भूरे
कुत्तों की बढ़ती खुराक
वटेसरकाका घर पर अकेले थे।
काकी मैके गयी हुयी थी। आहट टटोलता मैं सीधे रसोईघर में पहुँचा तो देखा— छोटी सी
कठौतिया में ढेर सारा आटा लिए, पद्मासनमुद्रा में, पसीने से तर-बतर, जमीन पर बैठे
काका, दोनों हाथों से आटा गूँथ रहे हैं। बीच-बीच में पानी का छींटा मार रहे थे और
किसी अज्ञात-अदृश्य पर धीरे-धीरे झल्ला भी रहे थे। प्रथमदृष्ट्या कोई यही समझता कि
आटे पर किसी बात का गुस्सा निकाल रहे हों। किसी और का गुस्सा किसी और पर निकालना—सहज
मानव स्वभाव है। एक शक्तिशाली देश के राष्ट्रपतिभवन के ऐन प्रवेश द्वार पर एक
कुख्यात आतंकवादी की विशालकाय तस्वीर बनायी गयी थी, इस उद्देश्य से कि आने-जाने वाले
लोगों के पैरों तले कुचला जाए। आधुनिक मनोविज्ञान इस बात की पुष्टि करता है कि इस
विधि से क्रोध-आक्रोश की मनोग्रन्थि को विसर्जित किया जा सकता है। हालाँकि हमारे
भारतीय मनीषियों के मानसशास्त्र में ऐसी बात नहीं कही गयी है। चुँकि दुनिया
पश्चिमी हवा के हिसाब से अधिक चल रही है, इसलिए हो सकता है, काका भी इस विधा या विधि के हिमायती हों। अतः
कुछ पूछना-कहना अनुचित लगा। जबकि मैं ये भलीभाँति जानता हूँ कि कुछ न पूछना-कहना
काका के लिए बहुत ही नागवार गुजरता है।
मेरी ओर देखे बिना ही काका
उचरने लगे— “अच्छा हुआ तुम आ गए। आओ, बैठो। रोटियाँ सेंकने में मेरी मदद करो। और हाँ,
ध्यान रखना—लोईयाँ हिसाब से काटना। ऐसा न कि सभी लोईयाँ एक बराबर हो।”
मैंने देखा, रसोईघर के एक
कोने में रात की कुछ रोटियाँ पड़ी हुयी हैं—बिलकुल अलग-अलग आकारों वाली, अलग-अलग
नक्शे वाली, मोटी-मोटी, कच्ची, कुछ जली-अधजली रोटियाँ। एक अलेके आदमी की इतनी
बुतात
! मैं मन ही मन विचारा ।
मेरी नजरों की गुस्ताखी और
मनोभावों पर ताड़ते हुये काका कहने लगे — “ दुनिया में
कुत्तों की कई जमातें हैं—काले कुत्ते, सफेद कुत्ते, भूरे कुत्ते, छींटदार कुत्ते,
शेरोदिल कुत्ते, सियार मार्का कुत्ते, दुम हिलाते कुत्ते, दुम सटकाए कुत्ते...।
कुत्तों की दुनिया इनसानों की आम दुनिया के समानान्तर होते हुए भी जरा अलग-थलग सी
है। राज की बात ये है कि रंग-भेद होते हुए, आपसी तालमेल इन जमातों में आम आदमी की
तुलना में अधिक है। ये बात अलग है कि कभी काला, कभी सफेद तो कभी भूरा या छींटदार
हावी होते रहता है एक दूसरे पर। काले-सफेद खुद को ओवर इन्टेलिजेन्ट और पावरफुल
समझते हैं, तो भूरे वाले अपने अन्दाज में देश-दुनिया को हैंडिल करते हैं। ये
अलग-अलग क्वायलिटी की रोटियाँ जो देख रहे हो न, उसी हिसाब से बनायी है मैंने। कुछ
को जली रोटी पसन्द है, कुछ को अधजली, अधसिंकी। कुछ को मोटी रोटी ही चाहिए, कुछ का
काम पतली से चल जाता है। कुछ का काम सादी रोटी से भी चल जाता है, तो कुछ को वगैर
