साधक का द्वन्द्व (आत्ममन्थन का नवनीत) छठा भाग

 साधक का द्वन्द्व (आत्ममन्थन का नवनीत) 

                      छठा भाग -         पृ.145 से 165तक

मृत्यु और पुनर्जन्म का पूरा खेल इस 'मेमोरी कार्ड' (चित्त) की ही कलाकारी है। मृत्यु केवल शरीर की होती है, लेकिन यह 'डेटा बैंक' सुरक्षित रहता है और यही डेटा नए शरीर की तलाश करता है। इसे सूक्ष्म शरीर की दृष्टि से इन तीन मुख्य बिन्दुओं में समझा जा सकता है

Ø  'स्मृति' ही बीज है (Desire and Memory)जब मृत्यु घटित होती है, तो स्थूल शरीर (Physical Body) मिट्टी में मिल जाता है, लेकिन सूक्ष्म शरीर और कारण शरीर (Causal Body) उस 'मेमोरी कार्ड' को लेकर बाहर निकल जाते हैं। इस कार्ड में तुम्हारी अधूरी इच्छाएं (Desires) और वासनाएं संचित होती हैं। जैसे एक बीज में पूरा वृक्ष छिपा होता है, वैसे ही इस मेमोरी कार्ड में तुम्हारे अगले जन्म का पूरा नक्शा छिपा होता है। जब तक इच्छाएं शेष हैं, यह कार्ड 'फॉर्मेट' नहीं हो सकता और नया जन्म अनिवार्य हो जाता है।

Ø      एक बहुत ही क्रान्तिकारी बात—जो होशपूर्वक मरना  सीख गया, वह दोबारा जन्म नहीं लेता। मरते समय हम अक्सर मूर्छा (Unconsciousness) में होते हैं। डर और घबराहट के कारण हम बेहोश हो जाते हैं। यदि कोई मृत्यु के क्षण में साक्षी बना रहे कि "शरीर छूट रहा है, सांस रुक रही है, मैं देख रहा हूँ," तो वह होश की अग्नि उस 'मेमोरी कार्ड' को जलाकर राख कर देती है। इसे ही 'निर्वाण' या 'महापरिनिर्वाण' कहते हैं। 

Ø जन्मों का बन्धन और 'चुम्बकीय पुल'हमारा चित्त एक चुम्बक की तरह है। इस पर जिस तरह के 'संस्कार' (Data) अंकित होते हैं, मृत्यु के बाद यह वैसे ही गर्भ (Womb) की ओर आकर्षित होता है, जो इसके डेटा से मैच करता है। यदि कार्ड में क्रोध और वासना है, तो वैसा ही जीवन मिलेगा। यदि कार्ड 'फॉर्मेट' होने की प्रक्रिया में है (अर्थात  ध्यानपूर्ण रहे हैं), तो  चुनाव कर सकते हो कि कहाँ जन्म लेना है या जन्म के चक्र से बाहर निकल सकते हो।

            इसके कुछ सरल उपाय हैं—'फॉर्मेट' करने का 'शॉर्टकट' "अभी मर जाओ!" (Die to the past every moment)—इसका अर्थ है
कि हर पल जो बीत गया, उसे वहीं छोड़ दो। यदि बीते हुए कल की यादों (Data) को आज नहीं ढो रहे हो, तो समझो सूक्ष्म शरीर की सफाई कर रहे हो। इसके लिए कुछ प्रयोग करके देखो। रात सोते समय यह महसूस करो कि "मैं मर रहा हूँ।" दिन भर की सारी पहचान, नाम, रिश्ते और यादें विसर्जित कर दो। सुबह जब उठो, तो महसूस करो कि यह एक 'नया जन्म' है, पिछला कोई डेटा साथ नहीं है। यह अभ्यास तुम्हारे सूक्ष्म शरीर को अविश्वसनीय रूप से हल्का कर देगा।

            जरा ठहर कर बाबा ने पुनः कहना शुरु किया— गीता छठे अध्याय के जिस श्लोक पर तुमने जिज्ञासा की वह पूरा श्लोक इस प्रकार है—प्राप्य पुण्यकृतां लोकानुषित्वा शाश्वतीः समाः।
शुचीनां श्रीमतां गेहे योगभ्रष्टोऽभिजायते ॥   

श्रीकृष्ण कहते हैं कि योगभ्रष्ट पुरुष (जो साधना पूरी किए बिना शरीर छोड़ देता है) पुण्यवानों के लोकों को प्राप्त होकर, वहाँ बहुत वर्षों तक निवास करके, फिर शुद्ध आचरण वाले सम्पन्न पुरुषों के घर में जन्म लेता है। पुनर्जन्म के सिद्धान्त को गहराई से समझने के लिए इसकी विशद व्याख्या इस प्रकार हो सकती है—

1. योग का संस्कार कभी नष्ट नहीं होता— अर्जुन ने कृष्ण से पूछा था कि जो व्यक्ति श्रद्धापूर्वक योग में लगा है, लेकिन मन विचलित होने के कारण लक्ष्य तक नहीं पहुँच पाया, क्या वह 'छिन्न-भिन्न बादल' की तरह नष्ट हो जाता है? भगवान बुद्ध और कृष्ण दोनों का सिद्धान्त है कि 'किया हुआ शुभ कर्म कभी व्यर्थ नहीं जाता।' पुनर्जन्म इसी अधूरे सफर को पूरा करने का दूसरा अवसर है।

2. 'शुचीनां' और 'श्रीमतां' का महत्व— श्लोक में दो विशेष शब्दों का प्रयोग किया गया है, जो जन्म के स्थान को दर्शाते हैं— शुचीनां (पवित्र आचरण वाले) ऐसा परिवार जहाँ नैतिक मूल्य, भक्ति और सात्विकता हो। यहाँ जन्म मिलने से जीव को बचपन से ही आध्यात्मिक वातावरण मिलता है। श्रीमतां (ऐश्वर्यशाली/सम्पन्न) धनी परिवार। यहाँ जन्म लेने का अर्थ यह है कि उस जीव को अपनी बुनियादी जरूरतों (भोजन, वस्त्र, आवास) के लिए संघर्ष नहीं करना पड़ेगा, जिससे वह निश्चिंत होकर अपनी अधूरी योग साधना को आगे बढ़ा सके। 

