नज़र-नज़ारा-नाज़ीर
वटेसरकाका
आज का ताज़ा ख़बर पढ़ रहे थे, जब मैं उनके यहाँ दाखिल हुआ। सुबह की चाय या तो काका
मेरे यहाँ लेते हैं या मैं काका के यहाँ—ऐसा लगभग समझौता जैसा चले आ रहा है पिछले
कई वर्षों से, जो
शायद ही कभी बाधित हुआ हो।
अनुभवी
लोग कहा करते हैं कि चाय और ख़बर का चोली-दामन वाला सम्बन्ध है। हालाँकि ये बात आज
तक समझ नहीं पाया। चाय का सम्बन्ध न तो चोली से है और न खबर से, किन्तु विदेशी
चतुर अखबार नवीशों ने शायद ये जुमला चला दिया है। हमारे यहाँ की तो ये परम्परा कभी
हो ही नहीं सकती। नयी पीढ़ी वाले भले ही भुला दिए हों, किन्तु हमें तो बखूबी याद
है कि दादाजी ब्रह्ममुहूर्त में जगते थे—रामधुन के साथ और पहर भर दिन चढ़ने तक
नित्यक्रिया—संध्यावन्दन आदि में व्यतीत हो जाता था। सभी वर्णों के अपने-अपने
नित्यकर्म होते हैं , जिसका बड़ी सख्ती और ईमानदारी से लोग पालन किया करते थे।
झूठी-सच्ची, मीठी-कड़वी ख़बरों से मन मैला करने का वक्त ही कहाँ था किसी के पास
! किन्तु अब तो टी.वी.,अखबार, फेशबुक, वाट्सऐप न
हो तो माईग्रेन या कि ब्रेनट्यूमर होने की आशंका रहती है ज्यादातर लोगों को। दिन
की शुरुआत से लेकर रात की समाप्ति तक सब इन्हीं वाहियात स्रोतों पर टिका होता है।
ऊल-जुलूल ख़बरें जुटावो और फिर उन ख़बरों के विश्लेषण में सारा समय गंवा दो—यही आधुनिक
दिनचर्या है। ख़बरों से अपडेट नहीं रहते, तो समझो बिलकुल बैक-टू-डेट हो यानी की
बैकवर्ड हो। हालाँकि ‘बैकवर्ड’ शब्द का राजनीतिक रजिस्टर में कुछ और ही अर्थ
सुझाया गया है।
मेरी
उपस्थिति पर काका जरा मुस्कुराए और फिर मगधएडीशन के पन्नों में समा गए।
शायद कोई खास ख़बर होगी, अन्यथा काका की तो ऐसी लत नहीं है कि कोई पास बैठा हो और
काका कहीं और खोए हों, जैसा कि आजकल लोगों की आदत होती है—लोग जाते हैं कहीं किसी
से मिलने-जुलने, किन्तु गौर करें तो पायेंगे कि उनका ज्यादा वक्त ऍनरॉयड स्क्रीन
पर ही गुज़र जाता है। औपचारिक बात शुरु भी करते हैं तो मुंह में ही अटका रह जाता
है, क्योंकि अजीबोगरीब रिंगटोन ध्यान खींच ले जाता है। हर दो मिनट पर नयी धुन वाला
ग्रूपवाइजड सेटिंग रिंगटोन—सुनने वाले का भी कान पका देते हैं।
मुझे
टोकना पड़ा—क्या बात है काका! ख़बर कुछ खास है क्या?
काका
ने सिर हिलाते हुए कहा— “ख़बरें खास न हों तो ख़बर बने कैसे? खास और ख़बर- दोनों की एक राशि है ज्योतिष के
अनुसार। हालाँकि खबर को खास बना देना या कि ठंढे वस्ते में डाल देना ‘खबरिया’ पर निर्भर करता है और खबरिया का सीधा सम्बन्ध
हवा की रुख से है। सभी खबरिये खुद को तटस्थ और पेशे के प्रति निष्ठावान बताते हैं,
किन्तु ये निष्ठा और तटस्थता शब्द भी अंगराज कर्ण वाला तो रह नहीं गया है अब। सीधी
सी बात है—जहाँ अपना कल्याण न हो वहाँ दूसरे के कल्याण की बात ही बेमानी है। अब
देखो न—आज की ही खबर है—कल्याणविभाग में करोड़ों का घोटाला हुआ है। जरा सोचो तो ये
भी कोई खबर हुयी !
