Saturday, 13 December 2014

पुण्यार्कवास्तुमंजूषा-82

गतांश से आगे....

अध्याय १७.गृह-समीप-(क) वृक्षादि विचार भाग चार

वास्तुमंडल के पूर्वदिशा में न्यूनतम इक्कीश फीट की दूरी पर वट का वृक्ष हो,जिसकी छाया और डालियाँ भवन को छू न रही हों;इसी भांति पश्चिम दिशा में अश्वत्थ(पीपल),उत्तर दिशा में प्लक्ष(पाकड़),और दक्षिण दिशा में उदुम्बर (गूलर) का वृक्ष हो(भले ही वह दूसरे की जमीन में क्यों न हो),किन्तु इस प्रकार चारों ओर से घिरा हुआ भवन एक अभेद्य दुर्ग की भाँति सुरक्षित होता है।जबकि इनका सामीप्य और स्थानिक परिवर्तन उतना ही घातक भी सिद्ध होता है।यानी पूर्ब में पीपल,पश्चिम में वट,उत्तर में गूलर और दक्षिण में पाकड़ बहुत ही अशुभ हैं। इनके अशुभत्व को दूर करने के लिए (यदि इनका काटना सम्भव न हो)ऊपर कहे गये दोष निवारक पौधों को बीच में लगा देना चाहिए। दोष निवारण के लिए एक और उत्तम उपाय है कि समय-समय पर उन वृक्षों के जड़ में जल डालें,और दही-चावल,दही-उड़द आदि का बलि भी दे दिया करें।यह उपचार बहुत ही लाभदायक होता है।नीचे के चित्र में वटादि चार वृक्षों की शुभस्थियाँ क्रमशः चारों दिशाओं के लिए दर्शायी गयी हैं-



क्रमशः.....

No comments:

Post a Comment