3. 'योगभ्रष्ट' का अर्थ क्या है?यहाँ 'भ्रष्ट' शब्द का अर्थ चरित्रहीन होना नहीं है, बल्कि 'पथ से डिग जाना' है। जो व्यक्ति मोक्ष की राह पर चला तो था, पर माया या इन्द्रियों के आकर्षण के कारण या मृत्यु आ जाने के कारण गन्तव्य (परमात्मा) तक नहीं पहुँच पाया, उसे 'योगभ्रष्ट' कहा गया है।

4. पुनर्जन्म का तन्त्र— "जहाँ छोड़ा, वहीं से शुरू"— पुनर्जन्म का सिद्धान्त केवल शरीर बदलना नहीं है, बल्कि 'चेतना का सातत्य' (Continuity of Consciousness) है। गीता के अनुसार पिछले जन्म के संस्कार (Inherent tendencies) नए जन्म में भी साथ जाते हैं। कृष्ण कहते हैं कि वहाँ उसे पिछले जन्म के वे बुद्धि-संस्कार अनायास ही प्राप्त हो जाते हैं और वह फिर से परमात्मा की प्राप्ति के लिए यत्न करने लगता है।

5. पुनर्जन्म और विकासवाद (Evolution of Soul)यह श्लोक स्पष्ट करता है कि पुनर्जन्म कोई सजा नहीं, बल्कि एक क्रमिक विकास है। प्रकृति हमें तब तक अवसर देती रहती है, जब तक हम पूर्णता को प्राप्त न कर लें। एक जन्म की मेहनत अगले जन्म की 'फाउंडेशन' बनती है।
यह श्लोक हमें आश्वस्त करता है कि आज हम जो भी अच्छा काम या आध्यात्मिक अभ्यास कर रहे हैं, वह मृत्यु के साथ समाप्त नहीं होगा। पुनर्जन्म के सिद्धान्त के अनुसार, हमारी अगली यात्रा वहीं से शुरू होगी जहाँ इस बार समाप्त हुई है।

 

बाबा के उपदेशों से सुरभित वयार ने मेरी जानकारियों पर मंडराती वदली तितर-बितर तो कर दी, किन्तु नई रौशनी में नई बातें, नये सवालों का पैदा होना भी स्वाभाविक है। मैंने पुनः जिज्ञासा की—

सूक्ष्मशरीर अठारह तत्वों को लेकर ऊर्ध्वगमन करता है। पाँच महाभूत वाला शरीर पीछे छूट जाता है। तो क्या पशु, पक्षी, कीट, पतंग, वृक्ष आदि चौरासी लाख योनियों में भटकने वाली बात सही है? यदि सही है तो वहाँ भी ये सभी तत्व कैसे अपना काम करते हैं?

 

बाबा ने मुस्कुराकर उत्तर दिया— तुमने बहुत ही तार्किक और गहरा प्रश्न पूछा है। वेदान्त और सांख्य के अनुसार, सूक्ष्म शरीर ही वह वाहक है, जो एक जन्म से दूसरे जन्म की यात्रा करता है। चौरासी लाख योनियों में भटकने वाली बात सूक्ष्म शरीर के विज्ञान के नजरिए से बिल्कुल संगत है। इसे समझने के लिए हमें यह देखना होगा कि ये सभी तत्व पशु-पक्षियों या वृक्षों में किस तरह काम करते हैं। मैं आशा करता हूँ कि उन अठारह तत्वों की गिनती बारबार नहीं करानी पड़ेगी। अतः सीधे सिद्धान्त की बात पर आता हूँ।  

1. तत्वों की उपस्थिति बनाम उनकी अभिव्यक्ति (Manifestation)सूक्ष्म शरीर के सभी तत्व सभी योनियों में मौजूद होते हैं, लेकिन उनका विकास और अभिव्यक्ति (Expression) अलग-अलग होती है। वृक्षों में मन और बुद्धि 'सुषुप्त' (dormant) अवस्था में होते हैं। उनमें केवल स्पर्श की संवेदना और जीने की इच्छा (प्राण) प्रबल होती है। पशु-पक्षियों में मन और कर्मेन्द्रियाँ बहुत सक्रिय होती हैं, लेकिन 'बुद्धि' और 'अहंकार' केवल शारीरिक रक्षा और आहार तक सीमित होते हैं। उनमें 'विवेक' (गलत-सही का निर्णय) करने वाली बुद्धि विकसित नहीं होती। मनुष्यों में बुद्धि पूर्णतः विकसित होती है, जिससे वह अपने कर्मों को बदल सकता है।

दूसरी महत्त्वूपूर्ण बात यह है कि सूक्ष्म शरीर केवल तत्वों का समूह नहीं है, बल्कि यह 'संस्कारों' की चिप है। जैसे एक कम्प्यूटर हार्डवेयर (स्थूल शरीर) बदल जाता है, लेकिन उसका डेटा (सूक्ष्म शरीर) नई मशीन में डाल दिया जाता है। इसी भाँति जब कोई जीव पशु योनि में जाता है, तो उसके सूक्ष्म शरीर के अठारह तत्व उसी योनि के अनुकूल व्यवहार करने लगते हैं। जैसे, एक शेर के सूक्ष्म शरीर में 'कर्मेन्द्रिय' के रूप में शिकार करने का वेग होगा, जबकि एक गाय के सूक्ष्म शरीर में शान्ति का।

अब तुम्हारे इस सवाल का जवाब कि ऊँच-नीच योनियों में गमन का हिसाब कैसे तय होता है, तो इसके बारे में गीता के वचन हैं, सूक्ष्म शरीर हमेशा ऊपर ही नहीं जाता। वह कर्मों के अनुसार गमन करता है— ऊर्ध्वं गच्छन्ति सत्त्वस्था:...। सात्विक कर्म करने वाले उच्च लोकों में जाते हैं। मध्ये तिष्ठन्ति राजसाः...। राजसी लोग मृत्यु लोक (मनुष्य योनि) में रहते हैं। जघन्यगुणवृत्तिस्था अधो गच्छन्ति तामसाः। तामसी वृत्तियों वाले लोग पशु-पक्षी या कीट-पतंग जैसी 'अधो' (नीचे की) योनियों में जाते हैं।