मक्खन चुपड़े हलक से नीचे उतरता ही नहीं। ओवरस्मार्ट कुत्ते तो इण्डियन स्टाइल
वाली रोटियाँ सूँघते भी नहीं। उन्हें ब्रांडेड ब्रेड-विस्कुट चाहिए। जैसे कुछ लोग हिन्दी
की जगह अंग्रेजी में ही बोलते हैं और रुपयों की जगह डॉलर में बात करते हैं।”
काका की बातें मेरे सिर से
ऊपर-ऊपर निकली जा रही थी। कुत्तों की जमात और रसोई में रोटियों की विसात वाली
बातें और हालातें मेरी समझ से परे थी। अतः पूछना पड़ा—कुत्तों के हिसाब से रोटियाँ—मैं
कुछ समझा नहीं।
काका झल्लाये— “तुम भला क्यों समझोगे। पकी-पकायी रोटियाँ मिल जाती हैं बाबूजी के होटल में,
ऐसे में रोटियों के आकार-प्रकार से तुम्हें क्या मतलब ! जरा
बाहर की दुनिया में निकलकर देखो, तब पता चले रोटियों का मोल। बाढ़, अकाल, महामारी
आदि की स्थिति हो या परिस्थिति कुछ लोग आश लगाये इन्तजार करते रहते हैं ऐसे दिनों
की। एक नेताजी की बीबी पूरे साल भर तक पड़ोसी नेता से गलबहियाँ लगाये रही, क्योंकि
अपने वाले नेताजी ने बाढ़ राहत वाली हेलीकॉप्टर से बीबी को बाढ़ का नजारा नहीं
दिखाया और दूसरे वाले ने बाढ़ के बहाने पूरा प्रान्त ही घुमा दिया। अगली बाढ़ में
घुमाने का शपथपत्र दिये जाने पर ही किसी तरह सुलह हुयी बेचारे की। तुम जरा सोचो न,
कर्मठ-ईमानदार नेता भला अपनी बीबी को लेकर आपदा-प्रबन्धन वाले हेलीकॉप्टर में बिठा
कर घुमाये तो कैसे, सत्ताहीन दल वाले तो सदा ऐसे ही मौके की तलाश में रहते हैं। सत्तासीन
रहते भर में ईमानदारी और जनसेवा का रत्तीभर भी ध्यान नहीं रहता। सारा ध्यान टिका
रहता है सिर्फ कुर्सी का, किन्तु सत्ता फिसलते ही साक्षात धर्मावतार बन जाते हैं। अब
बांध की मिट्टी बह जाए प्रचंड धार में, तो इसमें भला किसी ईंजीनियर या ठेकेदार की
क्या गलती है? बेचारे कर्मठ नगरनिगम वालों को देखो, नौ महीने
इत्मिनान से रहते हैं और ज्यों ही मौसम विभाग मानसून के दस्तक की खबर सुनाता है, लग
जाते हैं नालियों की सफाई में। हफ्तों नाली का कीच सड़क की शोभा बढ़ाती है। आधे से
अधिक तो लोग जूते-चप्पलों में चुरा कर, अपने घर-आँगन की शोभा बढ़ाते हैं, बाकी के
रहे-सहे, फिर से पानी की धार में उन्हीं नालियों में जा मिलती है—जैसे आत्मा
परमात्मा से मिलती है। ”
मुझसे रहा न गया। बीच में ही
बोलना पड़ा—किन्तु काका! अभी तो आप कुत्तों के लिए
रोटियों की साईज बता रहे थे और बात करने लगे सड़क की कीच-कादो की।
काका ने सिर हिलाते हुए कहा—
“साहित्य में अविधा, लक्षणा और व्यंजना तीन तरह का प्रयोग हुआ करता है
शब्दों का। अब तुम्हें समझाने के लिए तुम्हारी ही भाषा में बोलना पड़ेगा। अब देखो
न, कल की ही तो बात है—तुम्हारी काकी जिद्द पकड़ ली मैके जाने के लिए। मैंने लाख
समझाया कि अभी लॉकडाउन में बाहर निकलने की सख्त मनाही है। किन्तु उन्हें कौन