सरकारी विभागों में घोटाला नहीं तो और क्या होगा सहस्रकुण्डीय गायत्री महायज्ञ? आपदाप्रबन्धन हो या जनकल्याण,
शिक्षा हो या स्वास्थ्य...। सोचने वाली बात है
कि खुद का ही कल्याण न किया जिसने, स्वयं के स्वास्थ्य का ही ध्यान रखा जिसने,
अपनी आपदा का ही प्रबन्धन न कर पाया, तो फिर बाकी का क्या ! पुरानी कहावत है—घर में दीए जलाने के बाद ही
मन्दिर में आरती दिखाना बुद्धिमानी है। घर में ही अन्धेरा रहा,
ऐसे में मन्दिर का उजाला किस काम का! अरबी का एक शब्द है नज़ीर, इसी से बनता है
नाज़ीर। नज़ीर और नाज़ीर का सीधा सम्बन्ध है नज़रों से। नज़रों से ही नज़ारों का
भी वास्ता है। निगाहें सलामत हों ही नहीं जिसकी, वो भला नज़ारों का ज़ायका क्या ले
पायेगा!
नज़रों और नज़ारों के इसी तर्ज पर एक सरकारी पद
है—नाज़ीर—सरकारी फाइलों का खुशनुमा नज़ारा चारों ओर पसरा हो जिसके—वही नाज़ीर
कहलाता है। इसका सीधा अर्थ होता है—देखरेख करने वाला। पुराने जमाने में रजवाड़ों
के अन्तःपुर में नपुंसकों को नाज़िर के रुप में नियुक्त किया जाता था, ताकि रनिवास
का सही देखरेख और सुरक्षा हो। किसी तरह का खतरा न हो, जैसा कि आजकल प्रायः देखा
जाता है—मांझी ही नाव डुबोने लगता है। नपुंसकों नाज़िरों से रानियों के अस्मत को
खतरा नहीं था, किन्तु सरकारी नाज़िरों से फाइलों या कि फाइलों से सम्बन्धित बातों
को कोई खतरा न हो, इस बात की भला कैसे गारंटी दी जा सकती है? सरकारी नाज़िर न तो नपुंसक है और न बे नज़र। अब
तुम ही जरा सोचो—नज़रें हों कामयाब, नज़ारें दिखेंगी ही फाइलों के अन्दर-बाहर की।
ऐसे में कोई ‘एलीयन’ तो है नहीं नाज़िरबाबू। वो भी हमारी-तुम्हारी
तरह हाड़-मांस वाला जीता-जागता इन्सान है। उसके भी बीबी-बच्चे हैं। ऐसा भी हो सकता
है कि कुछ लाखों में खेलकर इस गुदगुदी कुर्सी को हासिल किया हो। इन सब बातों और
हालातों में कोई छोटा-बड़ा घोटाला हो ही जाए तो कौन कहें कि एवरेस्ट की चोटी टूट
गयी, जो इतना हायतौबा मचा है! और आज के जमाने में करोड़-अरब की मुराद की ही कितनी
है! और ऐसी बात भी नहीं है कि सरकारी खज़ाने के
रंगीन नज़ारों पर सिर्फ उसकी अकेली नज़र ही फिसली हों और वही एक मात्र अकेला
गुनाहगार है नज़रों की गुस्ताखी वाला। और सबसे बड़ी बात तो ये है कि नज़रों और
नज़ारों का तोहमत सिर्फ नाज़ीर पर ही क्यों? आँखों की गुस्ताखी की सजा पूरे शरीर को मिलती
है न !
ज़ाहिर है कि शरीर में कई अंग-प्रत्यंग हुआ
करते हैं। हाँ, एक बात तो मैं कहना ही भूल गया—नाज़ीर का एक नया सा अर्थ ये भी
होता है—आईकॉन । हमारे नाज़ीरबाबू नये आईकॉन बने—डिजिटल इण्डिया के। चमकते आईकॉन
को देखकर भला किसके मुंह से लार नहीं टपकेगी! ”
![]() |
Comments
Post a Comment