अधूरी मूर्ति :: पूरी
कहानी
आषाढ़ शुक्लपक्ष द्वितीया तिथि को रथयात्रा पर्व बड़े धूमधाम से मनाया जाता है। यूँ तो पूरे भारत में इस पर्व का कमोवेश प्रचलन है, किन्तु उत्कलप्रान्त के पुरी नगर में सर्वाधिक भव्य आयोजन होता है। ये वही पुरी है, जिसे बुद्धकाल में सनातनधर्म की डगमगाती नैया को आद्य शंकराचार्य महानुभाव ने बड़े यत्न और कौशल पूर्वक सम्भाला था—पञ्च देवोपासना पर बल देते हुए, चारों दिशाओं में चार धामों की स्थापना करके। उन चार धामों में एक— पूर्वोदधि तट पर बसा ‘ जगन्नाथपुरी ’ धर्म, अध्यात्म, इतिहास, स्थापत्य आदि के महत्त्व को ईंगित करते हुए, तन्त्र-योग की ‘भित्ति’ निर्माण करने में भी सहायक है।
मानव-जीवन-यात्रा के ‘औचित्य और इति’ का सरल संकेत है— रथयात्रा। सहज रुप से सांख्य के चौबीसवें तत्त्व—‘प्रकृति’ से पार जाने की रहस्यमय विधि का ईंगन
है—रथयात्रा पर्व। मोक्षमार्ग की सर्वाधिक
बलिष्ठ बाधा— ‘अहं’ के विसर्जन
का अद्भुत लोकपर्व है— रथयात्रा ।
रथ-रथी-सारथी और मार्ग की रोचक
चर्चा है कठोपनिषद् प्रथम अध्याय, प्रथम वल्ली में—
आत्मानं
रथिनं विद्धि शरीरं रथमेव तु ।
बुद्धिं
तु सारथिं विद्धि मनः प्रग्रहमेव च ।।
इन्द्रियाणि
हयानाहुर्विषयांस्तेषु गोचरान् ।
आत्मेन्द्रियमनोयुक्तं
भोक्तेत्याहुर्मनीषिणः।।
स्वार्थ-बहुल जीवन रथ को
कैसे खीचें कि परमार्थ लब्ध हो—इन्हीं बातों का संकेत है रथयात्रा पर्व में। रथयात्रा
में १६,
१४
और १२
पहियों का तीन रथ प्रयुक्त होता है। ये तीन क्रमशः मन, बुद्धि और अहंकार के प्रतीक
कहे गए हैं। आगे-आगे चलने वाले बलराम के रथ में चौदह चक्र हैं। मध्य में सुभद्रा रथ
बारह चक्रों वाला है और अन्त में गत्यमान श्रीकृष्ण रथ सोलह चक्रों वाला।
पुराण की कथा-शैली बड़ी
अद्भुत होती है। रथयात्रा की पौराणिक कथा भी वैसी ही है।
श्रीकृष्ण तो राधे बिन आधे
हैं, सखा बिन सूखे हैं। किन्तु बड़ी विचित्र बात है कि जगन्नाथपुरी मन्दिर में जो
प्रतिमा स्थापित है वो राधा-कृष्ण की न हो कर, श्रीकृष्ण, वलराम और बहन सुभद्रा की
है। ये वही सुभद्रा है, जिसे अर्जुन द्वारा अपहृत कराकर, द्रौपदी की सौत बनवा दिया
था कृष्ण ने।
इसी सुभद्रा को एक बार
द्वारका भ्रमण की इच्छा जगी। भ्रमण में दाऊ की भी सहभागिता रही। यही त्रिमूर्ति
स्थापित हैं यहाँ। रोचक बात ये है कि स्थापित मूर्तियाँ सामान्य मूर्तियों की तरह
श्वेत वा श्याम शिलाखण्डों से निर्मित न होकर, काष्ठमूर्ति है। प्रत्येक बारह
वर्षों पर मूर्ति का जीर्णोद्धार होता है—एक खास नीमकाष्ठ से। निर्माण की विधि भी
बड़ी विचित्र है। क्यों कि मूर्तिरहस्य ही विचित्र है।
विदित है कि यदुवंशियों का