समझाये—मैके जाना बाहर जाने की सूची में आता ही नहीं। लाचार होकर किराये पर एक कार
लिया ससुराल यात्रा के लिए। सड़क पर गाड़ी दौड़ाने के लिए सरकार के कितने
नियम-कायदे हैं, कहीं नोटिशवोर्ड पर लिखे हुए तो मिलते नहीं और न हाईस्कूल के
सिलेबस में ही पढ़ाई जाती है। नियम-कानूनों की जानकारी के लिए हर कोई वकालत ही
पढ़े—ऐसा भी नियम मैंने नहीं सुना है। और सब नियम यदि जनता जान भी जाये तो क्या
फर्क पड़ना है, लाईसेन्स बनवाने के लिए भाग-दौड़ और पूजा-दक्षिणा का जो प्रावधान
है अपने यहाँ, उसे भला कौन रोक सकता है। ये नियम-कानून का पेंच इसलिये रखा गया है,
ताकि सरकारी सेवकों का सदा भला होता रहे। खैर, लगता है मैं फिर विषयान्तरित हो रहा
हूँ। हुआ यूँ कि जैसे ही ससुराल की सीमा में दाखिल हुआ, तीन-चार भूरे कुत्ते
भों-भों करते हुए मेरी गाड़ी की ओर लपके। तुम तो जानते ही हो कि तुम्हारी काकी को
कुत्तों से बहुत ही डर लगता है, खासकर भूरे कुत्तों से, क्योंकि ये बहुत सख्त होते
है अपनी जुबान के। उन तीनों ने मुझे सड़क किनारे बने एक रेवटी में जाने को मजबूर
किया और एक वहीं खड़ा दूसरे ग्राहक का इन्तजार करता रहा। अन्दर जाने पर मैंने देखा—
एक और वैसा ही भूरा कुत्ता, किन्तु डीलडौल में बहुत ओहदेदार सा जम कर आसन डटाये है
और उसके ईर्द-गिर्द मेरे जैसे और भी लोग हाथ जोड़े अपना दुखड़ा सुना रहे हैं। किन्तु
बीतरागी सा वो ओहदेदार कुत्ता किसी की बात पर ध्यान न देकर, सीधे अपनी दुम से
ईशारा करता—और अन्दर जाने के लिए। दुम के ईशारे पर मैं भी भीतर गया, रेवटी से
थोड़ा हट कर एक टुटही स्टूल पर एक आदमी जैसा इन्सान बैठा हुआ था। मेरी ही तरह उसके
भी सारे अंग-प्रत्यंग थे, किन्तु जुबान कुछ अजीब भोथरी थी। शायद मुंह में
गुटका-तिरंगा ठूसे हुए था और हाथ में पकड़े नोटों का बंडल लहरा रहा था। उसकी
भाव-भाषा का अनुकरण करते हुए पहले से आए हुए लोग अपनी चिरोरी के साथ यथेच्छा अपनी
जेबें भी ढीला करते जा रहे थे। संयोग से वो मुझे अच्छी तरह पहचानता था। मेरी
कड़कभरी आवाज पर सकपकाते हुए बोला—कक्कू ! क्या करुँ, सरकारी
ताबेदार हूँ। ऊपर-नीचे सब देखना पड़ता है। ऊपर का ही ऑडर है, रोज का टार्गेट नहीं
पूरा करुँ तो तुरत कालापानी हो जाए। और बेचारा वो ऊपर वाला भी क्या करे, उससे भी
ऊपर वाला वो सफेद झबरा जो है, और भी घाघ है। सारा टार्गेट वही लीड करता है। हम सब
तो सरकारी मुलाज़िम ठहरे। किसी तरह जीते-खाते हैं। ”
काका की बात अब कहीं घुसी
मेरे ज़ेहन में—कुत्तों की बढ़ती खुराक पर ही मनोवैज्ञानिक रिसर्स का प्रयोग कर
रहे थे वटेसरकाका। चाहें तो आप भी ऐसा प्रयोग करके देखें, मन हल्का हो जायेगा।
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