अब तुम्हें चौरासी लाख योनियों का रहस्य समझाता हूँवस्तुतः यह चेतना के विकास के सोपान हैं। जड़/वृक्ष— जहाँ चेतना कैद है। कीट/पशु— जहाँ चेतना थोड़ी मुक्त हुई लेकिन केवल सहज प्रवृत्तियों के अधीन है। मनुष्य— जहाँ चेतना 'स्वतन्त्र' है । वह चाहे तो वापस नीचे गिरे या योग के माध्यम से परमात्मा में मिल जाए।  

निष्कर्ष ये कि पशु या वृक्ष योनि में भी अठारह तत्व होते हैं, लेकिन वे 'बीज' रूप में या बहुत ही सीमित रूप में काम करते हैं। वहाँ जीव अपने पुराने कर्मों का फल 'भोगता' है, नए कर्म 'बनाता' नहीं (क्योंकि विवेकशील बुद्धि सक्रिय नहीं होती)। इसीलिए मनुष्य योनि को 'कर्म योनि' और बाकी को 'भोग योनि' कहा गया है।

            प्रसंगवश ये भी स्पष्ट कर दूँ कि मृत्यु के समय सूक्ष्म शरीर स्थूल शरीर से कैसे निकलता है या संस्कार अगले जन्म की बनावट (DNA) को कैसे प्रभावित करते हैं? सच पूछो तो ये विषय अध्यात्म और आधुनिक विज्ञान के उस मिलन बिन्दु पर हैं, जहाँ 'चेतना' (Consciousness) पदार्थ (Matter) को संचालित करती है। इन दोनों प्रक्रियाओं को सरल और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से समझाते हैं—

1. मृत्यु के समय सूक्ष्म शरीर का निकलना— उपनिषदों (विशेषकर बृहदारण्यक उपनिषद) और भगवद्गीता में इस प्रक्रिया का बहुत सजीव वर्णन है। यथा—

Ø  समेटने की प्रक्रिया (Withdrawal): जैसे हम रात को सोने से पहले अपनी ऊर्जा समेटते हैं, वैसे ही मृत्यु के समय सबसे पहले 'ज्ञानेन्द्रियाँ' मन में विलीन होने लगती हैं। दृष्टि धुँधली होती है, सुनने की शक्ति कम होती है और अन्त में केवल 'स्पर्श' और 'प्राण' बचते हैं।

Ø  प्राण का केन्द्रीकरण: 18 तत्वों का वह समूह (सूक्ष्म शरीर) 'मुख्य प्राण' के साथ हृदय प्रदेश में इकट्ठा हो जाता है। उस समय जीव को अपने पूरे जीवन की एक झलक (Flashback) दिखाई देती है, जो उसके अगले जन्म का आधार (बीज) बनती है।

Ø  निकास द्वार (The Exit Point): सूक्ष्म शरीर स्थूल शरीर के किस छिद्र से बाहर निकलेगा, यह व्यक्ति की जीवन भर की साधना और अन्तिम समय की 'चेतना' पर निर्भर करता है। जैसे—ऊर्ध्व मार्ग (ब्रह्मरन्ध्र):  यदि व्यक्ति योगी है, तो सूक्ष्म शरीर सिर के ऊपरी हिस्से (सहस्रार चक्र) से निकलता है। इसे 'कपाल क्रिया' या मोक्ष का द्वार माना जाता है। मध्य मार्ग:  यदि जीवन सामान्य रहा है, तो आँख, कान या मुख से निकलता है। अधो मार्ग:  यदि जीवन केवल वासनाओं और तामसी प्रवृत्तियों में बीता है, तो शरीर के निचले अंगों (मल-मूत्र द्वार) से निकास होता है। इस कार्य में उदान वायु की भूमिका विशेषकर होती है। योग शास्त्र के अनुसार, 'उदान' नाम की वायु ही सूक्ष्म शरीर को स्थूल शरीर से अलग करके बाहर ले जाने का काम करती है।

अब ये समझो कि संस्कार DNA और अगले जन्म की बनावट को कैसे प्रभावित करते हैं? यह आधुनिक विज्ञान (Epigenetics) और प्राचीन दर्शन के जुड़ाव का सबसे रोमांचक हिस्सा है। संस्कार एक 'ब्लूप्रिंट' की तरह है। सूक्ष्म शरीर अपने साथ 'वासना' और 'कर्म-संस्कार' ले जाता है। जब यह सूक्ष्म शरीर किसी गर्भ में प्रवेश करता है, तो यह केवल एक अतिथि नहीं होता, बल्कि यह उस गर्भ के भौतिक तत्वों (Cells) को निर्देश देने वाला 'चीफ आर्किटेक्ट' होता है।  DNA का प्रोग्रामिंग विज्ञान कहता है कि DNA हमारे शरीर का नक्शा है। लेकिन 'एपिजेनेटिक्स'  यह सिद्ध कर रहा है कि हमारे विचार, अनुभव और वातावरण हमारे जींस के 'एक्सप्रेशन' (जींस कैसे काम करेंगे) को बदल देते हैं। जैसे यदि सूक्ष्म शरीर में तीव्र भय के संस्कार हैं, तो वह गर्भ में ऐसे हार्मोन्स और Neural pathways को सक्रिय करेगा जो उस बच्चे को जन्मजात 'डरपोक' या 'अति-संवेदनशील' बना देंगे।

आकृति और स्वभाव (Phenotype) श्रीकृष्ण कहते हैं— "यं यं वापि स्मरन्भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम्" (मृत्यु के समय जो भाव होता है, वही अगला शरीर मिलता है)। यह भाव ही 'ब्लूप्रिंट' है। संस्कार तय करते हैं कि गर्भ में किन जींस को 'On' करना है और किनको 'Off'। यही कारण है कि एक ही माता-पिता की दो सन्तानें बिल्कुल अलग स्वभाव और शारीरिक क्षमताओं वाली होती हैं। यहाँ अधूरी साधना भी प्रभावित करती है, अगले जन्म को। जैसा कि पहले श्लोक में चर्चा हुई, 'योगभ्रष्ट' व्यक्ति जब सम्पन्न घर में जन्म लेता है, तो उसके सूक्ष्म शरीर के संस्कार उसके मस्तिष्क की संरचना (Brain Wiring) को बचपन से ही अध्यात्म की ओर मोड़ देते हैं। उसे वो चीजें जल्दी समझ आने लगती हैं, जो दूसरों के लिए कठिन हैं। बिल्कुल कम्प्यूटर की भाषा में इसे कहो कि सूक्ष्म शरीर वह 'सॉफ्टवेयर' है जो अगले शरीर के 'हार्डवेयर' (DNA) को कॉन्फ़िगर करता है।

