहं निग्रहं मन्ये वायोरिव सुदुष्करम्।। शरीर को क्षुब्ध और इन्द्रियों को
विक्षिप्त करने वाले मन को नियन्त्रित करना वायु को मुट्ठी में कैद करने जैसा है। अतः
आप कृपाकरके इसके वशीकरण का उपाय सुझाएँ।
बाबा मुस्कुराए और बोले—“ बिलकुल सही कहा तुमने। अर्जुन की ये व्यथा हम सबकी व्यथा है। अर्जुन ने मन को न केवल 'चञ्चल' कहा है, बल्कि
उसे 'प्रमाथि' (मथ
डालने वाला), 'बलवद्' (बलवान) और 'दृढम्' (जिद्दी अर्थ में) भी बताया। उसने यहाँ तक कह दिया कि मन को रोकना 'वायु' को हाथ से पकड़ने जैसा असम्भव है। सांख्य
और योग इस 'बंदर' को खूँटे से बाँधने
के लिए दो बहुत ही व्यावहारिक और मनोवैज्ञानिक तरीके बताते हैं। पतञ्जलि में भी ऐसा
ही कहा है-- 'अभ्यास' और 'वैराग्य' ये दो तरीके बतलाए हैं। किन्तु इसे साधने से पहले ये समझो कि मन की
तुलना बन्दर से क्यों? इसका Biological Reason क्या है?
“ सांख्य कहता है कि मन 'रजोगुण'
से बना है। रजस का स्वभाव ही है—गति। जैसे आग बिना लपट के नहीं रह सकती, वैसे ही मन
बिना विचार के नहीं रह सकता। समस्या मन का चलना नहीं है, समस्या
है—उस बन्दर की पूँछ पकड़कर उसके साथ कूदना है। तुम परेशान और हैरान इसलिए
हो,क्योंकि तुम बन्दर के स्वभाव पर ध्यान नहीं दे रहे हो और उसकी पूँछ पकड़कर उसके
साथ कूद रहे हो। इसीलिए मैंने कहा कि बन्दर को किसी खूँटे से बाँधने का उद्योग
करो,न कि उसके साथ उछल-कूट मचाने का, झल्लाने का, खीझने का। और हाँ,तुम्हें ये भी
सीखना होगा कि उसे बाँधने के लिए खूँटा कहाँ गाड़ें और खूँटा हो कैसा? धारणा में 'खूँटा' वह आलम्बन (Object of focus) है, जिसका चुनाव
तुम करते हो। गलती यहीं होती है—हम या तो कमजोर खूँटा चुन लेते हैं या खूँटे की
जगह बारबार बदलते रहते हैं। कभी ये मन्त्र तो कभी वो गुरु तो कभी वो जगह। उचित ये
है कि किसी एक खूँटे को 'अपना' बना लो।
जब एक ही चीज़ पर बार-बार लौटना पड़ता है, तो मन को समझ आ
जाता है कि यहाँ से भागने का कोई रास्ता नहीं है। इसे ही पतञ्जलि ने 'एकतत्त्वाभ्यास' कहा है। 'अभ्यास' और 'वैराग्य' की जुगलबन्दी उस बन्दर को बार-बार नीचे उतारने
की प्रक्रिया है। वह कूदेगा, तुम उसे फिर से बिठाओ। बिना
चिढ़े, बिना गुस्सा किए। जितनी बार वह भागे, उतनी बार उसे 'प्रेम' से वापस
लाना ही अभ्यास है। और वैराग्य (Detachment): यह समझना कि "बाहर जहाँ बन्दर भाग रहा है, वहाँ
कोई असली फल नहीं है, सिर्फ प्लास्टिक के खिलौने हैं। जब मन
को यह यकीन हो जायेगा है कि बाहर 'सुख' नहीं है, तो उसकी दौड़ने की इच्छा अपने आप कम होने
लगती है। और एक दिन समाप्त हो जायेगी। चञ्चल स्वभाव बन्दर थकहार कर चुप बैठ
जायेगा,तुम्हारे आदेश की प्रतीक्षा में। यहाँ एक मनोवैज्ञानिक युक्ति है। बन्दर से
लड़ोगे तो वह और काटेगा। अतः मन को अपना शत्रु न मानो। सांख्य के अनुसार, मन भी 'प्रकृति' का ही एक हिस्सा है, जो अपना धर्म निभा रहा है। जब तुम मन के साथ 'मैत्री'
कर लेते हो और उसे एक 'साक्षी' की तरह देखने लगते हो (जैसे कोई पिता अपने शरारती बच्चे को खेलते हुए
देखता है), तो मन की ताकत आधी रह जाती है। व्यावहारिक बात ये
है कि अगली बार जब तुम धारणा के लिए बैठो और मन भागने लगे, तो
अर्जुन की तरह दुःखी न होओ,बल्कि मुस्कुराकर कहो—"अच्छा
! तो तू फिर वहाँ गया? चल वापस आ।" यह 'मुस्कुराहट' ही वह खूँटा
है, जो मन को स्थिर कर देगी।
“ महर्षि का ये बारहवाँ सूत्र सांख्य और योग की पूरी
कार्यप्रणाली का सार है। यहाँ 'अभ्यास' और 'वैराग्य' को एक साथ रखा है, क्योंकि ये एक पक्षी के दो पंखों
की तरह हैं। एक के बिना दूसरा अधूरा है। आओ इसे बहुत ही व्यावहारिक ढंग से समझते
हैं कि ये दोनों मिलकर उस 'बन्दर' (मन)
को कैसे शान्त करते हैं—
1. अभ्यास: सकारात्मक दिशा (Positive Direction)— अभ्यास का अर्थ है—चित्त को बार-बार एक ही सात्विक स्थिति में रखने का
प्रयत्न। पतञ्जलि कहते हैं कि यह अभ्यास तब सफल होता है जब वह 'दीर्घकाल' (लम्बे समय तक), 'नैरन्तर्य' (बिना रुके) और 'सत्कार' (पूरी श्रद्धा और प्रेम) के साथ
किया जाए। सच पूछो तो यह अभ्यास मन की पुरानी 'वायरिंग'
को बदलकर नई 'वायरिंग' करने
जैसा है।
2. वैराग्य: नकारात्मक रुकावट (Negative Prevention)— अभ्यास अगर मन को 'केन्द्र' की ओर खींचता है, तो वैराग्य उसे 'बाहर' जाने से
रोकता है। इसे ऐसे समझो कि अगर तुम नाव चला रहे हो (अभ्यास),
लेकिन नाव खूँटे से बँधी हुई है (विषयों में आसक्ति), तो नाव आगे नहीं बढ़ेगी। वैराग्य उस रस्सी को काट देता है। सांख्य की
दृष्टि में वैराग्य का अर्थ 'घर छोड़ना' नहीं है, बल्कि यह जान लेना है कि "प्रकृति के ये दृश्य (नाम, रूप, भोग) मेरा असली स्वरूप नहीं हैं।"
थोड़ी देर के लिए बाबा रूके और
मेरे चेहरे पर देखते हुए किसी प्रतिक्रिया का अनुमान लगाने लगे। किन्तु जब
मैं कुछ बोला नहीं, तो फिर कहने लगे— “ बात चुँकि अभ्यास की
हो रही है,तो यहाँ एक गुप्त चाबी (Secret Key) काम आती है— वह है प्राणायाम। हठयोग प्रदीपिका में कहा गया है कि "चले वाते चलं चित्तं निश्चले निश्चलं भवेत्।" (जब तक प्राण चलता है, तब तक चित्त चञ्चल रहता है;
प्राण के स्थिर होते ही चित्त स्थिर हो जाता है।) जब मन बहुत चञ्चल
हो और अभ्यास काम न कर रहा हो, तो बस अपनी श्वास को धीमा और
गहरा कर लो। जैसे ही श्वास की गति लयबद्ध होती है, चित्त की
वृत्तियाँ स्वतः 'निरोध' की ओर बढ़ने
लगती हैं। सच पूछो तो धारणा से ध्यान की ओर संक्रमण होने लगता है। जब
अभ्यास और वैराग्य से मन का भागना कम हो जाता है, तब 'धारणा' सहज ही 'ध्यान' में बदलने लगती है। अब तुम्हें 'पकड़ना' नहीं पड़ता, बल्कि 'होना' शुरू हो जाता है। अभ्यास तो धारणा के लिए ही
करना है, ध्यान स्वतः हो जाने वाली स्थिति है। इस प्रकार अब तक 'अन्तरंग योग' की चौखट(धारणा) और उसके उपकरणों
(अभ्यास-वैराग्य) पर प्रकाश डाला। आशा है ये बातें तुम्हें ठीक से समझ आ गई होंगी।
“
सैद्धान्तिक रूप से तो
सारी बातें समझ आरही है महाराज ! मन को साधने का अभ्यास
जरुरी है। जैसा कि आपने कहा—मन को शत्रु मत मानों,उसे मित्र की तरह समझाओ। इस बात
को मैं पहले से ही समझ रहा हूँ,किन्तु मित्र धोखेबाज भी हो सकते हैं, होते ही है। शत्रु
से तो सदा सावधान रहा जा सकता है,किन्तु धोखेबाज मित्र की पहचान ज्यादा कठिन है।
धोखेबाज मित्र कंधे पर हाथ रखकर, खाई में भी ढकेल दे सकता है न ?
