श्रीश्री फ्रॉडाचार्चजी

 

              श्रीश्री फ्रॉडाचार्चजी


जैसा कि आप जानते ही हैं कि हमारे यहाँ धूर्त, मक्कार, फ़रेबी की बिलकुल किल्लत नहीं है। इनके लिए इम्पोर्ड ड्यूटी की फिज़ूलखर्ची  भी नहीं करनी पड़ती, क्योंकि अपने यहाँ ही प्रोडक्शन भरपूर है। इनकी  बेरोजगारी की भी चिन्ता नहीं है, क्योंकि ज्यादातर बहालियाँ संसद-परिषद में ही हो जाती हैं। उससे बचे-खुचे काबिल थोड़े निचले स्तर पर गुँजायश बना लेते हैं—निगमों, पंचायतों में। वो भी नहीं, तो सरकारी-गैरसरकारी योजनाओं की दलाली के धन्धे से भला कौन रोक सकता है ऐसे काबिल लोगों को !

श्रीश्री फ्रॉडाचार्चजी से सोढ़नदासजी की मुलाकात लगभग सत्तर के दशक में स्वनामधन्य झूठेश्वरनाथजी ने करायी थी, जब वे ब्राण्डन्यू कॉलेजिया रंगरूट थे। हाल में ही ग्रैजूयेशन की डिग्री मिली थी और लगे हाथ ही वैवाहिक बन्धन में बाँधकर दुनियादारी की मंझधार में ऊबजूब होने के लिए जबरन छोड़ दिए गए थे अभिभावकों द्वारा।

चुँकि उन दिनों पहले कैरियर बनाओ, फिर जोड़ी बनाओ वाली बीमारी इक्कशवीं सदी की तरह वायरल नहीं हुई थी युवाओं के बीच, फिर भी चुपके से माँ को तो संकेत दे ही दिए थे—शादी न करने की, किन्तु माँ ने पिता तक संवाद पहुँचाने में सिर्फ देर ही नहीं किया, बल्कि सचिवालय के बाबुओं की तरह पूरी फाइल ही डम्प कर दी, नतीजन स्नातक की डिग्री और जमींदार घराने की बहू—दोनों का एक ही साथ गृहप्रवेश हुआ। और इतना ही नहीं, तिलक से चौठारी तक वाले पुराने अन्दाज में शादी समारोह में पन्दरहिअन से पधारे मामा, मौसा, मामी, मौसी, फूफा, फूआ आदि की विदाई के साथ ही फ्रेशर ग्रैजुएट वेटे को भी वार्निंग मिल गई पिता की ओर से — बहुत हो गया, अब नहीं चलेगा घर का आटा गीला करना। अब तो एक से दो हो गए। जाओ, कोई नौकरी ढूँढो, ताकि मियाँ-बीबी के साथ माता-पिता, दादा-दादी का भी शौक-सपना पूरा हो सके। बाबूजी के होटल का दाल-भात कब तक चपोरते रहोगे...!”  

बेचारे सोढ़नदासजी अभी नयी-नवेली पत्नी का जी भरकर मुँह भी नहीं देख पाए थे ढिबरी-लालटेन की पीली रौशनी में कि पिता के डिस्चार्ज  कम  ट्रान्सफर  ऑर्डर का ऑडियो वर्जन माँ के मार्फ़त कानों में घुसा तो मानों पाँव तले की ज़मीन ही घिसक गई।  माँ से किसी तरह के जीफ-ज़िरह किए बिना ही समझ गए सोढ़नदासजी कि कालापानी की सजा सुना दी गई है, जिसकी आगे की अदालतों में अपील भी कहीं नहीं हो सकती।

फलतः मनमसोस कर चौठारी के चौथे ही दिन झोला उठाकर पटना निकल गए बेचारे सोढ़नदासजी। पत्नी तो दूसरे ही दिन बिदा हो गई थी, नौ महीने बाद अगहन में गवना के करार पर । 

पटना चुँकि तीन-चार साल की परिचित नगरी थी। कई कॉलेजिया संगी-साथी भी थे वहाँ। कुछ फोपटलालों और ऑफिसियल  दलालों से  भी सम्पर्क था ही, जिनके सौजन्य से कहीं न कहीं कुछ न कुछ छोटा-मोटा जुगाड़ हो ही जायेगा—इस बात का पक्का यक़ीन था उन्हें।