 

 अनायास मेरी हथेलियाँ जुड़ गई। अद्भुत ! अद्भुत ! ! मुझ पर आपकी असीम अनुकम्पा है महाराज ! मेरे पास कोई अनुकूल शब्द नहीं है इसकी अभिव्यक्ति हेतु ।  फिर भी मैं धृष्टता करता हूँ ये जानने के लिए कि मृत्यु के समय अपनी चेतना को कैसे स्थिर रखा जाए (अन्तिम मति-सा गति), ताकि सूक्ष्म शरीर का निकास श्रेष्ठ मार्ग से हो सके?

 

बाबा ने मुस्कुराते हुए कहा—यह बहुत ही व्यावहारिक प्रश्न है। मृत्यु के समय की चेतना, गर्भ संस्कार और इसके पीछे काम करने वाली नियति (प्रारब्ध बनाम पुरुषार्थ) को समझना ही जीवन के रहस्य को सुलझाना है। इसे हम दो भागों में समझाते हैं—

1. मृत्यु के समय चेतना को स्थिर कैसे रखें? (अन्तिम मति सा गति)गीता का सिद्धान्त है कि अन्त समय में जो विचार प्रधान होता है, वही अगले जन्म का बीज बनता है। इसे साधने के लिए तीन व्यावहारिक तरीके हैं— अभ्यास (Constant Practice):  कृष्ण कहते हैं कि अन्त समय में अचानक ईश्वर याद नहीं आएंगे। इसके लिए जीवन भर 'अभ्यास' करना होगा। यदि जीवन भर मन सांसारिक चिंताओं में रहा, तो मृत्यु के समय भी वही उभरेगा। इसीलिए 'तस्मात्सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युध्य च' (हर समय मेरा स्मरण करो और अपना कर्तव्य करो)। और दूसरा उपाय है साक्षीभाव, जिसके बारे में बारबार सांख्य की बात कर रहा हूँ।  मृत्यु के समय शरीर में भारी पीड़ा या बेचैनी हो सकती है। उस समय 'मैं शरीर नहीं हूँ' का बोध (साक्षी भाव) चेतना को शरीर के निचले केन्द्रों (मूलाधार/स्वाधिष्ठान) से उठाकर ऊपर के केन्द्रों (आज्ञा/सहस्रार चक्र) की ओर ले जाता है। इसके लिए प्राणायम का बल कार्य करेगा। योग शास्त्र के अनुसार, जो व्यक्ति श्वास पर नियन्त्रण करना जानता है, वह उदान वायु की गति को ऊर्ध्वगामी बना सकता है। यानी ऊपर की ओर मोड़ सकता है।  

2. गर्भ संस्कार की भूमिका—गर्भ संस्कार केवल एक धार्मिक कृत्य (रस्म) नहीं, बल्कि 'कॉन्शियस पेरेंटिंग' का विज्ञान है। जब सूक्ष्म शरीर गर्भ में प्रवेश करता है, तो माता के विचार, आहार और वातावरण उस सूक्ष्म शरीर के 'संस्कारों' के साथ प्रतिक्रिया (Interact) करते हैं। यदि माता सात्विक और शान्त रहती है, तो वह आने वाले जीव के तामसी संस्कारों को 'दबा' (Suppress) सकती है और सात्विक संस्कारों को 'उभार' (Express) सकती है। यह बिल्कुल वैसा ही है, जैसे एक बीज को समुचित खाद-पानी-धूप-हवा मिले तो वह बेहतर विकसित होता है।

            चुँकि मैं जानता हूँ कि तुम्हारा अगला सवाल क्या हो सकता है। इसलिए बिना पूछे ही कह दूँ— यह किस पर निर्भर है: प्रारब्ध, क्रियमाण या परमात्मा? चुँकि यह प्रश्न बहुत ही महत्वपूर्ण है। अतः इसे एक उदाहरण से समझाता हूँ। ताश खेलते हो न ? नहीं खेलते हो, तो किसी खिलाड़ीटीम के पास बैठकर देखो, वह क्या कर रहा है, कैसे कर रहा है। हम सबका ये  जीवन भी ताश के खेल (Game of Cards) की तरह है। ताश के पत्ते कोई एक बाँट देता है, किन्तु उसका बुद्धिमानी पूर्वक प्रयोग खिलाड़ी पर निर्भर होता है।  प्रारब्ध (Destiny): तुमको जो पत्ते मिले हैं, वे तुम्हारा 'प्रारब्ध' है। जन्म, माता-पिता, शरीर और तुम्हारी जन्मजात प्रवृत्तियाँ प्रारब्ध से तय होती हैं। इसमें तुम्हारा वश नहीं है। क्रियमाण (Free Will): उन पत्तों को तुम कैसे खेलते हो, यह तुम्हारा 'क्रियमाण' (वर्तमान कर्म) है। एक खराब हाथ (बुरा प्रारब्ध) मिलने पर भी एक अच्छा खिलाड़ी अपनी बुद्धिमत्ता (पुरुषार्थ) से खेल जीत सकता है। मृत्यु के समय की चेतना काफी हद तक तुम्हारे क्रियमाण (वर्तमान अभ्यास) पर निर्भर करती है। और रही बात परमात्मा की, तो परमात्मा इस खेल का 'रेफरी' या 'नियमों का आधार' है। वह एकदम निष्पक्ष है। लेकिन जब कोई जीव पूरी तरह शरणागत (Surrender) हो जाता है, तो परमात्मा की 'कृपा' उसके प्रारब्ध के बोझ को हल्का कर देती है और उसे वह विवेक प्रदान करती है, जिससे उसका 'अन्तिम समय' सुधर जाए। निष्कर्ष यह कि जन्म मुख्य रूप से प्रारब्ध पर निर्भर है (कि कहाँ और कैसा शरीर मिलेगा)। मृत्यु की चेतना मुख्य रूप से क्रियमाण पर निर्भर है (कि आपने जीवन भर क्या अभ्यास किया)। मोक्ष या उत्थान ये दोनों परमात्मा की कृपा और जीव की तड़प पर निर्भर है।