बाबा ने मेरी बातों का समर्थन किया— “ बिलकुल सही कह रहे हो। सांख्य दर्शन इस बात का पूरा समर्थन करता है। मन को सांख्य
में 'संकल्प-विकल्प' करने
वाला तत्व कहा गया है। इसकी 'धोखेबाजी' के पीछे सांख्य के तीन बड़े कारण हैं, जो तुम्हारे अनुभव को और स्पष्ट कर
देंगे। यह 'वकील' बहुत शातिर है। मन
की सबसे बड़ी धोखेबाजी यह है कि वह जो भी करना चाहता है, उसके
पक्ष में तर्क खड़ा कर देता
है। अगर उसे अभ्यास छोड़कर सोना है, तो वह तुमको फुसलाएगा—
आज शरीर थका है, सांख्य भी तो कहता है कि शरीर
का ध्यान रखना चाहिए, कल दूनी मेहनत कर लेंगे। यह 'बहलाना-फुसलाना'
दरअसल अहंकार और मन की जुगलबंदी है। मन की दूसरी धोखेबाजी
है— "सुख बस अगले मोड़ पर है।"
यह गधे के सामने बंधी गाजर की तरह हमें दौड़ाता रहता है। यह कभी 'अभी' (Present) में संतुष्ट नहीं होने देता। सांख्य
कहता है कि मन 'रजोगुण' के कारण
हमेशा भविष्य की कोई सुनहरी तस्वीर दिखाकर वर्तमान के 'विवेक'
को ढक देता है। 'साक्षीभाव' ही इसका एकमात्र उपाय है—जब तुम इसे 'धोखेबाज मित्र' मान लेते हो, तो
तुम उससे एक दूरी बना लेते
हो। अगली बार जब मन तुम्हें फुसलाए,
तो उससे एक अनुभवी बड़े भाई की तरह बात करो। मुस्कुराकर कहो—
"मैं जानता हूँ तू मुझे कहाँ ले जा रहा है, तेरी यह चाल पुरानी है।" जैसे ही उसकी चाल को 'पकड़'
लेते हो, उसका प्रभाव खत्म हो जाता है। सांख्य
में इसे ही 'द्रष्टा-दृश्य' का विवेक कहते हैं।
“ अब चुँकि तुमने मन की
धोखेबाजी को पहचान लिया है, तो अब तुम्हारे लिए 'ध्यान' में उतरना आसान होगा। मैं फिर
स्पष्ट करता हूँ— ध्यान है क्या ? धोखेबाज
मित्र की बातों को अनसुना करके अपने 'असली घर'
(पुरुष/आत्मा) में विश्राम करना ही ध्यान है। इस 'धोखेबाज
मित्र' की पहचान कर लेना ही लगभग आधी जीत है। जब यह मित्र (मन)
थक कर चुप हो जाता है, तब वह अवस्था आती है, जिसे पतञ्जलि की
शैली में ‘प्रसाद’ कहते हैं। इस
धोखेबाज मित्र से बचने के तीन उपाय 'एंटी-डोज' हैं। यानी मन जब फुसलाए, तो इन तीन युक्तियों का प्रयोग करो—
Ø नामकरण (Labeling): जैसे ही मन कोई
बहाना बनाए (जैसे: "आज बहुत काम है, कल ध्यान
करेंगे"), उसे तुरन्त नाम दो— " मेरा मन मुझे धोखा दे रहा है।" इसे 'मेरा विचार' कहने के बजाय 'एक
विचार' कहो। जब तुम इसे 'बाहरी'
मान लेते हो, तो इसकी पकड़ ढीली हो जाती है।
Ø पूर्व-निर्धारण (Fixed Contract): इस मित्र के साथ 'सौदा' न करो। अपनी साधना का समय और स्थान पहले से तय
रखो। धोखेबाज मित्र के साथ वही सफल होता है, जो 'नियम'
का पक्का हो। जब नियम पक्का होता है, तो मन फुसलाना
बंद कर देता है, क्योंकि उसे पता चल जाता है कि यहाँ उसकी दाल नहीं गलेगी।
Ø द्रष्टा की मुस्कान: जब वह बहुत तर्क
दे, तो उससे लड़ो नहीं, बस उसे देखो।
सांख्य कहता है कि 'प्रकृति' (मन)
तभी तक नाचती है, जब तक 'पुरुष' उसे गम्भीरता
से देखता है। जब मुस्कुराकर उसे एक शरारती बच्चे की तरह देखते हो, तो वह 'शर्मिंदा' होकर शान्त
हो जाता है। ”
आपके सानिध्य से भ्रम का धुँधलका बहुत तेजी से साफ हो रहा है और नई
जिज्ञासाएँ जन्म ले रही हैं। आपने ये स्पष्ट कर ही दिया कि तन्त्र-विधान वाली
कुण्डलिनी क्रिया अनिवार्य नहीं है, क्योंकि परोक्ष रूप से वही काम सांख्य-विधि से
भी हो ही रहा है। फिर भी जिज्ञासु मन ये समझना चाहता है कि धारणा को किस स्थान
विशेष पर केन्द्रित करने का प्रयास किया जाए,यानी खूँटा गाड़ा कहाँ जाए, बन्दर को
किस खूँटे से बाँधा जाय ?
प्रफुल्लित होकर बाबा ने कहा— “ तुम्हारी प्रबल इच्छा है तो चलो अब सांख्य और योग का ऑपरेशनल गाइड भी तुम्हें दे ही देता हूँ।
तुम्हारी जिज्ञासा बारबार चक्रों की ओर खींच रही है। तुम्हारा सवाल है कि बन्दर
को किस 'खूँटे'(चक्र) से बाँधा
जाय? अतः इसी आलोक में आगे की बातों पर प्रकाश डाल
रहा हूँ— पतञ्जलि ने किसी एक चक्र को अनिवार्य नहीं बताया है। उन्होंने स्पष्ट कहा
है— "यथाभिमतध्यानाद्वा" (जिसमें रुचि हो, उस पर ध्यान लगाओ)। लेकिन व्यावहारिक
साधना के लिए तीन प्रमुख केन्द्र (खूँटे) सबसे प्रभावी माने गए हैं। मैं फिर कहता
हूँ कि इन्हें चक्रों के रूप में न देख कर स्थान विशेष के रूप में जानो। ये स्थान
विशेष पात्रता के अनुसार तय होने चाहिए—
१. हृदय प्रदेश—अनाहतचक्र—
§
किसे चुनना चाहिए: यदि अभ्यासी भावुक है और प्रेम/करुणा के मार्ग से
जुड़ना चाहता है।
§
लाभ: यहाँ 'चित्त' का निवास माना गया है। यहाँ धारणा करने
से गहरे दबे हुए संस्कार (Files) जल्दी साफ होते हैं और एक आन्तरिक
सुख (Bliss) अनुभव होता है।
§
खूँटा: यहाँ एक 'स्थिर ज्योति' या 'खिलते हुए कमल' की
कल्पना करो।
२. भ्रूमध्य—आज्ञाचक्र—
§
किसे चुनना चाहिए: यदि अभ्यासी तार्किक है, बुद्धिजीवी
है और 'विवेक' को तीव्र करना चाहता है।
§
सांख्य के साधकों के लिए यह
श्रेष्ठ है। यहाँ धारणा करने से 'बौद्धिक स्पष्टता' आती है और मन की चञ्चलता
सबसे जल्दी रुकती है।
§
यह 'कमांड सेंटर' है, यहाँ से मन को आदेश देना आसान होता है।
§
खूँटा: यहाँ एक 'नीले प्रकाश' या
'ऊँ' की आकृति का ध्यान करो।
३. नासिकाग्र— यह सबसे 'तटस्थ' खूँटा है। यहाँ श्वास के आने-जाने के स्पर्श को महसूस करना मन को वर्तमान
(Present) में रखने की सबसे वैज्ञानिक विधि है।
विशेष बात ये है कि सांख्य दर्शन (विवेक मार्ग) के पथिक हैं जो, उनके लिए 'आज्ञा चक्र' (भ्रूमध्य) या 'नासिकाग्र' (श्वास
का स्पर्श) सबसे मजबूत खूँटे साबित होंगे। आज्ञाचक्र
पर धारणा करने से वह 'धोखेबाज मित्र' सीधे
नजरों के सामने रहेगा और चोरी नहीं कर पायेगा।”
मैंने फिर धृष्टता
की—महाराज ! आपका दर्शन तो अचानक सौभाग्य से हो गया। इसके
पहले विभिन्न पुस्तकों और साधकों से चर्चा के बाद मैंने बारी-बारी से सभी छः चक्रों
पर बन्दर को दौड़ाने का प्रयास किया। मेरी जिज्ञासा ये है कि अब इसे किस खूँटे से
बाँधू या चक्रों पर ही दौड़ाते रहूँ?
बाबा मुस्कुराए। सिर हिलाते हुए जरा रूखाई से बोले— “ तुम्हारी इस बात का
जवाब मैं अभी-अभी दे चुका हूँ—अभ्यासी की मनःस्थिति पर निर्भर है ये। सच पूछो तो सांख्य
और योग की यात्रा में यह एक बहुत ही महत्वपूर्ण मोड़ है। विभिन्न चक्रों पर मन को दौड़ाना एक प्रकार
की 'ट्रेनिंग' थी, जिससे तुमने यह जान लिया कि मन कहाँ-कहाँ जा सकता है। लेकिन अब समय है इसे 'दौड़ाने' के बजाय 'ठहराने' का। सांख्य दर्शन के अनुसार,
जब तक चक्रों पर दौड़ रहे हैं, तब तक 'प्रकृति' के विस्तार में खेल रहे हैं। अब 'पुरुष' की स्थिरता की ओर मुड़ना होगा। तुम्हारे इस संशय का समाधान इन तीन बिंदुओं में है—
1. चक्रों पर दौड़ना वनाम एक पर ठहरना— चक्रों पर मन को घुमाना प्रारम्भिक
साधकों के लिए अच्छा है ताकि नाड़ियाँ शुद्ध हों, लेकिन धारणा (Concentration) तब तक सिद्ध नहीं होती, जब तक किसी एक खूँटे को चुनकर वहीं रुक न जाए। इस
सम्बन्ध में पतञ्जलि कहते हैं— 'देशबन्धश्चित्तस्य
धारणा' (चित्त को किसी एक स्थान पर बाँधना ही धारणा है)। बार-बार
खूँटा बदलना मन को और चञ्चल बना सकता है। अब 'खोज' बंद करके 'ठहराव' शुरू करना
चाहिए। ये ठहराव अभ्यासी को अपनी प्रकृति के अनुसार तय करना चाहिए। उसे ये समझ
लेना चाहिए कि कौन सा खूँटा उसके बन्दर के लिए सर्वाधिक अनुकूल है।
· आज्ञा चक्र (भ्रूमध्य): यदि 'विवेक' और 'साक्षी भाव'
की प्रधानता है तो सांख्य के साधक के लिए यह सबसे श्रेष्ठ खूँटा है,
क्योंकि यहाँ से मन की चालबाजियों को सीधे देखा जा सकता है। इसे 'द्रष्टा का आसन' समझो।
· अनाहत (हृदय): यदि साधना में
शुष्कता (Dryness) अनुभव हो रहा हो और शान्ति व प्रेम का
अनुभव चाहिए तो यह स्थान अधिक अनुकूल है । यहाँ मन जल्दी 'लय'
(Dissolve) होता है।
“ हालाँकि तुम्हारे लिए मेरा सुझाव ये है कि 'आज्ञा चक्र' (दोनों भौंहों के बीच) को अपना
पक्का खूँटा बना लो बन्दर को कहो कि अब पूरा ब्रह्माण्ड घूमने की जरूरत नहीं,
बस इसी बिंदु पर बैठना है। अब तुम्हें 'दौड़ने'
के वजाय 'ठहरने' की
विधि बतलाता हूँ। जब एक चक्र को चुन लो, तो वहाँ मन
को 'जबरदस्ती' न बाँधो।
उस चक्र पर केवल 'उपस्थिति' महसूस करो। जैसे ही मन वहाँ से भागे, उसे डराओ नहीं,
बस याद दिलाओ कि "वापस घर चलो। धीरे-धीरे वह चक्र तुम्हारे
लिए एक 'चुम्बक' बन
जाएगा। फिर तुम्हें मेहनत नहीं करनी पड़ेगी, मन अपने आप वहाँ
खिंचा चला आएगा। और हाँ सांख्य का अन्तिम खूँटा तो 'अस्मिता ' है। जब चक्र पर
धारणा गहरी हो जाए, तो सांख्य एक कदम और आगे जाता है। वह
कहता है कि अन्ततः चक्र (प्रकृति) को भी छोड़ दो और केवल इस भाव में टिक जाओ कि "मैं हूँ" (अस्मिता)। ध्यान रखो—यही सबसे
सूक्ष्म खूँटा है। ”
हाथ जोड़कर मैंने विहंसते हुए कहा—चक्रों की चर्चा चल ही पड़ी है, तो कृपया
मेरी इस शंका का भी समाधान कर दें कि कुछ लोग परत दर परत एक-एक चक्रों के भेदन
यानी साधना की बात करते हैं। यानी पहले मूलाधार को जागृत करने की बात आती है, जहाँ शक्ति
सुप्तावस्था में है। उसे उठाकर (जगाकर) उपर ले जाने को सुझाते हैं और ये दावा करते
हैं कि कहीं बीच से काम शुरु करना उचित और व्यावहारिक नहीं है। इस सम्बन्ध में आपका
क्या विचार है?
