साधक का द्वन्द्व(आत्ममन्थन का नवनीत) भाग 1- पुरोवाक् एवं आमुख

 साधक का द्वन्द्व (आत्ममन्थन का नवनीत)





                         सस्नेह समर्पित

     सनातन के भावी ध्वजवाहकों को

         श्री सुमंगलम् साहित्य-वाटिका

              का सताइसवाँ पुष्प

         कमलेश पुण्यार्क (गुरुजी)

     विषयानुक्रम

       पुरोवाक्—                                .

v आमुख—                                   .

v सांख्य की समझ—                      १२.

v योग की साधना—                      १०५.

v भक्ति की ज्योति—                      १६७.

v महारास में विलय—                    १८३.

v उपसंहार—                               २२९.

    लेखक परिचय—                        २३१.

                   

     पुरोवाक् 

मेरे प्रिय आत्मन् !

          आप प्रियजनों का स्नेह ही बारम्बार खींच लाता है मेरी क्लान्त लेखनी और दुर्बल आँखों को। स्नेहिल होकर, पुनः-पुनः उस संवाद-साधिका का सहारा लेना पड़ा है ।

आशा है मेरे प्रिय उपद्रवीनाथजी से तो आप परिचित अवश्य होंगे , जिन्होंने अखबारीबाबू से अपना चिट्ठा लिखवा लिया था बिल्कुल हँसी-खेल में ही।

कुछ सुधीजनों ने तो इसे सिर्फ पढ़ा ही नहीं, बल्कि रट्टामार लिया।   बाबा उपद्रवीनाथ का चिट्ठा को घुट्टी बना लिया ।

किसी पुस्तक को आठ-दस बार पढ़ना पाठक की सहृदयता और धैर्य के साथ-साथ लेखक के सौभाग्य का भी सूचक है। उन पाठकों की जिज्ञासा और द्वन्द्व ने ही मुझे पूरे आठ वर्षों बाद पुनः उसी शैली में  शेष कुछ कहने को विवश कर दिया है।

हालाँकि इस चिट्ठे की शैली पूर्व की भाँति पूर्ण रूपेण औपन्यासिक नहीं है, फिर भी संवाद-प्रवाह को बोझिल होने से बचाने का भरपूर प्रयास किया है मैंने। आप चाहें तो इसे प्रश्नोत्तरशैली या संवादशैली कह सकते हैं।

किसी उपन्यास में  नायक-नायिका का होना अनिवार्य होता है न ! प्रेम और विरह भी आवश्यक अंग हैं न ! किन्तु यहाँ यत्किंचित् दृश्यांकन के साथ विशुद्ध संवाद ही है—मात्र दो व्यक्तियों के बीच, बिल्कुल कृष्णार्जुन संवाद की याद दिलाने वाले अन्दाज में। जबकि न कृष्ण हैं और न अर्जुन। किन्तु हाँ, कुरुक्षेत्र जैसा, बल्कि उससे भी कहीं ज्यादा विस्तार वाला युद्धभूमि तो अवश्य है—“भवसागर का युद्धक्षेत्र सुख-दुःख, पाप-पुण्य, स्वर्ग-नरक, कर्म-अकर्म-विकर्म, पुनर्जन्म-मोक्ष... अनगिनत द्वन्द्व । और इन युग्म-द्वन्दों में जूझता सामान्य मनुष्य। करे तो क्या करें, जाय तो कहाँ जाय, कर्म-कर्तव्य-करणीय का निर्धारण करना ही कठिन हो जाता है ।

 प्रायः प्रत्येक अभ्यासी के समक्ष कलिकाल के नानाविध विकट द्वन्द्वात्मक व्यूह की विकरालता होती है, जिसमें वह घुसने का या तो प्रयत्न ही नहीं करता या घुसने की धृष्टता करके, उलझ जाता है ,नदी के सेवार में उलझे अनाड़ी तैराक की तरह, क्योंकि योग्य गुरु या मार्गदर्शक का सर्वथा अभाव है वर्तमान में।  किन्तु हाँ, प्रोफेशनलगुरु पग-पग पर मिल जाते हैं खुर पुजाई और कन फुँकाई के लिए।