            “…इनके विषय में पहले भी बहुत कुछ समझा चुका हूँ। पुनः नये उदाहरण से समझाने का प्रयास करता हूँ। प्रारब्ध, क्रियमाण और परमात्मा के इस जटिल सन्तुलन को एक 'नौका और नदी' के उदाहरण से समझाते हैं। कल्पना करो कि नदी में नाव चला रहे हो। नदी की धारा की गति, उसकी गहराई और उसमें उठने वाली लहरें तुम्हारा 'प्रारब्ध' है। तुमने नाव किस नदी में उतारी है (यानी तुम्हारा जन्म किस कुल में हुआ, तुम्हारी शारीरिक क्षमता क्या है)यह तुम्हारे हाथ में नहीं था। यह पिछले जन्मों के वेग से तय हुआ है। अगर नदी शान्त है, तो यह 'सुखद प्रारब्ध' है; अगर नदी में उफान है, तो यह 'कठिन प्रारब्ध' है। क्रियमाण / पुरुषार्थ तुम्हारे हाथ में जो 'पतवार' (Oars) है और तुम नाव को किस दिशा में मोड़ते हो, वह तुम्हारा 'क्रियमाण' कर्म है। नदी की धारा (प्रारब्ध) चाहे कितनी भी तेज क्यों न हो, पतवार चलाने वाला अपनी ताकत और सूझबूझ (पुरुषार्थ) से नाव को किनारे की ओर ले जा सकता है या उसे डूबने से बचा सकता है। यहाँ ध्यान देने वाली बात यह है कि प्रारब्ध केवल  'परिस्थिति' पैदा करता है, लेकिन 'प्रतिक्रिया' (Reaction) हमेशा तुम्हारा क्रियमाण कर्म तय करता है। और परमात्मा?  नदी में बहने वाली हवा 'परमात्मा की कृपा' है। हवा हमेशा बह रही है, लेकिन उसका लाभ वही उठा पाता है, जो अपनी नाव का 'पाल' (Sail) खोल देता है। परमात्मा ने नियम बना रखे हैं (जैसे गुरुत्वाकर्षण या पानी का स्वभाव), लेकिन वह तुम्हारे 'स्वतन्त्र संकल्प' (Free Will) में तब तक हस्तक्षेप नहीं करता, जब तक तुम उसे पुकारते नहीं। जब तुम पूरी तरह थक जाते हो या अपनी बुद्धि को परमात्मा के चरणों में समर्पित कर देते हो,

तो वह 'अनुकूल वायु' बनकर तुम्हारी नाव को पार लगा देता है।

            अब जरा विचार करो कि इस सन्तुलन का वास्तविक जीवन में क्या प्रभाव पड़ रहा है? यदि केवल प्रारब्ध होता, तो हम सब कठपुतली होते। फिर पाप-पुण्य का कोई अर्थ नहीं होता, क्योंकि हम जो भी करते वह तो पहले से तय होता। लेकिन ऐसा नहीं है। यदि केवल क्रियमाण होता तो हर मेहनती व्यक्ति सफल होता और हर आलसी आदमी असफल। पर हम देखते हैं कि कभी-कभी बहुत मेहनत के बाद भी फल नहीं मिलता (यहाँ प्रारब्ध आ जाता है)। तुम पूछ सकते हो कि परमात्मा की भूमिका क्या है? परमात्मा वह 'करुणा' है, जो हमें हर पल नया क्रियमाण कर्म करने की शक्ति देता है। वह हमें 'संकेत' देता है, लेकिन नाव चलाने का श्रम हमें ही करना पड़ता है। विशेष बात  ये है कि 'प्रारब्ध' केवल भोग के लिए है, 'विकास' के लिए नहीं।  

ऋषि कहते हैं कि प्रारब्ध से सुख या दुःख मिल सकता है, लेकिन ज्ञान और भक्ति केवल पुरुषार्थ और परमात्मा की कृपा से मिलती है। बीमार होना प्रारब्ध हो सकता है, लेकिन उस बीमारी में भगवान को याद करना या रोते रहनायह तुम्हारी पसंद (Choice) है। यही 'स्वतन्त्रता' हमें मनुष्य बनाती है। प्रारब्ध वह कागज है, जिस पर हमारी जिन्दगी की कहानी लिखी जानी है, क्रियमाण वह कलम है, जिससे हम लिखते हैं और परमात्मा वह प्रकाश है, जिसकी उपस्थिति में लिखना सम्भव होता है।

            ये पक्की बात है कि प्रारब्ध को पूरी तरह मिटाया नहीं जा सकता, क्योंकि वह 'तीर' है, जो कमान से छूट चुका है। लेकिन उसके प्रभाव को तीन तरीकों से बदला जा सकता है। पहला है— तप और प्रायश्चित।  जैसे अग्नि सोने की अशुद्धि को जला देती है, वैसे ही वर्तमान का 'तप' पुराने संस्कारों के वेग को कम कर देता है। अगर प्रारब्ध में 'रोग' लिखा है, तो वर्तमान का 'संयम और योग' उस रोग की तीव्रता को इतना कम कर सकता है कि वह केवल एक मामूली खरोंच बनकर रह जाए। दूसरा है—दृष्टिकोण का परिवर्तन—ज्ञान के माध्यम से  प्रारब्ध के प्रति अपना नज़रिया बदल सकते हो। एक अज्ञानी व्यक्ति दु:ख आने पर टूट जाता है, जबकि एक ज्ञानी उसे 'पुराने कर्ज का भुगतान' समझकर प्रसन्नता से स्वीकार करता है। जब मन दुखी नहीं होता, तो प्रारब्ध का प्रभाव शून्य हो जाता है। और तीसरा है— शरणागति भक्ति मार्ग में जब जीव कहता है "मैं तेरा हूँ", तो परमात्मा उसके प्रारब्ध की जिम्मेदारी अपने ऊपर ले लेते हैं। जैसे एक पिता अपने  बच्चे का कर्ज खुद चुका देता है, वैसे ही ईश्वरीय कृपा प्रारब्ध के पहाड़ को राई  के समान बना देती है।