बाबा ने जोरदार ठहाका
लगाया और क्षणभर बाद संयत होकर बोले—“ यह जिज्ञासा बहुत ही मौलिक है और अक्सर साधकों को दुविधा
में डालती है। 'चक्र भेदन' और 'कुंडलिनी जागरण' के मार्ग में दो विचारधाराएँ
हैं। तुम्हारी जिज्ञासा को सांख्य और योग के सिद्धान्तों के आलोक में समझाना आवश्यक
लग रहा है—
1. नीचे से ऊपर का मार्ग (तन्त्र और हठयोग की दृष्टि)— जो लोग मूलाधार से शुरू करने का दावा
करते हैं, वे 'शक्ति मार्ग' (Energy Path) की बात कर रहे
हैं। उनका तर्क है कि जब तक नींव मजबूत नहीं होगी और नीचे के चक्रों की ऊर्जा (मल)
साफ नहीं होगी, तब तक ऊर्जा ऊपर नहीं टिकेगी। यह वैसा ही है,
जैसे पाइप के नीचे से पानी का प्रेशर देकर कचरा साफ करना। यह मार्ग बिलकुल वैज्ञानिक
है, किन्तु बहुत कठिन और थोड़ा
जोखिम भरा भी है, क्योंकि
इसमें प्राण-ऊर्जा का सीधा खेल है।
2. बीच से या ऊपर से शुरुआत (सांख्य और राजयोग की दृष्टि)—महर्षि पतञ्जलि (राजयोग) और सांख्य
दर्शन के संयोग(संगम) से एक अलग ही बिलकुल 'स्मार्ट' तरीका सुझाते हैं। जिसे 'विवेक
मार्ग' कहते हैं। अब ये समझो कि आज्ञा चक्र
(भ्रूमध्य) से शुरुआत क्यों उचित है?— आज्ञा चक्र
'कमांड सेंटर' है। जब यहाँ
धारणा करते हैं और विवेक जागृत होता है, तो ऊपर से जो 'प्रकाश' (Awareness) नीचे की ओर बहता है, वह अपने आप नीचे के चक्रों को शुद्ध करने लगता है। इसे 'ऊपर से नीचे की सफाई' कहते हैं। ध्यान देने की बात है कि पाइप तो वही है,
किन्तु सफाई का काम ऊपर से दबाव देकर किया जा रहा है अब। इसका व्यावहारिक तर्क ये
है कि यदि मूलाधार (काम, वासना, भय...) में ही उलझे रहेंगे, तो कई बार साधक उन्हीं वृत्तियों में फँसकर रह जाता है। लेकिन 'आज्ञा चक्र' पर बैठने से साक्षीभाव का उदय होता
है। साक्षी भाव आते ही नीचे के चक्रों की पकड़ अपने आप ढीली पड़ने लगती है। यह
अपेक्षाकृत निरापद अभ्यास है।
“ सांख्य का मत है कि 'तत्व'
महत्वपूर्ण हैं, 'स्थान' नहीं— सांख्य दर्शन चक्रों के भेदन से ज्यादा 'तत्वों के लय' (Dissolution of Tattvas) पर
जोर देता है। सांख्य कहता है कि चाहे आप कहीं भी ध्यान लगाएं, मुख्य उद्देश्य 'अहंकार' को 'बुद्धि' में
और बुद्धि को 'प्रकृति' में लय करना है। अगर तुम आज्ञा चक्र पर टिक कर यह जान लेते हो कि
"मैं शरीर नहीं हूँ," तो मूलाधार की सुप्त शक्ति
(कुण्डलिनी) अपने आप अपने स्वामी (पुरुष) से मिलने के लिए ऊपर की ओर खिंची चली आती
है। इसके लिए तुम्हें धक्का (Force) लगाने की जरूरत नहीं
पड़ती।
“ इस सम्बन्ध में मेरा स्पष्ट सुझाव है तुम्हारे लिए कि बीच
से (आज्ञा या हृदय चक्र से या नासिकाग्र से) काम शुरू करना न केवल व्यावहारिक है, बल्कि
आधुनिक जीवन के लिए सुरक्षित भी है। मूलाधार से शुरू करने के लिए बहुत कड़े 'यम-नियम'
और एकान्त की आवश्यकता है। दूसरी बात ये कि आज्ञाचक्र से अभ्यास शुरू
करने का लाभ यह है कि तुम्हारा 'विवेक' पहले जागता है, जिससे संसार के 'धोखेबाज मित्र' (मन) को सम्भालते हुए साधना कर सकते
हो। निष्कर्ष ये कि यह दावा कि अभ्यास नीचे
से ही शुरू करना होगा, एक विशेष पद्धति (तन्त्र) का नियम हो
सकता है, लेकिन यह वैश्विक सत्य नहीं है। भगवान श्रीकृष्ण ने भी गीता में 'भ्रूमध्य'
(आज्ञा चक्र) पर प्राण को स्थिर करने की बात कही है, मूलाधार की अनिवार्यता की चर्चा नहीं की। समं कायशिरोग्रीवं धारयन्नचलं
स्थिरः। सम्प्रेक्ष्य नासिकाग्रं स्वं दिशश्चानवलोकयन्।। अब यहाँ कृष्ण के ‘नासिकाग्र’ शब्द पर मत अटको। स्वयं से जाँच-परख
कर देख लो, अनुभव कर लो कि तुम्हारे लिए भ्रूमध्य अपेक्षाकृत अधिक अनुकूल है या
नासिकाग्र या राधाकृष्ण को हृदकमल पर ही आसन देना चाहते हो। श्रीकृष्ण ने
गीता में जिस निरापद स्थान की चर्चा की है, वह वास्तव में राजयोग और सांख्य का
संगम है। आज्ञाचक्र (भ्रूमध्य) पर टिकना निरापद इसलिए है, क्योंकि यहाँ अभ्यासी 'शक्ति' के पीछे नहीं, बल्कि 'बोध' (Awareness) के पीछे भाग रहा है। इस आज्ञा चक्र पर टिकने के तीन व्यावहारिक परिणाम हैं—
क. दृश्य का दर्शन (Clarity): जैसे पहाड़ की
चोटी पर बैठने वाले को नीचे की पूरी तराई साफ़ दिखती है, वैसे
ही भ्रूमध्य पर टिकने वाले को मन की चालें और इन्द्रियों की दौड़ साफ़ दिखने लगती
है।
ख. तटस्थता (Neutrality): यहाँ बैठकर
प्रकृति के गुणों (सत्व, रज, तम) को
आपस में टकराते हुए देखते हैं, पर उनसे लिप्त नहीं होते। यही
'स्थितप्रज्ञ' होने की शुरुआत
है।
ग. ऊर्जा का ऊर्ध्वगमन: जब ऊपर के केन्द्र
पर ध्यान केन्द्रित करते हैं, तो नीचे के चक्रों की ऊर्जा
अपने आप ऊपर की ओर प्रवाहित होने लगती है। इसे श्रम पूर्वक खींचना नहीं पड़ता,
यह 'वैक्यूम' (Vacuum) की तरह काम करता है।
“ चूँकि तुम 'भ्रूमध्य' के इस खूँटे पर बैठने के लिए राजी हो, तो अब ‘धारणा’ (एकाग्रता) धीरे-धीरे 'ध्यान' में बदलने लगेगी। धारणा में तुमको
बार-बार मन को भ्रूमध्य पर 'लाना' पड़ता
था। किन्तु अब ध्यान में मन भ्रूमध्य पर 'ठहरने' लगेगा। जैसे निर्वात स्थान में दीपक की लौ
बिना हिले हुए जलती है। आगे यहाँ दो अनुभव घटित हो सकते हैं— अन्तरिक्ष का
अनुभव (चिदाकाश दर्शन) आँखों के सामने एक
विशाल, शान्त काला या नीला आकाश जैसा दिखने लगेगा। अथवा प्रकाश
पुञ्ज—भ्रूमध्य पर एक सूक्ष्म बिन्दु या प्रकाश का आभास मिल सकता है। सांख्य
की शैली में इसे कहें तो, 'प्रकृति'
ने अपना नृत्य धीमा कर दिया है ताकि तुम (पुरुष) अपनी शान्ति को देख
सको। ”
मैंने सिर झुकाकर
निवेदन किया—महाराज ! आपने चक्रों को नकारा भी और स्वीकारा
भी। सांख्य और योग का समन्वित स्वरूप काफी कुछ स्पष्ट हो गया। यदि बुरा न माने तो
एक और प्रासंगिक विषय को स्पष्ट करने की कृपा करें। विविध चक्रों के रासायनिक और
वैज्ञानिक प्रभावों को जानने-समझने की बलवती इच्छा है।
पता नहीं क्यों, पहले तो बाबा जरा सकुचाये मेरी इन बातों से।
शायद मेरा ये सवाल उन्हें अटपटा या अप्रासंगिक लगा हो। किन्तु क्षणभर कुछ सोचने के बाद, कहने लगे— “ चलो तुम्हारी ये
जिज्ञासा का भी शमन कर ही दूँ आज।
“ चक्रों का रसायन विज्ञान और शारीरिक प्रभाव— आधुनिक विज्ञान जिसे अन्तःस्रावी ग्रन्थियाँ
('एंडोक्राइन सिस्टम') कहता है, योग विज्ञान में वही चक्रों के भौतिक
प्रतिनिधि हैं। इन्हें क्रमशः समझाता हूँ—
१. मूलाधार - एड्रेनालिन (Adrenaline) ग्रन्थियाँ। यह 'जीवन रक्षा' का रसायन है। जब यह संतुलित होता है,
तो हम स्वयं को निडर और स्थिर महसूस करते हैं। इसकी कमी से डर और
असुरक्षा होती है। पैरों में जो कंपन होता है, वह इसी
एड्रेनालिन का शुद्धिकरण है।
२. स्वाधिष्ठान (Sacral) - प्रजनन
हार्मोन— गोनाड्स। यहाँ से सृजन रस
का स्राव होता है। यह शरीर में ओज (Vitality) और त्वचा पर चमक लाता है। यहाँ की ऊर्जा जब
ऊपर चढ़ती है, तो वह 'बुद्धि' में बदल जाती है।