किन्तु पन्द्रह दिनों के भटकाव के बावजूद मनमाफिक काम और धाम (रहने का ठौर) का जुगत न हो सका तो मन मारकर शहर के एक जानेमाने टिम्बर फैक्ट्री में मात्र ढाई सौ रुपए की बाबूगिरी सम्भाल लिए, जहाँ लकड़ियों के नाप-जोख-देख-रेख के अलावे असली और नकली दोनों तरह के बही-खातों का खानापुरी भी करनी थी, क्योंकि फैक्ट्री मालिक को पता था कि पाठ्यक्रम में एकाउन्टेंसी और ऑडिटिंग ही प्रिय विषय रहा है सोढ़नदासजी का। इस ज़ोख़िम भरे काम के एवज़ में उन्हें वहीं कैम्पस में ही गुजारा करने लायक एक कमरा भी रिवार्ड में मिल गया, ताकि रात के वाचमैन का मुशहारा भी बच जाये मालिक का।

हालाँकि नियमतः दो-ढाईसौ रुपए भी समय पर मिलते जाए, तो आगे का सहारा सुदृढ़ करने और कम्पीटीशन  की तैयारी करने में विशेष कठिनाई नहीं होगी। इतना बिश्वास था ही कि बाबूजी ने घर बैठकर दाल-भात चपोरने की मनाही की है सिर्फ, घर की खेती वाला दाल-चावल यहाँ लाकर खुद से राँध-रूँधकर गुजारा करने की मनाही तो की नहीं है।  

किन्तु शनिचरा जब सवार होते हैं सिर पर, तब हाथी पर बैठे आदमी को भी कुत्ता भँभोर देता है। आग में भूँनी हुई मछली भी तड़प कर तालाब में गोता लगा जाती है। सोढ़नदासजी के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ। महीना लगने से पहले ही अनाड़ी हाथों से लकड़ियों के नाप-जोख करते, एकलव्य की तरह दाहिने हाथ का अँगूठा गँवा बैठे और मालिक के डाँट-फटकार के साथ आधे महीने की तनख़्वाह लेकर बैरंग वापस जाने को मज़बूर हुए।

दुःख और निराशा के बोझिल क्षणों में नवोढ़ा पत्नी की याद सताने लगी। फलतः गवने के रस्म का इन्तज़ार किए वगैर, गाँव जाने के वजाय ससुरपुर की वस में सवार हो गए।

 सप्ताह भर के ससुराली प्रवास के बाद झूठेश्वरनाथजी का असामयिक आगमन हुआ, जो सौभाग्य या कहें दुर्भाग्यवश अब मझले वाले साढ़ू की भूमिका में थे। जोड़-तोड़ लगाकर इन्हीं की चापलूशी से जल्दबाजी में शादी भी निपटायी गई थी। सिर्फ नये बने साढ़ू ही नहीं, पुराने रिस्तेदार होने के नाते पारिवारिक तनाव और बेरोजगारी के दंश की बात जान-सुन कर उन्होंने भरपूर सहानुभूति जतायी और अगले ही दिन साथ लेकर चल दिए पटना के बजाय प्रेतनगरी, जिसे श्रद्धालु लोग गयाधाम के नाम में पुकारने की प्रेरणा दे रहे हैं आजकल।

यात्रा के लगभग पाँच-छः घंटे अपने अभिन्न मित्र की यशोगाथा में गुज़ार दिए साढूभाई — ...मैं आपको एक ऐसे शरीफ इन्सान से मिलवाने जा रहा हूँ जो बेरोज़गारों की व्यथा को तत्क्षण सिर्फ सुनता ही नहीं, बल्कि महशूस करता है और तत्काल अनुकूल व्यवस्था भी जुटा देता है...।

अगले ही दिन झूठेश्वरनाथजी के महाशरीफ दोस्त जिन्हें लोग  फ्रॉडाचार्यजी के नाम से जानते हैं, सोढ़नदासजी की मुलाकात हुई और बिना विशेष छान-बीन-पूछ-पाछ के ही, सीधे उन्हीं के आवासीय कार्यालय में मैनेजमेंट का कार्यभार मिल गया। इतना ही नहीं, रहने-खाने की समस्या भी हल हो गई उनकी बंगालन बीबी की कृपा से।

किसी को जिज्ञासा हो सकती है श्रीश्री फ्रॉडाचार्य के असली नाम के बारे में। किन्तु बुद्धिमानों का मानना है कि  नाम में क्या रखा है?’ अतः असली नाम की चिन्ता किसी को नहीं करनी चाहिए। रही बात काम की। तो काम-धाम का असली अन्दाजा तो धीरे-धीरे ही लगेगा न ।

सोढ़नदासजी को जानने वाले लोग भलीभाँति जानते हैं कि उनका सबसे बड़ा शत्रु उनकी तीक्ष्ण बुद्धि ही है। काश ! वे इतना तेज-तरार न हुए होते, सोच-विचार, सत्य-असत्य, लोक-परलोक, धर्म-अधर्म, पाप-पुण्य की परवाह करने वाला क्रौनिक वैक्टीयरल डिजीज उन्हें न होता, तो सम्भवतः उनका जीवन बहुत ही ऐश-व-आराम से गुज़रा होता औरों की तरह। किन्तु ये भी सच है कि नेचर एंड सिंगनेचर कान्ट बी चेंज