ऐसी विकट परिस्थिति में नाम के आगे गुरुजी का पुछल्ला देखकर, लोग यथासम्भव सम्पर्क साधने का प्रयास करते हैं, जबकि मैं हर पूछने वाले को सावधान करता हूँ कि गुरु बहुत ही गरिमामय पद है, जिसके योग्य मैं कदापि नहीं। जानकार और ज्ञानवान में आकाश-पाताल का अन्तर होता है। गुरुजी वाला पूँछ तो एकबार प्रशासनिक पदाधिकारियों की बैठक में खोंस दिया गया था, क्योंकि हरबार वे मेरे नाम का गलत उच्चारण करते थे और मैं टोक देता था। इसी क्रम में एकदिन एस.पी. साहब ने कह दिया कि आज से  गुरुजी कहा करेंगे, क्योंकि आप खजूर की छड़ी हिलाते, पुराने गुरुजी के अन्दाज में हमलोगों को डपट देते हैं...। और तबसे ही ख्यात हो गयी मेरी ये उपाधि। बाद में मुझे भी इसे चिपकाए रखना अच्छा लगने लगा।  

प्रस्तुत पुस्तक साधक का द्वन्द्व शतशः शुभेच्छु पाठकों के विभिन्न जिज्ञासाओं पर आधारित आत्ममन्थन का नवनीत है, जिसमें विशेषकर दो प्रियजनों— चि.आशुतोष मिश्र (परसा, औरंगाबाद) और चि. मनीष मिश्र (बेला, गया) की विशेष प्रेरणा रही है। फलतः किंचित् अनुभवों को संकलित करके, भावी पीढ़ी के लिए सुरक्षित कर देने का उनका प्रीतिकर आग्रह मैं टाल न सका।

चूँकि बाबाउपद्रवीनाथ का चिट्ठा के माध्यम से साधनात्मक तृष्णा जागृत कराना मेरा उद्देश्य था, इस कारण व्यावहारिक (प्रैक्टिकल) बातों की चर्चा बिल्कुल नहीं की गई थी वहाँ।

हालाँकि पुस्तकीय जानकारी मात्र से किसी साधना में उतरना निरापद नहीं है, फिर भी योग्य गुरु के अभाव की किंचित् भरपाई भी तो जरुरी है—इस विचार से संवादशैली में साधक के द्वन्द्वों का समाधान करने का प्रयास किया गया है यहाँ।

विशिष्ट जिज्ञासुओं से मेरा आग्रह है कि श्रीमद्भगवद्गीता के समन्वय-सिद्धान्त और सांख्य के मौलिक सिद्धान्तों को यथासम्भव आत्मसात करने का प्रयास अवश्य करें।

   भक्ति की अविचल-अविरल ज्योति के सानिध्य में यदि  महर्षि  कपिल का सांख्य और महर्षि  पतञ्जलि का योग समेकित रूप से साधा जाए तो साधना के राजमार्ग पर निःशंक, निर्बाध यात्रा सुनिश्चित है।

तत् साक्षी है आत्ममन्थन का ये नवनीत, जिसे आप सुधीजनों  (विशेषकर नयी पीढ़ी के अभ्यासियों) के लिए संकलित करने की धृष्टता कर रहा हूँ।

जी हाँ, संकलन ही (लेखन कैसे कहूँ इसे)। सनातन वाङ्गमय में ऋषियों ने जितना संजो दिया है, उसे अद्यतन आलोक देकर, प्रस्तुत ही तो कर रहा हूँ। भुवनभास्कर के सघन प्रकाश की उपस्थिति में टॉर्चलाइट का प्रक्षेपण करने की धृष्टता जैसी ही तो बात है !