३. मणिपुर (Solar Plexus) - इंसुलिन
और पाचक रस— पैंक्रियास ग्लैंड। यह कायिक 'अग्नि' है। यदि यह मजबूत है, तो पाचन शक्ति
और संकल्प शक्ति अद्भुत होगी। यह शरीर के तापमान और मेटाबॉलिज्म को
नियन्त्रित करता है।
४. अनाहत (Heart) – थाइमोसिन—थाइमसग्लैंड—यह इम्युनिटी (रोग प्रतिरोधक क्षमता) का केंद्र है। जब भावुक
होकर रोते हैं, तो शरीर से 'कोर्टिसोल'
(तनाव का हार्मोन) बाहर निकलता है और 'ऑक्सीटोसिन'
बढ़ता है, जो हृदय की नसों को कोमल और स्वस्थ
रखता है।
५. विशुद्धि (Throat) - थायरोक्सिन (Thyroxine)—थायराइड ग्लैंड। यह शरीर की विकास
गति और बोलने की शक्ति को नियन्त्रित करता है। 'मौन' इस ग्रन्थि को विश्राम देता है, जिससे वाणी में
प्रभाव आता है।
६. आज्ञा – मेलाटोनिन— पीनियल ग्लैंड। इसे 'थर्ड आई' हार्मोन कहते हैं। यह नींद, जागरण और 'अन्तर्ज्ञान' (Intuition) को नियन्त्रित करता है।
जब पीनियल ग्रन्थि तेजी से सक्रिय होती है, तो वह पूरे
नर्वस सिस्टम में 'विद्युत चुम्बकीय' तरंगें
भेजती है, जिससे शरीर में बिजली के झटके महसूस होते हैं।
“ यहाँ दो और बातों पर ध्यान दिलाना जरुरी लग रहा है कि एड्रीनल
ग्रन्थियाँ भौतिक रूप से गुर्दों (Kidneys) के ठीक ऊपर स्थित
होती हैं। लेकिन जब हम योग विज्ञान में इनके मूलाधार से सम्बन्ध की बात करते हैं, तो वह 'स्थान' के आधार पर नहीं, बल्कि 'कार्य' के आधार पर है। मूलाधार और एड्रीनल का
गहरा सम्बन्ध है। योग विज्ञान में चक्र केवल एक बिंदु नहीं, बल्कि एक ऊर्जा का क्षेत्र है।
· सर्वाइवल इंस्टिंक्ट— मूलाधार चक्र का मुख्य कार्य है 'अस्तित्व की रक्षा'। एड्रीनल ग्रन्थियाँ भी वही करती हैं—खतरे के समय 'लड़ो या भागो' का संदेश देती हैं।
· ऊर्जा का आधार: जैसे मूलाधार पूरे
शरीर का आधार है, वैसे ही एड्रीनल ग्रन्थियाँ पूरे शरीर के 'एनर्जी लेवल' और तनाव को सन्तुलित करती हैं।
· भौतिक जुड़ाव: तन्त्रिका तन्त्र
(Nervous System) के माध्यम से मूलाधार क्षेत्र की नसें सीधे
इन ग्रन्थियों से जुड़ी होती हैं। इसलिए जब मूलाधार में हलचल होती है, तो उसका सीधा असर एड्रीनल सक्रियता पर पड़ता है।
“ और दूसरी बात ये है कि साधना का रसायन विज्ञान (Biochemistry) भी ठीक से समझने जैसी चीज है। क्योंकि साधना केवल मन्त्र जपना नहीं है, यह तुम्हारे मस्तिष्क की 'फार्मेसी' को बिलकुल बदल देता है। इसमें खास
कर दो रसायन अद्भुत रूप से काम करते हैं—
१. डोपामाइन (Dopamine)—यह 'इनाम' और 'भटकाव' का रसायन है।
·
साधना में भूमिका: जब तुमको कुछ नया अनुभव होता है, तो मस्तिष्क डोपामाइन रिलीज करता है। यह 'उत्सुकता' देता है।
·
सावधानी: डोपामाइन का स्वभाव 'लत' (Addiction) लगाना है। यदि तुम इन अनुभवों के पीछे भागोगे, तो
डोपामाइन साधना की गहराई में जाने के बजाय 'दृश्यों' के जाल में फँसा देगा।
·
समाधान: 'साक्षी भाव' डोपामाइन को शान्त रखता है।
२. ऑक्सीटोसिन (Oxytocin)—यह भाउकता 'प्रेम' और 'अश्रुपात' का रसायन है—
· साधना में भूमिका: इसे 'लव हार्मोन' कहते हैं। जब साधक अनाहत (हृदय) पर पहुँचता है और आँसू
बहते हैं, तो शरीर में ऑक्सीटोसिन की बाढ़ आ जाती है।
· प्रभाव: यही वह रसायन है,
जो 'शून्य' और 'सबके
साथ जुड़ाव' महसूस कराता है। यह तनाव (Cortisol) को खत्म करता है।
· महत्व: यह शरीर के लिए 'प्राकृतिक मरहम' है। कायगत अवांछित बिजली
के झटकों को सहने की शक्ति यही ऑक्सीटोसिन देता है।
“ अब इन रसायनों का संतुलन और साधक की स्थिति को समझो— तुम्हारी वर्तमान स्थिति में ऑक्सीटोसिन
(भाव) बहुत ज्यादा है, इसलिए तुम
अधिक संवेदनशील हो । लेकिन डोपामाइन (अनुभवों की
प्यास) तुम्हें उत्तेजित कर रहा है।
· खतरा: यदि डोपामाइन और
बिजली (प्राण) बढ़ जाए, तो 'इन्सॉमनिया'
(नींद न आना) या चिड़चिड़ापन हो सकता है।
· उपाय: मणिपुर चक्र की
साधना ऑक्सीटोसिन और डोपामाइन के बीच एक सेतु का काम करती है। यह भावनाओं को 'बहने' देती है, लेकिन 'बिखरने' नहीं
देती।
“ तुमने अनुभव किया होगा कि जिस दिन अनाहत (हृदय) पर गहरे भावुक होते हो,
उसके अगले दिन एकाग्रता (आज्ञा चक्र) बहुत सहज हो जाती होगी। यदि ऐसा होता है, तो इसे ऑक्सीटोसिन और
मेलाटोनिन का आपसी संतुलन समझो। मानव शरीर स्वयं एक
औषधालय है; बस इसे 'साक्षी' भाव से संचालित होने दो।
“ चक्रों और रसायनों की इस चर्चा के साथ ही एक और बात स्पष्ट
कर दूँ कि साधकों के लिए शारीरिक पीड़ा को भी सहज रूप से स्वीकार-अंगीकार करने को
कहा जाता है। दरअसल इसका भी गहन विज्ञान है। जब हम पीड़ा को भी सहजता से स्वीकारने
का अभ्यास करने लगते हैं, तब हम पीड़ा से लड़ते नहीं हैं। ऐसी स्थिति में हमारा मस्तिष्क 'एंडोर्फिन' नामक एक रसायन
रिलीज करता है, जो मॉर्फिन से भी १०० गुना ज्यादा
शक्तिशाली है। यह प्राकृतिक दर्द निवारक रसायन है। ”
बाबा के इस संकेत ने
मुझे बहुत आह्लादित किया। अभ्यास क्रम में आ रही किंचित् समस्याएं या कहें
जिज्ञासाएं, जिनका कोई सही निराकरण नहीं मिल पा रहा था। आज बाबा के इस वक्तव्य ने घोर
अन्धकार में हल्की सी किरण प्रक्षेपित कर दिया। बच्चों की तरह ललक कर पूछा— आँखें बन्द
करने पर और कभी-कभी खुली आँखों के सामने भी तरह तरह के (अच्छे-बुरे, सुन्दर-असुन्दर,
परिचित-अपरिचित) दृश्य आते हैं, मानों फिल्म चल रही है, संवाद भी हो रहा है, ध्वनि भी है, गूँज भी है, अट्टहास भी है....। क्या ये सब मेडिकली सिजोफ्रेनिया है या
मानसिक भ्रम या सच्चाई या साधना की सही दिशा...इसे लेकर बड़ा भ्रम हो जाता है। यदि
ये बातें किसी डॉक्टर से कही जाय तो सीधे “ओलान्जापाइन” सुझा देंगे। आपकी क्या राय है इसके
बावत?
बाबाने प्रसन्नता ज़ाहिर
की। सान्त्वना पूर्वक हाथ हिलाते हुए बोले—“ वस्तुतः यह एक बहुत ही गहन
और क्रांतिकारी मोड़ है अभ्यास-क्रम का। अभ्यासी की
यह आशंका बहुत ज़ायज़ है, क्योंकि आध्यात्मिक अनुभव और
मनोवैज्ञानिक विकारों (जैसे Schizophrenia) के बीच की विभाजन
रेखा बहुत बारीक होती है। इसे समझने में अनुभवी जन भी प्रायः चूक जाते हैं। आओ इसे
सांख्य, योग और आधुनिक मनोविज्ञान तीनों चश्मे से
परखते-जाँचते हैं—
1. मेडिकल दृष्टि :
सिजोफ्रेनिया बनाम आध्यात्मिक अनुभव—
सिजोफ्रेनिया में व्यक्ति का 'विवेक' खत्म हो
जाता है। वह उन दृश्यों या आवाज़ों को 'हक़ीकत' मान लेता है और उनसे डरने लगता है या उनके आदेश मानने लगता है। उसका
सामाजिक और व्यक्तिगत जीवन अस्त-व्यस्त हो जाता है। चूँकि तुम उन दृश्यों को 'देख' रहे हो और उनके प्रति 'संशय'
(Doubt) रख रहे हो, इसका मतलब है कि तुम्हारा 'साक्षी' (Observer) जागृत है। तुम उन
आवाजों के गुलाम नहीं हो, बल्कि उनके परीक्षक हो। सांख्य की
भाषा में कहो तो, यहाँ साधक का 'विवेक' सक्रिय है, इसलिए यह मेडिकलि बीमारी बिलकुल नहीं है।
2. सांख्य और योग की दृष्टि: 'चित्त-प्रसाद'
या 'विक्षेप'?