            बाबा के इन सारगर्भित उपदेशों के बीच ही मेरे मन में एक पुराना संशय सिर उठाने लगा। एक तथाकथित साधक हमेशा कहा करते थे हमसे कि मेरा चेला बन जाओ। हम आपको पञ्चकोशीय साधना सिखलायेंगे, जो अत्यन्त  द्रुतगामी प्रभाव वाला है। किन्तु साधनामार्ग में राह चलते किसी को गुरु नहीं बना लेना चाहिए—पिताजी की ये चेतावनी याद गई और उनका शिष्यत्व स्वीकार करने से बँच गया। आज फिर उनकी बातों का स्मरण हो आया। अतः बाबा से ही सवाल करना उचित लगा। इनसे अधिक योग्य साधक आज के पेशेवर युग में भला कहाँ मिलेगा मुझको—सोचकर हाथ जुड़ गए—महाराज ! आप अन्यथा न लें। मेरी धृष्टता को क्षमा करें। कृपया पञ्चकोशीय साधना पर प्रकाश डालें। ये कोई नई या भिन्न पद्धति है या सांख्य और योग के अन्दर की ही बात है?

             

            पल भर के लिए बाबा रुके—कुछ सोचने की मुद्रा में, फिर हँसते हुए बोले— ज्यादा जानकारी और कम समझदारी बड़ी घातक होती है। पता नहीं कहाँ-कहाँ से ऐसी जानकारियाँ बटोर लाते हो। नदी किनारे घूम-घूमकर सभी नाविकों से सिर्फ मोल-जोल करना है या तुम्हें नदी पार करना है—पहले ये तो तय करो। हालाँकि आज के समय में बहुत मुश्किल है ये तय कर पाना, क्योंकि नाविक खुद ही चिल्ला रहा है—मेरी नाव पर बैठो...मेरी नाव पर बैठो हम जल्दी उसपार पहुँचा देंगे...मैं सबसे कम खेवाई लेता हूँ और रास्ते में मनोरंजन भी करता हूँ...। खैर कोई बात नहीं। तुम्हारा ये पञ्चकोशीय संशय भी दूर ही कर दूँ आज। सबसे पहले ये स्पष्ट कर दूँ कि पञ्चकोश का सिद्धान्त मुख्य रूप से वेदान्त दर्शन का विषय है, न कि सांख्य या योगदर्शन का। पञ्चकोश की मूल चर्चा तैत्तिरीयोपनिषद् के ब्रह्मानन्दवल्ली में मिलती है। यह वेदान्त का एक प्रमुख सिद्धान्त है। यह आत्मा के ऊपर पड़ने वाली पाँच परतों (कोशों) को दर्शाता है। जैसे म्यान के भीतर तलवार होती है, वैसे ही एक के ऊपर एक, इन पाँच कोशों से आत्मा आवेष्ठित है। तुमको पहले भी बतला चुका हूँ कि सांख्य दर्शन पचीस तत्वों की बात करता है । यही कारण है कि सांख्य में 'कोश' शब्द का प्रयोग इस तरह नहीं मिलता। हालाँकि, सांख्य का 'सूक्ष्म शरीर' इन कोशों से काफी मेल खाता है। महर्षि पतञ्जलि के मूल योगसूत्र में भी 'पञ्चकोश' शब्द का सीधा उल्लेख नहीं है। किन्तु टीकाकार स्वामी ओमानन्दजी ने इस पर विशद प्रकाश डाला है। तुम जान चुके हो कि योगदर्शन मुख्य रूप से चित्त की वृत्तियों के निरोध और अष्टांग योग  पर केन्द्रित है। लेकिन बाद के योग विज्ञान में साधक के विकास को समझने के लिए वेदान्त के इस पञ्चकोश सिद्धान्त को अपना लिया गया है। जैसे— अन्नमय कोश को स्वस्थ रखने के लिए आसन किए जाते हैं। प्राणमय कोश के लिए प्राणायाम किया जाता है। मनोमय कोश के लिए प्रत्याहार और धारणा की जाती है। मैं पुनः स्पष्ट करना चाहता हूँ कि पञ्चकोश मूल रूप से वेदान्त (उपनिषद) की देन है। सांख्य और योग इसके समकालीन और पूरक दर्शन हैं, इसलिए योग साधना को गहराई से समझने के लिए पञ्चकोश का अध्ययन साथ में किया जाता है।

पञ्चकोश मनुष्य के अस्तित्व की पाँच परतें हैं। योग साधना का उद्देश्य इन परतों को शुद्ध करके भीतर अवगुण्ठित आत्मा का अनुभव करना है। अब तुम्हें प्रत्येक कोश के कार्य और योग साधना में उनके महत्व को विस्तार से समझाने का प्रयास करता हूँ। इसे ध्यान से सुनो-समझो।

1. अन्नमय कोश - भौतिक शरीर—स्थूल शरीर—यह हमारा दृश्यमान मांस-मज्जा का शरीर है, जो भोजन (अन्न) से बनता और पलता है। स्थिरता, गति और संसार में कर्म करना इसका कार्य है। यही अन्य सभी सूक्ष्म कोशों का आधार भी है। शरीरमाद्यंखलुधर्मसाधनम्। यदि शरीर अस्वस्थ है, तो जप-तप-ध्यान कुछ भी साधना कठिन है। आसन और षट्कर्मादि से  इसे मजबूत और रोगमुक्त बनाया जाता है। उचित और सात्विक आहार इसका मुख्य पोषण है।

2. प्राणमय कोश - ऊर्जा शरीर—पञ्चभौतिक शरीर के भीतर बहने वाली जीवनी शक्ति (प्राण) की परत, इसमें अनेकानेक नाड़ियाँ और चक्र शामिल हैं। श्वसन, रक्त संचार, पाचन और पूरे शरीर में ऊर्जा का प्रवाह बनाए रखना इसका कार्य है। यह मन (मनोमय) और शरीर (अन्नमय) के बीच के सेतु का काम करता है। प्राण सन्तुलित होने पर ही मन शान्त होता है। प्राणायाम (अनुलोम-विलोम,कपालभाति...) और बन्धादि के अभ्यास से प्राण का नियमन और चक्रों का जागरण किया जाता है।