महीना लगते-लगते सोढ़नदासजी को फ्रॉडाचार्यजी के असली नाम-धाम-काम सबका हिसाब मिल गया—कुछ-कुछ उनकी चाल-ढाल से और बाकी कुछ उनकी प्रियतमा से, जो उनकी अनुपस्थिति का मौका कभी नहीं चूकने देती थी। वैसे भी वे प्रायः बाहर ही रहते थे—शहर या कि शहर से भी बाहर। कहते थे कि कई राज्यों में कारबार है। स्टाफ पर हण्डरेड परशेंट भरोसा करने वाला जमाना नहीं है...।

फ्रॉडाचार्यजी ज्यूँही बाहर निकलते, उनकी बंगालन बीबी पल्लू सम्भालती ऑफिसरूम में आ धमकती चाय की दो खनखनाती प्यालियों के साथ—आओ, पहले चाय शिप करो, फिर फाइलों में नजरें गड़ाना...दिन भर फाइलें पलटते क्या कभी बीबी-बच्चों की याद नहीं आती...?”

कई रोज से एक ही सवाल सुनते ऊब सी हो गई । अतः एक दिन होठों पर जबरन मुस्कान लेप कर सोढ़नदासजी नजरें ऊपर उठाते हुए बोले— शादी तो अभी चन्द महीने पहले ही हुई है...बीबी को याद  करके दुःख और चिन्ता ही तो मोल लेना है...पहले उसके अरमानों पर खरा तो उतरूँ कुछ कमाने-धमाने लगूँ...।  

और फिर वो शुरु हो गई अपनी कथा-व्यथा लेकर। दरअसल कोई आदमी आपकी रामकहानी सुनने में उतनी दिलचश्पी नहीं रखता, जितना कि अपनी रामकहानी सुनाने की ललक होती है। खुद रीझा तो होता ही है इन्सान। सामने वाले को रिझाने की कोशिश करता है चाय की चुस्की के साथ स्नेह-सहानुभूति जता कर।

उसीकी जुबानी ये जानकारी मिली कि फ्रॉडाचार्य के ऑफिस का देश के करीब बारह-तेरह राज्यों में  व्राँच है और मज़ेदार बात ये है कि लगभग सभी राज्यों में बीबियाँ भी बना रखी हैं महाशय ने। बातों ही बातों में एक दिन वो बोली थी—“…अगर मेरी सूचनाएं सही हैं तो  मैं उनकी तेरहवीं प्रेमिका हूँ...। बुरा न मानों तो मैं तुम्हें सावधान करना चाहती हूँ कि लाख चुग्गा फेंके, तुम अपना परिवार यहाँ कभी भूल कर भी मत लाना । ये अपने को कामरूप का सिद्ध तान्त्रिक भी कहता है। मुझे भी तन्त्रजाल में ही असम से उड़ा लाया है। मेरे माँ-बाबा(पिता) कामाख्या गए थे । वहीं मैं इसकी जाल में फँस गई। सम्मोहित-प्रभावित माँ-बाबा ने भी आपत्ति न जतायी। उल्टे, अपनी करोड़ों की कलकत्ते वाली सम्पत्ति इसके नाम कर दी वशीयत में। वहीं कालीबाड़ी में विधिवत विवाह हुआ हम दोनों का। मुझे इसके सम्पर्क में आए दो साल हो गए। ज्यादातर समय प्रेम के वजाय कलह में ही गुज़रता है। पिछले ही महीने टोह लेती हुई, किसी तरह यहाँ पहुँची थी राजस्थान की एक युवती और साथ में थी एक हरियाणवी और एक लखनवी महिला भी। उन तीनों की जुबानी जो कुछ भी सुनी-जानी तो रूह काँप उठी। पैरों तले की ज़मीन थर्राने लगी थी। भले ही उनके ज़मीन-ज़ायदाद बरकरार रहे हों, किन्तु अस्मत-आबरू ! वो तो परवान चढ़ ही गया न इसके हबश़ के आगे । ईश्वर की शुक्रगुजार हूँ कि उन्हें समय रहते चेत आया और किसी तरह इस दरिन्दें की चँगुल से बाहर निकलने में सफल हो पायीं, अन्यथा सुदूर सागर पार किसी होटल की शोभा बढ़ा रहीं होती...। —कहती हुई फूट-फूट कर रोने लगी थी — किन्तु मैनें तो दोनों गँवाए...बाबा की दौलत भी और अपना आबरू भी...मेरे बहुत से फोटोग्राफ और कई तरह के डौकूमेंट्स पर उसने मेरे हस्ताक्षर ले रखें हैं...धोबी के गधे की तरह मैं घर की रही न घाट की...जीवन से पलायन करने के लिए मौत से समझौता भी नहीं कर सकती...तुम एक सुलझे हुए इन्सान दीख रहे हो...जब से आए हो, मैं तुम्हारे चरित्र और व्यक्तित्व की परख करने में लगी हूँ...तुम ये न सोचो कि मैं कामातुरा हूँ...तुम पर डोरे डाल रही हूँ...तुम्हारी भी नयी-नवेली बीबी है...औरत की व्यथा-वेदना और संताप का मुझे पूरा अनुभव है...एक प्रौढ़ मित्र की हैशियत से मैं तुमसे सही सुझाव चाहती हूँ—मैं क्या करूँ...मुझे क्या करना चाहिए...?

