Sunday, 28 December 2014

पुण्यार्कवास्तुमंजूषा-90

गतांश से आगे...अध्याय अठारह भाग पांच

(B)हवेली-महल का ही एक रुप है हवेली,जिसका प्रचलन खासकर मुगलकाल में हुआ।इनमें उपयोगिता और कलाकृति को भले ही ध्यान में रखा गया,किन्तु विचार और ज्ञान के अन्तर के कारण वास्तुनियमों की अवहेलना की गयी,या कहें – सम्यक् रुप से पालन नहीं किया गया।बाद में शनैः-शनैः भारतीय सभ्यता और नियमों को अंगीकार भी किया जाने लगा।मुस्लिम दार्शनिक अलबेरुनी जब वगदाद से भारत आया, तो यहाँ का वास्तुकौशल देखकर दंग रह गया।आमजन से लेकर पुराने राजमहलों के प्राचीर उसे विवश करने लगे - भारतीय वास्तुशास्त्र का अध्ययन हेतु।

(C) बैंग्लो और फ्लैट्स- ये दोनों अंग्रेजी के शब्द हैं,और इनकी रुपरेखा भी अंग्रेजों की ही देन है।वास्तुनियमों की धज्जियाँ उड़ाते हुए इनका निर्माण किया गया- सबसे पहले ब्रह्मस्थान(आंगन)के औचित्य को नकारते हुए,आंगन-विहीन वास्तु संरचना का जन्म हुआ।तत्वों की मर्यादा का भी घोर उलंघन हुआ। सामुदायिक या व्यक्तिगत(एकल) रुप से भी इसका निर्माण किया जाने लगा।तत् कालीन राजसेवकों के लिए छोटे-बड़े बैंग्लो और फ्लैट्स बनाये जाने लगे,जिनके इर्द-गिर्द बाटिका,जलयन्त्र,शालायें आदि तो होती हैं,भले ही वास्तुनिमय के विपरीत(आवश्यकता और स्थिति के अनुरुप)हों।आजकल ज्यादातर ऐसे ही आवास बनाये जा रहे हैं,और लोगों को भा भी रहे हैं।


क्रमशः...

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