3. मनोमय कोश—मानसिक शरीर— यह विचारों, भावनाओं, इच्छाओं और इन्द्रियों के अनुभवों की परत है। इसका कार्य है—बाहरी दुनिया से जानकारी लेना, सुख-दुख का अनुभव करना और अनियन्त्रित विचार पैदा करना। महर्षि पतञ्जलि के अनुसार योग का लक्ष्य ही 'चित्त की वृत्तियों को रोकना' है। यह कोश सबसे चञ्चल होता है और ध्यान में बाधा डालता है। प्रत्याहार (इन्द्रियों को अन्दर मोड़ना)धारणा (एकाग्रता)मंत्र जप और यम-नियम के पालन से मन को शान्त और वश में किया जाता है।

4. विज्ञानमय कोश—बौद्धिक शरीर— यह विवेक, बुद्धि, निर्णय क्षमता और अन्तर्ज्ञान (Intuition) की परत है। वस्तुतः यह केवल सूचना नहीं, बल्कि सही-गलत का ज्ञान कराता है। इसके कार्य हैं— साक्षी भाव में रहना, आत्म-मंथन करना और सही निर्णय लेना। इस कोश के जाग्रत होने पर व्यक्ति केवल मन की इच्छाओं के पीछे नहीं भागता, बल्कि सत्य की खोज करता है। ज्ञान योग का अभ्यास, स्वाध्यायध्यान और निरन्तर आत्म-निरीक्षण इस कोश को शुद्ध करते हैं।

5. आनन्दमय कोश—कारण शरीर—यह सबसे गहरी परत है, जो आत्मा के सबसे करीब है। यहाँ किसी बाहरी कारण के बिना ही परम शान्ति और आनन्द का अनुभव होता है। गहरी नींद या समाधि की स्थिति में असीम शान्ति, सन्तोष और प्रेम का अनुभव कराना इसका कार्य है। यह योग साधना की उच्चतम अवस्था के ठीक पहले का द्वार है। यहाँ साधक द्वन्द्वों (सुख-दुख, लाभ-हानि) से ऊपर उठ जाता है। समाधिभक्ति योग (पूर्ण समर्पण) और निःस्वार्थ सेवा (कर्म योग) से इस कोश का अनावरण होता है, जिससे व्यक्ति सीधे आत्मा से जुड़ जाता है।

भाग-दौड़ वाले दैनिक जीवन में तनाव, गलत खान-पान और अस्त-व्यस्त जीवनशैली के कारण ये पाँचों कोश असन्तुलित हो जाते हैं। जब कोई एक कोश असन्तुलित होता है, तब उसका प्रभाव दूसरे कोशों पर भी पड़ने लगता है। अतः अब इनके असन्तुलन के लक्षण और उन्हें मजबूत करने के व्यावहारिक उपायों पर प्रकाश डालते हैं—

1. अन्नमय कोश (भौतिक शरीर)—इसके असन्तुलन के लक्षण हैं—थकान, आलस्य, मोटापा या अत्यधिक दुबलापन, पाचन खराब होना और बार-बार बीमार पड़ना इत्यादि। इसे ठीक करने के लिए सात्विक आहार-विहार का अनुपालन होना चाहिए।

2. प्राणमय कोश (ऊर्जा शरीर)—इसके असन्तुलन के लक्षण हैं— सुबह उठने पर भी ताजगी न मिलना, सामान्य कार्यों में भी हाँफने लगना, शरीर में भारीपन या अत्यधिक बेचैनी होना। इसे ठीक  करने के उपाय हैं नियमित प्राणायाम (अनुलोम-विलोम,भ्रामरी आदि) का अभ्यास । गहरी सांसें भी तनाव को कम करती हैं। प्रकृति से अधिकाधिक जुड़ाव बनाये रखना भी इस कोश के सन्तुलन हेतु कारगर उपाय है।

3. मनोमय कोश (मानसिक शरीर)—इसके असन्तुलन के लक्षण हैं— भावनात्मक उतार-चढ़ाव, छोटी छोटी बातों पर क्रोधित होना, अत्यधिक सोचना और चिंता। आधुनिक जीवनशैली की सबसे बड़ी समस्या है ये। अभ्यासी के लिए उचित है कि सोने से घंटे भर पहले फोन, टीवी और सोशल मीडिया से दूरी बनालो। मन को शान्त करने के लिए किसी मन्त्र का मानसिक जप करो या सिर्फ आती-जाती सांसों का निरीक्षण करो। नकारात्मक विचारों वाले लोगों और खबरों से दूर रहो। 

4. विज्ञानमय कोश (बौद्धिक शरीर)—इसके असन्तुलन के लक्षण हैं—निर्णय न ले पाना (Confusion), सही-गलत में भेद न कर पाना, जीवन में उद्देश्य की कमी महसूस होना और अंधविश्वास या संकीर्ण सोच। इसे सन्तुलित करने हेतु  सात्विक जीवन शैली सर्वश्रेष्ठ उपाय है। किसी भी परिस्थिति में तुरन्त प्रतिक्रिया न देकर, शान्त रहकर विचार करे। दिनभर में कम से कम आधे घंटे का पूर्ण मौन रखो।

5. आनन्दमय कोश (आनन्द शरीर)—इसके असन्तुलन के लक्षण हैं सब कुछ (पैसा, परिवार, सुख-सुविधाएं) होने के बाद भी भीतर से खालीपन, उदासी और असन्तोष होना। इसे ठीक करने हेतु कृतज्ञता का भाव आवश्यक है। रोज रात को सोने से पहले उन चीजों के लिए ईश्वर या प्रकृति को धन्यवाद दो जो तुम्हारे पास है। निःस्वार्थ सेवा – बिना किसी स्वार्थ के किसी की मदद करो । गहरी नींद – इस कोश को छूने का सबसे सरल तरीका है, गहरी और शान्तिपूर्ण नींद या चौबीस मिनट का योग निद्रा का अभ्यास। दैनिक जीवन में अनिद्रा, गुस्सा, आलस्य आदि आम समस्याएं हैं। पञ्चकोश सिद्धान्त के अनुसार, ये समस्याएं किसी एक विशेष कोश के असन्तुलित होने का संकेत देती हैं। अतः इसे ठीक से समझकर, सही दिशा में कार्य करना चाहिए।