उसकी दर्दभरी दास्ताऩ और फ्रॉडाचार्य के करतूत सुन कर सोढ़नदासजी का सिर चकराने लगा था। उस अभागन को देने के लिए उनके पास कुछ तात्कालिक सुझाव के शब्द न थे। मेज पर सिर टिकाये वे सोचने लगे थे— मैं भी कहाँ आ फँसा ! कई कागज़ातों पर मैंने भी तो आँखमूँद कर दस्तखत कर दिया है। बेरोजगारी के चक्कर में झूठेश्वरनाथ ने मुझे भी फँसा डाला । ठीक ही कहा जाता है कि मित्रता समान बुद्धि-विचार वालों के साथ ही निभती है। साढ़ूभाई यानी झूठेश्वरनाथ बिलकुल फ़ॉडाचार्य की पंक्ति में बैठने लायक इन्सान हैं..।

लगभग पूरी रात दोनों गुमसुम बैठे रहे थे। कोई सही उपाय न सूझ रहा था। किन्तु अगली सुबह असमय में ही दरवाजे पर दस्तक हुई। और दरवाजा खोलते ही पुलिस की टीम दनादन दाखिल हो गई मकान के अन्दर। एक-एक कमरे की तलाशी ली जाने लगी। फाइलें खँघाली जाने लगी और अन्ततः मकान में मौज़ूद दोनों जनों का वयान दर्ज़ किया जाने लगा। पुलिस का सुझाव था कि एक ही उपाय है— सरकारी गवाह बनकर कानून को सहयोग दो। शेष बारह महिलाओं ने भी यही किया है। तेरहवीं की ही तलाश थी,जो आज पूरी हुई...।

मरता क्या न करता। हुआ वही जो पुलिस चाहती थी। ईमानदार पुलिस यदि चाह जाए तो गड़े मुर्दे की भी गवाही लेले। अपराधी को पाताललोक से भी उठा लाये। मकड़जाल से उलझे मामले को भी चन्द महीनों में सुलझा दे। सनसनी खेज घटना ने कई राज्यों को एक साथ समेट लिया था। कितने ही आई.ओ. सक्रिय हो गए थे।

शीघ्र ही शुरु हो गया अदालती चक्कर—हाज़िरी, पेशी, गवाही और गवाहों की तबाही। एक साथ सभी राज्यों के मामलों को पटना में ही देखा जाने लगा, क्योंकि मुज़रिम पटना के नजदीक का ही मूल निवासी था, मुख्य कार्यालय बुद्ध की नगरी में था और मुख्य गवाह के रूप में अन्तिम बंगालन बीबी ही थी । साल लगते-लगते सबकुछ निपट गया। माल-जप्ती-कुर्की के साथ बीसबर्षा नहीं, बल्कि आजीवन सजा मुकर्रर की गई। कोई दोस्त-महीफ़, चेला-चाटी आगे नहीं आए। फ़्रॉडाचार्य का फ़र्ज़ीबाड़ा नेस्तनाबूद हो गया...।

उस घटना के वर्षों-वर्षो बाद आज अचानक पटने की तंग गलियों में ही उससे मुलाकात हो गई। उसकी आँखों पर चढ़े मोटे चश्में के कारण बिना चश्में वाले सोढ़नदासजी तो उसे पहचान न पाए, किन्तु आज भी उसकी पारखी निग़ाहें सोढ़नदासजी को पहचाने में जरा भी देर न की। आज उसके पास अपनी कहानी कहने के लिए कुछ था ही नहीं। किन्तु इतना अवश्य बतलायी कि सज़ायाफ़्ता सेल में ही ख़ुदकशी कर ली फ्रॉडाचार्यजी ने। तेरह बीबियों के शौहर को न दो गज ज़मीन ही मिली और न किसी परिजन की मुखाग्नि। प्रशासनिक निगरानी में पेट्रोल छिड़ककर फूँक दिया गया वहीं कहीं परिसर में ही।

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#कमलेश पुण्यार्क

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