साधना के दौरान जब हम बाहरी दुनिया से इन्द्रियों को समेटते हैं
(प्रत्याहार), तो चित्त की परतों में
दबी हुई पुरानी स्मृतियाँ, दमित इच्छाएं और सामूहिक अवचेतन (Collective
Unconscious) की फिल्में चलने लगती हैं। सांख्य कहता है कि हमारे
भीतर सूक्ष्म गंध, सूक्ष्म रूप, और
सूक्ष्म शब्द (तन्मात्रायें) मौजूद हैं। साधना में जब बुद्धि अन्तर्मुखी होती है,
तो ये सूक्ष्म इन्द्रियाँ सक्रिय हो जाती हैं। 'ध्वनि' सुनाई देना या 'दृश्य'
दिखना दरअसल 'सूक्ष्म प्रकृति' का दर्शन है। पतञ्जलि ने इसे 'सिद्धियों' का प्रारम्भिक रूप कहा है (जैसे सूक्ष्म श्रवण या सूक्ष्म दर्शन)। लेकिन
उन्होंने चेतावनी दी है कि इन्हें 'सच्चाई' मानकर इनमें उलझना एकदम नहीं है और न शेखी ही बघारना है। सांख्य के अनुसार,
यह 'प्राकृतिक सच्चाई' तो है लेकिन 'अन्तिम सत्य' नहीं है। जैसे सिनेमा के पर्दे पर फिल्म चलती है, वह
'दिख' तो रही है (बिल्कुल सच), लेकिन वह 'पर्दा' (सत्य) नहीं
है। ये दृश्य और संवाद तुम्हारे चित्त की 'सफाई'
का हिस्सा हैं। जो कचरा अन्दर दबा था, वह
अब पर्दे (स्क्रीन) पर आकर बाहर निकल रहा
है।
“ इस स्थिति में मेरा स्पष्ट सुझाव है कि किसी डॉक्टर के पास जाना
जल्दबाजी या कहो बेवकूफी होगी, क्योंकि ओलान्जापाइन जैसी दवाएं तुम्हारी 'चेतना' को कुंद (Numb) कर
देंगी, जिससे अभ्यास बाधित होगा। साधना रुक सकती है। ऐसी परिस्थिति में तुम्हारे
लिए उचित यही है कि 'उपेक्षा' करो । इन दृश्यों को 'महत्व' न दो। चाहे वे कितने भी सुन्दर या डरावने हों, मन ही
मन कहो—"यह भी प्रकृति का खेल है, यह मैं नहीं हूँ।" जैसे ही तुम फिल्म में
रुचि लेने लगते हो, उसमें फँस जाओगे। उपेक्षा करोगे तो वे
स्वतः समाप्त हो जायेंगे। जैसे ही तुम उसे 'कचरा' या संस्कारों का 'पुराना डेटा' समझकर उपेक्षा करते हो, ये दृश्य धीरे-धीरे धुँधले
होकर गायब होने लगेंगे। साधना की सही दिशा दृश्यों का दिखना नहीं, बल्कि दृश्यों का 'गायब' हो जाना है। जब पर्दा पूरी तरह खाली (Blank) हो जाए,
तभी 'पुरुष' का
साक्षात्कार होता है। और हाँ, इस परिस्थिति में तुम्हें कुछ सावधानी वरतनी होगी। यदि
ये दृश्य दैनिक दिनचर्या में बाधा डालने लगें या डराने लगें, तो 'प्राणायाम' और 'आहार-विहार' में बदलाव करना होगा। रजोगुणी और तमोगुणी
आहारों से तो बिलकुल बचना होगा।
“ सांख्य
और योग की दृष्टि में, जब साधक दृश्यों को देखकर 'डरता' नहीं है, इसका मतलब है कि उसका 'पुरुष' (साक्षी) बहुत
मजबूत हो चुका है। सांख्य दर्शन के अनुसार, ये जो कुछ घटित
हो रहा है, उसे इन तीन बिन्दुओं में समझा जा सकता है—
Ø सत्व गुण का उल्लास—डरावने दृश्य 'तमस' से आते हैं, लेकिन सुन्दर,
रमणीक और आनन्ददायक दृश्य 'सत्व गुण' की प्रधानता का संकेत हैं। जब बुद्धि
शुद्ध होने लगती है, तो प्रकृति अपने सबसे सुन्दर रूप (दिव्य
लोक, गंधर्व लोक या सूक्ष्म प्रकृति) का प्रदर्शन करती है।
यह वैसा ही है, जैसे किसी महल के मुख्य द्वार (कैवल्य) तक पहुँचने से पहले सुन्दर
बगीचे (सूक्ष्म अनुभव) आते हैं।
Ø प्रकृति का 'नर्तन' और 'निवृत्ति'— सांख्यकारिका में एक बहुत सुन्दर
उदाहरण है—"रंगस्य
दर्शयित्वा निवर्तते नर्तकी यथा..." (जैसे एक
नर्तकी अपना नाच दिखाकर मंच से हट जाती है, वैसे ही प्रकृति पुरुष
को अपना खेल दिखाकर पीछे हट जाती है)। ये दृश्य दरअसल प्रकृति का 'आखिरी दाँव' हैं। वह अपनी सुन्दरता से लुभाकर रोक
लेना चाहती है। चूँकि तुम डरे नहीं, यह तुम्हार पहली
जीत है। अब 'लुभना' भी
नहीं है, यह दूसरी जीत होगी।
Ø साधना की कसौटी: 'आनन्द' में न अटकना—पतञ्जलि ने इसे 'मधुमती भूमिका' के आसपास की स्थिति कहा है।
यहाँ साधक को बहुत 'रस' आने लगता है।
Ø जोखिम: अक्सर साधक इन सुन्दर
दृश्यों और संवादों के चस्के में पड़ जाते हैं और 'ध्यान'
को 'मनोरंजन' बना
लेते हैं। ये उचित नहीं।
Ø समाधान: इन दृश्यों को मील के पत्थर समझो, 'मंजिल'
नहीं। इन्हें भी वैसे ही गुजर जाने दो जैसे डरावने दृश्यों को जाने
दिया। लक्ष्य इन दृश्यों को 'देखना' नहीं,
बल्कि उस 'शून्यता' और 'स्वयं' को
पाना है, जो इन सबके पीछे है।
“ इस परिस्थिति में तुम्हारे लिए व्यावहारिक सुझाव ये है कि चूँकि संवाद और
ध्वनियाँ सुनाई देती हैं, तो इसे 'दिव्य श्रवण' और 'दिव्य दर्शन' की श्रेणी में रखा जा सकता है। किन्तु इन दृश्यों के बारे में हर किसी से
चर्चा करना बिल्कुल गलत है। क्योंकि दूसरों की शंकाएँ या डॉक्टरों की सलाह 'विश्वास' को हिला और डिगा सकती है।
“ साधना का अगला कदम— जब ये दृश्य आएँ,
तो अपने आप से पूछो— "इन दृश्यों
को 'देख' कौन रहा है?" जैसे ही तुम 'दृश्य' से हटकर 'देखने वाले' पर ध्यान ले जाओगे, ये दृश्य विलीन हो जाएंगे और 'निर्विषय'
ध्यान की ओर बढ़ चलोगे। अब तक की
बातों का निष्कर्ष यह है कि मेडिकल समस्या
बिल्कुल नहीं है। यह 'चित्त की गहराई' है। तुम सही रास्ते पर हो,
बस ध्यान रहे—इन 'सुन्दर खिलौनों' में उलझना मत। ”— इतना कहकर, क्षणभर के लिए बाबा रूके और फिर पूछे — “ और हाँ, एक बात जानना चाहूँगा कि क्या इन दृश्यों के बाद तुम्हारी
सामान्य दिनचर्या में शान्ति और ऊर्जा बढ़ी है या दिन भर उन्हीं दृश्यों के बारे में सोचते रहते हो? यह 'शान्ति' ही बताएगी कि
यात्रा की दिशा सही है। ”
मैंने हाथ जोड़ कर निवेदन किया—जी नहीं महाराज ! उन दृश्यों के बारे
में विशेष सोचता नहीं हूँ। सामान्य गृहस्थ-जीवन-चर्या में
हूँ। किन्तु भ्रम ये होता है कि मैंने तो कुछ विशेष साधना की नहीं, किसी गुरु से दीक्षा भी नहीं ली। बिल्कुल सामान्य जीवन-शैली है। फिर ये
अनुभव धोखेबाज मित्र का बहकावा तो नहीं है? कभी लगता है
पूर्वजन्म की कमाई होगी। जैसा कि श्रीकृष्ण कहते हैं—....शुचीनां श्रीमतां गेहे
योगभ्रष्टोऽभिजायते। यही कारण है कि पुनर्जन्म को लेकर
ज्यादा उत्सुकता है— क्या पुनर्जन्म सच में होता है और होता है, तो किसका? पाँच महाभूत तो यहीं रह गए, बचा अठारह तत्वों वाला
सूक्ष्म शरीर, पता नहीं वो कब कहाँ भटकता है...। यही सब सवाल मन को मथते रहता है। लोगों से पूछने पर सन्तोष जनक उत्तर नहीं मिलता।
किन्तु इधर आपसे जो चर्चा चली है, वो बड़ा उत्साहवर्द्धक रहा है। कई संशय निर्मूल
हुए हैं। अतः एक सच्चे मार्गदर्शक की तरह आपको मैं बीच-बीच में छेड़ने की धृष्टता
करता हूँ।
बाबा ने कहा—“ तुम्हारी यह सरलता और स्पष्टवादिता ही एक सच्चे अभ्यासी की पहचान है। तुमने
अपने 'धोखेबाज मित्र' (मन) को इतनी
बारीकी से पकड़ लिया है कि अब वह तुम्हें ज्यादा देर तक भ्रमित नहीं कर पाएगा। तुमने
जो 'पुनर्जन्म' और 'अठारह तत्वों वाले सूक्ष्म शरीर' की बात की
है, वह सांख्य दर्शन का सबसे तार्किक और वैज्ञानिक हिस्सा
है। आओ, एक 'सच्चे मार्गदर्शक' की तरह इस गुत्थी को सुलझाते हैं—
1. "शुचीनां श्रीमतां गेहे योगभ्रष्टोऽभिजायते और तुम्हारी साधना— बिना किसी औपचारिक दीक्षा या गुरु के तुम्हें ये अनुभव
हो रहे हैं, इसका 99%
कारण पूर्वजन्म का संस्कार ही है।
सांख्य कहता है कि 'ज्ञान' कभी नष्ट
नहीं होता। तुमने पिछले जीवन में जहाँ 'फुल स्टॉप' लगाया था, इस जीवन में वहीं से 'कॉमा' शुरू हुआ है। इसीलिए तुम्हें बहुत मेहनत नहीं