 

आपकी सारी बातें तो समझ में आ गई, किन्तु मैं फिर संशयग्रस्त हो गया। कुत्ते की दुम टेढ़ी की टेढ़ी ही रह जा रही है। अतः निवेदन किया — इन बातों से फिर थोड़ी उलझन हो रही महाराज ! ये तय कर पाना मुश्किल हो रहा है कि ज्ञानमार्ग पर्याप्त है या पतञ्जलि का योगमार्ग या विशुद्ध भक्ति मार्ग। किस रास्ते को अपनाऊँ समझ नहीं पा रहा हूँ।

           

बाबा ने ठहाका लगाया— दुम का स्वभाव है हमेशा टेढ़ा रहना और तुम्हारा काम है, उसे सीधा करने का युगत करते रहना। तुम्हारा ये प्रश्न वैसा ही है जैसे पूछना कि मंजिल तक पहुँचने के लिए हवाई जहाज बेहतर है या ट्रेन या कार या पैदल चलना? अरे बाबू !  यह यात्री की रुचि, क्षमता और योग्यता पर निर्भर करता है कि वह कैसे सफ़र करेगा। ज्ञानमार्ग—सांख्य—उसके लिए है, जिसकी बुद्धि बहुत तीक्ष्ण है और जो तर्कप्रिय हैं। ध्यान रखो— "अहं ब्रह्मास्मि" (मैं ब्रह्म हूँ)। यह मार्ग सीधे 'अविवेक' पर चोट करता है। यह मार्ग 'शुष्क' हो सकता है। इसमें अहंकार आने का खतरा रहता है कि "मैं सब जानता हूँ"। दूसरी ओर पतञ्जलि का योगमार्ग—अष्टांग योग—उसके लिए है जो अनुशासन प्रिय है और मन-इन्द्रियों को जीतना चाहता है। "योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः"—यह एक वैज्ञानिक पद्धति है, जो शरीर और प्राण को साधकर मन तक पहुँचती है। यह अत्यन्त कठिन मार्ग है। इसमें यम, नियमादि के साथ निरन्तर अभ्यास की आवश्यकता होती है। और तीसरा रास्ता है—विशुद्ध भक्ति मार्ग— समर्पण का राजमार्ग— यह सबके लिए सुलभ है, विशेषकर उनके लिए, जिनके हृदय में प्रेम और भाव प्रधान है। सब कुछ ईश्वर का है। यहाँ जीव को अपनी शक्ति पर नहीं, ईश्वर की शक्ति पर भरोसा होता है। यहाँ प्रारब्ध का भय सबसे कम होता है। किन्तु इन सारी बातों का निचोड़ यह है कि भगवान कृष्ण ने गीता के अन्त में 'समन्वय' (Integration) पर जोर दिया है। क्योंकि वास्तव में ये तीनों अलग-अलग नहीं हैं। क्योंकि बिना ज्ञान के भक्ति 'अंधविश्वास' हो सकती है। बिना योग (अनुशासन) के ज्ञान केवल 'शब्द-जाल' बनकर रह जाता है। और बिना भक्ति के योग और ज्ञान 'अहंकारी' बना सकते हैं। अतः सर्वश्रेष्ठ मार्ग है— ज्ञान से सत्य को पहचानायोग से स्वयं को अनुशासित करना और भक्ति से अहंकार को परमात्मा के चरणों में समर्पित कर देना। लेकिन यदि तुम किसी एक को ही चुनना चाहो, तो वर्तमान युग (कलियुग) में भक्ति मार्ग को सबसे सुलभ और सुरक्षित माना गया है, क्योंकि इसमें 'परमात्मा' स्वयं हाथ थाम लेते हैं। तुम केवल अपनी पात्रता बनाओ, बाकी काम परमात्मा करेंगे। जैसा कि संत तुलसी ने कहा है—कलियुग केवल नाम अधारा।

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बाबा का उपदेश चल ही रहा था, तभी ऐसा लगा मानों फल्गु की सूखी रेत पर अचानक बाढ़ आ गई हो। हम दोनों घिर गए हैं। बाबा  मुस्कुरा रहे हैं और उनके सामने अठखेलियाँ करती पीले-भूरे फेनिल जलराशि पर एक बिशालकाय हंस तैर रहा है, जिसके एक पंख पर कपिल का सांख्य रखा हुआ है और दूसरे पंख पर पतञ्जलि का योग। फल्गु के उस पार चमकता सुनहरा अति मोहक एक महल भी दीख रहा है। मेरी ओर हाथ का इशारा करते हुए बाबा कह रहे हैं— जाओ, तुम्हारा वाहन आ गया है। निर्द्वन्द्व होकर सवार हो जाओ उसकी पीठ पर। और वह रहा तुम्हारी आकांक्षाओं का राजमहल।

 

क्षणभर में ही दृश्य बिलकुल बदल गया। पीले चोंच वाले हंस पर मैं खुद को बैठा हुआ पा रहा हूँ। हंस मुझे उड़ाए लिए जा रहा है ऊँचे आसमान में, सीधे पूरब दिशा की ओर।   

 

और फिर अगले ही क्षण मेरे सपनों का राजमहल धराशायी हो गया। सीताशापित फल्गु की रेत सूखी की सूखी पड़ी है और मैं वहीं औंधे मुँह पड़ा सिसक रहा हूँ। न जल है, न राजहंस और न बाबा उपद्रवीनाथजी ही।

पीछे पलट कर देखा तो कुछ दूरी पर उदास मुँह लटकाए पत्नी खड़ी नजर आयी। आज सुबह ही बिना किसी को बतलाए, पत्नी के साथ हुए रात की नोकझोंक को विसराने के विचार से इधर निकल आया था।

 

वह उदास शायद इसलिए थी कि उसने मुझे व्यथित किया था कल रात। और मैं प्रसन्न चित्त इसलिए था कि उसकी महती कृपा रही मुझ पर, जो कि बाबा का दर्शन लाभ हुआ इसी बहाने।


अगली कड़ी की प्रतीक्षा करें>>>>>>>>>

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