विषय-वस्तु की स्पष्टता हेतु तत्सम बहुल शब्द-प्रयोग के साथ ही  उर्दू, फारसी, अरबी, अंग्रेजी के शब्दों का भी भरपूर प्रयोग किया गया है। इसके साथ ही मॉडर्न सांयन्स के तकनीकि शब्दावलियों का भी समावेश है। और हाँ, सांयन्स को विज्ञान न समझें—ये मैं हमेशा कहते आया हूँ, क्योंकि सांयन्स को विज्ञान कहना विज्ञान ही नहीं सनातन का भी अपमान है।

आशा है नये अभ्यासियों और नवोदित चिंतकों के लिए ये सुरुचिकर,  प्रीतिकर और उपयोगी होगा।

और हाँ, प्रतिज्ञा तो नहीं, किन्तु आशंका है कि ये मेरी अन्तिम रचना हो। क्योंकि पहले से ही कई आधी-अधूरी रचनाएँ पड़ी हैं। उनमें कितने को पूर्ण करके, आपके सामने परोसने में सफल हो पाऊँगा—ईश्वर ही जाने, मैं कठपुतली भला कैसे दावा करूँ ! हरे कृष्ण ! हरे कृष्ण !

विनीत—                                                      बुद्ध पूर्णिमा,

कमलेश पुण्यार्क                                          विक्रमाब्द २०८३

श्री सुमंगलम् आश्रम,

मैनपुरा, कलेर(अरवल)बिहार

guruji.vastu@gmail.com, 8986286163

                                 

                                  आमुख

        शिवनगरी काशी में मरने पर मोक्ष मिलता है, जबकि विष्णुनगरी गया में मरने के बाद भी मोक्ष दिलवाया जा सकता है—ऐसा प्रायः सुनते आ  रहे हैं।  उस मोक्षप्रदायी भूमि श्रीविष्णुनगरी गया के प्रति सनातनियों की उदासीनता और राजनीतिज्ञों के प्रकोपवश, निर्वाणभूमि बुद्धनगरी (बोधगया) का वर्चश्व दिनोंदिन बढ़ता जा रहा है। अन्तरराष्ट्रीय तीर्थभूमि को पर्यटकभूमि का स्वरूप देने के लिए सजाने-सवाँरने में हमारी सरकार पुरजोर प्रयत्नशील है। धर्मभीरू तीर्थयात्री भला कितना देंगे, भोगवादी विदेशियों की तुलना में ! और वैसे भी हम सन्तोषी स्वभाव सनातनी, बुद्ध को भी तो विष्णु का अवतार मान ही लिए हैं। फलतः क्या फर्क पड़ना है—विष्णुनगरी हाईलाईटहो या बुद्धनगरी ! और यदि मुझ अकेले को कुछ फ़र्क महसूस हो भी , तो इससे दुनियावालों को क्या फ़र्क पड़ना है !

            पौराणिक प्रसंगानुसार सुख्यात है कि उसी विष्णुनगरी, गया में भस्मकूट पहाड़ी पर जगत् के व्यवस्थापक श्रीविष्णु के सुदर्शनचक्र के सौजन्य से दक्ष-पुत्री सती का युगल पयोधर पातित हुआ है, जो मंगलागौरी सिद्धपीठ के नाम से विख्यात है। शाक्तसम्प्रदाय के ५१ शक्तिपीठों में इसका स्थान वरेण्य है। वस्तुतः ये पालनपीठ है। किन्तु हास्यास्पद ये है कि उदरजीवी -जिह्वालोलुपों ने इस दक्षिणपीठ को भी वामपीठ बना डाला है । पता नहीं कब से ये कुप्रथा चली आ रही है—छागबलि के बिना माता मंगलागौरी प्रसन्न ही नहीं होती !  