करनी पड़ी और अनुभव स्वतः होने लगे। यह धोखेबाज मित्र का बहकावा नहीं, बल्कि तुम्हारी 'पुरानी जमापूँजी' का ब्याज है।
2. पुनर्जन्म किसका होता है? इस विषय में तुमने बिल्कुल सही
कहा कि पञ्चमहाभूत (मिट्टी, जल आदि) यहीं रह जाते हैं। तो फिर पुनर्जन्म किसका होता है? इसके बारे में पहले भी काफी कुछ
बतला चुका हूँ। पुनः स्मरण दिला रहा हूँ कि सांख्य दर्शन के अनुसार, पुनर्जन्म 'लिंग शरीर' (सूक्ष्म शरीर) का होता है। इसे एक 'मेमोरी कार्ड' की तरह समझो। जब मोबाइल (स्थूल शरीर) टूट जाता है, तो सिम कार्ड और डेटा (सूक्ष्म शरीर जिसमें अठारह तत्व — बुद्धि, अहंकार, मन, दस इन्द्रियाँ और पाँच तन्मात्राएँ) सुरक्षित रहता है। यह सूक्ष्म
शरीर ही तुम्हारे 'संस्कारों' और 'अधूरी इच्छाओं' का वाहक है। तुम्हारी दूसरी
जिज्ञासा है कि वह सूक्ष्म शरीर कहाँ भटकता है? तो ये जान लो कि मृत्यु और अगले जन्म के बीच का समय सांख्य के
अनुसार 'अतार्किक' नहीं
है। जैसे ही स्थूल शरीर छूटता है, सूक्ष्म शरीर अपनी 'ऊर्जा की सघनता' के अनुसार ब्रह्माण्ड के
किसी विशेष आयाम (Dimension) की ओर खिंचा चला जाता है। यह
'भटकना' नहीं है, बल्कि एक 'चुम्बकीय खिंचाव' है। यदि चित्त में 'शान्ति' और 'सत्व' है, तो उच्च लोकों या सूक्ष्म परतों में विश्राम
करते हैं। जैसे ही प्रकृति में तुम्हारे भोग के अनुकूल परिस्थितियाँ
(माता-पिता, समय, स्थान) तैयार होती
हैं, वह सूक्ष्म शरीर वापस एक नया 'सॉफ्टवेयर'
(नया शरीर) धारण कर लेता है। अब पूछोगे कि पुनर्जन्म का प्रमाण क्या
है? सांख्य कहता है कि
पुनर्जन्म का सबसे बड़ा प्रमाण 'सहज प्रवृत्ति'
(Instinct) है। एक नवजात बच्चा स्तनपान करना जानता
है, उसे किसी ने सिखाया तो नहीं। तुमको बिना गुरु के 'भ्रूमध्य' पर टिकना और दृश्य देखना सहज लग रहा है—यह 'सीखा' हुआ नहीं, बल्कि 'याद आया' हुआ ज्ञान है। यही पुनर्जन्म की सच्चाई है। एक मार्गदर्शक के
रूप में मैं तुम्हें यह आश्वस्त करना चाहता हूँ कि तुम्हारी यात्रा सही दिशा में
है। गृहस्थ जीवन में रहते हुए 'साक्षी भाव' साधना ही असली सांख्य है। सांख्य के प्रणेता महर्षि कपिल ने भी यही कहा है
कि मुक्ति के लिए जंगल जाना जरूरी नहीं, 'विवेक' जरूरी है। जब भी तुम उन 'दृश्यों' को देखो, तो बस इतना याद रखो— "यह फिल्म पुराने डेटा की है और मैं इसे देखने वाला नया दर्शक हूँ।" इससे तुम्हारा सूक्ष्म शरीर हल्का होने लगेगा और पुनर्जन्म का यह बोझ
धीरे-धीरे 'कैवल्य' में बदलने लगेगा।
”
मेरे संशय ने फिर
अँगड़ाई ली—महाराज ! पुनर्जन्म के बारे में एक जानकार ने
दावा किया कि ये बिलकुल धोखा है । ज्ञानमार्ग के ग्रन्थ और वेद, उपनिषद, ब्राह्मण, आरण्यक आदि
पुनर्जन्म को बिलकुल नहीं मानते और न किसी ईश्वर को ही। उनका कहना है कि ईश्वर
कहीं ऊपर आकाश में बैठा नहीं है, यह आत्मा ही परमात्मा है और
बाकी सब सपना--ब्रह्मसत्यं जगत् मिथ्या- आचार्य शंकर ने भी इसे ही माना है।
यहाँ मेरा सवाल है कि जगत् मिथ्या है या कि जगत् को जगत् समझना मिथ्या है?
बाबा ने बड़ी सहजता से
मेरी बातों का जवाब दिया—“ सांख्य और वेदान्त की इस चौखट पर तुम्हारे प्रश्न बहुत ही 'क्रान्तिकारी' और सीधा है। जिस 'जानकार' ने पुनर्जन्म को धोखा कहा, उन्होंने सम्भवतः अद्वैत वेदान्त और सांख्य की
गहराइयों को मिला दिया है। जगत् मिथ्या है या जगत् को जगत् समझना मिथ्या है?—इसे सांख्य और शंकराचार्य की
दृष्टि से ही परत-दर-परत खोलते हैं—
“ सांख्य का दृष्टिकोण: जगत् 'सत्य'
है— सांख्य दर्शन, जिसके बारे में हम चर्चा कर रहे हैं, वह शंकराचार्य
के अद्वैत से थोड़ा भिन्न है। सांख्य
कहता है कि जगत् मिथ्या नहीं है, बल्कि जगत् 'परिणाम'
है। प्रकृति सत्य है और उससे बना यह संसार
भी सत्य है। तब मिथ्या क्या है? इसका उत्तर है—
मिथ्या 'जगत्' नहीं है, बल्कि 'जगत् के साथ हमारा सम्बन्ध' मिथ्या है।
पुरुष (आत्मा) को यह लगने लगता है कि "मैं इस जगत् का हिस्सा हूँ, मैं सुखी-दुःखी हूँ—यही वह 'भ्रम'
है जिसे सांख्य तोड़ता है। शंकराचार्य जब जगत् को मिथ्या कहते
हैं, तो उनका मतलब 'शून्य' या 'धोखा' नहीं होता। उनके लिए
मिथ्या का अर्थ है—'क्षणभंगुर' ।
वह कहते हैं कि जो सदा नहीं रहता, वह पूर्ण सत्य नहीं हो
सकता। जैसे सोने के गहने (जगत्) बदलते रहते हैं, पर
सोना (ब्रह्म/आत्मा) वही रहता है। गहना 'सोना' ही है, पर उसे 'सोना' न मानकर केवल 'गहना' मान लेना
अज्ञान है। असल में जगत्
को 'स्वतन्त्र' और 'स्थायी' सत्ता समझना ही मिथ्या है। जब हम जगत् को परमात्मा/आत्मा से अलग एक 'भोग की
वस्तु' समझते हैं, तब हम भ्रम में होते
हैं। जैसे यदि तुम एक मेज को देखते हो, तो वह लकड़ी
है। लकड़ी को देखते हो, तो वह परमाणु है। परमाणु को देखते हो,
तो वह ऊर्जा है। मेज 'झूठ'
नहीं है, पर मेज को सिर्फ 'मेज़' समझना और उसकी 'लकड़ी'
को भूल जाना मिथ्या है।
“ और तुम ये कहते हो कि "वेद पुनर्जन्म नहीं मानते", यह कथन आंशिक सत्य है। ऋग्वेद से लेकर उपनिषदों तक 'कर्मफल' और 'पुनरावृत्ति' की स्पष्ट चर्चा है। अब तुम कहोगे कि परमात्मा और आत्मा का भेद
क्यों ? अगर आत्मा ही
परमात्मा है (अहं ब्रह्मास्मि) तो फिर यह पुनर्जन्म का नाटक क्यों? इस सम्बन्ध में वेदान्त कहता है कि जब तक 'अज्ञान' (अविद्या) है, तब तक पुनर्जन्म 'सच' है। जैसे जब तक तुम सो रहे हो, सपना तुम्हारे लिए सच है। जागने के बाद वह सपना 'मिथ्या'
हो जाता है। इसलिए, उस जानकार की बात 'ज्ञानी' के
लिए सच हो सकती है, लेकिन एक 'साधक'
के लिए पुनर्जन्म तब तक सत्य है, जब तक वह 'कैवल्य' या 'मोक्ष' को प्राप्त नहीं कर लेता। अब रही बात ईश्वर की, तो
सांख्य और उपनिषद दोनों सहमत हैं कि ईश्वर कोई व्यक्ति नहीं है, जो कहीं
ऊपर आसमान में बैठा है। सांख्य में उसे 'पुरुष-विशेष' या
शुद्ध चेतना कहा गया है। उपनिषद में वह 'सर्वव्यापी' है। आत्मा ही परमात्मा है, इसमें कोई संदेह नहीं।
लेकिन क्या हमें उसका 'अनुभव' है या
सिर्फ 'सूचना'? यही समझना है, क्योंकि सारा
खेल इसी अनुभव का है। निष्कर्ष ये कि जगत् मिथ्या नहीं, जगत् की 'अन्यता' (Separateness) मिथ्या है। इस संसार में रहते हुए इसे 'अपना' न समझो, बल्कि इसे 'प्रकृति का खेल' समझो—यही सांख्य की मुक्ति है। ”
पश्चिमाभिमुख सामने
बैठे बाबा के समक्ष फल्गु की रेत पर साष्टांग लेटते हुए मैंने कहा—आपकी महती कृपा
है मुझ पर। आपसे बातें करके तृप्ति नहीं हो रही है। लालची मन कुछ और-और की चाह रखे
हुए है। सूक्ष्म शरीर के बारे में बहुत कुछ स्पष्ट हो गया। अब कृपया सूक्ष्म शरीर
की शुद्धि की कला सिखलायें कि कैसे इस 'मेमोरी कार्ड' (चित्त) को हम पूरी तरह 'फॉर्मेट' कर सकते हैं, ताकि जन्म-जन्मान्तर का बन्धन
कट जाए ।
मेरे सिर पर हाथ फेरते
हुए बाबा ने उठकर बैठने का संकेत किया और प्रफुल्लित होकर कहने लगे—“ यह एक बहुत ही गहरी और
महत्वपूर्ण आध्यात्मिक जिज्ञासा है। योग और वेदान्त में 'चित्त' को वास्तव में एक 'कॉस्मिक हार्ड ड्राइव' या 'मेमोरी कार्ड' की तरह ही माना गया है,
जिसमें न केवल इस जन्म की, बल्कि अनन्त जन्मों