नाश महर्षि दुर्वासा के श्रापवश हुआ था। मानव शरीरधारी कृष्ण इससे बचे कैसे रह
सकते थे ! जरा नाम धारी व्याध के वाण में वही, दुर्वासा-शापित लौहदण्ड का अंश था, जिसने
अनजाने में कृष्ण के तलवे का भेदन किया। अपार्थिव श्रीकृष्ण के पार्थिव शरीर का
अग्नि-संस्कार अर्जुनादि स्वजनों द्वारा किया गया। सारा शरीर तो भस्मीभूत हो गया, किन्तु
हृदयस्थल को अग्नि आत्मसात नहीं कर पाया। निराश स्वजनों ने उसे समुद्र में
प्रवाहित कर दिया। कालान्तर में वह ‘नीलमाधव’ नाम के एक अद्भुत मूर्ति के रुप में ख्यात हुआ। भक्तों ने उस मूर्ति को
एक गुप्त गुफा में स्थापित कर दिया। तत्कालीन राजा इन्द्रद्युम्न को बड़ी विकलता
हुयी उस मूर्ति के दर्शन के लिए, किन्तु बहुत उद्योग के पश्चात् भी निराशा ही हाथ
लगी। स्थान पर पहुँच कर भी मूर्ति का दर्शन नहीं हो पाया।
राजा को स्वप्न संकेत हुआ कि
समुद्र किनारे उन्हें एक काष्ठ-खण्ड प्राप्त होगा। उसकी ही प्रतिमा बनवाकर स्थापित
करायें। स्वप्नादेश का इन्द्रद्युम्न ने अनुशरण किया। काष्ठ-खण्ड तो प्राप्त हो
गया, किन्तु मूर्ति-निर्माण हेतु योग्य शिल्पी न मिल पा रहा था। चिन्तानिमग्न राजा
को एक दिन एक अति क्षीणकाय वृद्ध व्यक्ति मिला, जिसने उक्त काष्ठ से मूर्ति निर्माण
की सशर्त स्वीकृति दी। शर्त ये था कि मूर्ति-निर्माण-कार्य वो एकान्त बन्द कमरे
में करेगा और जब तक मूर्ति पूर्ण रुप से तैयार न हो जाए, तब तक कमरा खोला न जाए।
विचित्र कारीगर के विचित्र
शर्तों के साथ मूर्ति-निर्माण-कार्य प्रारम्भ हुआ। कई दिन व्यतीत हो जाने पर राजा
को नयी चिन्ता सताने लगी— साधन-विहीन बन्द कमरे में बूढ़ा कारीगर कहीं मर न गया
हो।
शर्त विरुद्ध द्वार खोलकर,
राजा ने कक्ष में प्रवेश किया। उनकी आँखें चौंधिया गयी—साक्षात देवशिल्पी
विश्वकर्मा का दर्शन कर। आँखें खुली तो शिल्पी अदृश्य थे। दृश्य था तो सिर्फ— भूतल
पर पड़ी तीन काष्ठ मूर्तियाँ, वो भी अपूर्ण अवस्था में । राजा के पश्चाताप का
ठिकाना न रहा। पल भर में ही उन्हें सारा रहस्य भासित हो गया। दुःखी-उद्विग्न राजा
इन्द्रद्युम्न को पुनः स्वप्न-संकेत मिला—इन्हीं मूर्तियों को यथास्थान स्थापित
करा दो।
कृष्ण, बलराम और सुभद्रा की
ये ही आधी-अधूरी मूर्तियाँ आज भी रथयात्रा समारोह में झांकी के लिए प्रस्तुत होती हैं।
संशय और अहं ने पूर्ण नहीं
होने दिया मूर्तियों को। संशय रहित होकर अहं के विसर्जन की सीख देती है ये अधूरी
मूर्तियाँ। वैसे भी परब्रह्म परमात्मा के सिवा जगत् में कोई पूर्ण कैसे हो सकता है—भगवान
जगन्नाथ की यही सीख है हम मनुष्यों के लिए। अस्तु।।
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