 धन्य हो माँ मंगले ! कुछ तो कृपा करो बुद्धिहीनों पर !  अपना पीन-पयोधर-पान कराकर जगत् का पोषण करती हो और उसी जगत् के एक निरीह प्राणी का भक्षण भी करती हो—तुम्हारी ये लीला मुझ अज्ञानी के समझ से परे है । मैं तो वस इतना ही  समझता हूँ कि बलि अनिवार्य है शक्ति-उपासना में, किन्तु बलि-विधान और बलि-वस्तु का भेद है उभय पीठों के लिए। स्वार्थान्ध,अज्ञानियों ने तो बलि का शब्दार्थ ही संकुचित-विकृत कर दिया है।

            खैर जो भी हो। कभी अवसर मिले. मुझ मूरख को इस योग्य समझो यदि तो समझा देना इस रहस्य को—सामने नहीं, तो सपने में ही आकर सही। अभी तो मैं स्वयं ही उलझा हूँ—तुम्हारी लीला-वैचित्र्य में ।  

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बहुत दिनों बाद उस दिन भागिनेय के वैवाहिक समारोह में भाग लेने हेतु मंगलागौरी के प्रांगण में जाने का अवसर मिला । उसी परिसर में एक भव्य समारोह-स्थल बना हुआ है, जिसमें विवाह हेतु दोनों पक्ष एकत्रित हुए थे। कार्यक्रम की मध्यान्तरी में मन बना कि जल्दी से माँ का दर्शन कर आऊँ । देर होने पर पट बन्द हो जायेगा।

            आदतन मुझे भीड़भाड़ से बड़ी घबराहट होती है। सन्त-महात्माओं के दर्शन की कौन कहे,  धक्कामुक्की करके साक्षात ईश्वर का दर्शन भी मुझे रास नहीं।  नेता-अभिनेता के दर्शन की तो कभी ललक ही न रही—भला ये कब से दर्शनीय हो गए !

            जनवास स्थल से बाहर निकल कर मन्दिर-परिसर में ऊपर आया तो पाया कि गर्भगृह बिलकुल खाली पड़ा है, जिसके एक कोने में चिलम सुड़कते एक सज्जन विराज रहे हैं पुजारीजी का आसन सम्भाले—औंघियाते हुए, जिनको किसी ऐंगल से ब्रह्मणत्व ने छूआ तक नहीं था।

            मेरे पदचाप से पुजारी की खुमारी थोड़ी ढीली हुई तो दक्षिणा की आश में आतुर, सविनय आमन्त्रण ठोंक दिए — आ जाइये ! अन्दर आकर बढ़िया से दर्शन कीजिये। ऐसा मौका बहुत कम मिलता है यहाँ...।

            सुअवसर पाकर मैं श्रद्धावनत गर्भगृह में प्रवेश कर, वायें कोने में आसन मारकर बैठ गया और क्षुधित-तृषित-अधीर बालक की भाँति जपापुष्पावरण में अवगुण्ठित मातृपयोधरों का नेत्र-पान करने लगा।

बामुश्किल अभी पाँच मिनट बीते होंगे। एकाग्रता की भूमिका  बन ही रही थी कि तुषारापात हो गया पुजारीजी के शब्दवेधी वाण से—         ज्यादा देर यहाँ वैठकी लगाने की अनुमति नहीं है—न मन्दिर  समिति से और न प्रशासन से...अभी हाल में ही माँ के जेवर चोरी हो गए हैं...।एकाग्रता (धारणा) का थोड़ा भी सुस्वाद मिला हो जिन्हें, वे सहज ही समझ सकते हैं कि कैसी मनोदशा हुई होगी मेरी !

क्रोधावेश को सन्तुलित करने के प्रयास में, खिन्न चित्त बाहर निकल कर, विशाल कदम्ब तले बने टूटे-फूटे चबूतरे पर आकर बैठ गया ठुड्डी पर हथेली टिकाकर। कुछ ऐसी ही घटना घटी थी वर्षों पहले विष्णुपद के गर्भगृह में भी मेरे साथ। फर्क इतना ही था कि जेवर की जगह पूजा का परात चोरी जाने की बात कहते हुए हिदायत दी गई थी कि मन्दिर के गर्भगृह में ध्यान-साधना एलाऊ नहीं है।  और उस दिन के बाद फिर कभी विष्णुपद-दर्शन हेतु ललक ही नहीं जुटा पाया। क्या माँ मंगला भी यही चाहती हैं !

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