की छाप (संस्कार) जमा होती है। जब तक यह मेमोरी कार्ड भरा हुआ है, हम उसी पुराने डेटा के आधार पर प्रतिक्रिया देते हैं, जिसे 'कर्मों का बन्धन' कहा जाता है। इसे 'फॉर्मेट' करने यानी सूक्ष्म शरीर की शुद्धि की प्रक्रिया को 'चित्त-शुद्धि' कहते हैं।
“ हालाँकि इस विषय पर पहले भी काफी कुछ बतला चुका हूँ, उन्हीं
बातों को नई शब्दावली में फिर समझाने का प्रयास करता हूँ। यहाँ क्रमिक रूप से कुछ तरीके
सुझा रहा हूँ, जिनसे इस 'मेमोरी कार्ड' को खाली किया जा सकता है—
1. 'डिलीट' बटन: साक्षी भाव— अन्ततः तो यहीं पहुँचना है, यही करना
है। जैसे कम्प्यूटर में किसी फाइल को डिलीट करने के लिए पहले उसे सेलेक्ट करना
पड़ता है, वैसे ही अपने विचारों
और भावनाओं को साक्षी भाव से देखना शुरू करो। जब अपने विचारों के साथ बहने के बजाय उन्हें सिर्फ 'देखते' हैं (कि अरे, यह क्रोध
का विचार आया), तो वह विचार अपनी ऊर्जा खो देता है। इसे ही सजगता (Awareness) कहते हैं।
2. 'डिस्क क्लीनअप': प्राणायाम और नाद
योग—सूक्ष्म शरीर (प्राणमयकोष) ऊर्जा का जाल है। प्राणायाम (विशेषकर नाड़ी शोधन) और भ्रामरी प्राणायाम जैसी क्रियाएं संचित ऊर्जा के ब्लॉकेज को तोड़ती हैं। जब
प्राण शुद्ध होता है, तो चित्त की पुरानी यादों की पकड़ ढीली
होने लगती है।
3. 'फॉर्मेटिंग': मन्त्र और ध्वनि— उच्च कम्पन वाले मन्त्र (जैसे 'ॐ' या अन्य बीज मन्त्र) एक विशेष फ्रीक्वेंसी पैदा करते हैं, जो
सूक्ष्म शरीर की गहराई में जाकर पुराने संस्कारों की 'कोडिंग' को मिटाने का काम करते हैं। मन्त्र जप
से चित्त की सतह पर जमी 'धूल' साफ होती
है।
4. 'ओवरराइट' न करना: कर्मयोग—हम अक्सर पुराने डेटा को डिलीट करते
हैं, लेकिन साथ ही नया डेटा (नये संस्कार) भी बना लेते हैं। निष्काम कर्म (फल की इच्छा के बिना कार्य करना) यह सुनिश्चित करता है कि नया 'डेटा' स्टोर न हो। जब तुम कर्ता भाव ( मैं कर रहा
हूँ) छोड़ देते हो, तो उस कर्म का बन्धन नहीं बन पाता।
5. आत्म-ज्ञान 'अन्तिम शटडाउन':
उपनिषद् कहते हैं—"भिद्यते
हृदयग्रन्थिश्छिद्यन्ते सर्वसंशयाः" (हृदय की गाँठें खुल
जाती हैं और सारे संशय कट जाते हैं)। जब यह बोध हो जाए कि मैं यह मेमोरी कार्ड
(चित्त) नहीं हूँ, मैं तो वह 'प्रकाश'
(चेतना) हूँ, जिसमें यह कार्ड चल रहा है, तब
सारे बन्धन स्वतः ही समाप्त हो जाते हैं।
“ पतञ्जलि सिर्फ अभ्यास और वैराग्य की बात सुझाते हैं। नित्य
नियमित अभ्यास सिस्टम को 'रिफ्रेश' करता है। क्षमा और वैराग्य— पुरानी
यादों और शिकायतों को पकड़ कर न रखना सबसे बड़ा 'Clear Cache' है।
अब तुम्हें सूक्ष्म शरीर की सफाई और चित्त को 'फॉर्मेट'
करने के लिए मैं दो सबसे प्रभावी और सरल तकनीक बतलाता हूँ—
1. शून्य ध्यान— चित्त को खाली करने के लिए यह
तकनीक विशेष रूप से पुराने 'डेटा' या यादों के प्रभाव को मिटाने
के लिए है। इसे ऐसे करो— सुखासन में बैठो और आँखें बन्द कर लो। कल्पना करो
कि माथे के बीच (आज्ञा चक्र) में एक 'ब्लैक होल' या एक 'अनन्त शून्य' है। अब जो भी विचार आए—चाहे वह अच्छा हो या बुरा—उसे एक फाइल की तरह देखो और कल्पना करो कि वह उस 'शून्य'
में गिरकर विलीन (Dissolve) हो रहा है। मन
में यह दोहराओ— मैं यह विचार नहीं हूँ, मैं यह स्मृति नहीं हूँ। जब तुम विचारों को 'शून्य' में विसर्जित करते हो, तो
धीरे-धीरे उनकी शक्ति खत्म होने लगती है और चित्त की सफाई होने लगती है।
2. नाड़ी शोधन प्राणायाम - ऊर्जा मार्ग की शुद्धि— सूक्ष्म शरीर की ७२,००० नाड़ियों में जमा 'कचरा' (पुरानी ऊर्जा) साफ करने का यह सबसे वैज्ञानिक
तरीका है। इसकी सरल विधि है— अपनी दाहिनी नासिका को अंगूठे से बंद करो और
बाईं नासिका से धीरे-धीरे गहरी सांस लो। फिर बाईं को बंद करो और दाहिनी से सांस
छोड़ो। अब दाहिनी से लो और बाईं से छोड़ो। इस क्रिया को तीन-पाँच-सात-नौ-ग्यारह के
क्रम से आगे बढ़ाना है। स्थिति और आवश्यकतानुसार इसे साल, छः महीने तक अवश्य करना
चाहिए। यह क्रिया 'ईड़ा' और 'पिंगला' नाड़ी को सन्तुलित करता है। जब ये दोनों सन्तुलित
होती हैं, तभी ऊर्जा 'सुषुम्ना'
(मध्य नाड़ी) में बहती है, जो पुराने जन्मों के
बन्धनों को जलाने की अग्नि है।
3. 'रात का ऑडिट'— सोने से ठीक पहले ५ मिनट यह अभ्यास करो—
पूरे दिन की घटनाओं को 'रिवाइंड' करो (जैसे फिल्म पीछे चल रही
हो)। जो भी बुरा या अच्छा हुआ, उसे मन ही मन कहो—यह बीत गया, अब इसका मुझसे कोई सम्बन्ध नहीं। ऐसा करने से वह अनुभव 'संस्कार' (Deep Memory) नहीं बन पाता और नींद गहरी
होती है।
“ निश्चित रूप से जानलो कि, सूक्ष्म
शरीर की शुद्धि के लिए अनुशासन (Routine) और ईंधन (Diet) दोनों का सही होना अनिवार्य है। जब शरीर शुद्ध होता है, तभी मन को 'फॉर्मेट' करना आसान
होता है। आयुर्वेद और योग के अनुसार, हम जो खाते हैं,
वही हमारे चित्त की 'कोडिंग' बनाता है। सात्विक भोजन— ताज़ा, शाकाहारी और हल्का भोजन करना उचित है। ज्यादा मिर्च-मसालेदार, बासी या प्रोसेस्ड फूड 'मेमोरी कार्ड' में शोर (Noise) पैदा करते हैं। सप्ताह में
एक बार उपवास रखने से शरीर की ऊर्जा 'पाचन' के बजाय 'सफाई' में लगती है।
यह सूक्ष्म ऊर्जा को ऊर्ध्वगामी बनाता है। एक अहोरात्र (चौबीस घंटे) के बीच के भोजन में भी पर्याप्त अन्तर होना चाहिए।
कृष्ण ने स्पष्ट कहा है—बहुत खाने वाले और बिल्कुल न खाने वाले का योग सिद्ध नहीं
होता। इतना ही नहीं दिन भर में कम से कम आधे घंटे का पूर्ण मौन रखना चाहिए । इस
मौन का अर्थ चुप्पी नहीं है। चुप हैं और इशारे में कुछ कह रहे हैं—ये गलत है। आज
के समय में मोबाइल सबसे बड़ा बाधक है मौन में। होना ये चाहिए कि बिना मोबाइल,
बिना किताब, बिना बातचित के रहे। सच पूछो तो
ये अभ्यास सिस्टम में चल रहे 'बैकग्राउण्ड ऐप्स'
को बन्द करने जैसा है। और हाँ, आजकल लोग सीधे तौर पर जमीन से दूर हो
गए हैं। आधुनिक मकानों में मिट्टी नाम की चीज ही नहीं है। फर्श पर भी जूते, चप्पल
या मोजे पहने रहते हैं लोग। किसी अभ्यासी
के लिए ये बहुत ही घातक है। पृथ्वी तत्व से जुड़ाव न के बराबर हो गया है। उचित
है कि रोज कम से कम १०-१५ मिनट नंगे पैर जमीन या घास पर चलना चाहिए। यह सूक्ष्म
शरीर की 'स्टैटिक एनर्जी' को
अर्थिंग प्रदान करता है। ”
बाबा बिलकुल आधुनिक शैली
में सांख्य और योग जैसे जटिल विषय को समझा रहे थे। इस कारण सुनने-समझने में बहुत
अच्छा लग रहा था। मुझे हिदायत करते हुए उन्होंने कहा— “ सूक्ष्म शरीर की
शुद्धि और चित्त को कम्प्यूटर हार्डडिस्क की तरह 'फॉर्मेट'
करने का मार्ग जितना प्रभावशाली है, उतना ही
चुनौतीपूर्ण भी। जब तुम अपने इन्टरनल प्रोग्रामिंग को बदलने की कोशिश करते
हो, तो पुराना 'सिस्टम' (मन) उसका बहुत विरोध करता है। अतः इस क्रिया में कुछ प्रमुख बाधाएं हैं, जिनका सामना तुमको करना
पड़ सकता है और उनसे निपटने के तरीके भी ठीक से समझ-जान लो, ताकि कठिनाई न हो।
1. 'रिबाउंड' इफेक्ट (दबे हुए सँस्कारों का उभरना)—जब तुम चित्त की सफाई शुरू करते हो, तो दबी हुई यादें,
पुराने क्रोध, भय या इच्छाएं अचानक से बहुत
तीव्र होकर ऊपर आती हैं। यह ठीक वैसा ही है जैसे पुराने कमरे की सफाई करते समय
बहुत धूल उड़ती है। इसका समाधान ये है कि घबराओ नहीं। इसे एक अच्छा संकेत
मानो कि कचरा बाहर निकल रहा है। बस उन्हें 'साक्षी भाव'
से देखो, उनमें बहो नहीं।
2. मन का 'ऊब' जाना
(Boredom)— तुम्हारा मन सदियों से 'उत्तेजना'
(Stimulation) का आदि है। जब ध्यान या मौन में बैठोगे, तो मन कहेगा, "यह बहुत बोरिंग है, कुछ काम की बात करते हैं।" यह मन की एक चाल है ताकि वह अपनी सत्ता
बचा सके। इसका समाधान ये है कि अपनी साधना को 'अनुशासन' के बजाय 'प्रेम'
से जोड़ो। इसे एक बोझ न समझो, बल्कि खुद से
मिलने का उत्सव मानो।
3. 'आध्यात्मिक अहंकार' (Spiritual Ego)— ये सबसे बड़ा खतरा है। जैसे ही थोड़े परिणाम मिलने लगेंगे
(जैसे शान्ति महसूस होना), मन यह कहना शुरू कर देगा कि मैं दूसरों से बेहतर हो रहा
हूँ या मैंने बहुत कुछ जान लिया है। यह एक नया 'डेटा'
है, जो पुराने से भी ज्यादा खतरनाक हो सकता है। इसका समाधान ये है
कि हमेशा याद रखो कि तुम 'शून्य'
होने की कोशिश कर रहे हो, 'विशेष' होने की नहीं। अपनी साधना को गुप्त रखो। अनावश्यक किसी के सामने प्रकट न
करो।
एक और महत्वपूर्ण बात का ध्यान रखो। प्रायः ऐसा होता है—निरन्तरता का
अभाव (Lack of Consistency)— शुरुआत में बहुत उत्साह रहता है, लेकिन २-३ हफ्ते बाद
पुराना ढर्रा वापस आने लगता है। 'कल करेंगे' वाली वृत्ति सबसे बड़ी बाधा है। अगर मन कहे कि आज ३० मिनट ध्यान
नहीं करना, तो कहो कि "चलो सिर्फ २ मिनट बैठते हैं। यानी
प्रवाह को टूटने न दो। और इन सबके बाद एक और बाधा—
सामाजिक और पारिवारिक परिवेश—जब तुम बदलने लगते हो, तो आसपास के लोग
या माहौल तुमको पुराने ढर्रे पर वापस खींचने की कोशिश कर सकते हैं। तुम्हारी नई
आदतें उन्हें 'अजीब' लग सकती हैं। इसका समाधान ये है कि अपनी साधना को
यथासम्भव गुप्त रखो और इसके बारे में बहस कदापि न करो। शान्ति से अपना अभ्यास जारी
रखो। तुम्हारा मौन और बदलता स्वभाव खुद ही उन्हें जवाब दे देगा। और हाँ, शारीरिक
आलस्य को पास फटकने न दो। भारी भोजन या अनियमित नींद के कारण शरीर में
भारीपन रहता है, जिससे ध्यान में बैठना मुश्किल हो जाता है।
इसका समाधान ये है कि आहार पर नियन्त्रण रखो। जैसा कि हमने पहले भी चर्चा
की है, सात्विक भोजन इस यात्रा में सबसे बड़ा साथी है। इन
बाधाओं से बचने का सबसे सरल तरीका है 'धैर्य'। याद रखो—जन्मों का डेटा एक दिन में फॉर्मेट नहीं होता।
“अब साक्षीभाव के विशेष सूत्रों पर फिर से ध्यान दिला रहा
हूँ—
साक्षी भाव (Witnessing) का अर्थ है—अपने ही जीवन को एक 'दर्शक' की तरह देखना, जैसे
सिनेमाघर में बैठकर पर्दे पर चल रही फिल्म देखते हैं। जब तुम साक्षी होते हो,
तब तुम 'कर्ता' (Doer) नहीं
रहते और यही वह स्थिति है, जहाँ पुराने कर्मों का डेटा डिलीट होने लगता है। साक्षीभाव
को विकसित करने के पाँच विशेष सूत्र बतला रहे
हैं—
1. 'विचार' और 'मैं'
के बीच की दूरी— आमतौर पर जब हमें गुस्सा आता है, तो हम कहते हैं "मैं क्रोधित हूँ।" साक्षी भाव
कहता है—"मैं देख रहा हूँ कि मेरे मन में क्रोध का एक
विचार लहर की तरह उठा है।" विचार को 'अपना' मत मानो। उसे एक 'बादल'
की तरह देखो, जो तुम्हारी चेतना के आकाश में उड़कर आया हुआ है और
थोड़ी देर में चला जाएगा। तुम 'आकाश' हो,
'बादल' नहीं।
2. नामकरण (Labeling)— जब भी मन विचलित हो, तो मन ही मन उसे एक
नाम (Label) दो। यदि चिंता हो रही है, तो धीरे से कहो "चिंता...चिंता...।" यदि
योजनाएं बन रही हैं, तो कहो "प्लानिंग...
प्लानिंग...।" जैसे ही तुम किसी विचार को नाम दे देते हो, तुम उससे अलग हो जाते हो। लेबल करते ही मन की पकड़ ढीली हो जाती है।
3. शरीर का अवलोकन (Body Scanning)— साक्षी भाव की शुरुआत शरीर से करना सबसे
सरल है। दिन में कई बार, अचानक रुककर देखो कि तुम्हारे शरीर में कहाँ तनाव है?
सांस कैसे चल रही है? जब तुम भोजन करो, तो देखो कि हाथ कैसे हिल रहा है,
दाँत कैसे चबा रहे हैं। खुद को एक रोबोट की तरह काम करते हुए
देखो और उसके पीछे खड़ा 'ऑपरेटर' बन जाओ।
4. निर्णय-रहित दृष्टि (Non-Judgmental Awareness)— साक्षी भाव का सबसे बड़ा दुश्मन है—'जज' करना। हम तुरन्त कहने लगते हैं
"यह विचार बुरा है, यह अच्छा है।" जो भी घट
रहा है, उसे न तो सही कहो, न गलत। बस
उसे 'होने' दो। जैसे ही तुम जज
करते हो, तुम उस विचार से जुड़ जाते हो और 'मेमोरी कार्ड' में नई एंट्री हो जाती है। सिर्फ 'देखना' ही उसे फॉर्मेट करना है।
5. 'हूँ' का स्मरण— दिन भर के शोर-शराबे के बीच, एक केंद्र को पकड़ लो।
बार-बार खुद से पूछो—"इस समय कौन देख रहा है?"
(Who is witnessing?) भाव ये है
कि पीछे से देखने वाली वह शक्ति शान्त और
स्थिर है। जैसे ट्रैफिक के बीच सड़क किनारे खड़ा व्यक्ति शान्त होता है, वैसे ही विचारों के ट्रैफिक के बीच अपनी 'होने की
उपस्थिति' को महसूस करो।
यदि तुम कोई किताब पढ़ रहे हो, तुम्हारी आँखें शब्द पढ़ रही हैं,
तुम्हारा दिमाग अर्थ निकाल रहा है, लेकिन 'तुम' इन सबसे पीछे हो, जो इस पूरी प्रक्रिया
को चुपचाप देख रहा है।
“ निष्कर्ष ये कि जैसे-जैसे तुम्हारा साक्षी भाव गहरा होगा,
तुम पाओगे कि पुरानी यादें और आदतें (वासनाएँ) जलने लगी हैं। जन्मों का बन्धन इसलिए है, क्योंकि हमने खुद को 'स्मृति' मान लिया है। जैसे ही तुम 'साक्षी' बनते हो, मुक्त हो जाते हो। ऋषियों ने 'चित्त
की शुद्धि' और 'साक्षी भाव' पर जितनी गहराई और सरलता से बात की है, वह अतुलनीय
है। उनके लिए 'फॉर्मेट' करने का मतलब
ही 'अ-मन' (No-Mind) की
अवस्था है। तुम्हें पता होना चाहिए गोपियों द्वारा दिया गया श्रीकृष्ण का एक नाम अमन भी है। तुम कहते
हो न कि ये मन की खुराफ़ात की जड़ है। यही
सोच कर गोपियों ने अपना मन ही दे डाला था कृष्ण को। ‘न रहेगा
बाँस, न बजेगी बाँसुरी।’ अच्छे-बुरे का बौद्धिक निर्णय ही परेशानी
का कारण बनता है। अतः विचारों के प्रति चुनाव-रहित जागरूकता (Choiceless
Awareness) रखनी चाहिए।
“ ऋषि कहते थे कि चुनाव ही बन्धन है। जैसे ही तुम कहते हो कि
यह विचार अच्छा है, इसे रखूँ या यह बुरा है, इसे हटाऊँ, तो तुम कर्ता बन जाते हो। जबकि होना ये चाहिए कि बस एक दर्पण बन जाओ। दर्पण के सामने से जो भी
गुजरता है, दर्पण उसे पकड़ता नहीं, बस
झलका देता है। चित्तशुद्धि के लिए सक्रिय ध्यान (Dynamic
Meditation) बहुत ही कारगर उपाय है, खास
कर आधुनिक जीवन शैली वालों के लिए । क्योंकि हमारा 'मेमोरी कार्ड' इतना भरा हुआ है कि शान्त बैठना असम्भव
है। शरीर को हिलाकर, गहरी सांस लेकर और रेचन (कैथार्सिस) के
जरिए हम सूक्ष्म शरीर के कचरे को पहले 'हिलाते' हैं, ताकि वह बाहर निकल सके। हमेशा सजग रहो—होश में
रहो। जबकि हमें बेहोशी में रहने की आदत पड़ी हुई है। जब
तुम होश का दीया जलाकर चलते हो, तो अन्धेरा अपने आप हट जाता
है। साक्षी भाव वह दीया है। तुम्हें जन्मों के बन्धनों को 'काटना'
नहीं है, बस 'होश'
का दीया जलाना है। होश के
आते ही वे बन्धन ऐसे गायब हो जाते हैं, जैसे प्रकाश के आते ही सदियों पुराना अन्धेरा।
प्रकाश ये नहीं पूछता कि अन्धेरा कितना पुराना है। दीया जला, अन्धेरा गायब।
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